Friday, 10 July 2020

बदला तो पूरा हुआ, पर असल चुनौती अभी शेष है. / विजय शंकर सिंह


कानून के हांथ बहुत लंबे होते हैं। कभी कभी इतने लंबे कि, कब किसकी गर्दन के इर्दगिर्द आ जांय पता ही नहीं चलता है। एक सड़क दुर्घटना, घायल मुल्जिम द्वारा भागने की कोशिश, और फिर उसे पकड़ने की कोशिश, पुलिस पर हमला, पुलिस का आत्मरक्षा में फायर करना, और फिर हमलावर का मारा जाना। विकास दुबे के कल सुबह से चल रही सनसनी का यही अंत रहा। महाकाल के मंदिर से गिरफ्तार हो कर बर्रा के पास हुयी मुठभेड़ तक यह सनसनी लगातार चलती रही और आज जब मैं सो कर उठा तो बारिश हो रही है, और सोशल मीडिया पर विकास दुबे के मारे जाने की खबरें भी बरस रही हैं। यह खबर हैरान नहीं करती है क्योंकि यह अप्रत्याशित तो नहीं ही थी। प्याले और होंठ के बीच की दूरी कितनी भी कम हो, एक अघटित की संभावना सदैव बनी ही रहती है।

विकास दुबे खादी, खाकी और अपराधी इन तीनों के अपावन गठबंधन का नतीजा है और कोई पहला या अकेला उदाहरण भी यह नहीं है । शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे विकास दुबे द्वारा 8 पुलिसकर्मियों की दुःखद हत्या के बाद, उससे सहानुभूति शेष रही हो, पर यह एक अपराधी का खात्मा है, सिस्टम में घुसे अपराध के वायरस का अंत नहीं है। विकास दुबे मारा गया है, उसके अपराध कर्मो ने उसे यहां तक पहुंचाया, पर जिस अपराधीकरण के वायरस के दम पर वह, पनपा और पला बढ़ा, वह वायरस अब भी ज़िंदा है, सुरक्षित है और अपना संक्रमण लगातार फैला रहा है। असल चुनौती यही संक्रमण है जो शेष जो हैं, वे तो उसी संक्रमण के नतीजे हैं।

इस प्रकरण को समाप्त नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे एक उदाहरण समझ कर उस संक्रमण से दूर रहने का उपाय विभाग को करना चाहिए। राजनीति में अपराधीकरण को रोका थामा जाय, यह तो फिलहाल पुलिस के लिये मुश्किल है लेकिन पुलिस तंत्र कैसे अपराधी और आपराधिक मानसिकता की राजनीति से बचा कर रखा जाय, यह तो विभाग के नेतृत्व को ही देखना होगा। 8 पुलिसकर्मियों की मुठभेड़ के दौरान हुयी शहादत, पुलिस की रणनीतिक विफलता, और पुलिस में बदमाशों की घुसपैठ और हमारे मुखबिर तंत्र जिसे हम, क्रिमिनल इंटेलिजेंस सिस्टम कहते हैं, की विफलता है। क्या अब हम फिर से, कोई फुंसी, कैंसर का थर्ड या फोर्थ स्टेज न बन जांय, को रोक सकने के लिये तैयार हैं ?

कहा जा रहा है कि सारे राज विकास दुबे के मारे जाने के बाद दफन हो गए । यह बात भी इस साफ सुथरी और सीधी मुठभेड़ की तरह मासूम है कि, कौन से राज पोशीदा थे जो दफन हो गए ? हां एक राज ज़रूर रहस्य ही बना रहा कि उस काली रात को जब डीएसपी देवेन्द्र मिश्र अपने 7 साथियों सहित उस मुठभेड़ में मारे गए तो असल मे हुआ क्या था ? विकास दुबे को पुलिस के रेड की खबर किसने दी थी और फिर खबर नियमित दी जा रही थी या यही ब्रेकिंग न्यूज़ थी कि उसके यहां छापा पड़ने वाला है ? इस राज़ का खुलना इसलिए भी ज़रूरी है कि यह एक हत्यारे का अंत है न कि अपराध का पटाक्षेप।

रहा सवाल राजनीति में घुसे हुए अपराधीकरण के राज़ के पोशीदा रह जाने का तो वह राज़ अब भी राज़ नहीं है और कल भी राज़ नहीं था। विकास दुबे अगर ज़िंदा भी रहता तो क्या आप समझते हैं कि वह सब बता देता ? वह बिल्कुल नहीं मुंह खोलता और जिन परिस्थितियों में वह पकड़ा गया था उन परिस्थितियों में वह अपने राजनीतिक राजदारों का राज़ तो नहीं ही खोलता। यह तो पुलिस को अन्य सुबूतों, सूचनाओं और उसके सहयोगियों से ही पता करना पड़ता। क्या सरकार केवल विकास दुबे के राजनीतिक, प्रशासनिक और व्यापारिक सम्पर्को की जांच के लिये भी कोई दल गठित करेगी या इसे ही इतिश्री समझ लिया जाएगा ?

विकास के सारे आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी अभी जिंदा हैं। विकास के फोन नम्बर से उन सबके सम्पर्क मिल सकते है। मुखबिर तंत्र से सारी जानकारियां मिल सकती हैं। उनके अचानक सम्पन्न हो जाने के सुबूत भी मिल सकते हैं। राजनीति में कौन कौन विकास दुबे के प्रश्रय दाता हैं यह भी कोई छुपी बात नहीं है। पर क्या हमारा पोलिटिकल सिस्टम सच मे यह सब राज़ और राजनीति, पुलिस तथा अपराधियों के गठजोड़ के बारे में जानना चाहता है और अपराधीकरण के इस वायरस से निजात पाना चाहता है या वह केवल 8 पुलिसकर्मियों की शहादत का बदला ही लेकर यह पत्रावली बंद कर देना चाहता है ? बदला तो पूरा हुआ पर अभी असल समस्या और चुनौती शेष है।

यह एक उचित अवसर है कि सीआईडी की एक टीम गठित कर के 8 पुलिसजन की हत्या की रात और उसके पहले जो कुछ भी चौबेपुर थाने से लेकर सीओ बिल्हौर के कार्यालय से होते हुए एसएसपी ऑफिस तक हुआ है, उसकी जांच की जाय। एसटीएफ को जिस काम के लिये यह केस सौंवा गया था वह काम एसटीएफ ने पूरा कर दिया और अब उसकी भूमिका यहीं खत्म हो जाती है। विकास दुबे के अधिकतर नज़दीकी बदमाश मारे जा चुके हैं। जो थोड़े बहुत होंगे वे स्थानीय स्तर से देख लिए जाएंगे। अब ज़रूरी है कि उसके गिरोह का पुलिस, प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रो में जो घुसपैठ है उसका पर्दाफाश किया जाय जिससे यह गठजोड़ जो समाज मे आपराधिक वातावरण का काफी हद तक जिम्मेदार है वह टूटे।

माफिया का जिस दिन आर्थिक साम्राज्य दरकने लगेगा उसी दिन से अपराधियों का मनोबल भी टूटता है। अपराध से यकायक बढ़ती हुयी संपन्नता, और अफसरों एवं राजपुरुषों की नजदीकियां युवाओं को इस तरह का एडवेंचर करने के लिये बहुत ही ललचाती हैं। गाड़ी पलट मार्का मुठभेड़ों से जनता खुश होती है क्योंकि वह शांति से जीना चाहती है, गुंडों बदमाशों से मुक्ति चाहती है। यह मुक्ति चाहे उसे न्यायिक रास्ते से मिले या न्याय के इतर मार्ग से। यह ऐसे ही है जैसे कोई बीमार एलोपैथी से लेकर नेचुरोपैथी तक की तमाम दवाइयां अपने को स्वस्थ रखने के लिये आजमाता है, कि न जाने कौन सी दवा काम कर जाए ! पर ऐसी मुठभेड़ों पर हर्ष प्रदर्शन, न्यायिक व्यवस्था पर जनता के बढ़ते अविश्वास का ही परिणाम है।

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 9 July 2020

आत्मसमर्पण या गिरफ्तारी, यह रहस्य महाकाल ही जानें / विजय शंकर सिंह


सुबह जब खबर मिली कि उज्जैन के महाकाल मंदिर में  कानपुर विष्णु कांड का आठ पुलिस अफसरों का हत्यारा विकास दुबे पकड़ा गया तो तत्काल दो बातें दिमाग मे कौंधी। अभी तक आत्मसमर्पण के लिये मुल्जिम किसी न किसी अदालत का परिसर चुनते थे पर इसने देश का एक प्रसिद्ध शिव मंदिर और वह भी सावन के महीने में जब कि शिव मंदिरों में वैसे भी भीड़ भाड़ रहती है क्यों चुना औऱ दूसरे विकास के फरार होने की जो खबरें मिल रही थीं वह नेपाल, बिहार, दिल्ली हरियाणा के शहरों तक तो मिल रही थी पर मध्यप्रदेश के उज्जैन या मध्यप्रदेश के किसी और शहर की ओर, विकास दुबे के मूवमेंट का कोई सुराग नहीं मिला है। सारी सतर्कता दिल्ली की ओर केंद्रित रही।

दो दिन पहले फरीदाबाद के एक होटल में उसके उपस्थिति की सूचना मिली, तो यही शक गहराया कि वह दिल्ली में ही किसी अदालत में सरेंडर होने को इच्छुक है। एक खबर यह भी मिली कि, नोयडा के फ़िल्म सिटी में वह किसी मीडिया हाउस के सामने आत्मसमर्पण कर सकता है। पुलिस को जैसी जैसी सूचनाएं मिलती रही पुलिस उसी तरह के इंतज़ामात करती रही। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विकास दुबे ने कानपुर से दिल्ली फिर, वहां से फरीदाबाद, फिर रोहिणी फिर फरीदाबाद  फिर वहां से दिल्ली और फिर वहां से अंत मे महाकाल की शरण मे उज्जैन तक की सारी यात्राएं बसों से की जिससे कहीं संदेह न हो सके। 

पर असल खेल महाकाल के मंदिर में खेला गया। वह एक सामान्य दर्शनार्थी की तरह,मंदिर जाता है, औऱ अपनी पहचान घोषित कर के जोर से खहता है कि, मैं हूँ विकास दुबे कानपुर वाला। एक सुरक्षा गार्ड उसे पकड़ लेता है और फिर तो पुलिस आती है और उसे अपनी हिरासत में लेती है। थोड़ी देर बाद यूपी पुलिस भी यह पुष्टि कर देती है कि महाकाल नदिर में पकड़ा जाने वाला व्यक्ति कुख्यात और वांछित अभियुक्त बिकास दुबे है। 

महाकाल का मंदिर शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में आता है और वहां की भस्म आरती बहुत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि, महाकाल, अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करते हैं। विकास की गिरफ्तारी के बाद ही मीडिया में उसकी मां का एक इंटरव्यू चलने लगा जिंसमे उसकी मां ने यह कहा कि हर साल विकास सावन के महीने में महाकाल का दर्शन करने जाता रहता है। यानी सावन में महाकाल का दर्शन करने जाने की उसकी एक नियमित आदत रही है। जब कि यह बात कितनी सही है यह तो जब उससे पूरी पूछताछ हो जाय तभी बताया जा सकता है। 

उज्जैन से कुछ और भी खबरें मिल रही हैं जो इस रहस्य को और भी गहरा कर रही हैं। जैसे, कल यानी 8 जुलाई की शाम को डीएम आशीष सिंह और एसएसपी मनोज कुमार, उज्जैन महाकाल के मंदिर में गए थे और उन्होंने वहां दर्शन नहीं किया, बल्कि मंदिर प्रबंधन से कुछ बातचीत की। हालांकि सावन के महीने में वहां भीड़ भाड़ होने की संभावना होती है और इस संदर्भ में जिला मैजिस्ट्रेट और एसएसपी का मंदिर में जाना और वहां के प्रबंधन से मुलाकात करना, असामान्य बात नहीं है,  पर उसी के अगली सुबह यानी 9 जुलाई को विकास का मंदिर से गिरफ्तार हो जाना इस सामान्य दौरे को असामान्य ज़रूर बना देता है। 

विकास दुबे को उज्जैन से गिरफ्तार करके कानपुर लाया जा रहा है, और अब यह बाद में पता चलेगा कि, उसे पुलिस कस्टडी के रिमांड पर लिया जाता है या नही। लेकिन यह अपराध इतना गम्भीर और उलझा हुआ है कि इसकी कई अनसुलझी गुत्थियों को खोलने के लिये, इसे पुलिस कस्टडी रिमांड पर लेकर गहनता से पूछताछ करनी चाहिए। इस रहस्य का पर्दाफाश होना भी बहुत ज़रूरी है कि, आखिर हत्या के बाद वह कहां कहां रहा, किससे किससे मिला औऱ कहाँ कहाँ से होता हुआ वाह उज्जैन पहुंचा और वहां वह गिरफ्तार हुआ। अभी एनडीटीवी की एक खबर के अनुसार, उसे एमपी पुलिस ने यूपी पुलिस को बिना किसी ट्रांजिट रिमांड के ही सौंप दिया है। आज 9 जुलाई के सुबह की गिरफ्तारी है तो पुलिस उसे 24 घँटे तक अपनी कस्टडी में रख सकती है और तब मैजिस्ट्रेट के यहां पेश करेगी। लेकिन सामान्यतः दूसरे प्रदेश में गिरफ्तार किए गए मुल्जिम को ट्रांजिट रिमांड पर ही लाया जाता है। 

अब विकास दुबे के खिलाफ पुलिस के कार्यवाही की असली और प्रोफेशनल परीक्षा होगी कि वह किस प्रकार और कितनी कुशलता से विकास दुबे को 8 पुलिसकर्मियों की जघन्य हत्या के मामले में अदालत से सज़ा दिला पाती है। अब पुलिस को चाहिए कि होशियार और विवेचना में माहिर अनुभवी अधिकारियों की एक टीम का गठन करे और विवेचना के सूत्र दर सूत्र मिलाते हुए कुख्यात हत्यारे के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दायर करे। पूछताछ के लिये भी अलग से टीम रहनी चाहिए जो मुक़दमे के हर बिंदु पर उससे पूछताछ करे और फिर सुबूतों को जुटाए। 

सरकार को हाईकोर्ट से अनुरोध कर के एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन इस महत्वपूर्ण मुक़दमे की सुनवाई के लिये करना चाहिए। सत्र न्यायालय से अनुरोध किया जाय कि, दिन प्रतिदिन के आधार पर इस मुकदमे का त्वरित ट्रायल हो । साथ ही, अभियोजन की तरफ से भी कुशल एडवोकेट नियुक्त किये जाय। रूटीन टाइप की पैरवी से अभियुक्त को सज़ा दिलाना मुश्किल होगा। अभियुक्त बेहद शातिर और इसके संपर्क सूत्र बहुत गहरे हैं। महाकाल या किसी भी बड़े देवालय में इस प्रकार का आत्मसमर्पण या गिरफ्तारी की घटना शायद पहले नही हुई है। इसमे कोई संदेह नहीं कि भविष्य की कानूनी लड़ाई के लिये यह मुल्जिम अपनी तैयारी कर चुका है। 

हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि थाना शिवली कानपुर देहात के 2001 में हुए संतोष शुक्ल हत्याकांड में उसके खिलाफ गवाही नही मिली थी और वह बरी हो गया था। इस बार वह पैटर्न न हो यह पुलिस को देखना होगा। अब सब कुछ एक बेहद सुगठित विवेचना और सक्रिय पैरवी पर ही निर्भर करता है। यह एक सामान्य मामला नहीं है बल्कि यह पुलिस को एक सीधी चुनौती है और इसका जवाब तभी संभव है कि या तो उसकी गिरफ्तारी के दौरान कोई इनकाउंटर हो जाय और वह मारा जाय, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सका है तो अब उसे कानूनन अदालत में सुबूत पेश करके कठोर से कठोर सजा दिलवाई जाय। 

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 8 July 2020

क्या राजनीति का अपराधीकरण रोकने की इच्छाशक्ति हमारे नेताओं मे है ? / विजय शंकर सिंह


क्या सभी राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट न देने और उनसे चुनाव में कोई सहायता न लेने पर संकल्पबद्ध हो सकते हैं ?
अगर नहीं तो अपराध पर ज़ीरो टॉलरेंस और भय मुक्त समाज की बात करना बंद कर दें।

यूपी विधानसभा में माननीय अपराधियों का जो विवरण एडीआर से मिला है वह इस प्रकार है।
● साल 2017 में हुए यूपी विधान सभा चुनाव में कुल 402 विधायकों में से 143 ने अपने ऊपर दर्ज आपराधिक मामलों का विवरण पेश किया था. इन नेताओं ने चुनावी हलफ़नामे में अपने ऊपर दर्ज मुक़दमों की जानकारी दी थी।
● साल 2017 में भारी बहुमत हासिल कर सत्ता में आई बीजेपी के 37 फ़ीसद विधायकों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं.
● बीजेपी के कुल 312 विधायकों में से 83 विधायकों पर संगीन धाराओं में मामले दर्ज हैं जिसका ज़िक्र उन्होंने अपने चुनावी हलफ़नामे में भी किया है.
● समाजवादी पार्टी के 47 विधायकों में से 14 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
● बीएसपी के 19 में से पांच विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
● कांग्रेस के सात विधायकों में से एक पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
● तीन निर्दलीय विधायक भी चुनाव जीते हैं और इन सभी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

वीर बहादुर सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो सबसे पहली बार संगठित माफिया गिरोहों के खिलाफ कार्यवाही उनकी सरकार ने की थी। उक्त कार्यवाही में गोरखपुर का चर्चित माफिया और बाद में पार्टी बदल बदल कर माननीय मंत्री बनने वाला हरिशंकर तिवारी और विधायक चुना जाने वाला वीरेंद्र शाही, यह दोनो माफिया सरगना पकड़े गए थे । गोरखपुर क्षेत्र में ब्राह्मण क्षत्रिय जातिगत आधार पर अपराध और माफिया का एक बड़ा संगठित संजाल था, जो लंबे समय तक पूरे पूर्वांचल को संक्रमित किये रहा। दोनो ही जातियों के युवा इन दोनों माफिया सरगनाओं के प्रति आकर्षित और मोहित थे, जो अनावश्यक रूप से उनके आपसी विवाद में निरर्थक ही मरते कटते रहे। नॉर्थ इंस्टर्न रेलवे के जोनल मुख्यालय होने के कारण, गोरखपुर रेलवे के बड़े ठेकों में भी यह दोनो सरगना घुसे। दोनो ने ही वक्त ज़रूरत पर एक दूसरे की अंदरूनी मदद भी की। फिर और भी नेता जातिगत और माफिया वर्चस्व के आधार पर तो बंटे ही यह अपराध और जातिगत ध्रुवीकरण का यह संक्रमण अन्य सरकारी विभागों में भी फैल गया और फिर भला पुलिस कैसे इस राजरोग से बचती !

नेता पहले बदमाश को संरक्षण देता है और फिर इसलिए उसे पालता और बढ़ावा देता है कि वह, बदमाश, चुनाव में उस नेता का भौकाल बनाता है। बाद में जब बदमाशों को यह लगने लगा कि जब उनके बाहुबल के आधार पर नेता, सांसद, विधायक और मंत्री तक बन जाता है, तो फिर वे ही क्यों न माननीय बन जांय। बस यहीं से राजनीति का अपराधीकरण या अपराध का राजनीतिकरण शुरू हो गया। वीर बहादुर सिंह के समय यह दोनो माफिया सरगना, पहली बार एनएसए, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत जेल भेजे गए थे। तभी माफिया गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिये 1986 में यूपी गैंगस्टर निवारण अधिनियम लाया गया था। यह अधिनियम पुलिस को व्यापक अधिकार देता है और इस अधिनियम में जमानत आदि के प्राविधान सामान्य अपराधों से अधिक कड़े हैं। अतः इसका असर भी अपराधियों पर पड़ा और माफियाओं की गतिविधियों पर लगाम भी लगी।

लेकिन माफियाओं ने अपना स्वरूप बदला और वे विभिन्न सरकारी ठेकों में घुस गए। अब वे कारोबार में घुसे। रेलवे के ठेकों के अतिरिक्त, खनन और अन्य सरकारी ठेकों में भी उन्होंने अपना संजाल फैलाया। सरकार ने ठेके देने के लिये ठेकेदारों के चरित्र प्रमाणपत्र और पुलिस वेरिफिकेशन के नियम बनाये तो, इन माफियाओं ने अपने सहयोगियों, जिसके क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं थे, के नाम पर ठेके लेने लगे। अब इससे जो, धन आया, उससे माफिया का एक नया स्वरूप विकसित हुआ, जिंसमे ठेके तो माफिया दिलाता है और उसका कुछ पैसा लेता है, पर काम अन्य लोग करते हैं। यह एक नए प्रकार की रंगदारी और सामंतवाद का जन्म था जिंसमे इलाके की बड़ी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी भी अपना काम सुचारू रूप से चलाने के लिये खलवंदना करने लगीं। बिना श्रम से अर्जित पूंजी जब आती है तो वह अपराध की ओर स्वाभाविक रूप से ले जाती है।

इस प्रकार राजनीति, ठेका, और माफिया का जो गठजोड़ बना वह तमाम कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर भारी पड़ा। गैगस्टर एक्ट में अचानक धनी और सम्पन्न हो जाने वाले लोगों पर भी नज़र रखने का एक प्राविधान था। उनके संपत्ति के स्रोत की जांच और अगर वह सम्पत्ति उस गिरोह के अपराधकर्म से संचित है तो, उसकी जब्ती के भी प्रविधान हैं। पर इन सब पर कार्यवाही उतनी नहीं हुयी जितने मनोयोग से होनी चाहिए। आज विकास दुबे के सहयोगी जय बाजपेयी की संपत्तियों की खबर मिल रही है और यह भी खबर है कि इनकम टैक्स विभाग ने भी इसकी जांच शुरू कर दी है। यह भी तो पूछा जा सकता है कि, जय बाजपेयी की, लगातार बढ़ती संपत्तियों के बीच, इनकम टैक्स विभाग का इनवेस्टिंग विंग क्या कर रहा था ? जय बाजपेयी 300 रुपये रोज़ पर एक प्रिंटिंग प्रेस में कुछ ही सालों पहले काम करता था, और आज उसकी संपत्तियां कानपुर से लेकर दुबई सिंगापुर तक फैली हैं। क्या यह आर्थिक साम्राज्य विस्तार असामान्य नही लगता है ?

पुलिस, राजस्व और आयकर इन तीनो कानून लागू करने वाली एजेंसियों को साथ ही मिल कर इन माफियाओं के काले साम्राज्य पर हमला करना और शिकंजा कसना पड़ेगा तभी माफियाओं का संजाल टूटेगा। माफिया एक समानांतर सरकार की तरह होता है। पुलिस से लेकर सरकार तक उनकी पैठ होती है और ज़रूरत पड़ने पर एक दूसरे के विपरीत रहने वाले माफिया अपने आर्थिक हितों के लिये एक दूसरे के साथ समझौता भी कर लेते हैं।

अपराध नियंत्रण हेतु, देश की विधि व्यवस्था में कानूनी प्रविधानो की कमी नहीं है। गैंगस्टर एक्ट 1986 के बाद और भी सख्त कानून बने हैं पर उन सब कानूनो के तात्कालिक असर के बाद, इन माफिया गिरोहों पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ता है। इसका सबसे बड़ा कारण है, राजनीति में उनकी पैठ, धमक और हनक। सरकार एसओ चौबेपुर विनय तिवारी को इस कांड से जोड़ कर उसे जेल भेज दे या बर्खास्त कर दे, पर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि विनय तिवारी इस पूरे अपराधीकरण के खेल में एक भुनगा है और उसकी बर्खास्तगी से माफियागिरी पर कोई बहुत असर नहीं पड़ेगा। सड़ चुका यह तंत्र, फिर से कोई न कोई नया विनय तिवारी पैदा कर लेगा। उसके पास अनेक विनय तिवारी बनाने का हुनर, सामर्थ्य और राजनीतिक तथा प्रशासनिक कनेक्शन है।

मार्च, 1993 में मुंबई धमाकों के बाद भारत सरकार ने, केंद्रीय गृह सचिव रहे एनएन वोहरा की अध्यक्षता में राजनीति के अपराधीकरण की छानबीन के लिये एक कमेंटी गठित की थी। इसे क्राइम सिंडिकेट, माफिया संगठनों की गतिविधियों के बारे में हर संभव जानकारी जुटाने और उसका विश्लेषण करने का काम दिया गया था जिन्हें सरकारी अधिकारियों और नेताओं से संरक्षण मिलता हो। एनएन वोहरा एक आईएएस अफसर थे। उन्होंने छः महीने में ही अपनी जांच रिपोर्ट पांच अक्टूबर, 1993 को सरकार को सौंप दी थी। लेकिन वोहरा कमिटी की रिपोर्ट, आज 27 साल बाद भी न जाने कहाँ गुम हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें दाऊद इब्राहिम के साथ नेताओं और पुलिस के नेक्सस की विस्फोटक जानकारियां हैं। इसीलिए कोई भी राजनीतिक दल इसे सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। अपराधियों से किस किस नेता अफसर व्यापारियों के रिश्ते हैं क्या यह जानने का अधिकार जनता को नहीं है ?

रिपोर्ट सौंपने के दो साल बाद तक इसे संसद में नहीं रखा गया, जबकि इसे संसद के पटल पर रखने की मांग जब कांग्रेस सत्ता में थी तो भाजपा करती रही और जब भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस करती रहती है पर 1995 से अब तक दोनो ही दल लंबे समय तक सरकार में रह चुके हैं और भाजपा तो अब भी सत्ता में है पर यह रिपोर्ट न तो सार्वजनिक की गयी और न ही सार्वजनिक की जा रही है । 1995 में एक सनसनीखेज हत्याकांड हुआ, नैना साहनी का । वह भी राजनीति के अपराधीकरण का मामला था। तब तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने, अगस्त, 1995 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट के कुछ पन्ने सार्वजनिक किए। यह रिपोर्ट 100 से ज्यादा पन्नों की है लेकिन सरकार ने सिर्फ 12 पन्ने सार्वजनिक किए। कोई नाम सार्वजनिक नहीं किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेक्सस में कुछ एनजीओ और बड़े पत्रकार भी शामिल थे।

जब 2014 में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में सरकार बनी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब राज्यसभा के सांसद दिनेश त्रिवेदी ने वोहरा कमिटी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की। दिनेश त्रिवेदी ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिये सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की पर सरकार ने अदालत से कह दिया कि वह कोई भी रिपोर्ट पटल पर रखे या न रखे जाने का निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र है, और उसने सदन के पटल पर यह रिपोर्ट न रखने का निर्णय लिया है । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की यह बात भी मान ली। लेकिन अभी भी इस रिपोर्ट में क्या है यह रहस्य खुलने का इंतज़ार देश को है।

इस बीच बीते चार आम चुनाव से राजनीति में आपराधिकरण तेजी से बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में इसका जिक्र किया है। 2004 में 24% सांसदों की पृष्ठभूमि आपराधिक थी, लेकिन 2009 में ऐसे सांसदों की संख्या बढ़कर 30 पर्सेंट और 2014 में 34 पर्सेंट हो गई। चुनाव आयोग के मुताबिक, मौजूदा लोकसभा में 43 पर्सेंट सांसदों के खिलाफ गंभार अपराध के मामले लंबित हैं।

फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद, एक महत्वपूर्ण आदेश दिया कि, राजनीतिक दलों को आपराधिक रेकॉर्ड वाले उम्मीदवारों के बारे में खुद जनता को जानकारी देनी होगी। अदालत ने यह भी कहा है कि अगर इस पर अमल नहीं हुआ तो अवमानना की कार्रवाई होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि नेताओं, अपराधियों, अफसरों और पुलिस के बीच गठजोड़ को जड़ से खत्म करने की कोशिश क्यों नहीं होती?

आखिर सरकार इस मामले पर आगे बढ़ कर सभी दलों से बात करके इस अपराधीकरण के संक्रमण को रोकने के लिये कोई सार्थक पहल क्यों नहीं करती ? पहल तो दूर की बात है, इस रिपोर्ट को नरेंद्र मोदी सरकार ने भी सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटाई । जबकि इन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि, एक साल के अंदर सभी दागी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बना कर उनके मुकदमों का निस्तारण किया जाएगा। 26 सितंबर, 2018 को चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की पीठ ने राजनीति के अपराधीकरण को 'लोकतंत्र के महल में दीमक' करार दिया था।

तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने एक मुक़दमे के फैसले में,1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद गठित एनएन वोहरा कमिटी की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया और यह टिप्पणी की कि,
" भारतीय पॉलिटिकल सिस्टम में राजनीति का अपराधीकरण कोई अनजान विषय नहीं है बल्कि इसका सबसे दमदार उदाहरण तो 1993 के मुंबई धमाकों के दौरान दिखा जो क्रिमिनल गैंग्स, पुलिस, कस्टम अधिकारियों और उनके राजनीतिक आकाओं के नेटवर्क का परिणाम था। "
चीफ जस्टिस मिश्रा ने बताया कि कैसे इसमें सीबीआई, आईबी, रॉ के अधिकारियों ने इनपुट दिया कि आपराधिक नेटवर्क समानांतर सत्ता चला रहे हैं। वोहरा कमिटी की रिपोर्ट में कुछ ऐसे अपराधियों का जिक्र भी है जो स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद के सदस्य बन गए। पांच जजों की बेंच ने कई ऐसे पीआईएल की सुनवाई की, जिनमें दोषी ठहराए जाने से पहले ही आरोपों के आधार पर नेताओं की सदस्यता खत्म करने की अपील की गई थी। हालांकि बेंच ने इस पर कार्रवाई का अंतिम फैसला संसद पर छोड़ दिया।

सरकार को एक और अधिकार है कि वह कोई भी आपराधिक मामला वापस ले सकती है। यह किसी भी वादी का एक वैधानिक अधिकार है। आपराधिक मामलों में वादी सरकार होती है तो सरकार चाहे तो वह कोई भी मुकदमा वापस ले सकती है। किसका मुकदमा वापस होना है, कौन सा मुकदमा वापस होना है और कब वापस होना है यह निर्णय सरकार का होता है और सरकार का यह निर्णय शुद्ध रूप से राजनीतिक निर्णय होता है। जिले से जिसका मुकदमा वापस होना है उसके बारे में डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट और एसपी से रिपोर्ट मांगी जाती है और रिपोर्ट में मुक़दमे वापसी के विरोध में लिखा जाता है, फ़िर भी सरकार मुकदमा वापस ले लेती है। क्या कभी यह सोचा गया है कि इस प्रकार के मुक़दमे वापसी का क्या असर पुलिस पर पड़ता है ? पुलिस ने झूठा मुकदमा लिख लिया, रंजिश से मुकदमा लिखा दिया गया, पोलिटिकल दुश्मनी है आदि आदि अनेक तर्क दिए जाते हैं पर कोई यह नहीं कहता कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर के इसकी सुनवाई कर ली जाय और तब राजनीति कीजिए।

आज जो भी बहस माफिया और गुंडों के बारे में आप देख सुन पढ़ रहे हैं उन सबका स्रोत राजनीति से जुड़ा है। राजनीति के अपराधीकरण और जातीय तथा धार्मिक भेदभाव ने पुलिस को गहरे तक संक्रमित कर रखा है। दिक्कत है कि इसका इलाज करने में जो सक्षम है, यानी सरकार वह खुद भी इससे अधिक संक्रमित है। अब उसका इलाज कौन करे असल सवाल यही है। सभी राजनीतिक दलों को कम से कम एक बात पर एकमत होना पड़ेगा कि वे किसी भी आपराधिक व्यक्ति का न तो पक्ष लें और न ही उन्हें अपने दलों में शामिल करें। आज हालत यह हो गई है कि बुरी मुद्रा ने अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया है। विकास दुबे पकड़ा जा सकता है और यह भी हो सकता है कि पकड़ते समय कोई मुठभेड़ हो जाय तो उसमें वह मार भी दिया जाय । उसका आर्थिक साम्राज्य तहस नहस भी हो सकता है। पर इस बात की क्या गारंटी है कि कल कोई दूसरा विकास दुबे नहीं पैदा होगा। असुर रक्तबीज की तरह होते हैं। क्या आज हमारे रहनुमाओं में, राजनैतिक इच्छा शक्ति इतनी है, कि राजनीति और अपराध का यह गर्हित घाल मेल वे रोक सके ?

( विजय शंकर सिंह )

Monday, 6 July 2020

सरकार, अब आप का इकबाल बुलंद नहीं रहा ! / विजय शंकर सिंह

उत्तर प्रदेश के कानपुर के गाँव बिकरू मे, एक अभियुक्त विकास दुबे को पकड़ने गयी पुलिस पार्टी और बदमाशों के बीच हुयी  मुठभेड़ मे, एक डीएसपी सहित कुल आठ पुलिसजन मारे गए। इस घटना पर पुलिस अफसरों और अन्य लोगो की तरह तरह प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। पुलिस की तैयारी और इस ऑपरेशन पर भी सवाल उठ रहे हैं और राजनीति के अपराधीकरण के साथ साथ पुलिस में आपसी विश्वासघात यानी पुलिस अपराधी सम्बन्धो पर भी उंगलिया उठ रही हैं । इस जघन्य हत्या की निंदा और विकास दुबे की गिरफ्तारी की कोशिशें भी चल भी रही हैं। पुलिस व्यवस्था के संदर्भ में,  अगस्त बॉलमेर जो कैलिफोर्निया के बर्कले शहर के पहले पुलिस प्रमुख और आधुनिक पुलिस व्यवस्था के जन्मदाताओं में से एक माने जाते हैं का यह कथन उल्लेखनीय है, 
" एक पुलिसकर्मी, जनता द्वारा उपेक्षित, उपदेश देने वालों द्वारा आलोचित, फिल्मों द्वारा हंसी मज़ाक़ का पात्र, अखबारों द्वारा निंदित, जज और अभियोजन अधिकारियों द्वारा असमर्थित होता है। वह सम्मानित समाज द्वारा त्याग दिया गया, अपने कैरियर में असंख्य बार खतरों और लोभ से घिरे रहते हुए भी, जब वह कानून को लागू करता है तो उसकी भर्त्सना भी की जाती है और कानून लागू नहीं करने पर, नौकरी से वह बर्खास्त भी हो जाता है।" 
मैं इसे जिगर मुरादाबादी के ही शब्दों में कहूँ तो, यह आग का दरिया है और डूब कर जाना है ! 

कर्तव्य पालन में हुयी यह बेहद दुःखद घटना, उत्तर प्रदेश के हाल के अपराध के इतिहास की एक बड़ी घटना है। डीएसपी, देवेंद्र मिश्र, संभवतः मथुरा के जवाहर बाग कांड में शहीद होने वाले एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के बाद  ऐसी घटनाओं में शहीद होने वाले, दूसरे राजपत्रित अधिकारी हैं। कानपुर का बिकरु गांव, न तो बीहड़ का कोई गांव है और न ही विकास दुबे किसी संगठित दस्यु गिरोह का सरगना ही है। यह गांव,  शहर से बहुत दूर भी नहीं है। विकास दुबे, एक आपराधिक चरित्र का व्यक्ति है और किसी समय बसपा का एक छोटा मोटा नेता भी था। लेकिन ज़रूरत पड़ने पर सफेदपोश बदमाश जैसे सभी राजनीतिक दलों में ठीहा खोज लेते हैं, वैसे यह भी ठीहा खोज लेता है। यह एक अजीब विडंबना भी है ऐसे क्षवि के दुष्टों और अपराधी नेताओं में जनता एक अजब तरह का नायकत्व भी ढूंढ लेती है। 

यह नायकत्व का नतीजा है या, हमारी राजनीति और चुनाव व्यवस्था की गम्भीर त्रुटि, कि, पंद्रह वर्ष से या तो विकास दुबे, स्वयं या तो उसकी पत्नी या उसका भाई,  ज़िला पंचायत का सदस्य होता रहा है। अपने गांव का वह निर्विरोध प्रधान भी एक समय रहा है। छोटे स्तर पर ही राजनीतिक गतिविधियों के कारण  विधायक या संसदीय के चुनाव में वह किसी न किसी के साथ जुड़ा ही रहता है। 2001 में, इसने, कानपुर देहात के शिवली थाने में ही भाजपा के एक नेता, संतोष शुक्ल, जो तब दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री भी थे, की हत्या कर दी थी। यह हत्या थाने के अंदर थाना कार्यालय में ही हुयी थी। आप यह जान कर हैरान रह जाएंगे कि दिन दहाड़े थाना ऑफिस में हुयी हत्या की उस घटना में विकास दुबे अदालत से बरी हो गया था। उस समय वह उसी क्षेत्र के एक वरिष्ठ बसपा नेता, के काफी करीब था। 2017 में एसटीएफ़ द्वारा भी गिरफ्तार किया गया था, पर उसमे भी वह फिलहाल जमानत पर है। इसके अतिरिक्त अन्य मुकदमों में भी यह  मुल्जिम है। साथ ही वह एक रजिस्टर्ड हिस्ट्रीशीटर भी है। 

पुलिस की इस ऑपरेशन में क्या कमियां रही हैं इस पर जांच भी हो रही होगी, लेकिन एक बात तो तय है कि इस दबिश या रेड की भनक विकास दुबे को ज़रूर रही होगी। अब जो खबरें आ रही है उसके अनुसार, थाने से ही इस दबिश की गोपनीयता भंग हुयी है। ऐसे ऑपरेशन के समय पुलिस पार्टी द्वारा मुल्जिम की शक्ति, उसके छिपने के ठिकानों और फ़ायरपावर का अंदाज़ा लगाने मे कहीं न कहीं चूक ज़रूर हो गयी है। बदलते परिवेश के अनुसार, पुलिसिंग के ढर्रे भी बदलने होंगे और दबिश तथा इसी प्रकार के अन्य ऑपरेशन के समय एक प्रोफ़ेशनल परिपक्वता बनाये रखनी पड़ेगी। 

घटना के एक दिन बाद पुलिस ने बिकरू गांव में विकास दुबे के मकान को ध्वस्त कर दिया। यही नहीं, घर के बाहर खड़ी उसकी कई गाड़ियों को भी नष्ट कर दिया गया। इस ध्वस्तीकरण के कानूनी प्राविधानों पर भी चर्चा चल रही है। क़ानूनी जानकारों की मानें तो क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसमें किसी अभियुक्त या दोषी साबित किए गए अपराधी का घर, ध्वस्त किया जाए। कानून में कुर्की का प्राविधान है, पर उसका वारंट एक निर्धारित प्रक्रिया द्वारा अदालत से मिलता है न कि, किसी की मनमर्जी से। कुर्की में चल संपत्तियां ज़ब्त कर ली जाती हैं। उस स्थिति में कई बार घर की खिड़कियां और दरवाज़े तोड़ दिए जाते हैं क्योंकि अदालत में उन्हें चल संपत्ति दिखा दिया जाता है। उन्हीं की आड़ में कई बार दीवार भी गिरा दी जाती है लेकिन पूरा घर ज़मींदोज़ कर दिया जाए, ऐसी कार्रवाई नहीं की जाती है। कुर्की में अचल संपत्ति को भी कुर्क करने का एक प्राविधान है जिसमें थोड़ा समय लगता है पर वह बहुत ही प्रभावी प्राविधान है। कानूनी प्रक्रिया यह है कि, मुल्जिम को गिरफ़्तार किया जाय,  अगर मुल्जिम ने संपत्ति का नुक़सान किया है तो उसकी वसूली हो, लेकिन संपत्ति को नष्ट करने का अधिकार क़ानून नहीं देता है। 

पुलिस का मुख्य काम अपराधों की रोकथाम, अन्वेषण और क़ानून व्यवस्था बनाए रखना है। क़ानून का पालन हो यह उसकी सबसे पहली प्राथमिकता है। क़ानून कैसे लागू किया जाएगा, कौन उसे लागू करने के लिए कौन कौन अधिकृत है और कब लागू किया जाएगा यह सब क़ानून की किताबों में स्पष्ट रूप से लिखा है। लेकिन जब इन कानूनों के बावजूद भी समाज और जनता को अपेक्षित लाभ नहीं पहुँच पाता है तो, जो कुंठा समाज और सरकार तक पहुँचती है तो, निशाने पर फिर, पुलिस ही आती है। तभी यह मानसिकता भी जन्म लेती है कि अब कानूनन कुछ नहीं हो पायेगा तो, कुछ न कुछ क़ानून से हट कर कदम उठाने पड़ेंगे। जनता जो अक्सर पुलिस पर कानूनन काम न करने का आक्षेप लगाती रहती है, खुले आम क़ानून के उल्लंघन पर पुलिस को हांथों हाँथ ले लेती है। कुछ मित्र इसे असामान्य परिस्थितियों में, उठाया गया असामान्य कदम, कह कर इसका बचाव करेंगे, लेकिन डीके बसु कोड और अदालतें इसे विधि विरुद्ध और पुलिस अराजकता और न जाने क्या क्या कहती हुयी पुलिस को ही कठघरे में खड़े कर देंगी। तब यही असामान्य कदम जो असामान्य परिस्थितियों के लिए एक औषधि के रूप में सुझाया गया था, अचानक पुलिस के लिए हलाहल बन जाता है। 

अक्सर लोग कहते हैं कि, जब तक सख्ती नहीं होगी, अपराध नहीं रुकेंगे। सख्ती का आशय पुलिस के मसल पावर की सख्ती नहीं बल्कि सख्ती से क़ानून को लागू करना है। मैं इस तर्क से सहमत हूँ कि क़ानून कभी कभी अपनी धार खो बैठता है. लेकिन जो पुलिस जन समाज के हित में क़ानून विरोधी तरीके से व्यवस्था बनाने और अपराध रोकने का काम करते हैं क्या उनके हित और हक में समाज और लोग भी, लम्बे समय तक, जब वे कानूनी मुसीबत में रहते हैं, तो कभी खड़े नज़र आते हैं ? तात्कालिक समर्थन की बात मैं नहीं कह रहा हूँ। तत्काल तो लोग सुपर काप घोषित कर ही देते हैं। मेरा अनुभव है, जी नहीं । और फिर वही शास्त्र वचन सामने आता है, हे मनुष्य, अपने कर्मो का फल तो तुम्हे ही भोगना है।

पंजाब में जब केपीएस गिल डीजीपी थे तो पंजाब आतंकवाद के बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा था। क़ानून व्यवस्था का यह हाल था कि कोई क़ानून रह ही नहीं गया था। असामान्य, परिस्थितयों में असामान्य कदम उठाये गए। स्थिति सुधरी और पंजाब में अमन चैन वापस आया । गिल साहब बेहद सराहे गए। लेकिन बाद में, उन्ही असामान्य कदमों पर सवाल भी उठने लगे । कुछ मानवाधिकार संगठन जो आतंकी दिनों में, बिल में घुस गए थे, निकल कर बाहर आये और इतनी याचिकाएं अदालतों में दायर हुईं कि, कल के नायक और त्राता, रातों रात हत्यारे, भ्रष्ट , सुपारी पर ह्त्या कराने वाले खलनायक हो गए।. हद तब हो गयी जब इन्ही याचिकाओं से पीड़ित अमृतसर के एक पूर्व एसएसपी ने रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली। आखिर किस ने झेला यह सब ?

ऐसे क़ानून के उल्लंघन को आप राज्य के पक्ष में कह कर उचित ठहरा सकते हैं । पर राज्यहित, किसी का निजीहित न बने, क्या ऐसा होने से रोका जा सकता है ? अपने साथियों से यही कहना चाहूँगा कि, हम सब को क़ानून लागू करने की ट्रेनिंग दी गयी है, न कि दुरुपयोग करने की। देश में आपराधिक न्याय प्रशासन के और भी अंग हैं। न्याय पालिका है, अभियोजन है, कारागार है। कभी किसी न्यायालय ने यह जानते हुए भी कि अभियुक्त ने सच में अपराध किया है पर साक्ष्य नहीं है, और तब भी दण्डित करने का एडवेंचर किया है ? शायद नहीं। जज चाहते हुए भी नहीं करते। लेकिन पुलिस, सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में हैं और खुद को कानून से इम्यून समझते हुए,  अक्सर ऐसे रास्ते एडवेंचर के रूप में अपना लेती है। न्यायालय की अपनी मज़बूरियाँ और कमियाँ होंगी, पर उसके लिए केवल पुलिस ही क़ानून तोड़ें, और फिर कोई ऊंच नीच हो जाय तो अकेले भुगतें यह बिलकुल उचित नहीं है। विवेचना में मेहनत करना, सुबूत जुटाना और उसे साबित करना कठिन काम है. लेकिन यह तो पुलिस का दायित्व और कर्त्तव्य है। सारी ट्रेनिंग ही इसी लिए दी जाती है। सिंघम और दबंग वास्तविक पुलिसिंग नहीं है। यह एडवेंचर है। तीन घंटे का मन बहलाव है। इस प्रवित्ति से लोगों को तात्कालिक लाभ भले मिल जाए, पर पुलिस के लिए इसके दूरगामी परिणाम बहुधा सुखद नहीं होते हैं, और यह उचित भी नहीं है। क़ानून का राज क़ानून के प्राविधानों से ही लागू किया जाना चाहिए, गैर कानूनी तरीके से नहीं। 

विकास दुबे के सभी मोबाइल फोन की, पिछले छः महीने की कॉल डिटेल अगर निकाली जाय तो राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण का एक बेहद भयानक चेहरा सामने आएगा। उतर प्रदेश हो या बिहार या कोई अन्य प्रदेश, अक्सर ऐसे गुंडे और अपराधी न केवल राजनीति में अपना असर रखते हैं, बल्कि वे अपनी अपनी बिरादरी के नायक के रूप में भी मूर्धाभिषिक्त हो जाते हैं। चाहे वह गोरखपुर के हरिशंकर तिवारी हों या वीरेंद्र शाही, या मऊ के मुख्तार अंसारी, या मुरादाबाद के डीपी यादव, प्रयागराज ( इलाहाबाद ) के अतीक अहमद, ग़ाज़ियाबाद के मदन भैया, आजमगढ़ के रमाकांत यादव, सीवान, बिहार का शहाबुद्दीन, आदि आदि न केवल अपने अपराध कर्मो से राजनीतिक गलियारों में सम्मान पाते हैं बल्कि वे अपनी अपनी बिरादरी के हीरो के रूप में भी देखे जाते हैं।  जीवन भर जनता के दुःख दर्द में खड़े रहने वाले पढ़े लिखे नेता जहां चुनाव हार जाते हैं वहीं यह तबका चुनाव दर चुनाव जीतता चला जाता है। जनता इनके पीछे दीवानों सी चिपकती है और मजे की बात जनता इनके इतिहास और आपराधिक बैक ग्राउंड को अच्छी तरह से जानती भी है। 

चुनाव सुधार या अपराधी तत्वो को चुनाव में खड़े होने से रोकने की बाते हों, तो, परस्पर घनघोर विरोधी दल भी दो विंन्दुओं पर पूर्णतः सहमत नज़र जाते हैं कि, अपराधियों के चुनाव में भाग न लेने और पार्टी फंड को मिले दान की सार्वजनिक घोषणा पर कोई प्रभावी कानून न बने । राजनीति में यही दो मुख्य बिंदु हैं, जहां से राजनीति का प्रदूषण शुरू होता है और हम आप सब इन्ही अपराधियों के मुखारविंद से झरते हुए सुभाषित सुनते हैं और उन्हें भारी बहुमत से वोट देकर विजयी बनाते हैं। फिर इस बहस में उलझ जाते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण। राजनीति में अपराधीकरण को तो, पुलिस नहीं ठीक कर सकती है, क्योंकि यह उसके बस में नहीं है, लेकिन पुलिस में अपराधी तत्वो की घुसपैठ न हो, यह तो पुलिस को ही सुनिश्चित करना पड़ेगा। पहले भी पुलिस में विभाग में अपराधी तत्वो की पहचान कर के कार्यवाहियां की हैं, अब भी इसे नियमित आधार पर एक अराजनीतिक दृष्टिकोण से करते रहना होगा। 

पुलिस सरकार के बजट में, नॉन प्लान एक्सपेंडीचर की श्रेणी में आती है। इसलिए इसके लिये धन की कमी सदैव बनी रहती है। "  सरकार का सबसे महत्वपूर्ण, मीडिया का पसंदीदा सॉफ्ट टार्गेट, आम जनता से ईश्वरीय अपेक्षा लिए हुए यह विभाग सरकार, सत्ता और अधिकार, का प्रतीक हैं । फिल्मों में कभी पांडू हवलदार, तो कभी सुपरमैन तो, कभी एंग्री यंग मैन, के रूप में यह विभाग चित्रित होता रहता है । पुलिस एक बिरादरी है. पुलिस एक मानसिकता भी है और पुलिस को समाज मे, एक दुर्गुण के रूप में भी अक्सर लिया जाता है। कुल मिलाजुला कर यह सरकार का अकेला विभाग है जो, जब सारी मशीनरी थम जाती है तो, और भी गतिशील हो जाता है। यह नीलकंठ की तरह विषपायी है ।

सिंघम और दबंग फिल्मों में पुलिस जैसी दिखाई गई है वह क्षवि, जनता को बहुत मोहित करती है। इन फिल्मों की कथावस्तु, थीम, लगभग एक जैसा ही सन्देश देती है, कि 'पुलिस अपने विधि विधान से अगर कार्य करेगी तो न तो समाज का भला होगा और न ही जनता का और क़ानून किसी भी प्रकार की बुराई के लिए अप्रासंगिक हो चुका है। पुलिस को क़ानून का राज कायम करने के लिए क़ानून की अवहेलना करनी चाहिए।' अक्सर जनता के लोग अपराधियों को सार्वजनिक रूप से पीटते हुए, गधे पर बिठा कर जुलूस निकालते हुए देख कर प्रसन्न होते हैं और ऐसे दरोगा की जम कर तारीफ़ और वाह वाही करते हैं। लेकिन जब यही खबर कहीं छप जाती है और इसके वीडियो वायरल हो जाते है तो दरोगा जी, कागजों का पुलिंदा लिए अपनी शिकायतों के खिलाफ की जा रही जांचों में बयान देते हुए, अकेले ही नज़र आते है। नायक से खलनायक के बीच की जो सीमारेखा है, वह कब समाप्त हो जाती है पता भी नहीं चलता है।

सरकार का इक़बाल बुलंद है ! यह संवाद आज से पचास साल पहले जब कप्तान साहब बहादुर अपने थानेदार साहब बहादुर से यह पूछते थे कि , कैसे मिजाज़ हैं और इलाके का क्या हाल है तो, लंबे तगड़े और रोबीले चेहरे की रोबदार आवाज़ से यही वाक्य निकलता था। इक़बाल का शाब्दिक अर्थ होता है प्रभाव , असर , रुतबा। बुलंद का अर्थ होता है ऊंचा। पर अब सरकार का इक़बाल बुलंद नहीं रहा ! क्यों ? यह न सिर्फ हुजूर सरकार अफसरों के लिए सोचने की बात है बल्कि उन सब के लिए जो एक ही यूनिफार्म में एक ही परेड ग्राउंड पर एक ही वर्ड ऑफ कमांड पर कदम ताल करते हैं । इक़बाल की बुलंदी की क्या बात की जाय, वह तो तनुज्जली की और जा रहा है और जो कुछ विभाग में हो रहा है उसे तो हम सब देख ही रहे हैं । 2015 से 2019 तक के सालों में 1100 बार पुलिस मजाहमत या पुलिस के काम में दखलंदाज़ी की छोटी बड़ी घटनाएं, पूरे देश मे हो चुकी हैं । रोज़ ही अखबारों में कहीं पुलिस से वकील मुल्ज़िम छुड़ा ले रहे हैं तो कहीं दबिश यानी रेड , करने गयी पुलिस पर हमला हो गया है या यातायात नियंत्रण के समय किसी रसूखदार पार्टी के झंडेधारी गाड़ी वाले ने यातायात सिपाही के गिरेबान पर हाँथ रख दिया, जैसी ख़बरें छपती रहती हैं । पुलिस का मनोबल गिरा हुआ है या नहीं यह तो अलग बात है पर असामाजिक तत्वों का मनोबल ज़रूर बहुत बढ़ा हुआ है । यह मनबढई अब इतनी आम हो गयी है कि पुलिस भी इसकी आदी होती जा रही है ।

अगर कानूनी अधिकारों की बात की जाय तो पुलिस को जो अधिकार 1861 के पुलिस अधिनियम और तब के ही संहिताबद्ध आई पी सी , सीआरपीसी और लॉ ऑफ़ एविडेंस में प्रदत्त हैं उसमे कोई कमी नहीं हुयी है बल्कि उसके बाद बहुत से ऐसे क़ानून पास हुए हैं जिसमे पुलिस को और अधिक अधिकार मिले हैं । पुलिस बल की संख्या भी बढी है, लेकिन आबादी के अनुपात में अब भी कम है। गतिशीलता के साथ साथ संचार के साधन भी बढे हैं पर इन सब के बावज़ूद भी पुलिस का रुतबा या सम्मान घटा ही है । ऐसा क्यों है ? यह सवाल अक्सर मेरे और मेरे सहकर्मी मित्र जो पुलिस और प्रशासनिक सेवा में हैं या रह चुके हैं के मन में खदबदाता रहता है ।

अपराध न हो सके इसका जिम्मा तो कोई नहीं ले सकता है लेकिन अपराध होने पर उसका खुलासा हो और दोषी पकड़े जांय यह पुलिस का दायित्व और कर्त्तव्य दोनो है। पर उसे न्यायालय से सजा हो जाय यह जिम्मेदारी अभियोजन की भी है। हमारा कानून न्यायशास्त्र के जिस दर्शन , पर टिका है उसमें सुबूतों का पुख्तापन इतना हो कि, अदालत संतुष्ट हो जाय और मुक़दमे में सज़ा हो जाय। लेकिन यह काम एडवेंचर से नहीं सम्भव है। यह काम सम्भव है तफ्तीश की बारीकी भरी समझ, मनोयोग से की जाने वाली पैरवी और अभियोजन से बेहतर तालमेल से। क्या वर्तमान कानून व्यवस्था की विविधता को देखते हुए किसी भी मुक़दमे की विवेचना करने वाले एसआई या इंस्पेक्टर को जो थाने की ड्यूटी में भी है इतना समय और धैर्य है ? जिला पुलिस में तो नहीं ही है। सीआईडी और क्राइम ब्रांच की बात और है। सरकार के पास लंबे समय से पुलिस सुधार की संस्तुतियां लंबित हैं पर आज तक उन पर कोई निर्णय नहीं हुआ। न तो एसओ से लेकर डीजीपी के तयशुदा कार्यकाल पर कोई फैसला हुआ न तो पुलिस की रिक्तियों की नियमित भर्ती पर, न शहरों में कमिश्नर सिस्टम लागू करने पर, न तो विवेचना को कानून व्यवस्था से अलग करने पर और न ही पुलिस की अन्य लॉजिस्टिक समस्याओं पर। क्योंकि यह सरकार की प्राथमिकता में है ही नही और हमारा ख्वाब भयमुक्त समाज का है ! 

पुलिस को कानून को कानूनी तरह से लागू करने पर अड़ा रहना चाहिए और कोई भी ऐसा निर्णय जो विधितन्त्र और विधिनुकूल न हो उसे सरकार को विनम्रता से अवगत करा भी देना चाहिए। सरकार को अपनी प्रशासनिक भूमिका में काम करते समय, राजनैतिक प्रतिबध्दता से मुक्त रहने की आदत डालनी पड़ेगी। अपराध नियंत्रण के अनेक पुराने कानूनी उपाय जो उस्ताद बता गए हैं वे अब अपनाए नहीं जाते है क्योंकि वे समय लेते हैं। इंस्टेंट सफलता के इस युग मे जिस सिस्टमैटिक पुलिसिंग की ज़रूरत है वह अब धीरे धीरे भुला दी जा रही है और दबंग और सिंघम मॉडल पुलिसिंग उसका जगह ले रही है। आज पुलिस का इकबाल खत्म हो रहा है और हम मिथ्या भौकाल के युग मे पहुंच गए हैं। लेकिन एक तल्ख हक़ीक़त यह है कि  समाज, सड़क, संसद औऱ संस्थाओं में आपराधिक मानसिकता का जो वायरस संक्रमित हो गया है उसका इलाज कोई नहीं करना चाहता है। जो कुछ भी इलाज के रूप में आप देख रहे हैं वह महज कॉस्मेटिक है। 

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 4 July 2020

अस्पताल में 'सावधान बैठ' / विजय शंकर सिंह

'सावधान बैठ', सावधान, विश्राम, आराम से की तरह ही एक वर्ड ऑफ कमांड है जो तब दिया जाता है जब किसी सैनिक टुकड़ी को सम्बोधित करने के लिए किसी यूनिट में कोई विशिष्ट मेहमान या फौज, पुलिस या सुरक्षा बल का कोई बड़ा अफसर आता है। इसका उद्देश्य होता है कि वह अपने जवानों से मुखातिब हो, उनका हौसला बढाये और अगर कोई तात्कालिक समस्या हो तो उसका वहीं समाधान करे। लेकिन जब कोई मंत्री, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसी यूनिट में भ्रमण करने जाता है तो, यह महज एक औपचारिक और संक्षिप्त सम्बोधन होता है। सम्बोधन के बाद जवानों के साथ ही सभी चाय या सूक्ष्म जलपान या जैसी व्यवस्था हो उसमे सब भाग लेते हैं। इसी बीच जवानों से वीआइपी कुछ हल्की फुल्की बातें करते हैं। वे जवानों से उनकी कुछ समस्याएं पूछते भी हैं, पर जवानों को यह भी समझा दिया जाता है वे ऐसी कोई समस्या न बताएं। अगर समस्याये हों भी तो उसे अपने अधिकारियों को ही बताएं, न कि वीआईपी को । क्योंकि यह एक सेरिमोनीयल सम्मेलन होता है जो, महज एक औपचारिकता होती है।


सैनिक सम्मेलन, सभी सुरक्षा बलों, पुलिस और सेना में जवानों से नियमित बात चीत के लिये आयोजित होने वाली एक प्रथा है जिसे यूनिट कमांडर माह में एक बार आयोजित कर के सम्बोधित करते है। यह सम्मेलन जवानों की मूल समस्याओं से रूबरू होने और उनके निदान के लिये नियमित रूप से आयोजित किये जाते है। सुरक्षा बलों, पुलिस और सेना में कोई भी यूनियन जैसा संगठन, अनुमन्य नहीं है अतः यह सम्मेलन जिसे सैनिक सम्मेलन कहा जाता है, आयोजित किया जाता है। पहले इसे यूनिट कमांडर का दरबार कहा जाता था लेकिन अब यह सैनिक सम्मेलन कहा जाता है।
इसी प्रकार सैनिक अस्पतालों में भी वीआईपी के भ्रमण का एक कायदा है। भ्रमण के दौरान किसे क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका भी एक स्टैंडिंग आर्डर होता है। इसका कारण है कि सेना हो या सुरक्षा बल या पुलिस यह सब एक रिजिमेंटल बल हैं औऱ उसी संस्कृति से आच्छादित हैं। यह मूलतः सैन्य परंपराओं की देन हैं जो ब्रिटिश मिलिट्री सिस्टम से हमे विरासत में मिली हैं। पहले सभी वर्ड ऑफ कमांड अंग्रेजी में होते थे अब वे सभी ड्रिल मैनुअल के अनुसार, हिंदी में स्वीकार कर लिये गए हैं और सेना, सुरक्षा बल और पुलिस के लिये सभी वर्ड ऑफ कमांड एक ही प्रकार से होते हैं।
लेह के पास एक सैनिक अस्पताल में प्रधानमंत्री द्वारा किये गए भ्रमण की कुछ फोटो सोशल मीडिया और अखबारों में छपी हैं, जिंसमे प्रधानमंत्री अस्पताल के वार्ड में जवानों के बीच माइक लेकर प्रसन्न मुद्रा में दिख रहे हैं। वैसे भी मरीज़ों को देखने के लिये अस्पताल में प्रसन्न और सुदर्शन मुद्रा में ही जाना चाहिए, इससे मरीज पर बेहतर और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और किसी भी प्रकार का बेहतर प्रभाव मरीज़ को जल्दी स्वस्थ होने के लिये मानसिक रूप से प्रेरित भी करता है। वीआईपी द्वारा अस्पताल भ्रमण करने का एक उद्देश्य यह भी होता है कि, उनके कष्ट में, और उनके साथ, पूरा देश है और बीमारी तथा चोटिल होने की इस दशा में भी वे न तो अकेले हैं और न ही उनके इलाज और तीमारदारी में कोई कमी होने दी जाएगी। अस्पताल की दशा भी इसी बहाने सुधर जाती है और जो थोड़ी बहुत कमियां रहती हैं वह भी सुधार दी जाती हैं। कभी कभी सद्भाव के रूप में अस्पताल को कुछ अतिरिक्त फंड या कुछ नयी घोषणाएं भी सरकार द्वारा मिल जाती है। यह सब एक प्रकार की अच्छी औपचारिकताये हैं और इनका निर्वाह समय समय पर किया जाना चाहिए।


भारत के सभी प्रधानमंत्री समय समय पर सेना की फॉरवर्ड पोस्ट का निरीक्षण अपने अपने समय मे पहले भी करते रहे हैं। यह परंपरा, युद्ध काल मे भी होती रही है और शांतिकाल में भी। इसी प्रकार गृहमंत्री भी जब सीमा क्षेत्र में जाते हैं तो वे भी अपने आधीन सुरक्षा बल, सीमा सुरक्षा बल, और भारत तिब्बत सीमा पुलिस आदि का भी निरीक्षण करते रहते हैं। वे भी सैनिक सम्मेलन और यूनिट के अस्पताल का भ्रमण करते हैं। और अपनी बात कहते हैं। मोदी जी के पहले रहे प्रधानमंत्रियों में से जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने फॉरवर्ड पोस्ट पर जाकर अपने सैनिकों के सम्मेलन को सम्बोधित किया है और उनसे बातचीत की है। जवाहरलाल नेहरू की नेफा सीमा पर, लाल बहादुर शास्त्री की पाकिस्तान सीमा पर इंदिरा गांधी की गलवां घाटी में सैनिको को संबोधित करते हुए फ़ोटो पहले भी मीडिया और अखबारों में छप चुकी हैं और अब भी गूगल कर के वे देखी जा सकती है।
अस्पताल में भ्रमण के दौरान वीआईपी एक एक मरीज़ के बेड के पास जा कर उनका कुशल क्षेम पूछते हैं, उनके रोग और चोट के बारे में साथ चल रहे मेडिकल सुपरिटेंडेंट से उसके इलाज के बारे कुछ दरयाफ्त करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। वही पर वीआईपी की तरफ से कुछ फल आदि भी मरीज़ को एक टोकन सद्भाव के रूप में दिया जाता है। सैनिक अस्पताल के किस वार्ड में, वीआईपी को जाना है और कितने मरीज़ को वीआइपी से मिलवाना है यह सब पहले से ही तय होता है और यह स्वाभाविक है कि अस्पताल का सबसे सुव्यवस्थित वार्ड ही इसके लिये चुने जाते हैं और मरीज़ भी वही चुने जाते है जो क्रिटिकल न हों और वीआइपी द्वारा कुछ पूछने पर अपने रोग और अपने बारे में भी कुछ बता सकें।


लेकिन यह भी पहली बार ही दिख रहा है कि कोई प्रधानमंत्री किसी अस्पताल में मरीज़ों को देखने जांय और वहां भाषण हो, पीएम के हांथ में किसी मंच के अभिनेता या सूत्रधार की तरह माइक हो, न किसी मरीज़ से कुशल क्षेम पूछने की औपचारिकता हो, न ही फल आदि प्रदान करने की परंपरा का निर्वाह हो, और सब कुछ एक इवेंट की तरह हो। मरीज़ चोटिल, रुग्ण नहीं बल्कि सावधान बैठ की मुद्रा में तन कर बैठे दिख रहे हैं। मरीज का अस्पताल में स्वस्थ चैतन्य और प्रसन्न दिखना एक सुखद अनुभव भी होता। अस्पताल एक घोषित साइलेन्स जोन होता है। ऐसा मरीज़ों की सुविधा के लिया किया जाता है। यह अस्पताल भी सजा धजा है लेकिन इसमें यह कोई अनोखी बात नहीं है। यह भी हो सकता है कि या तो अस्पताल ही इतना भव्य हो या किसी भव्य कॉन्फ्रेंस हॉल को ही अस्पताल में बदल दिया गया हो। और अगर ऐसा प्रधानमंत्री की यात्रा को देखते हुए किसी कॉन्फ्रेंस हॉल को भी अस्पताल में बदल दिया गया है, तो भी यह अप्रत्याशित नहीं है। वीवीआइपी के मुआयने के समय सबसे अच्छा दिखाने की एक स्वाभाविक इच्छा भी होती है। इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। चीजें माहौल औऱ सबकुछ चाक चौबंद तो होना ही चाहिए।
भारतीय सेना दुनिया की गिनी चुनी प्रोफेशल सेनाओं मे से एक है और इसका अराजनीतिक स्वरूप इसके प्रोफेशनलिज़्म को बनाये हुए हैं। 1948, 62, 65, 71 और 1999 के युद्धों में सेना ने अपने प्रोफेशनलिज़्म का परिचय दुनियाभर को दिया है। अनुशासन, और आज्ञापालन की भी कभी कोई गम्भीर शिकायतें नहीं मिली है। मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें ज़रूर मिली हैं पर सेना ने अपने स्तर से उन पर कार्यवाही की भी है। सेना जब भी सामान्य कानून व्यवस्था की डयूटी में लंबे समय के लिये उतारी और तैनात रखी जायेगी तो उसका भी चरित्र और मानसिकता कमोबेश पुलिस की तरह हो जाएगी। अक्सर कमांडर सेना के इस प्रकार की नियमित नियुक्ति का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि सेना या तो मोर्चे पर रहे या बैरक में। हम नॉर्थ ईस्ट और जम्मू कश्मीर में जहां सेना की नियमित लॉ एंड आर्डर की तैनाती सालों से देख रहे हैं वहां ऐसी शिकायते मिल भी रहीं हैं। इनसे न केवल सेना की क्षवि पर भी असर पड़ता है बल्कि उसका प्रोफेशनलिज़्म भी प्रभावित होता है।
सेना का मनोबल तो कभी भी गिरा हुआ नहीं रहा है। यहां तक कि 1962 के चीन युद्ध मे जब हमारी सेना संसाधनों के अभाव में लड़ रही थी। सेना ही हर निर्णय नहीं लेती और न उसे लेना चाहिए। युद्ध हों या न हो यह एक राजनीतिक निर्णय होता है और यह निर्णय घटनाओं की तात्कालिक गर्मी के अनुसार नहीं बल्कि दुनियाभर की कूटनीतिक और घरेलू नीतियों की समीक्षा के बाद ही लिया जाता है। यह बात अलग है कि सेना से हर पल किसी भी आकस्मिकता के लिये तैयार रहने की अपेक्षा की जाती है और वह रहती भी है।

सियाचिन, दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र है औऱ मौसम के लिहाज से सबसे दुर्गम और कठिन भी। वहाँ गर्मियों में भी तापमान शून्य से नीचे रहता है। उक्त दुर्गम रणक्षेत्र में सबसे पहले देश के रक्षामंत्री के रूप में जॉर्ज फर्नांडिस ने दौरा किया था और उनके अनेक दौरे वहां के हुए। उन्होंने जब बर्फ में चलने वाले स्कूटर भेजने का निर्देश अपने मंत्रालय में दिया तो, मंत्रालय ने लालफीताशाही के कारण उसमे देरी कर दी। उन्होंने तब मंत्रालय के ही सिविल अफसरों को वहां का दौरा करने और कुछ दिन वहां बिताने के लिये कहा। नतीजा यह हुआ कि सियाचिन की लॉजिस्टिक समस्याएं भी सबके सामने आयी और उनका समाधान भी हुआ। कहने का आशय यह है कि सेना को जो साज सामान चाहिए, वह उन्हें समय समय पर मिलता रहे ताकि जब युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो तो सेना किसी भी अभाव का सामना न करे।
अभी सीएजी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, सियाचिन, लद्दाख और डोकलम में मौजूद सैनिकों को पौष्टिक भोजन की कमी, बर्फ़ पर चमकती तेज़ धूप से बचने के लिए लगाए जाने वाले ख़ास चश्मे और जूते तक न मिल पाने के प्रमाण ऑडिट रिपोर्ट में आये हैं। अठारह हज़ार से तेईस हज़ार फीट की ऊंचाई वाले सियाचिन और दूसरे बर्फ़ीले फॉर्वर्ड पोस्ट में जवानों के पास इन चीज़ों की कमी की बात महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की ताज़ा रिपोर्ट में कही गई है, जिसे कुछ दिनों पहले ही राज्यसभा में पेश किया गया है। इस पर सेना के एक पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता ने बीबीसी से कहा कि सीएजी की रिपोर्ट में जो कहा गया है वह बहुत ही गंभीर मसला है। हालांकि 'इस तरह की कमी पहली बार नहीं हुई है' और भारतीय सेना के पास हथियारों और दूसरे सामानों की कमी का मामला साफ तौर पर 1999 के कारगिल युद्ध से समय भी सामने आया था। कारगिल पर जनरल वीपी मलिक ने अपने एक किताब, करगिल फ्रॉम सरप्राइज टू विक्ट्री, में कहा है, कि हालांकि हालात तबसे बेहतर है लेकिन सेना आज भी हथियारों और दूसरे उपकरणों की कमी से जूझ रही है।
जनरल मेहता का कहना है कि ये हालात सेना के पास फंड की कमी की वजह से बन रहे हैं और हालांकि बजट में हर सरकार फंड बढ़ाने का दावा करती है लेकिन एक्सचेंज रेट और चीज़ों की बढ़ी क़ीमतों के मद्देनज़र वो नाकाफ़ी साबित होता है। कुछ दिनों पहले जाने-माने अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सशस्त्र सीमा बल के 90,000 जवानों को पैसे की कमी की वजह से कई तरह के भत्ते नहीं मिल पाएंगे। सीएजी की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि जवानों को जो जूते मिल रहे हैं वो रिसाइकिल्ड हैं और बर्फ़ के ख़ास चश्मों की कमी भी गंभीर है, सियाचिन की स्थितियां काफ़ी कठिन हैं और वहाँ पौष्टिक आहार और उपकरणों के बिना जीवन काफ़ी कठिन होता है। सीएजी की यह रिपोर्ट आज की नहीं है फरवरी में अखबारों में छपी है तो यह निष्कर्ष एक साल या दो साल पहले का होगा। हो सकता है कमियां अब दूर कर ली गईं हो।
प्रधानमंत्री एलएसी से 150 से 200 किमी पहले की किसी पोस्ट पर गए थे। वही उन्होंने अस्पताल का निरीक्षण किया और अपनी बात कही। पर एलएसी पर चीन की गतिविधियों पर अभी कोई प्रभाव नहीं पड़ा है और वह वहां अपना सैन्य डिप्लॉयमेंट और बढ़ा रहा है। खबर है वहां उसने अपने आर्मर्ड डिवीजन और सैनिकों की संख्या में भी वृद्धि की है। भारत की तरफ से भी तैयारियां मुकम्मल होंगी। और भारत भी चीन का सैन्य प्रत्युत्तर देने के लिये सक्षम है। लेकिन युद्ध कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं करता है बल्कि वह अनेक समस्याओं को जन्म भी दे देता है। महाभारत का उदाहरण लीजिए। युद्ध तो हुआ लेकिन युद्ध न होने के लिये कितनी कोशिशें श्रीकृष्ण द्वारा की गयीं ? पर जब युद्ध अवश्यम्भावी हो गया तो न च दैन्यम न पलायनम का उपदेश उन्होंने ही दे कर अर्जुन का मोहभंग किया।
चीन एक विस्तारवादी देश के रूप में दुनिया मे उभर रहा है। यह विस्तारवाद ज़मीनी विस्तारवाद है। हालांकि चीन ने भारत मे अपने कॉरपोरेट का भी खूब विस्तार किया है और व्यापार संतुलन की बात करें तो हम उस पर अधिक और वह हम पर कम आश्रित है। कूटनीति, और विदेशनीति के प्रयास तो चलते रहते हैं पर रणक्षेत्र में तो सेना को ही लड़ना होता है। सेना को संसाधन चाहिए, आधुनिक उपकरण चाहिए और थल, नभ और जल हर जगह एक सुगठित औऱ सन्नद्ध सेना चाहिए। जब यह सब हो जाएगा तो मनोबल में और इजाफा होगा। उम्मीद है सरकार इन सब के बारे में भी कुछ न कुछ बेहतर करने के लिए सोच ही रही होगी। रहा सवाल इवेंट का तो, यह सब तो चलता रहता है और चलता रहेगा। हर व्यक्ति की अलग अलग यूएसपी और अलग अलग शैली होती है।
( विजय शंकर सिंह )

Friday, 3 July 2020

कानपुर का बिकरू, मुठभेड़ और 8 पुलिसजन की शहादत. / विजय शंकर सिंह


आज की सुबह बेहद बुरी खबर के साथ शुरू हुयी। सुबह ही सुबह एक पुलिस के ही मित्र का फोन आया कि चौबेपुर थाना क्षेत्र में एक मुठभेड़ हो गयी है और सीओ बिल्हौर सहित कई पुलिसजन मारे गए हैं। बाद में पता लगा कि, कानपुर जिले में चौबेपुर थानांतर्गत, बिकरु गांव में वहां के हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को गिरफ्तार करने गयी एक पुलिस पार्टी पर जिसमें एक डीएसपी देवेन्द्र मिश्र, और एसओ चौबेपुर सहित 8 पुलिसजन थे, एक मुठभेड़ में मारे गए।
कर्तव्य पालन में हुयी यह बेहद दुःखद घटना, उत्तर प्रदेश के हाल के अपराध के इतिहास की एक बड़ी घटना है। डीएसपी, देवेंद्र मिश्र, जो सीओ बिल्हौर थे, प्रतापगढ़ में कुछ सालों पहले, कानून व्यवस्था की एक घटना में मारे जाने वाले डीएसपी जिया उल हक के बाद, संभवतः ऐसी घटनाओं में शहीद होने वाले, दूसरे डीएसपी हैं। बहुत पहले 1982 में जिला गोंडा में इसी प्रकार की घटना में डीएसपी केपी सिंह शहीद हो गए थे।
कानपुर का बिकरु गांव, न तो बीहड़ का कोई गांव है और न ही विकास दुबे किसी संगठित दस्यु गिरोह का सरगना ही है। न ही यह इलाका दस्यु प्रभावित ही है। यह गांव, शहर से बहुत दूर भी नहीं है। विकास दुबे, एक आपराधिक चरित्र का व्यक्ति है और किसी समय बसपा का एक छोटा मोटा नेता भी था। लेकिन ज़रूरत पड़ने पर सफेदपोश बदमाश जैसे सभी राजनीतिक दलों में ठीहा खोज लेते हैं, वैसे यह भी ठीहा खोज लेता है। इलाके में इसकी क्षवि एक दबंग और पेशेवर बदमाश की है और यह है भी। यह एक अजीब विडंबना भी है ऐसे क्षवि के दुष्टों और अपराधी नेताओं में जनता एक अजब तरह का नायकत्व भी ढूंढ लेती है।
यह नायकत्व का नतीजा है या, हमारी राजनीति और चुनाव व्यवस्था की गम्भीर त्रुटि, कि, पंद्रह वर्ष से या तो विकास दुबे, स्वयं या तो उसकी पत्नी या उसका भाई, ज़िला पंचायत का सदस्य रहा है। अपने गांव का वह निर्विरोध प्रधान भी एक समय रहा है। छोटे स्तर पर ही राजनीतिक गतिविधियों के कारण विधायक या संसदीय के चुनाव में यह किसी न किसी के साथ जुड़ा ही रहता है। 2001 में, इसने, कानपुर देहात के शिवली थाने में ही भाजपा के एक नेता, संतोष शुक्ल, जो तब दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री भी थे, की हत्या कर दी थी। यह हत्या थाने के अंदर थाना कार्यालय में ही हुयी थी। मैं उस समय कानपुर में ही नियुक्त था, लेकिन जिले में नहीं बल्कि एसपी एन्टी डकैती ऑपरेशंस था। लेकिन तब मैं घटनास्थल पर यह सूचना मिलने पर गया था।
आप यह जान कर हैरान रह जाएंगे कि दिन दहाड़े और थाना ऑफिस में हुयी हत्या की उस घटना में विकास दुबे अदालत से बरी हो गया था। उस समय वह उसी क्षेत्र के एक बसपा नेता, जो मंत्री भी रह चुके थे के काफी करीब था। 2017 में एसटीएफ़ द्वारा भी गिरफ्तार किया गया था, पर उसमे भी जमानत पर है। इसके अलावा और भी बहुत सी आपराधिक घटनाएं हैं जिनमे यह मुल्जिम है। सभी पर मुक़दमे चल रहे हैं, और वह एक रजिस्टर्ड हिस्ट्रीशीटर भी है।
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि यह केवल बसपा से जुड़ा था या है, बल्कि यह सभी राजनीतिक दलों में अपने स्वार्थानुसार घुसपैठ करता रहता है। राजनीति और समाज सेवा से इसे इलाके में लोकप्रियता मिलती है पर यह मूल रूप से एक अपराधी और सम्पन्न लोगों से धन की वसूली करने वाला व्यक्ति है। यह उस तरह का हार्डकोर क्रिमिनल या आतंकी संगठन जैसा मामला नहीं है, बल्कि यह सफेदपोश लेकिन संगीन अपराध से जुड़ा मामला है।
पुलिस की इस ऑपरेशन में क्या कमियां रही हैं इस पर तो तभी कुछ कहा जा सकता है जब सिलसिलेवार पूरा घटनाचक्र पता चले। अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात तो तय है कि इस दबिश या रेड की भनक विकास दुबे के किसी न किसी करीबी को ज़रूर रही होगी। यह गोपनीयता भंग किस स्तर पर हुयी है , सीधे किसी पुलिसकर्मी की मिलीभगत से हुयी है या जनता के किसी व्यक्ति ने ऐसा किया है यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन एक बात तय है कि ऐसे ऑपरेशन के समय पुलिस पार्टी द्वारा मुल्जिम की शक्ति, उसके छिपने के ठिकानों और फ़ायरपावर का अंदाज़ा लगाने मे कहीं न कहीं चूक ज़रूर हो गयी है। बदलते परिवेश के अनुसार, पुलिसिंग के ढर्रे भी बदलने होंगे और दबिश तथा इसी प्रकार के अन्य ऑपरेशन के समय एक प्रोफ़ेशनल परिपक्वता बनाये रखनी पड़ेगी।
यह भी खबर है कि यह गाँवों में लॉकडाउन के दौरान आवशयक वस्तुएँ बँटवा रहा था और शोभन आश्रम की आकूत संपत्ति पर भी क़ाबिज़ होने की कोशिश कर रहा था । विकास दुबे पकड़ा भी जाएगा, और अगर कोई मुठभेड़ हुयी तो वह मारा भी जाएगा। यह भी हो सकता है कि वह खुद ही अदालत के सामने हाज़िर हो जाय। पर राजनीति के अपराधीकरण का यह दुष्परिणाम पुलिस को जो भोगना पड़ता है, उसका यह एक उदाहरण है।
राजनीति में अपराधीकरण को पुलिस नहीं ठीक कर सकती है क्योंकि यह उसके बस में नहीं है लेकिन पुलिस में अपराधी तत्वो की घुसपैठ न हो यह तो पुलिस को ही सुनिश्चित करना पड़ेगा। यहां पुलिस को विकास दुबे की कितनी खबर थी यह तो नहीं पता पर विकास को पुलिस के संभावित कार्यवाही की पूरी खबर थी इसीलिए यहां पुलिस का यह ऑपरेशन विफल रहा और ज़बरदस्त हानि उठानी पड़ी।
कानपुर में पुलिस मुठभेड़ के दौरान अपराधियों के हमले में शहीद पुलिस कर्मी,
1-देवेंद्र कुमार मिश्र,सीओ बिल्हौर
2-महेश यादव,एसओ शिवराजपुर
3-अनूप कुमार सिंह चौकी इंचार्ज मंधना
4-नेबूलाल, सब इंस्पेक्टर शिवराजपुर
5-सुल्तान सिंह कांस्टेबल थाना चौबेपुर
6-राहुल ,कांस्टेबल बिठूर
7-जितेंद्र,कांस्टेबल बिठूर
8-बबलू कांस्टेबल बिठूर
कर्तव्य पालन में वीरगति प्राप्त सभी पुलिस जन को विनम्र श्रद्धांजलि।
( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 2 July 2020

चीनी घुसपैठ क्या हमारी खुफिया एजेंसियों की नाकामी नहीं है ? / विजय शंकर सिंह


लद्दाख की पयोग्योंग झील और गलवां घाटी में घुसपैठ मई महीने के अंत तक होने लगी थी और जून के पहले सप्ताह तक सीमा पर अंदर तक चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए की गतिविधियां बढ़ने लगी थीं। जब इस घुसपैठ की पहली सूचना देश को मिली तो सबसे पहला ध्यान जनता का ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका पर गया। खुफिया एजेंसियों की यह पहली बड़ी विफलता नहीं है, बल्कि करगिल में यह विफलता देश के सामने पहले भी आ चुकी है।
उस समय उक्त विफलता को दृष्टिगत रखते हुए करगिल रिव्यू कमेटी का गठन 29 जुलाई 1999 को रिटायर्ड आईएएस अधिकारी के सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में किया गया था और उसके सदस्यों में, लेफ्टिनेंट जनरल केके हजारी, नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल बोर्ड के सदस्य बीजी वर्गीज, और सदस्य सचिव नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल बोर्ड के सचिव सतीश चंद्र थे। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 15 दिसंबर 1999 को लगभग सौ से अधिक, सैन्य और सिविल सेवा के अधिकारियों, भूतपूर्व प्रधानमंत्री और अन्य सांसदों से की गयी बातचीत पर तैयार कर के सरकार को सौंपी थी और सरकार ने 23 फरवरी 2000 को यह रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी और इस पर बहस हुयी। लेकिन रिपोर्ट के कुछ अंश गोपनीय थे जो आज भी गोपनीय हैं।
मीडिया में छपी कुछ खबरों के अनुसार, भारत चीन सीमा पर चीनी सेना पीएलए की घुसपैठ सम्बन्धी गतिविधियों में वृद्धि अगस्त 2019 में ही शुरू हो गयी। डेक्कन क्रॉनिकल में छपे प्रतिष्ठित पत्रकार, सैकत दत्ता के अनुसार, इसका एक काऱण जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 को सरकार द्वारा संसद से पारित कराना भी था। बीच बीच मे यह भी खबरे आती रहीं कि चीन की चिढ़ और उसकी घुसपैठ का कारण अनुच्छेद 370 में कतिपय संशोधन करना था। हालांकि यह बिल और अनुच्छेद 370 में संशोधन का प्रकरण देश का अंदरूनी मामला है और इससे न तो चीन का कोई संबंध है और न ही पाकिस्तान का। लेकिन जम्मू कश्मीर और लद्दाख के कुछ क्षेत्रों जो क्षेत्रफल की दृष्टि से विशाल हैं, उन पर, पाकिस्तान और चीन दोनो का अवैध कब्जा है तो उन्होंने इस पर अपनी अनावश्यक आपत्ति भी जताई थी।
बहरहाल, चीनी घुसपैठ का जो भी कारण हो, चाहे वह चीन की विस्तारवादी नीति का परिणाम हो, या कोई अन्य तात्कालिक कारण, पर यह एक प्रकार से खुफिया एजेंसियों की बड़ी विफलता का परिणाम तो है ही। इसके कई कारण है जिंसमे एक कारण इन एजेंसियों में समय समय पर सुधार, आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान न देना और कुछ हद तक, सरकार का इन एजेंसियों के प्रति उदासीन रवैया भी है। करगिल रिव्यू कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुफिया एजेंसियों की विफलता के कई उदाहरण पाए और उन्हें दुरुस्त किये जाने के लिये कई सुझाव भी सरकार को दिये। लेकिन उन सुझावों पर हुआ क्या यह अभी तक पता नहीं चला है। इन सुझावों के अनुसार एक मंत्रिमंडलीय समिति ग्रुप ऑफ मिनिस्टर औऱ कई टास्क फोर्स गठित किये जाने थे तो खुफिया एजेंसियों के दायित्व, क्रियाकलाप और अन्य विषयों पर विस्तार से अध्ययन कर के अपनी रिपोर्ट और संस्तुतियों को देते।
आज़ादी के बाद विकास के अन्य क्षेत्रों में परिवर्तन तो हुआ, नए नए प्रतिष्ठान खड़े किए गए, नहरें और बांध बने पर भारत ने वाह्य सुरक्षा की ओर ध्यान कम दिया और 1962 ई में यही लापरवाही देश के चीन के हाथों पराजय का एक प्रमुख कारण भी बनी। 1962 में कम संसाधनों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने, सीमा पर जिस अदम्य और अचंभित कर देने वाले शौर्य का प्रदर्शन किया था वह एक अजूबा था । चीन को विजय तो मिली थी, पर उसे यह भी आभास हो गया था कि भारतीय सैनिक युद्ध क्षेत्र मे उससे किसी भी दशा में कमतर नहीं हैं। यह अलग बात थी कि हम धोखे से युद्ध मे झोंक दिए गए थे और हमारे पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं थे।
1962 की शर्मनाक पराजय, जिंसमे भारत की अच्छी खासी ज़मीन पर चीन ने कब्जा कर लिया था, के बाद, देश के इंटेलिजेंस व्यवस्था को सुधारने और उसे पुनर्गठित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू किया गया। 1962 की हार भारत को बाहरी खतरे के प्रति और उससे निपटने के लिये चैतन्य कर गयी थी। इसी के बाद, 1962 और 1968 ई के बीच तत्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख रामनाथ काव की पहल पर बाह्य खुफिया एजेंसी के रूप में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के नाम से एक नयी खुफिया एजेंसी रॉ का गठन किया गया। उत्तर प्रदेश कैडर के आईपी ( इम्पीरियल पुलिस - यह आईपीएस का पूर्व रूप था ) अधिकारी, राम नाथ काव इसके पहले प्रमुख बने। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 10 मई 1918 को जन्मे आरएन काव ने 1940 में जनपद कानपुर में सहायक पुलिस अधीक्षक एएसपी के रूप में अपनी पुलिस सेवा शुरू की थी ।
यूपी कैडर के राम नाथ काव और मध्य प्रदेश कैडर के, केएफ रुस्तम जी देश के उन चुने हुए पुलिस अफसरों में से हैं जिन्होंने क्रमशः रॉ और सीमा सुरक्षा बल को खड़ा किया और आज यह दोनो ही संगठन देश के वाह्य सुरक्षा और खुफिया तँत्र की रीढ़ बने हुए हैं। राम नाथ काव, भीड़ और प्रचार से दूर रह कर काम करने वाले एक दूरदर्शी अधिकारी थे और रॉ के गठन के पहले वाह्य खतरों और वे खतरे कहाँ कहाँ से आ सकते हैं इसका अध्ययन भी उन्होंने किया फिर उन्होंने 1962 की पराजय के कारणों की एक विस्तृत समीक्षा की और तब वे उन समीक्षाओं के निष्कर्ष के आधार पर रॉ की कार्ययोजना तैयार की गयी। इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आरएन काव दुनियाभर में एक जाना माना नाम है और उन्हें अपने क्षेत्र में जबरदस्त प्रोफ़ेशनल दक्षता हासिल थी।
कहते हैं, राम नाथ काव एक रहस्यमय व्यक्तित्व की तरह थे। उनके बारे में अनेक दंत कथाओं में एक यह भी है कि, धूप के चश्मे के साथ उनकी कुछ ही फ़ोटो उपलब्ध हैं। वे लोगों से बहुत कम मिलते जुलते थे और मितभाषी भी थे। उन्होंने जिस प्रकार से रॉ को संगठित किया, उसके अच्छे परिणाम भी जल्दी ही मिलने शुरू हो गए। सबसे पहली सफलता रॉ को 1971 में बांग्लादेश युद्ध मे मिली। 1969 70 के समय जैसे ही पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर्रहमान के दल अवामी लीग ने अपना आंदोलन शुरू किया और जब यह लगने लगा कि पाकिस्तान के दोनों ही अंग एक दूसरे से अलग हो सकते हैं और पाकिस्तान के इस गृहयुद्ध के कारण, इसका दुष्परिणाम भारत को भोगना पड़ सकता है, तो रॉ सक्रिय हो गई और मुक्ति वाहिनी के गठन के बाद तो इसकी भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गयी। युद्ध मे सेना की भूमिका तो सबसे महत्वपूर्ण होती ही है, पर युद्ध के दौरान सटीक खुफिया सूचनाओं के अभाव में कोई भी युद्ध गौरवपूर्ण ढंग से नहीं जीता जा सकता है। 1971 के बांग्लादेश युद्ध मे रॉ की भूमिका पर्दे के पीछे थी और सराहनीय भी थी।
1971 के बांग्लादेश युद्ध मे रॉ की सफल भूमिका के बाद सिक्किम के भारत मे शामिल किए जाने में जो ग्राउंडवर्क किया गया था और जो पृष्ठभूमि बनी थी उसका बहुत कुछ आधार रॉ ने ही बनाया था। राम नाथ काव का सबसे बड़ा योगदान यह था कि, उन्होंने अक्सर उपेक्षित समझे जाने वाले खुफिया तँत्र को सरकार के एक प्रमुख और महत्वपूर्ण अंग के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था। खुफिया तंत्र में उन्होंने समय समय पर सुधार की अनेक योजनाओं का सूत्रपात किया और आधुनिकीकरण के कार्यक्रमो को जारी रखा। लेकिन 1977 के बाद जब मोरार जी देसाई की सरकार बनी तो रॉ को जबरदस्त झटका लगा और उसके वाह्य संगठन स्ट्रक्चर का बहुत ही नुकसान हुआ।
इंटेलिजेंस ब्यूरो ब्रिटिश राज द्वारा गठित एक खुफिया एजेंसी है जिसका ब्रिटिश काल मे मुख्य उद्देश्य था, देश के लोगों, महत्वपूर्ण व्यक्तियों और ब्रिटिश राज विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना। तब राज का विरोध और आज़ादी के आंदोलन का विरोध ही ब्रिटिश कालीन खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो का एक प्रमुख कर्तव्य था। लेकिन इंटेलिजेंस ब्यूरो उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए राजनीतिक इंटेलिजेंस तक ही अधिक सीमित रही और यह लम्बे समय तक सरकार के राजनीतिक हितों को ही फोकस में रखते हुए अपना काम करती रही। आईबी का प्रमुख देश का सबसे वरिष्ठ पुलिस अफसर होता है और इस नाते वह प्रधानमंत्री के सबसे अधिक निकट भी होता है। आईबी प्रमुख की सरकार से निजी निकटता के कारण कभी कभी कुछ राजनैतिक दिक्कतें भी हुयी है, और आईबी के एक प्रोफ़ेशनल खुफिया एजेंसी होने पर विपक्ष द्वारा सवाल भी खड़े किए गए हैं और आईबी पर सत्तारूढ़ दल के प्रति पक्षपात का भी आरोप लगा है। प्रधानमंत्री के आंख और कान जैसी निकटता की परंपरा आईबी के दूसरे निदेशक रहे बीएन मलिक और जवाहरलाल नेहरू के बीच की निकटता से शुरू हुयी।
कभी कभी यह निकटता इतनी निजी स्तर पर हो जाती है कि खुफिया तंत्र व्यक्ति या सत्तारूढ़ पार्टी के हित मे अपनी सेवाएं देने लगता है और सीज़र से भी अधिक राजभक्त होने की होड़ में ज़मीनी सूचनाएं और उन सूचनाओं की व्याख्या भी, 'जैसा रोगी चाहे वैसा वैद्य बतावे' की तर्ज़ पर देने लगता है। ख़ुफ़िया तंत्र का इस प्रकार राजनीतिकरण और सत्ता के साथ जुड़ जाना न केवल तंत्र को विफल कर देता है बल्कि उसे उसके असल उद्देश्य से भटका भी देता है। कहते हैं इमरजेंसी के समय आईबी ने इंदिरा गांधी को यही बताया था कि कोई विरोध नहीं होगा और 1977 के चुनाव में वे पुनः वापस लौटेंगी। पर हुआ इसका उलटा। वे खुद भी चुनाव हार गयीं और यूपी बिहार में उनकी पार्टी कांग्रेस को एक भी सीट नही मिली। एक काबिल खुफिया तंत्र को चाहिए कि वह सरकार को वह सब भी बताये जो असल मे ज़मीनी सच होता है पर सरकार उसे सुनना नहीं चाहती है। चाटुकारिता भरी लंतरानी टाइप अभिसूचनाये अन्ततः सरकार और देश दोनों को हानि पहुंचाती हैं।
खुफिया तंत्र में करगिल रिव्यू कमेटी सहित और उसके अतिरिक्त, कई सुधार प्रस्तावित हुए और उन्हें लागू करने की कई कोशिशें भी समय समय पर हुयीं पर वे बहुत अधिक सफल नहीं हो सके। 1998 - 99 में सचिवालय में, नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल के गठन की बात हो या, 1999 - 2000 में करगिल रिव्यू कमेटी या 26 / 11 के मुंबई हमले के बाद गठित नरेश चंद्र टास्क फोर्स पर मंत्रिमंडल समूह की बैठक का प्रयोग हो, इन सब कवायदों से खुफिया एजेंसियों की रुग्णता का इलाज नहीं हो सका। बहसे हुयीं और तरकीबें खूब सुझाई गयीं पर कोई भी मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। खुफिया जिसे सरकारी रूप से अभिसूचना कहते हैं के दो अंग होते हैं। एक खुफिया एजेंसी को मिलने वाली सूचनाएं और दूसरे उनका विश्लेषण। संदेह किसी भी खुफिया सूचना का मूल मंत्र है। विश्वसनीय से विश्वसनीय सोर्स भी ऐसी सूचना दे सकता है जो तथ्यों के विपरीत हो औऱ कभी कभी वह भटका भी ( मिसलीडिंग ) सकता है। इसलिए कच्ची अभिसूचनाओं का भी अन्य सोर्स से परीक्षण किया जाता है। फिर उनका विश्लेषण और फॉलो अप किया जाता है।


अब खुफिया तंत्र की चीनी घुसपैठ की भूमिका पर ज़रा बात करें। लद्दाख क्षेत्र में हुई घुसपैठ अप्रत्याशित नहीं है। अक्साई चिन के इलाके पर चीन का अवैध कब्जा है ही और पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर उसकी दो महत्वपूर्ण परियोजनायें, एक चीन से ग्वादर बंदरगाह जो पाकिस्तान में है, तक जाने वाला हाइवे और दूसरी ओबीओआर की बेहद महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाये चल रही हैं। लद्दाख के पयोग्योंग झील और गलवां घाटी की उन आठ पहाड़ियों जिन्हें फिंगर्स कहते हैं के फिंगर्स 8 तक हमारी भी गश्त होती थी, जहाँ अब हमें चीन जाने भी नहीं दे रहा है और हमारी सीमा में भी घुस कर बैठ गया है। इससे साबित होता है कि चीन की गतिविधियां लगातार हमारी सीमा पर सक्रिय रही हैं। लद्दाख में भी और अरुणाचल में भी और यदा कदा सिक्किम सीमा पर भी।
क्या हमारी खुफिया एजेंसियों को जिंसमे रॉ, आईबी और मिलिट्री इंटेलिजेंस के भी लोग शामिल हैं को इन सबकी भनक समय रहते नहीं लग जानी चाहिए थी ? अगर खुफिया एजेंसियों ने सरकार को समय रहते बता दिया था और तब भी सरकार चुप्पी साधे रही तो यह सरकार की बड़ी विफलता है। पुलवामा में आरडीएक्स से भरी गाड़ी से विस्फोट कर के सीआरपीएफ के कनवाय की एक बस उड़ा दी जाती है और उसमें कुल 48 सीआरपीएफ के जवान घटनास्थल पर ही बेहद दुःखद परिस्थितियों में मारे जाते है, और इस षडयंत्र की भी भनक अगर खुफिया एजेंसी को नहीं मिलती है तो यह भी उसकी विफलता ही है। क्योंकि वह इलाक़ा लंबे समय से आतंकी गतिविधियों से संक्रमित रहा है और आज भी है । खुफिया एजेंसियों की इस विफलता को गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है अन्यथा आगे भी ऐसी घटनाएं होने की संभावना बनी रहेगी। सैकत दत्ता के विश्लेषण के अनुसार, आज़ाद भारत की किसी भी सरकार ने देश के इंटेलिजेंस तन्त्र में व्याप्त खामियो को दूर करने और उसे समय के अनुरूप ढालने की कोई कोशिश नहीं की। शासन की सबसे प्रमुख और संवेदनशील तंत्र खुफिया एजेंसियां कभी भी किसी भी सरकार की प्राथमिकता में रही ही नहीं। इनका उपयोग या बेहतर हो यह कहें इनका दुरुपयोग केवल दलगत राजनीतिक दृष्टिकोण से ही समय समय पर किया जाता रहा है।
इसका परिणाम यह हुआ कि, खुफिया एजेंसियों द्वारा जुटाई गयीं सूचनाओं का विश्लेषण भी सही ढंग से नहीं किया गया और जिसके फलस्वरूप, 1962 के चीनी आक्रमण से लेकर आज गलवां घाटी की घुसपैठ की घटना तक देश को, बाहरी और चीनी खतरा भोगना पड़ रहा है। विरोधी दलों के नेताओ की गतिविधियों, जजो और महत्वपूर्ण अधिकारियों की गतिविधियों पर नज़र रख कर सरकार के पक्ष में ज़रूरत पड़ने पर उन्हें झुकाने या ब्लैकमेल करने के अनेक किस्से गॉसिप की तरह मीडिया, सत्ता के गलियारों, और अफसरों की सर्किल में गूंजते रहते हैं। इन सब से सरकार या सत्तारूढ़ दल पर किसी खास नेता की पकड़ भले ही मजबूत हो जाय पर इससे खुफिया एजेंसियों की प्राथमिकता जो देश हित मे अभिसूचना संकलन और विश्लेषण की है वह पीछे छूट जाती है। और साथ ही खुफिया अफसर, सरकार के कुछ चुनिंदा लोग और पार्टी के चंद प्रमुख नेताओं का एक गठजोड़ उभर कर सामने आ जाता है जिंसमे देश और देश की सुरक्षा का मूल उद्देश्य ही जाने अनजाने ही सही, पीछे रह जाता है। करगिल रिव्यू कमेटी ने इसी प्रकार के अपवित्र गठजोड़ जिसे अंग्रेजी में नेक्सस कहते हैं, का उल्लेख अपनी रपट में किया है।
अक्सर कहा जाता है कि इंदिरा गांधी के पास कुछ नेताओं की, जो उनके प्रतिद्वंद्वी हो सकते थे, और कुछ प्रमुख विरोधी दलों के नेताओ की फाइलें, जिंसमे उनके बारे में कुछ ऐसी सूचनाएं जिनसे समय पड़ने पर उन्हें झुकाया जा सके, रहती थी जिससे कोई भी पक्ष या विपक्ष का नेता इंदिरा गांधी का मुखर विरोध नहीं कर पाता था। यही बात आज भी कही जा रही है, पर यह सब एक कयास है और प्रमाण के अभाव में इस पर कुछ कहा भी नहीं जाना चाहिए। यह एक ध्रुव सत्य है कि, सत्ता से कोई भी दल हटना नहीं चाहता है और सत्ता में बने रहने के लिये वह हर संभव प्रयास भी करता है। खुफिया एजेंसियों और पुलिस का दुरूपयोग इसी ग्रँथि का एक परिणाम है। सरकार राजनीतिक जासूसी के लिये अलग विभाग का गठन चाहे तो कर सकती है, पर देश के लिये वाह्य और आंतरिक शत्रुतापूर्ण गतिविधियों की खुफिया जानकारी समय से मिलती रहे और भविष्य मे फिर कोई खुफिया विफलता न हो जाय इसके लिये एक संगठित और सुगठित तंत्र का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
आज गलवां घाटी में जो कुछ भी हुआ है वह एक प्रकार से खुफिया विफलता ही है। आज कल खुफिया एजेंसियों के पास सूचना एकत्र करने और फिर उसके विश्लेषण के लिये अधुनातन संसाधन उपलब्ध हैं। आईबी, रॉ, मिलिट्री इंटेलिजेंस, के पास ऐसे उपकरण हो सकता है हों भी, फिर भी सितंबर से यह घुसपैठ जारी है, जैसा कि कुछ अखबारों में छपा है और मई के अंत तक तो अच्छी खासी संख्या में चीनी पीएलए के सैनिक घुसपैठ कर के, लद्दाख के भारतीय इलाके में बैठ भी चुके थे। 3 जून को रक्षामंत्री का बयान फिर उसके बाद विदेश मंत्री का वक्तव्य, 6 जून को जनरल स्तर की फ्लैग मीटिंग और 15 जून की 20 सैनिकों की शहादत इस बात का प्रमाण है कि यह अचानक हुयी घुसपैठ नही थी, बल्कि यह लम्बे समय से धीरे धीरे हो रही एक सुनियोजित घुसपैठ थी और इसकी लेशमात्र भी कोई भनक तक, हमारी खुफिया एजेंसियों को नहीं लग पायी। ऐसी सामरिक और इंटेलिजेंस विफलताओं का आकलन, दुनिया भर के मित्र और शत्रु देशों की खुफिया एजेंसियां करती है और इसी से उन्हें हमारी क्षमता और योग्यता का पता भी चलता है।
हालांकि 19 जून को सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया 'न तो कोई घुसा था और न ही कोई घुसा है', वाला बयान तथ्यों के विपरीत है और वह क्यों दिया गया यह बात तो पीएमओ ही बता सकता है। उक्त बयान को चीन, गलवां घाटी के संदर्भ में, भारत की अधिकृत लाइन के रूप में प्रयोग कर रहा है। यह कहा जा सकता है कि चीन ऐसा गलत और झूठ कह रहा है और पीएम के बयान को तोडमोड कर प्रस्तुत कर रहा है, पर झूठ, वितंडा, और प्रोपेगैंडा तो राजनय के मान्य सिद्धांत हैं ही। रायटर, और पीटीआई ने गलवां घाटी घुसपैठ के जो सैटेलाइट इमेज जारी किये हैं उनसे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि, चीनी सैनिक अभी भी हमारे इलाके में हैं और हल्की फुल्की संख्या में नही बल्कि एक मजबूत नफरी उनकी है और वे वहां स्थायी स्ट्रक्चर भी बना चुके हैं और युद्ध के साज़ ओ सामान का जमावड़ा भी कर रहे हैं। ख़ुफ़िया एजेंसियां इन सब गतिविधियों की सूचना, सैटेलाइट इमेजिंग से भी जिससे धरती पर हो रहे परिवर्तन की पल पल की खबर रखी और विश्लेषित की जा सकती है, एकत्र कर सरकार और सेना से साझा करने में विफल रही हैं। डेटा और इमेजिंग विश्लेषण विज्ञान अब एक वैज्ञानिक विधा की तरह विकसित हो गया है, जिसका ख़ुफ़िया एजेंसियों को प्रयोग करना चाहिए। पर सवाल उठता है कि क्या यह सब हमारी प्राथमिकता में है भी ?
लद्दाख क्षेत्र में चीनी पीएलए का खतरा कोई नया और आकस्मिक खतरा नहीं है। यह 1962 से चल रहा है और एक अच्छी खासी जंग भी यहां दोनो देशों में हो चुकी है। उसके बाद भी अगर खुफिया तंत्र घुसपैठ का अभिज्ञान, एकत्रीकरण और विश्लेषण करने में असफल रहता है तो यह एक शर्मनाक प्रोफ़ेशनल इंटेलिजेंस विफलता के अतिरिक्त और कुछ नही है। करगिल रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट के कुछ अंश बेहद अचंभित करते हैं। उस कमेटी की रिपोर्ट को प्राप्त हुए, आज बीस साल बीत चुके हैं, पर किसी भी सरकार ने उसके निष्कर्षों, और सुझाओ पर ध्यान नहीं दिया है। इसका परिणाम कहीं गलवां घाटी, तो कहीं पयोग्योंग झील, तो कहीं डोकलां तो कहीं अरुणांचल के तवांग में में चीनी घुसपैठ के रूप में मिल रहा है।
1999 में गठित कमेटी की रिपोर्ट का यह अंश मैं सैकत दत्ता के ब्लॉग से उद्धृत कर रहा हूँ, पठनीय है। रिपोर्ट कहती है,
" ऐसा लगता है कि राजनीतिक, नौकरशाही, सैनिक और खुफिया तंत्र ने मिल कर एक ऐसा गठजोड़ बना लिया है जो यथास्थितिवाद से निकलना ही नही चाहता है। जब शांतिकाल रहता है तब राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन का मुद्दा हमारी प्राथमिकता की पृष्ठभूमि में चला जाता है और जब युद्ध या क्षद्म युद्ध का काल आता है तो यह मुद्दा इतना संवेदनशील हो जाता है कि इस पर कोई भी कड़ी बात कहने से बचता है। "
आगे कमेटी की रिपोर्ट कहती है,
" हमारे पास सभी एजेंसियों को मिलाजुला कर बना हुआ कोई भी ऐसा एकीकृत संस्थागत ढांचा नहीं है जिससे सूचनाओं के आदान प्रदान, संकलन और विश्लेषण की प्रक्रिया उन सूचनाओं के उपभोक्ताओं जैसे सेना, पुलिस, सुरक्षा बलों तक समय समय पर पहुंचा दी जाय। साथ ही ऐसा भी कोई मैकेनिज़्म नहीं है जिससे इन खुफिया एजेंसियों की कार्यक्षमता, उनके अभिलेखों का परीक्षण और उनकी गुणवत्ता की पड़ताल तथा छानबीन की जा सके। "
ख़ुफ़िया एजेंसियों की विफलता को सरकार द्वारा गम्भीरता से लेना होगा और प्राथमिकता के आधार पर करगिल रिव्यू कमेटी तथा कोई कमेटी बना कर विफलता के कारणों की पहचान कर के उचित निदान करना होगा अन्यथा गलवां घाटी जैसी घटनाएं आगे भी हो सकती हैं। भारतीय राज शास्त्र के अग्रणी ग्रन्थ अर्थशास्त्र में और मनीषी चाणक्य ने राज्य को संगठित और सुगठित रखने के लिये जगह जगह पर अभिसूचना तंत्र जिसे गुप्तचर विभाग कहा जाता है का उल्लेख किया है। यह भारत की समृद्ध राजनय की परंपरा को ही बताता है। पर विडंबना है कि सरकार का यह महत्वपूर्ण अंग प्राथमिकता में उतनी प्रमुखता से नही है, जितना उसे होना चाहिए। सरकार को गलवां घाटी की खुफिया विफलता पर गम्भीरता से विचार करके जो भी जिम्मेदार हों उनके विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी विफलता दुबारा न हो। चीन के सैनिक अभी वापस गए नहीं है। अगर वे जल्दी नहीं वापस भेजे जाते तो यह घुसपैठ धीरे धीरे और अंदर तक फैलेगी। यह एक संक्रमण की तरह है जिसका प्रभावी इलाज ज़रूरी है। खतरा बड़ा है और अभी बिल्कुल भी टला नहीं है।
( विजय शंकर सिंह )