Wednesday, 18 December 2019

खुशवंत सिंह ने कहा था, बहुलतावादी संस्कृति को नकारना, भारत की अवधारणा के खिलाफ / विजय शंकर सिंह

अंग्रेजी के प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह का यह उद्धरण,  द एंड ऑफ इंडिया, जो 2003 में प्रकाशित उनकी पुस्तक है, से लिया गया है। इस उद्धरण का पहले हिंदी अनुवाद पढ

‘हर फ़ासिस्ट सरकार को ऐसे समाज और समूहों की आवश्यकता पड़ती है, जिनका आसुरिकरण कर वे अपनीजड़ें जमा सकें। शुरुआत में तो यह एक या दो समूहों से शुरू होता है. लेकिन इसका अंत यहीं  नहीं समाप्त होता है। इसे नफरत पर आधारित एक आंदोलन से लगातार, जिंदा रखा जाता है। और यह लगातार डर और झगड़े का माहौल बनाकर ही जारी रखा जा सकता है. हममें से जो लोग इस वक्त सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि हम मुस्लिम या ईसाई नही हैं, तो हम मूर्खो के स्वर्ग में रह रहे हैं। संघ ( आरएसएस ) पहले से ही वामपंथी इतिहासकारो और ‘पाश्चात्य तरीके’ से रहने वाले युवाओं को अपना निशाना बनाता रहा है। कल वह अपनी नफरत उन महिलाओं पर निकालेगा जो स्कर्ट पहनती हैं, उन लोगों पर निकालेगा जो मांस खाते हैं, शराब पीते हैं, विदेशी फिल्में देखते हैं, तीर्थयात्रा में मंदिरों में नहीं जाते हैं, दंत मंजन की जगह टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं, वैद्य की जगह एलोपेथिक डॉक्टर्स के पास जाते हैं, ‘जय श्री राम’ बोलने की जगह हाथ मिलाकर या परस्पर चुम्बन कर एक-दूसरे का अभिवादन करते  हैं। कोई भी सुरक्षित नहीं है। अगर हम भारत को जीवित रखना चाहते हैं, तो हमें इन बातों को  समझना जरूरी है.। "

अब इसका मूल अंग्रेजी अंश पढें,
" Every fascist regime needs communities and groups, it can demonize in order to thrive. It starts with one group or two. But it never ends there. A movement built on hate can only sustain itself by continually creating fear and strife. Those of us today who feel secure because we are not Muslims or Christians are living in a fool's paradise. The Sangh is already targeting the Leftist historians, and ' westernized ' youth. Tomorrow it will turn its hate on women who wear skirts, people who eat meat, drink liquor, watch foreign films, don't go on annual pilgrimage to temples, use toothpaste instead of danth manjan, prefer allopathic doctor to vaids, kiss or shake hands in greetings instead of shouting Jai Shri Ram.. No one is safe. We must realize this, if we hope to keep India alive. "

2003 में प्रकाशित यह किताब मैंने पढ़ी नहीं है। पर कल जब एक प्रतिभावान और जागरूक बालिका सना गांगुली की एक इंस्टाग्राम पोस्ट नज़र से गुजरी तो इस किताब के बारे में उत्कंठा हुयी । किताब नेंट पर भी उपलब्ध है। उत्कंठावश जब शुरुआती कुछ पन्ने नेंट पर पढें तो किताब के बारे में, उत्सुकता भी बढ़ी और नयी पीढ़ी के प्रति गर्व भी हुआ कि, वह देश और दुनिया मे क्या घट रहा है, उसके प्रति अनजान और उदासीन नहीं है। सना गांगुली का यह पोस्ट डिलीट किया जा चुका है। डिलीट करने या डिलीट हो जाने का कारण महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है खुशवंत सिंह की भविष्यवाणी भरा यह कथन जो उन्होंने 2003 में प्रकाशित अपनी किताब, द एंड ऑफ इंडिया में लिखी थी।

यह किताब, 2003 में छपी है। खुशवंत सिंह इस पुस्तक में 1984 के सिख विरोधी दंगे, उड़ीसा के पादरी ग्राहम स्टेन्स की बर्बर हत्या,  2002 के गुजरात दंगों, नक्सल आन्दोलन आदि आदि तथा और भी कुछ ऐसी घटनाएं जो घृणा और विद्वेष पर आधारित हैं, का उल्लेख और उनकी विवेचना करते हैं । साथ ही वह, यह चेतावनी भी देते हैं कि अगर हम ऐसे ही, घृणा भरी विभाजनकारी राहों पर चलते रहे तो भारत के अंत की यह शुरुआत होगी। खुशवंत सिंह, अंग्रेजी के एक सिद्धहस्त लेखक, प्रखर पत्रकार और जीवंत व्यक्ति रहे हैं। उनके साथ भी मेरी एक अकस्मात और विचित्र परिस्थितियों में मुलाकात हो चुकी है। उससे उनकी जिंदादिली का पता चलता है।

भारत एक देश है पर विविधता से भरा हुआ। इसे यूरोपीय नेशन स्टेट की तरह नहीं देखा जा सकता है। मुसोलिनी और हिटलर के चश्मे से तो कत्तई नहीं। भारत एक  ऐसे क्रुसिबिल की तरह है जहां भांति भांति की नस्लें, धर्म,जाति, विचारधाराएं समय समय पर आती गयीं और फिर एक दूसरे से मिलते जुलते, सांस्कृतिक आदान प्रदान की दीर्घ परंपरा का निर्वाह करते हुए अपने अलग अलग अस्तित्व के साथ साथ एक मिलीजुली सभ्यता और संस्कृति का निर्माण भी करती रही हैं और यह सिलसिला आज भी चल रहा है। फ़िराक़ साहब ने अपने इस प्रसिद्ध शेर में इस सिलसिले को बेहद खूबसूरती से कहा है।
सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़' 
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया !!
( फ़िराक़ गोरखपुरी )

खुशवंत सिंह ने अपनी किताब में इसी बहुलतावादी संस्कृति को नकार कर कट्टरता की विचारधारा को फैलाने के खतरे के प्रति आगाह किया है, और कहा है कि वह प्रवित्ति भारत की अवधारणा के विपरीत और भारत के अंत का प्रारंभ होगा। किताब मैंने अभी पूरी नहीं पढ़ी है, अतः फिलहाल इतना ही। 

© विजय शंकर सिंह 

क्या हम एक बड़ी आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहे हैं / विजय शंकर सिंह

नागरिकता संशोधन कानून ( सीएए ) के तमाम विरोध और तमाशो के बीच वित्तमंत्री थोड़ी चैन से हैं। केंद्र सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने शुक्रवार को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक रिसर्च पेपर का प्रजेंटेशन करते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था आईसीयू की तरफ बढ़ रही है। वहीं एनबीएफसी कंपनियों में जो संकट है, वो एक भूकंप जैसा है।  ट्विन बैलेंस शीट (टीबीएस) संकट की दूसरी लहर इकोनॉमी को प्रभावित कर रही है।  

2004 से 2011 तक स्टील, पावर और इन्फ्रा सेक्टर के कर्ज जो कि एनपीए में बदल गए उन्हें टीबीएस-1 कहा है। सुब्रमण्यन ने कहा कि यह सामान्य मंदी नहीं है, बल्कि इसे भारत की महान मंदी कहना उचित होगा, जहां अर्थव्यवस्था के गहन देखभाल की जरूरत है।  

2017-18 तक रियल स्टेट सेक्टर के 5,00,000 करोड़ रुपये के लोन में एनबीएफसी कंपनियों का हिस्सा है।यह संकट निजी कॉरपोरेट कंपनियों की वजह से आया है 2014 में भी दी थी चेतावनी सुब्रमण्यन ने कहा कि पद पर रहते हुए 2014 में भी सरकार को टीबीएस को लेकर के चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। पहले चरण में बैंकों को एनपीए बढ़ने से मुश्किलें हुई थीं, वहीं अब दूसरे चरण में नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों और रिएल एस्टेट फर्मों के नकदी संकट से है।

पिछले साल सितंबर में सामने आया आईएलएंडएफएस का संकट भूकंप जैसी घटना थी। सिर्फ इसलिए नहीं कि आईएलएंडएफएस पर 90,000 करोड़ रुपये के कर्ज का खुलासा हुआ, बल्कि इसलिए भी क्योंकि इससे बाजार प्रभावित हुआ और पूरे एनबीएफसी सेक्टर को लेकर सवाल खड़े हो गए।

उन्होंने कहा कि बड़ी मात्रा में नकदी नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा हुए हैं और इस राशि का बड़ा हिस्सा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां(एनबीएफसी) को दिया है। इसके बाद एनबीएफसी ने इस राशी को रियल एस्टेट सेक्टर में खर्च किया है। साल 2017-18 तक रियल एस्टेट के पांच लाख करोड़ रुपये के बकाया अचल संपत्ति ऋण के आधे भाग के लिए गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां जिम्मेदार थे। 

© विजय शंकर सिंह 

छात्रों का यह आंदोलन अब रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य के मुद्दों पर हो / विजय शंकर सिंह

छात्रों को चाहिए कि वे अपना आंदोलन का एजेंडा, एनआरसी सीएए से थोड़ा अलग कर के सस्ती शिक्षा और सस्ते स्वास्थ्य के मुद्दे पर ले आएं। फेसबुक के मित्रो से भी यही अनुरोध है कि अब हमें आर्थिक मुद्दों पर ही केंद्रित होना चाहिये। क्योंकि सरकार इसी मुद्दे पर बगलें झांकने लगती है। अगर देश की आर्थिक स्थिति ठीक होती और आर्थिक एजेंडे पर सरकार की कुछ उपलब्धियां होती तो सरकार बिलकुल ही एनआरसी के चक्कर मे नहीं पड़ती। पर सरकार करे भी तो क्या करे। दरअसल भाजपा के पास कोई अर्थदृष्टि है ही नहीं। क्योंकि इन्होंने इस पर कभी सोचा ही नहीं है। आप जनसंघ से लेकर आज तक भाजपा के आर्थिक प्रस्तावों को देख लीजिए कहीं भी कोई ठोस आर्थिक सोच मिलेगी ही नहीं। निजीकरण की बात मिलेगी, पूंजीवाद की बात मिलेगी पर पूंजीवाद के विकास के भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव आपको इनकी सोच में मिलेगा। 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-नवंबर, 2019 के बीच सेंट्रल जीएसटी कलेक्शन बजट अनुमान से 40 फीसद कम रहा है। अब इस घाटे की पूर्ति के लिए दिसंबर 2019 से मार्च 2020 के बीच हर महीने 1 लाख 10 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी कलेक्शन लक्ष्य रखा गया है। जब से जीएसटी लागू हुआ है आज तक जीएसटी का मंथली कलेक्शन कभी भी 1 लाख 4 हजार करोड़ नही पुहंचा है। चालू वित्त वर्ष के आठ महीनों में से चार महीनों का जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर रहा है। इनमें से सिर्फ एक महीने वसूली का आंकड़ा 1.1 लाख करोड़ रुपये के ऊपर रहा है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि लक्ष्य तक पुहंचने के लिए हर महीने 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये चाहिए। यह कैसे होगा ? इसका कोई जवाब सरकार के पास नही है! अब तो आरबीआई के गवर्नर को भी मंदी दिखने लगी है  वैसे हम हर महीने 1 लाख 10 हजार करोड़ वसूलने से भी हम लक्ष्य तक नही पुहंचेंगे, लक्ष्य के लिए इन चार महीनों में किसी एक महीने में टैक्स कलेक्शन 1.25 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए।

सरकार जब आर्थिक दृष्टिकोण से विफल होने लगी तो इसने राष्ट्रवाद का अप्रासंगिक मुद्दा छेड़ दिया। जब देश आजाद होने के लिये व्यग्र था, एक लंबी और विविधता भरी लड़ाई लड़ रहा था,  एक व्यापक राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित था, जब ये जिन्ना के बगलगीर हो, अंग्रेजों के मुखबिर बने थे और हिटलर मार्का संकीर्ण और श्रेष्ठतावादी राष्ट्रवाद के विभाजनकारी मार्ग पर बढ़ रहे थे। आज भी बांटने और लड़ाने की वही पुरानी आदत गयी नहीं है। यह एनआरसी और सीएए उसी सोच का परिणाम है। सरकार को कहिये कि वह उसे लागू करे। इसकी नियमावली पहले बने। महकमे बनें। बजट तय हो। कुछ तो शुरू करे। रातोरात न तो कोई देश से बाहर भेजा जा रहा है और न डिटेंशन कैंप बन जा रहे हैं। असम से सीखिये। उन्होंने इस आंदोलन को आज भी, धर्म और साम्प्रदायिक भेदभाव से बचाकर रखा है। सरकार और सत्तारूढ़ दल की पूरी कोशिश है कि यह मुद्दा साम्प्रदायिक रंग ले ले। दरअसल इसके अलावा उन्हें कुछ आता ही नहीं है। सरकार की इस कोशिश को प्रछन्न रूप से कामयाब मत होने दीजिए। 

डिटेंशन कैंप भी अब बनने शुरू हो जाने चाहिये। इसका ठेका भी एलेक्टोरेल बांड से पैसा भेजने वाले लोगों की हैसियत देख कर हो। क्योंकि सरकार का इरादा तो चट्टान की तरह है। अब जब हुकूमत पत्थर हो जाय तो उससे सिर नहीं टकराना चाहिये। उस पर चढ़ना चाहिये। उसे चढ़ कर पार करना चाहिये। क्योंकि चट्टान जड़ हो जाती है। जड़ता हमारी संस्कृति में हेय समझी गयी है। चेतन बनिये । चैतन्य रहिये। सरकार को एनआरसी लाने दीजिए। अगर कागज़ात हैं आप के पास तो सम्भाल के रखिये। जब सरकार उसे मांगने आएगी तो देखा जाएगा। पहले वह मांगने की स्थिति तक तो आये। पढ़ाई लिखाई के डिग्री की चिंता नहीं करनी है। यह सरकार डिग्री नहीं मांगेगी। डिग्री की बात करते ही सरकार शरमाने लगती है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट ने कह रखा है कि आधार और वोटर आईडी है तो व्यक्ति नागरिक है। सुप्रीम कोर्ट ने आज पचास याचिकाओं पर नोटिस जारी की है। सुनवायी हो ही रही है। 

अहिंसक विरोध करें। लेख लिखें। सेमिनार आयोजित करें। पढ़ाई के साथ साथ लोगो जो आर्थिक मुद्दों पर ले जाँय। महंगाई, बिगड़ती आर्थिक हालात, बेरोजगारी, और सरकारी दुर्व्यवस्था की ओर लोगो को ले जांय। अपनी बात कहें और समझाएं । हर सरकार को हिंसक आंदोलन सूट करता है। हिंसक आंदोलन का दमन आसान होता है। क्योंकि सुरक्षा बलों को हिंसक भीड़ पर बल प्रयोग करने का अवसर कानूनन मिल जाता है। अहिंसक आंदोलन अक्सर सुरक्षा बलों को खिजा देता है। क्योंकि वहां धैर्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर अहिंसक आंदोलन पर नाजायज बल प्रयोग होता है तो उसकी बदनामी सरकार औऱ सुरक्षा बलों पर आती है। इससे दोनों ही बचना चाहते हैं।  गांधी जी यह मर्म समझ गए थे। सार्वजनिक संपत्ति, प्रकारांतर से हम सबकी सम्पत्ति है। केवल इलेक्टोरल बांड से घूस लेने वाले राजनीतिक दलों की ही नहीं। 

हिंसक आंदोलन अक्सर विफल हो जाते हैं। शांतिपूर्ण आंदोलन एक भ्रम है। अमूमन कोई भी आंदोलन शांतिपूर्ण होता नहीं है। उसमें हिंसा होती ही है। जब महात्मा गांधी द्वारा संचालित जन आंदोलन अहिंसक नही रह पाए तो शेष आंदोलन कैसे अहिंसक रह पाएंगे। उदाहरण के लिये आप 1921 का असहयोग आंदोलन और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन का उल्लेख कर सकते हैं। पर एक अपवाद भी है। दो साल पहले किसानों का मुंबई लांग मार्च जो वामपंथी दलों द्वारा संचालित था वह पूरी तरह से अहिंसक रहा और उसकीं प्रशंसा भी हुयी।  चाहे आंदोलनकारी उत्तेजित होकर खुद ही हिंसक हो जाँय या कोई बाहरी असामाजिक तत्व उसमे घुस कर हिंसा फैला दें। 

ऐसे हिंसक आंदोलन टूटते हैं। हिंसा, उन्मदावस्था का परिणाम होती है। उन्माद एक अस्थायी भाव है। बराबर आप क्रोध, घृणा, प्रतिशोध, और हिंसा के भाव मे नहीं रह सकते हैं। विज्ञान का यह सिद्धांत कि हर चीज़ अपनी सामान्य दाब और तापक्रम पर आकर स्थिर हो जाती है, मनोभावों के लिये भी लागू होता है।  पुलिस सबसे अधिक असहज होती है अहिंसक धरने और प्रदर्शन से। अगर शांतिपूर्ण  धरना चल रहा है और आंदोलनकारी व्यवस्थित तरह से उसे लगातार चला रहे हैं, केवल भाषण और नारेबाजी हो रही है और कोई हिंसा नहीं हो रही है तो अक्सर ऐसे आंदोलन के समय पुलिस केवल एक घेरा बनाकर  बैठ जाती है। आंदोलनकारी और पुलिस, दोनों ही एक दूसरे को थका देना चाहते है। तब पुलिस और प्रशासन न तो बल प्रयोग कर पाता है और न हीं आंदोलनकारियों को दौड़ा ही पाता है। 

ऐसी स्थिति में, तब अलग से आंदोलन को खत्म करने के लिये आंदोलनकारी नेताओ और प्रशासन की तरफ से आपसी बातचीत भी होती रहती है और समस्या के समाधान तक पहुंचने की कोशिश होती है। अक्सर बातचीत सफल भी रहती है। यह आपसी बातचीत करने वालों के स्वभाव और कौशल पर भी निर्भर करता है। 

लेकिन हिंसा के बाद अगर सार्वजनिक संपत्ति जैसे बस, रेल, डाकखाने या सरकारी इमारतें आदि में आगजनी और तोड़फोड़ होती है तो उसमें मुक़दमे कायम होते हैं और फिर कानूनी कार्यवाही होती है। हिंसा होते ही पुलिस को आंदोलनकारियों को भगाने और गिरफ्तार करने का अवसर मिल जाता है। अब चूंकि सीसीटीवी कैमरे आदि लगभग सभी महत्वपूर्ण जगहों पर लग गए  हैं तो, ऐसी हालत में उपद्रव करने वालों की पहचान आसानी से हो जाती है। और फिर उनकी धरपकड़ होने लगती है। 

जन आंदोलनों में व्यापक हिंसा एक इधर एक आदत सी बन गयी है। राजस्थान में होने वाला गुर्जर आरक्षण आंदोलन, हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन, आदि हाल में हुए व्यापक हिंसक आंदोलन रहे हैं। इनमें मुक़दमे भी कायम हुये हैं और जांच कमीशन भी बैठे हैं। पर न तो मुकदमों में कुछ उल्लेखनीय प्रगति हुयी और न ही जांच कमीशन के रिपोर्ट की सिफारिश मांगी गयीं। शांति हुयी सब भूल गए। इससे आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ता है और भविष्य का आंदोलन और हिंसक हो जाता है। 

हरियाणा में जब जाट आरक्षण के समय हिंसक आंदोलन और व्यापक तोड़फोड़ हुयी तो उसकी जांच के लिये पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह सर की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित हुयी। उन्होंने जांच तो की और अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी, पर जब उन्होंने हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिये अपनी सिफारिशों की अंतिम रिपोर्ट तैयार की तो सरकार ने उन्हे वहीं रोक दिया। प्रकाश सिंह ऐसे पुलिस अफसर नहीं हैं कि वे डिक्टेटेड लाइन पर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपे। उनकी रिपोर्ट से हरियाणा के असरदार जाट नेता और अफसर जब घिरने लगे तो उन्हें मना कर के सरकार ने खुद को असहज होने से बचाया। 

पश्चिम बंगाल में हर आंदोलन हिंसक हो ही जाता है। पहले भी, वहां जब ट्राम और बस के भाड़े में थोड़ी सी भी वृध्दि होती थी तो लोग सड़कों पर आ जाती थी और ट्राम बस तथा अन्य सरकारी संपत्ति फूंक दी जाती थी। बंगाल में ऐसे हिंसक आंदोलनों के उल्लेख से इतिहास भरा पड़ा है। यही स्थिति असम और नॉर्थ ईस्ट की भी है। छोटे छोटे जनजाति कबीलों में बंटा नॉर्थ ईस्ट अक्सर मिथ्या अस्मिता के सवाल पर एक दूसरे से उलझता रहता है। यह कबिलाई संस्कृति लोगों को एकजुट तो किये ही रहती है और उन्हें हिंसक बना देती है। 

अंग्रेजों के समय जब ऐसी व्यापक हिंसा होती थी तो वे, नुकसान की भरपाई के लिये आसपास की आबादी पर सामूहिक जुर्माना लगाते थे। जुर्माना कुछ वसूल होता था, तो कुछ नहीं होता था। पर इससे लोगों में कार्यवाही का डर बना रहता था और भविष्य में असामाजिक तत्व थोड़ा डरते भी रहते थे। 

© विजय शंकर सिंह 

Monday, 16 December 2019

कानून - घुसपैठ, नागरिकता संशोधन कानून और संविधान. / विजय शंकर सिंह

1947 में भारत आज़ाद तो हुआ पर दो भागों में बंट कर। एक भाग धार्मिक आधार पर इस्लामी मुल्क बना, दूसरा भाग जिसने स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और भारतीय संस्कृति की आत्मा सर्वधर्म समभाव के मार्ग को चुना एक उदार और पंथनिरपेक्ष देश बना रहा। बंटवारे की बात जब चल रही थी तो शायद ही किसी को यह अंदाजा था कि देश धर्म के आधार पर, दुनिया का सबसे बड़ा हिंसक विस्थापन अपनी पहली आज़ाद सुबह को देखेगा। लेकिन हमने देखा। लाखों की हत्या, आगजनी, हिंसा, बर्बरता और करोड़ो का विस्थापन। इसे नियति का खेल कहें, या हमारे महान नेताओं का बौनापन, या अंग्रेजों की कुटिल चाल का सफल होना या सबकुछ मिलाजुलाकर कहें तो, यह वह सुबह नहीं थी, जिसकी उम्मीद हमने की थी। पर सुबह आयी और धीरे धीरे वह तमाम भी हो गयी। हमने अपनी राह पकड़ी और पाकिस्तान ने अपनी। 

यह बात बिल्कुल सही है कि 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान के दोनों हिस्सों में और 1971 के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न हुआ है। पाकिस्तान में शुरुआत में यह उत्पीड़न, हिंदू, सिख और ईसाइयों का हुआ, फिर बाद में उत्पीड़ित जमात में, अहमदिया, शिया आदि गैर सुन्नी फिरके के इस्लामी मतावलंबी भी शामिल हो गए।  यह उत्पीड़न धर्म के नाम हुआ है। इसका कारण धर्मांधता और धार्मिक कट्टरता रही है। 1971 के समय जब बांग्लादेश युद्ध हुआ तो बांग्लादेश से लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत मे आये। इसमे हिन्दू भी थे और मुसलमान भी। 1971 में हुआ उत्पीड़न धर्म आधारित भी था और पाकिस्तान के दमन का परिणाम भी। इसी उत्पीड़न के दर्द से स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ। जब बांग्लादेश बना तो सबसे पहले उसे एक स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता, भारत ने दी और फिर भूटान ने। बाद में रूस सहित 8 अन्य देश भी सामने आए और बांग्लादेश को एक सार्वभौम देश मान लिया गया।  बाद में तो सभी देशों ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी। अंत मे पाकिस्तान ने भी बांग्लादेश को स्वतंत्र तथा संप्रभु राष्ट्र मान लिया । इस प्रकार धर्म राष्ट्र का आधार बन सकता है, यह सिद्धांत खंडित हो गया। सावरकर और जिन्ना के सिद्धांतों का यह सुखद अंत था। 

आज़ादी के बाद जब भारत का संविधान बना तो नागरिकता के विंदु का भी उसमे समावेश किया गया। संविधान के अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को यह अधिकार दिया गया कि संसद नागरिकता के संबंध में मापदंड तय करे और एक विस्तृत कानून बनाये। क्योंकि देश बंट चुका था। दोनों ही देशों में धार्मिक आधार पर आबादी का विस्थापन जारी था। दंगे भी भड़क रहे थे। भारत सरकार शरणार्थियों के पुनर्वास कार्य मे लगी थी। यह बेहद कठिन समय था। इसी अधिकार के अंतर्गत, संसद ने  एक नागरिकता कानून, 1955 पारित किया। इस अधिनियम में यह बताया गया है कि 26 जनवरी, 1950 के बाद से भारत का नागरिक कौन होगा? कैसे उनकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है। 

नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत  भारत का नागरिक होने की कुछ शर्तें हैं. इस कानून में नागरिकता के आधार तय किए गये हैैं।  1955 के नागरिकता अधिनियम में,  जन्म को भारत की नागरिकता का आधार बताते हुए कहा गया कि 
" अगर 26 जनवरी, 1950 के बाद किसी का जन्म भारत में हुआ है तो उसे भारत का नागरिक माना जाएगा । " 
लेकिन इस नियम के बाद यह समस्या आ गयी कि माता पिता के बारे में कोई नियम या मानक  नहीं किये गए थे। जन्म से नागरिकता के सिद्धांत के अनुसार, अगर किसी विदेशी का बच्चा भी भारत में पैदा होता, तो उसे अपने आप संवैधानिक तौर पर भारत की नागरिकता मिल जाती। फिर इस ऐक्ट में 1986 में संशोधन हुआ ।1986 के इस संशोधन में  बताया गया कि 26 जनवरी, 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ शख्स भारत का नागरिक होगा लेकिन उसके माता-पिता दोनों का या उनमें से किसी एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है। 

मूल अधिनियम में, यह भी कहा गया था कि 
" 26 जनवरी, 1950 के बाद से विदेश में पैदा हुआ वो व्यक्ति भी भारत का नागरिक होगा जिसके पिता भारत के नागरिक होंगे "
लेकिन यह संशोधन लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण था क्योंकि पिता का उल्लेख तो था, पर माता का उल्लेख नहीं था। इसलिए 1992 में पुनः इस एक्ट में संशोधन हुआ और यह प्रावधान जुड़ा कि ' 26 जनवरी, 1950 के बाद से विदेश में पैदा हुआ वह व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाएगा जिसके पिता या माता दोनों या दोनों में कोई एक भी भारत का नागरिक हो। " 
इसके बाद एक संशोधन और हुआ. जिसमें जोड़ा गया कि नागरिकता तभी मिलेगी जब पैदा होने के साल भर के अंदर बच्चे को उस देश की भारतीय एम्बेसी में रजिस्टर कराया गया हो.

पंजीकरण के आधार पर भी भारत के नागरिक होने का अधिकार मिलने का नियम इस एक्ट में है. जैसे अगर किसी शख्स ने भारत के नागरिक से शादी की तो उसे भारत की नागरिकता मिलेगी. लेकिन इसके लिए शर्त ये थी कि जिस नागरिक से शादी हो रही है वो 7 साल से भारत में रह रहा हो.

साल 2003 में इस कानून में फिर संशोधन हुआ। जिसमें कहा गया कि, 
" 26 जनवरी, 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ व्यक्ति भारत का नागरिक होगा लेकिन उसके माता और पिता दोनों भारत के नागरिक होने चाहिए, या माता-पिता में से एक भारत का नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो. प्रवास के सारे क़ानूनी कागज़ात उसके पास होने चाहिए । "

नागरिकता अधिनियम 1955 के अंतर्गत कोई भी अवैध प्रवासी भारत का नागरिक नहीं हो सकता है। इस एक्ट के तहत उन लोगों को अवैध प्रवासी माना जाएगा जो या तो बिना ज़रूरी कागज़ों के भारत में रह रहे हैं, या वीज़ा की अवधि ख़त्म होने के बाद भी भारत में रह रहे हैं। अवैध तौर पर रह रहे प्रवासी को द फॉरेनर्स एक्ट 1946 और द पासपोर्ट एक्ट 1920 के अनुसार, या तो जेल भेजा जा सकता है या उनके मूल देश डिपोर्ट किया जा सकता है। 

इसी प्रकार नागरिकता अधिनियम 1955 में  नागरिकता समाप्त करने के नियम भी तय किए गए थे। जैसे, 
● स्वैच्छिक त्याग. यानी कोई, अपने आप ही, अपनी नागरिकता छोड़ दें.
● टर्मिनेशन. माने किसी की नागरिकता बर्ख़ास्त कर दी जाए। अगर  किसी ने किसी अन्य देश की नागरिकता ले ली तो भारत की नागरिकता स्वतः खत्म हो जाएगी.
● अगर नागरिक किसी तरह के राष्ट्र विरोधी काम में लिप्त पाया जाता है, जैसे, किसी दुश्मन देश के लिए जासूसी कोई कर रहा हों या युद्ध में देश के ख़िलाफ़ काम कर रहा हो,  तो उसकी नागरिकता रद्द की जा सकती है।

अब  नागरिकता  कानून 1955 में 2019 के संशोधन के पारित होने के बाद अब अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान के अल्पसंख्यक बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में रहने के हकदार हो जाएंगे। पहले ऐसा होने के लिए उन्हें भारत में 12 साल शरणार्थी के तौर पर गुज़ारना होता था। लेकिन नए बिल के अनुसार, वह बस 7 साल में ही इसके लिए अर्ह हो जाएंगे। सरल शब्दों में कहें तो सरकार इस बिल के द्वारा ‘अवैध प्रवासियों’ की परिभाषा बदलने की तैयारी कर रही है। इस बिल को पहली बार लोकसभा में 15 जुलाई, 2016 को पेश किया गया था। लेकिन राज्यसभा में इसे पेश नहीं किया गया था। 

कानून में जिन अल्पसंख्यक समुदाय का ज़िक्र है उसमें, पाकिस्तान, बांग्लादेश और आफगानिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोग अल्पसंख्यक हैं। 4 जनवरी, 2019 को सिलचर की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बिल को पास कराने की बात की थी। क्योंकि असम में ऐसे लोगो की अच्छी खासी संख्या है, जो बांग्लादेश से आए हैं और धर्म से हिंदू हैं. अब उन्हें भारत में रहने का संवैधानिक हक मिल जाएगा। देश भर में,  इस कानून के सम्बंध में, तर्क वितर्क हो रहा है, लेकिन विरोध में आवाज़ें ज़्यादा मुखर हो रही हैं। सरकार का कहना है कि 
" जिन लोगों का धार्मिक आधार पर उत्पीड़न हो रहा है, संपत्तियां ज़ब्त की जा रही हैं, पूजा-पाठ पर हमले किए जा रहे हैं, महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है उन्हें सहज सरल तरीक़े से नागरिकता देना ही इस संशोधन का उद्देश्य है। इसे सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखना बंद किया जाना चाहिए। घुसपैठिए, घुसपैठिए होते हैं, उनमें जो लोग उत्पीड़न के कारण आते हैं, उनमें अंतर करना हमारा नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य बनता है। "

नागरिकता संशोधन बिल जब पेश हो ही रहा था तो, पूरे नॉर्थ-ईस्ट में भारी विरोध हो रहा है।असम के किसान नेता अखिल गोगोई जो  अब यूएपीए  के अंतर्गत निरुद्ध हैं, ने जब बिल पेश हो रहा था तो कहा था, 
“भारत का संविधान हमारे सांसदों को भारतीय नागरिकों के हक में काम करने का अधिकार देता है लेकिन मौजूदा सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों के नागरिकों को यहां लाकर बसाने के लिए यह बिल लेकर आई है। भले ही इस बिल से असम के लोगों का जीवन खतरे में क्यों न पड़ जाए। यह बिल पूरी तरह से असंवैधानिक है और हम इसका विरोध करते है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में लिखा हुआ है कि धर्म के आधार पर किसी को नागरिकता नहीं दी जा सकती. भाजपा इस विधेयक के ज़रिए हिंदूत्व का एजेंडा मज़बूत करना चाहती है.”
इस कानूूून पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि
" यह कानून  भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। भारत और पाकिस्तान जब दो देश बने थे तो पाकिस्तान मुसलमानों का देश बना था लेकिन हिंदुस्तान की कल्पना यह थी कि यह सभी धर्मों, जाति के लोगों के लिए बराबरी का देश होगा। "

इस कानून पर अंतरराष्ट्रीय जगत में भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुयी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश द्वारा की गयी आपत्तियों को दरकिनार भी कर दें तो संयुक्त राष्ट्र संगठन की आपत्ति को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने इस कानून पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा है  कि,
" इस कानून की प्रकृति ही 'मूल रूप से भेदभावपूर्ण' है। नए नागरिकता कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है। "
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय के प्रवक्ता जेरेमी लॉरेंस ने जेनेवा में कहा, 
"'हम भारत के नए नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 को लेकर चिंतित हैं, जिसकी प्रकृति ही मूल रूप से भेदभावपूर्ण है। "
उन्होंने आगे कहा, 
" संशोधित कानून भारत के संविधान में निहित कानून के समक्ष समानता की प्रतिबद्धता को और अंतराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार नियम तथा नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि में भारत के दायित्वों को कमतर करता दिखता है, जिनमें भारत एक पक्ष है जो नस्ल, जाति या धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की मनाही करता है। "
यूएनओ के लॉरेंस ने आगे कहा कि 
" भारत में नागरिकता प्रदान करने के व्यापक कानून अभी भी हैं, लेकिन ये संशोधन नागरिकता हासिल करने के लिए लोगों पर भेदभावपूर्ण असर डालेगा। प्रवास की स्थिति को देखे बिना, सभी प्रवासी सम्मान, संरक्षण और अपने मानवाधिकारों की पूर्ति के हकदार हैं। मात्र 12 महीने पहले ही भारत ने 'ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर सेफ, रेगुलर एंड ऑरडरली माइग्रेशन' का समर्थन किया था। इसके तहत राज्य बचनबद्ध है कि वह सुरक्षा की स्थिति में प्रवासियों की जरूरतों पर प्रतिक्रिया देगा, मनमानी हिरासत और सामूहिक रूप से देश निकाले से बचेगा और सुनिश्चित करेगा कि प्रवासियों से संबंधित व्यवस्था मानवाधिकार आधारित हो। यह मजबूत राष्ट्रीय शरण प्रणाली के जरिए होना चाहिए था जो समानता और भेदभाव नहीं करने पर आधारित है। यह उन सभी लोगों पर लागू होना चाहिए जिन्हें वास्तव में उत्पीड़न और अन्य मानवाधिकारों के हनन से संरक्षण की जरूरत है और इसमें नस्ल, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और अन्य का भेद नहीं होना चाहिए। हम समझते हैं कि भारत का उच्चतम न्यायालय नए कानून की समीक्षा करेगा और उम्मीद करते हैं कि भारत कानून की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के साथ अनुकूलता पर सावधानीपूर्वक विचार करेगा। " 

अब जरा इस कानून की पड़ताल संविधान के आलोक में करते हैं। नागरिकता कानून में यह संशोधन इजरायली होम लैंड की अवधारणा पर आधारित है। 1948 में इजरायल का जन्म यहूदियों के होमलैंड के रूप में हुआ था। इस संशोधन का आधार धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय का उत्पीड़न है। लेकिन सभी अल्पसंख्यक समुदायों का उल्लेख करते हुए मुस्लिम समाज को अलग कर दिया गया है। यह तर्क दिया गया है कि, वे तीनों देश जहां अल्पसंख्यक उत्पीडन होता है उनका राजधर्म इस्लाम है, और हिंदू, बौद्ध जैन सिख ईसाई पारसी का वहां उत्पीड़न होता है। उत्पीड़न तो शिया, अहमदिया आदि अल्पसंख्यक समुदायों का भी इन तीन देशों में होता है। उत्पीड़न तो नास्तिकों का सबसे अधिक होता है। अगर भारतीय धर्मो को शरण देने की भी बात है तो ईसाइयो को यह सुविधा क्यों दी जा रही है ? यह प्राविधान ही मुस्लिम विरोधी और स्वेच्छाचारी है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है। 

किसी भी देश की नागरिकता उस देश के नागरिकों को जोड़ती है न कि, उसे धर्म और संप्रदाय के आधार पर विभाजित करती है। संविधान के अनुच्छेद 14 में नागरिकता देते समय या किसी भी नियम कानून को बनाते समय, तार्किक वर्गीकरण की बात की गयी है न कि स्वेच्छाचारी वर्गीकरण की। नए संशोधित कानून में जहां उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समुदायों में मुस्लिम को बाहर कर दिया है वह तार्किक वर्गीकरण नहीं बल्कि स्वेच्छाचारी वर्गीकरण का एक उदाहरण है। अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए 1973 में ईपी रोयप्पा ने कहा था कि, " समानता एक गतिशील अवधारणा है जो हर दशा और परिस्थितियों में महत्वपूर्ण और विद्यमान रहती है। यह अपनी सैद्धान्तिक अवधारणा के अनुसार, ,न  तो खंडित की जा सकती है और न हीं तोड़ी मरोड़ी जा सकती है। सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो, समानता, स्वेच्छाचारिता के बिल्कुल अलग खड़ी होती है। यदि कोई कार्य स्वेच्छाचारिता के भाव से किया जाता है तो, वह समानता के सिद्धांत के विपरीत ही होता है। जो अनुच्छेद 14 की मूल भावना के विपरीत है। 

संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार कुछ अधिकार, हमे भारत के नागरिक होने के कारण मिले हैं, लेकिन अनुच्छेद 14 जो मौलिक अधिकारों के प्रारंभ में ही है के अंतर्गत प्रदत्त समानता का अधिकार, और अनुच्छेद, 21 के अंतर्गत प्रदत जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा से जीने का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट की एक व्याख्या के अनुसार, न केवल हम नागरिकों को प्राप्त है बल्कि उन सबको प्राप्त है जो इस देश मे रह रहे है, भले ही वे नागरिक न हों। चकमा शरणार्थियों की भी एक बड़ी समस्या से देश जूझ चुका है। चकमा एक जनजाति है जिसका उत्पीड़न बांग्लादेश में धर्म के आधार पर हुआ था। बहत से चकमा शरणार्थी उत्पीड़न से बचने के लिये भारत आये। उनके मानवाधिकार हनन के सवाल पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने, 1996 में अरुणाचल प्रदेश की सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकीं सुनवायी करते हुए कहा था कि, बिना दस्तावेज के आये इन लोगों को भी, भले ही वे भारतीय नागरिक नहीं हैं तो भी, संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीने और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त होगा। 

समय समय पर भारत से घुसपैठ करके आने वालों को बांग्लादेश भेजा भी गया है। आज भी बांग्लादेश ने अपने नागरिकों को वापस लेने की बात की है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने 2005 से अब तक बांग्लादेश भेजे जाने वाले घुसपैठियों का विवरण दिया है। उस विवरण के अनुसार,  यूपीए के कार्यकाल में कुल 82,728 बांग्लादेश के नागरिक जिन्होंने घुसपैठ किया था, वापस बांग्लादेश भेजे गए। इसी प्रकार एनडीए के कार्यकाल में, कुल 1822 घुसपैठियों को  वापस बांग्लादेश भेजा गया है । यह वापसी भी तभी बांग्लादेश स्वीकार करता है जब उसे प्रमाण सहित यह बता दिया जाय कि यह बांग्लादेश का ही नागरिक है, अन्यथा दुनिया का कोई देश वापसी स्वीकार नहीं करता है। सरकार को इस दिशा में भी कदम उठाना चाहिये। 

उचित तो यही है कि किसी भी घुसपैठिये को चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो, नागरिकता नहीं देनी चाहिये। 1985 में जो असम समझौता हुआ है उसे माना जाना चाहिये। आज यदि सेलेक्टिव आधार पर नागरिकता दी और ली जाने लगेगी तो, घुसपैठ का एक अंतहीन सिलसिला चल निकलेगा। फिर यह समस्या हर कुछ सालों के अंतराल में आएगी और जो भी सरकार तब होगी अपने अपने राजनीतिक एजेंडे से नागरिकता देने लगेगी। वर्ष 1971 एक असामान्य परिस्थितियों का समय था। उसी असामान्यता को हल करने के लिए नियम बने । लेकिन, असामान्य परिस्थितियों के लिये बनाये गए नियम, सामान्य परिस्थितियों में लागू नहीं किये जा सकते हैं। सीएबी का विरोध इसलिए है कि यह कानून धर्म के आधार पर भेद करता है जो असंवैधानिक है। जहां तक नागरिकता देने का प्रश्न है नागरिकता अधिनियम 1955 के अंतर्गत सरकार को किसी भी नागरिक को नागरिकता देने का अधिकार है। पहले की सरकारों ने कुछ लोगों को नागरिकता दी भी है। पर इस तरह केवल, धार्मिक आधार पर नागरिकता कानून को संशोधित करना भविष्य के लिये खतरनाक हो सकता है। 

© विजय शंकर सिंह 

Sunday, 15 December 2019

नागरिकता संशोधन कानून पर यूएनओ की प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने भारत के नए नागरिकता कानून को लेकर शुक्रवार को चिंता जताते हुए कहा कि इसकी प्रकृति ही 'मूल रूप से भेदभावपूर्ण' है. नए नागरिकता कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय के प्रवक्ता जेरेमी लॉरेंस ने जिनेवा में कहा, 'हम भारत के नए नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 को लेकर चिंतित हैं, जिसकी प्रकृति ही मूल रूप से भेदभावपूर्ण है.'

उन्होंने कहा, 'संशोधित कानून भारत के संविधान में निहित कानून के समक्ष समानता की प्रतिबद्धता को और अंतराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार नियम तथा नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि में भारत के दायित्वों को कमतर करता दिखता है, जिनमें भारत एक पक्ष है जो नस्ल, जाति या धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की मनाही करता है.'

दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि नया कानून भारत में पहले से ही रह रहे कुछ पड़ोसी देशों के उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए तेजी से विचार करने की बात कहता है. मंत्रालय ने कहा था कि प्रत्येक देश को विभिन्न नीतियों के जरिए अपने नागरिकों को सत्यापित करने और गणना करने का अधिकार है. लॉरेंस ने कहा कि भारत में नागरिकता प्रदान करने के व्यापक कानून अभी भी हैं, लेकिन ये संशोधन नागरिकता हासिल करने के लिए लोगों पर भेदभावपूर्ण असर डालेगा.

उन्होंने कहा कि प्रवास की स्थिति को देखे बिना, सभी प्रवासी सम्मान, संरक्षण और अपने मानवाधिकारों की पूर्ति के हकदार हैं. लॉरेंस ने कहा कि मात्र 12 महीने पहले ही भारत ने 'ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर सेफ, रेगुलर एंड ऑरडरली माइग्रेशन' का समर्थन किया था. इसके तहत राज्य बचनबद्ध है कि वह सुरक्षा की स्थिति में प्रवासियों की जरूरतों पर प्रतिक्रिया देगा, मनमानी हिरासत और सामूहिक रूप से देश निकाले से बचेगा और सुनिश्चित करेगा कि प्रवासियों से संबंधित व्यवस्था मानवाधिकार आधारित हो. प्रवक्ता ने उत्पीड़ित समूहों का संरक्षण देने के लक्ष्य का स्वागत करते हुए कहा कि यह मजबूत राष्ट्रीय शरण प्रणाली के जरिए होना चाहिए था जो समानता और भेदभाव नहीं करने पर आधारित है.

उन्होंने कहा कि यह उन सभी लोगों पर लागू होना चाहिए जिन्हें वास्तव में उत्पीड़न और अन्य मानवाधिकारों के हनन से संरक्षण की जरूरत है और इसमें नस्ल, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और अन्य का भेद नहीं होना चाहिए. लॉरेंस ने कहा, 'हम समझते हैं कि भारत का उच्चतम न्यायालय नए कानून की समीक्षा करेगा और उम्मीद करते हैं कि भारत कानून की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के साथ अनुकूलता पर सावधानीपूर्वक विचार करेगा.'

(.विजय शंकर सिंह )

कविता - चाय / विजय शंकर सिंह


सुबह की चाय
ज़िंदगी का एक हिस्सा बन गयी है,
या यूं कहें, ज़िंदगी ही है,
गर्म लिहाफ में,
नीम नींद में डूबी आंखें,
जब पूरी कायनात को,
अलसायी बना देतीं है,
तब एक अदद चाय,
एक खूबसूरत नेमत नज़र आती है।

चाय अपने हमसफ़र अखबार के साथ,
नमूदार हो तो,
चाय की चुस्कियों के साथ लगता है,
एक मुकम्मल दुनिया,
मेरे ख्वाबगाह में शब्दों के पैरहन पहने,
पसर आयी है।

कभी कभी सोचता हूँ,
चाय बनी ही न होती तो,
क्या सुबह, इतनी ही अलसायी सी,
किसी तलाश में मुब्तिला,
नीमकश आंखे लिये,
सुस्त पर दिलकश सी होती कभी ?

( विजय शंकर सिंह )

अंडमान में सावरकर के एक सहयोगी - त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती / विजय शंकर सिंह


बात अंडमान की है। बात अंडमान के सेलुलर जेल की है। बात उन काल कोठरियों में कैद उन महान संघर्षशील योद्धाओं की है जिन्होंने देश को आज़ाद कराने में अपना योगदान किसी से भी कम नहीं दिया, पर उनपर बहुत कम ही लिखा गया है और साम्रगी भी कम ही उपलब्ध है।

इन हुतात्माओं ने अपनी जवानी देश को आज़ाद कराने में दे दी और काले पानी के सेलुलर जेल की काल कोठरी में ही अपना पूरा जीवन बिता दिया। प्रख्यात इतिहासकार डॉ आरसी मजूमदार ने एक पुस्तक लिखी है द पीनल सेटलमेंट ऑफ अंडमान। लगभग 350 पृष्ठों की इस पुस्तक में जो भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से प्रकाशित है मुझे आईआईटी कानपुर के पुस्तकालय में ऐसे ही कैटलॉग पलटते पलटते मिल गयी। इस पुस्तक में अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के लोगों का इतिहास, परंपराएं और कुछ नृतत्वशास्त्रीय विवरण हैं और इन सबसे महत्वपूर्ण हैं अंडमान की खतरनाक और यातनामय सेलुलर जेल में बंद उन कैदियों की दास्तान जो वहां, 1787 से 1945 तक बंदी बना कर रखे गए हैं।

अंडमान में सभी कैदी राजनीतिक बंदी नहीं थे बल्कि दुर्दांत अपराधी ही पहले वहां बंदी बना कर रखे जाते थे। पर बाद में जब 1880 के बाद जब राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ और आज़ादी का आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगा तो क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान उम्रकैद की सज़ा पाए बंदी इन जेलों में भेज दिए जाते थे। हालांकि राजनीतिक बंदियों को अपराधी बंदियों के साथ रखने का कोई औचित्य नहीं है पर अहंकारी सत्ता भला औचित्य और अनौचित्य का विचार ही  कब करती हैं ? इन्ही बंदियों में वीडी सावरकर भी थे जो बाद में क्षमा याचना कर के और  अंग्रेज़ी हुक़ूमत के वफादार रहने के वादे पर छूट गए थे। पर आज हम उनकी चर्चा नहीं करेंगे। आज हम चर्चा करेंगे बंगाल के क्रांतिकारी त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती की जो इस सेलुलर जेल में आज़ादी मिलने तक कैद रहे।


त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (1888 - 1 अगस्त 1970) का जन्म 1889 ई. में बंगाल के मेमनसिंह जिले के कपासतिया गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। बचपन से ही त्रैलोक्य चक्रवर्ती के परिवार का वातावरण राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत था। पिता 'दुर्गाचरन' तथा भाई 'व्यामिनी मोहन' का इनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा था। पिता दुर्गाचरण स्वदेशी आन्दोलन के समर्थक थे। भाई व्यामिनी मोहन का क्रान्तिकारियों से संपर्क था। इसका प्रभाव त्रैलोक्य चक्रवर्ती पर भी पड़ा। देश प्रेम की भावना उनके मन में गहराई तक समाई थी। इंटर की परीक्षा देने से पहले ही अंग्रेज सरकार ने उन्हे बन्दी बना लिया। जेल से छूटते ही वे ‘अनुशीलन समिति’ में सम्मिलित हो गए। 1909 ई. में उन्हें 'ढाका षडयंत्र केस' का अभियुक्त बनाया गया, पर वे पुलिस के हाथ नहीं आए। 1912 ई. में वे गिरफ्तार तो हुए, पर अदालत में उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो सके।

1914 ई. में उन्हें 'बारीसाल षडयंत्र केस' में सजा हुई और सजा काटने के लिए उन्हें अंडमान भेज दिया गया। वे इसे सजा नहीं तपस्या मानते थे और यह विश्वास करते थे कि उनकी इस तपस्या के परिणामस्वरुप भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलेगी। वीडी  सावरकर और गुरुमुख सिंह जैसे क्रान्तिकारी उनके साथ अंडमान की जेल में बंदी थे। इन लोगों ने वहां संगठन शक्ति के बल पर रचनात्मक कार्य किया। उन्होने अपने जीवन के श्रेष्ठतम तीस वर्ष जेल की काल कोठरियों में बिताये। उनका संघर्षशील व्यक्तित्व, अन्याय, अनीति से जीवनपर्यन्त जूझने की प्रेरक कहानी है। त्रैलोक्य चक्रवर्ती को 'ढाका षडयंत्र केस' तथा 'बारीसाल षडयंत्र केस' का अभियुक्त बनाया गया था। कारागार में, वे 'महाराज' के नाम से प्रसिद्ध थे।

जब वे अंडमान जेल में भेजे गए तो सावरकर वहां आ चुके थे। वीडी सावरकर के सहयोगी के रूप में उन्होंने जेल में ही हिन्दी भाषा पढ़ने और उसके प्रचार का कार्य अपनाया। त्रैलोक्य नाथ बांग्ला भाषी थे और वे हिंदी नहीं जानते थे। सावरकर से हिन्दी सीखने वाले वे पहले व्यक्ति थे। परतंत्र भारत में भी वह स्वतंत्र भारत की बातें सोचा करते थे। उन्हें विश्वास था कि जब देश स्वतंत्र हो जायेगा, तो इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक भाषा का होना बहुत आवश्यक है। यह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। अत: इस भाषा के प्रचार का कार्य उन्होंने सावरकर के साथ वहीँ काले पानी की जेल में ही आरम्भ कर दिया था। उनके प्रयास से 200 से भी अधिक कैदियों ने वहां हिंदी सीखी। चाहें जेल की दीवारें हों या काले पानी की कोठरियां, वहां भी मनस्वी और कर्मनिष्ठ चुप नहीं बैठते।


1934 में वे जेल से फरार हो गए। जब देश आजाद हुआ तो उनकी जन्म भूमि पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्र में आई। वहां दंगे भड़क चुके थे। अल्पसंख्यक हिंदुओं का पलायन हो रहा था। उन्होंने उस कठिन और चुनौतीपूर्ण माहौल में भी सामाजिक सद्भाव के लिये काम किया। वे नोआखाली में जब महात्मा गांधी गये थे तो उनके साथ भी थे।
पूर्वी पाकिस्तान सरकार ने उन्हें वर्षों तक नजरबन्द बनाये रखा। वे चार साल तक ढाका जेल में बंद रहे। भारत सरकार के हस्तक्षेप के बाद, पाकिस्तान सरकार ने खराब स्वास्थ्य के आधार पर  उन्हें बाद में रिहा किया । वर्ष, 1970 में बीबी गिरी जब राष्ट्रपति थे तो उन्होंने उनको इलाज कराने के लिये दिल्ली बुलाया, पर चक्रवर्ती जी ने  यह कहते हुवे अनुरोध ठुकरा दिया कि ऐसी आज़ादी के लिए हमने सपना नही  देखा था। अंत मे बहुत अनुनय विनय पर महाराज, भारत आए । 1970 में ढाका जेल से उन्हें छोड़ा गया।  वे भारत आये और 1 अगस्त 1970 को उनका देहावसान हो गया।

इतिहास निर्मम तो होता ही है, पर उससे निर्मम हम होते हैं जो ऐसे क्रांतिवीरों को जिन्होंने अपार यातनाएं सहीं, पर न टूटे, न झुके, न माफी मांगी और न ही बिखरे, को भुला देते हैं । हम इन सारे क्रान्तिनायकों के कृतज्ञ हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व हमारे लिये बलिदान कर दिया । महाराज त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती को विनम्र प्रणाम।

© विजय शंकर सिंह