Tuesday, 2 April 2019

कानून - देशद्रोह और राजद्रोह का अंतर आईपीसी के संदर्भ से / विजय शंकर सिंह

124 A आइपीसी की धारा अपने अस्तित्व के समय से ही विवादों के घेरे में रही है। इसकी समीक्षा करते समय अक्सर एक तथ्य लोग भूल जाते हैं कि देशद्रोह और राजद्रोह दोनों ही अलग अलग विंदु हैं। देश स्थायी है और राज बदलता रहता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज जो अध्यक्ष पीठ के दाहिने बैठ रहा है वह कल अध्यक्ष पीठ के बाएं बैठ सकता है। और जो बाएं बैठ रहा है वह दाहिने आ सकता है। दाहिना पक्ष सत्ता का और बायीं तरफ का स्थान विपक्ष के लिये संसदीय परम्परा में रूढ़ हो गया है। धीरे धीरे वामपंथ शब्द विपक्ष के लिए रूढ़ हो गया और वह विरोध का स्वाभाविक पक्ष मान लिया गया। सत्ता परिवर्तन का यह बदलाव लोकतंत्र की खूबी है।

सरकार की आलोचना एक संवैधानिक कृत्य और दायित्व है। इसी लिये दुनियाभर की लोकशाही में संसद, सीनेट, असेंबली या जो कोई भी संबोधन जन प्रतिनिधियों की पंचायत के लिये तय हों उसमे विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, स्पष्टीकरण मांगने, शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन, भाषण और ऐसे कृत्य जो भारतीय दंड संहिता में अपराध की कोटि में नहीं आते हैं, करने का अधिकार है। यह सारे अधिकार संविधान की आत्मा मौलिक अधिकारों से संरक्षित हैं।

धारा 124 A के जन्म, विकास और विवाद पर लेख के अगले अंश में चर्चा होगी, पहले देशद्रोह और राजद्रोह से जुड़ी आइपीसी की धाराओं और उनके दंडात्मक प्राविधान का अवलोकन कर लें।

1. धारा 121 आईपीसी ( Section 121 IPC )

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना।

121 IPC. Waging, or attempting to wage war, or abetting waging of war, against the Government of India.—Whoever, wages war against the 75 [Government of India], or attempts to wage such war, or abets the waging of such war, shall be  punished with death,  or imprisonment for life
and shall also be liable to fine

जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करेगा, या ऐसा युद्ध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा युद्ध करने का दुष्प्रेरण करेगा, तो उसे मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना।
सजा - मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास + आर्थिक दण्ड।
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

2. धारा 122 आईपीसी ( Section 122 IPC )

Collecting arms, etc., with intention of waging war against the Government of India.—Whoever collects men, arms or ammunition or otherwise prepares to wage war with the intention of either waging or being prepared to wage war against the Government of India, shall be punished with imprisonment for life or fine.

जो भी कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने, या युद्ध करने की तैयारी करने के आशय से सैनिक, आयुध या गोलाबारूद संग्रहित करेगा, या अन्यथा युद्ध करने की तैयारी करेगा, तो उसे आजीवन कारावास, या किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे अधिकतम दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है से दण्डित किया जाएगा, और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रहित करना।
सजा - आजीवन कारावास या दस वर्ष कारावास और आर्थिक दण्ड।
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

3. धारा 123 आइपीसी ( Section 123 IPC )

Concealing with intent to facilitate design to wage war.—Whoever by any act, or by any illegal omission, conceals the existence of a design to wage war against the Government of India intending by such concealment to facilitate, or knowing it to be likely that such concealment will facilitate, the waging of such war, shall be punished with imprisonment of either de­scription for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

युद्ध करने की परिकल्पना को सुगम बनाने के आशय से छिपाना।

जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने की परिकल्पना के अस्तित्वों को, जो ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाने के आशय से इस प्रकार छिपाए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि इस प्रकार छिपाकर ऐसे युद्ध करने को सुगम बनाए, किसी कार्य, या किसी अवैध लोप द्वारा छिपाएगा, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है से दण्डित किया जाएगा, और साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

सजा - दस वर्ष कारावास + आर्थिक दण्ड।
यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है।

4. धारा 124 आईपीसी ( Section 124 IPC )

किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोधित करने के आशय से राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना

जो कोई भारत के राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल को ऐसे राष्ट्रपति या राज्यपाल की विधिपूर्ण शक्तियों में से किसी शक्ति का किसी प्रकार प्रयोग करने के लिए या प्रयोग करने से विरत रहने के लिए उत्प्रेरित करने या विवश करने के आशय से, उन पर हमला करेगा या उसका सदोष अवरोध करेगा, या सदोष अवरोध करने का प्रयत्न करेगा या उसे आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करेगा या ऐसे आतंकित करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा ।

5.धारा 124 A आईपीसी ( Section 124 A IPC ) - राजद्रोह

Whoever by words, either spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to excite disaffection towards, the Government established by law in India, a shall be punished with imprisonment for life, to which fine may be added, or with imprisonment which may extend to three years, to which fine may be added, or with fine.

जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण 1--अप्रीति पद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं ।
स्पष्टीकरण 2--घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उनको परिवर्तित कराने की दृष्टि से अननुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं ।
स्पष्टीकरण 3--घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार की प्रशासनिक या अन्य व्रिEया के प्रति अनुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध गठित नहीं करती ।

इस प्रकार आइपीसी की धारा 121 से लेकर 124 A तक की यह परिभाषाएं और दंडात्मक प्राविधान हैं। 121, 122, और 123 देश के विरुद्ध युद्ध के संदर्भ में है  और 123 तथा 124 राज के प्रतीक के राष्ट्रपति और राज्यपाल से सम्बंधित है। राष्ट्रपति की जगह पहले क्राउन हुआ करता था जो बाद में संशोधित कर दिया गया।

धारा 124 A जिसे अंग्रेजी में सेडिशन कहा जाता है उसमें राज के स्थान पर सरकार शब्द आ गया और सरकार की आलोचना कुछ स्पष्टीकरण के साथ भी दंडात्मक कर दी गयी है। इस धारा का आइपीसी में जोड़ा जाना और आज़ादी के बाद इस धारा को बनाये रखा जाय या न रखा जाय इस पर बहुत रोचक बहसें संविधान सभा मे हुयी है, क्योंकि कि यह इस धारा के प्राविधान संविधान के लोकतांत्रिक स्वरूप और मौलिक अधिकारों को भी अतिक्रमित करते हैं ।
( क्रमशः )

124 A आइपीसी के इतिहास और विकास और विवाद पर आगे पढियेगा
© विजय शंकर सिंह

राफेल पर एस विजयन की किताब का विमोचन रोका गया / विजय शंकर सिंह

चुनाव आयोग ने राफेलघोटाला राफेलसौदा मामले पर द हिन्दू द्वारा लिखी किताब के विमोचन पर रोक लगा कर दो बातें प्रमाणित कर दी हैं।
1. आयोग निष्पक्ष रेफरी नहीं है बल्कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त जिस उद्देश्य से आयोग में लाये गये थे, उसे पूरा करने के लिये प्रतिबद्ध हैं।
2. राफेल मामले में जितना सोचा और पाया जा रहा उससे अधिक कुछ न कुछ गड़बड़ है।

राफेल घोटाले पर आज भारती पब्लिकेशन मद्रास में एस विजयन की लिखी किताब जारी करने वाला था, लेकिन चुनाव आयोग ने फ़ंक्शन को रोक दिया और वहाँ से 142 किताबों को ज़ब्त कर लिया है । तमिल में लिखी किताब का नाम नाट्ठाई उलुक्कम राफेल बेरा उज़्हाल  (the Rafale scam that is rocking the country), है । किताब रिलीज़ का फ़ंक्शन जो पहले स्कूल में था बाद में स्कूल द्वारा आयोजन से इनकार करने पर , भारती पब्लिकेशन ने अपने कार्यालय में यह समारोह रख लिया था।

कमाल की बात यह है कि 12 अप्रैल को नरेन्द्र मोदी जी के जीवन पर बनी फिल्म जिसे को रिलीज करने की अनुमति आयोग ने दे दी है। आयोग का तर्क है कि फ़िल्म के प्रतिबंधित किये जाने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात होगा।

पर एस विजयन की किताब पर रोक से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित नहीं होगी। अजीब तर्क है आयोग का। फ़िल्म को इस लिये अनुमति दी गयी है कि उस फ़िल्म में मोदी जी की प्रशंसनीय क्षवि दिखायी गयी है, जबकि इस पुस्तक में राफेल सौदे में हुयी अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए हैं। जो आदमी अपनी आलोचना और अपने ऊपर उठे सवालों को गाली देना समझता है वह अपनी आलोचना सुन कैसे सकता है ? उसके कारकुन हर उस ज़ुबान और उंगली की ओर झपट पड़ेंगे जो सवालिया निशान लिये खुलती और उठती है। आयोग अब कारकुन बन गया है।

आयोग को संविधान में असीमित ताकत दी गयी है। चुनाव की घोषणा होने के बाद देश या प्रदेश जहां भी चुनाव हो रहा है उसका सारा प्रशासन तँत्र आयोग के अधीन आ जाता है। आयोग से पूछे किसी भी अधिकारी का न तो तबादला हो सकता है और आयोग द्वारा किये गए तबादलों पर सरकार कुछ कर भी नहीं सकती है। इस अपार वैधानिक शक्ति से सम्पन्न जब वरिष्ठतम नौकरशाह लिजलिजपापन दिखाते हैं तो उनके चरित्र और आचरण से वितृष्णा होती है।

कल्याण सिंह का भाजपा के समर्थन में खुल कर बयान देना, ए सैट के नाम पर उपलब्धि का प्रचार करना, सेना को एक व्यक्ति की सेना बताना आदि आदि उदाहरण आयोग की क्लीवता को ही उजागर करते हैं। पीएम, गवर्नर, सीएम ये सभी राजनीतिक व्यक्ति होते हैं, और सभी राजनीतिक व्यक्ति चुनाव जीतने के लिये किसी भी स्तर तक जा सकते है और जाते हैं। पर आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसका एक तय कार्यकाल और सुरक्षित सेवा शर्ते हैं। वह कौन सा एहसान उतार रहा है ?

अब तो प्रधानमंत्री के भाषणों में खुल कर आदर्श आचार संहिता के विपरीत साम्प्रदायिक आधार पर बातें कही जा रही है पर आयोग की इतनी भी हिम्मत नहीं कि वह नोटिस जारी कर सके। स्टील फ्रेम में जंग इसे ही कहते हैं।

© विजय शंकर सिंह

Monday, 1 April 2019

चुनावी वादों के नाम अप्रैल का पहला दिन / विजय शंकर सिंह

आज पहली अप्रैल है और दुनियाभर में आज का दिन मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्यों और कब से यह प्रथा चल रही है यह तो गूगलेश्वर स्वतः बता देंगे।

पर मैं आप के साथ लोकसभा चुनाव 2014 का भाजपा का संकल्पपत्र 2014 साझा कर रहा हूँ। सबकासाथ सबकाविकास के नारे के साथ वह चुनाव अनोखा था और उसके वादे तो और भी अलबेले थे। यह उन वादों की फेहरिस्त है। आप स्वतः तय कीजिये कि किन किन वादों का क्या हुआ और अब उन पर क्या हो रहा है। एक एक वादे पर हुआ क्या यह मैं बाद में लिखूंगा, पहले आप खुद ही इन्हें देखें और अब इन वादों का नाम भी ये वादाफरोश नहीं लेते।

और हां इनके सुबूत भी मांगिये। सुबूत मांगना देशद्रोह नहीं है, सुबूत मांगना आप के जिंदा रहने और जिंदा दिखने की पहचान है। महज आक्रामकता का चोला ओढ़ कर कोई चीखता हुआ, आप की देशभक्ति पर सवाल खड़ा करने लगे और आप डर जाँय, इस मनोवृत्ति से बाहर आइये। सुबूत मांगिये और दृढ़ता से मांगिये। सरकार के बूते न देश होता है न जनता बल्कि जनता के ही बल पर देश भी है और सरकार तो जनता के रहमोकरम पर है ही।

चुनाव के अवसर पर मुद्दा बदल योजना के बहकावे में न आएं. भाजपा के नेता नरेन्द्र मोदी  औऱ अन्य चुनाव प्रचार के जिस नाटकीय और तमाशाई दौर में अब चल रहे हैं यह अप्रत्याशित नहीं है। अप्रत्याशित तब होता जब वे इस नाटकीय और तमाशाई दौर में नहीं आते। 2016 के यूपी चुनाव में कब्रिस्तान और श्मशान के प्रतीक नारे  मतदान के कुछ दिन पहले आये थे। जब लगा कि ध्रुवीकरण के अलावा कोई अन्य विकल्प है ही नहीं इनके पास। इस बार ये प्रतीक  अभी आ गए हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह साम्प्रदायिक और ध्रुवीकरण की राजनीति का अपराह्न काल है। यह साम्रदायिक और ध्रुवीकरण की राजनीति की शुरुआत है। अभी और प्रतीक लाये जाएंगे, और विम्ब गढ़े जाएंगे और यह पूरी कोशिश होगी कि चुनाव 2014 के वादों, सरकार की उपलब्धियों, और जनहित के मुद्दों से सरक कर साम्प्रदायिक राजनीति के पंक में जा गिरे ताकि देश मे एक उन्माद का वातावरण बने।

ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिए है कि प्रधानमंत्री सहित सारी सरकार यह बात जानती है कि पिछले पांच साल में सरकार ने जो भी आर्थिक कदम नोटबंदी, जीएसटी, स्टैंड अप, स्टार्ट अप आदि आदि  उठाये गये उनके परिणाम जनता के लिये घातक और कुछ चहेते पूंजीपतियों के लिये बेहतर साबित हुये। धन भले ही पूंजीपति दे दें पर वोट तो जनता ही देगी। जनता का ध्यान उसकी समस्याओ की ओर जाय ही नहीं इसका सबसे कारगर और इनका आजमाया नुस्खा है साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण। इससे हमें बचना होगा।

वे धर्म, सांप्रदायिकता, हिन्दू मुस्लिम पर जो भी बोलते हैं, उन्हें बोलने दीजिये। उन्हें न रोकिये और न उनसे इन मुद्दों पर उलझिए। उन्हें याद दिलाइये 2014 के किये वादे। उन्हें याद दिलाइये नोटबन्दी, जीएसटी की दुश्वारियां, उन्हें याद दिलाइये उनके उन विदेशी दौरे जिनमे उनके चहेते पूंजीपतियों को लाभ मिला और पहुंचाया गया है, उन्हें याद दिलाइये 2016 से बंद बेरोजगारी के आंकड़े, उन्हें याद दिलाइये, बढ़ता बजट घाटा और घटता कर संग्रह, उन्हें याद दिलाइये, घटता उत्पादन और घटती हुयी औद्योगिक इकाइयां, उन्हें याद दिलाइये शनै शनै दम तोड़ती हुयी सरकारी कंपनियां, उन्हें याद दिलाइये 22 लाख रिक्तियां उन्हें याद दिलाइये कि क्या उम्मीदें इनसे आप ने संजोयी थीं और क्या मिला आपको। सरकार और सत्तारूढ़ दल के मुद्दों पर मत जाइए। अपने मुद्दे जो आप को सुखी, समृद्ध जीवन की ओर ले जाते हैं उन्हें उठाइये। धर्मांधता के मुद्दे जनता का नही  धर्मांधता पर आधारित दल और नेताओं को लाभ पहुंचाते हैं।

अपराधबोध का मनोविज्ञान समझिये । अक्सर कोई व्यक्ति जब यह कहे कि वह कसम खा कर कह रहा कि झूठ नहीं बोलता, झूठे वादे नहीं करता, तो यह बात समझ लीजिए कि वह यह झूठ कह रहा है। दुनियाभर के राजनीतिक दल चुनाव के दौरान झूठे वायदे करते हैं और भारत के राजनेता भी अपवाद नहीं है। दुनियाभर में जनता अलग अलग वैचारिक गुटों में बंट कर उन वादों की बखिया उधेड़ती है और मीन मेख निकाल कर के प्रदर्शन करती है अपनी सरकार से जवाब मांगती है और सुबूत तलब करती है, पर दुनिया मे कहीं भी आंदोलित और सवाल पूछने वाली जनता को देशद्रोही नहीं कहा जाता। लेकिन आज हर वह आदमी देशद्रोह का जुर्म कर रहा है जो सरकार से प्रश्न पूछ रहा है। सवाल का चिह्न ( ? ) जो प्रतीकात्मक रूप से अंकुश की तरह है सरकार और सरकार के समर्थकों को असहज कर दे रहा है।

मैं इसी प्रवित्ति के खिलाफ हूँ। जवाबदेही लोकतंत्र की पहली शर्त है और सवाल करने का अधिकार जनतंत्र की बुनियाद है। यह बुनियाद दरकने न दीजिये। पिछले पांच सालों की एक ' उपलब्धि ' यह भी रही है कि हमने सरकार को सर्वोच्च और सरकार के मुखिया को परमेश्वर मान लिया है। जानबूझकर कर ऐसा वातावरण बनाया गया कि जो भी इन पर उंगली उठाएगा उसे देशद्रोही करार दे दिया जाएगा। यह मानसिक दासता की ओर ले जाने का एक उपक्रम है ताकि हम पर सत्ता की हनक और भावुकता की अफीम की पिनक में राज किया जा सके।

और अंत में #ग़ालिब का यह कालजयी शेर भी पढ़ लें,
तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता ।

© विजय शंकर सिंह

अपराध और दंड - समझौता विस्फोट फैसला - एक समीक्षा / विजय शंकर सिंह

" मैं इस फैसले का समापन गहरे दुःख और क्षोभ से कर रहा हूँ, क्योंकि एक भयानक हिंसा से जुड़े इस मुक़दमे का अंत मुझे ज़रूरी सुबूतों के अभाव में अभियुक्तों को दोषमुक्त कर के करना पड़ रहा है । "
यह शब्द हैं पंचकूला के एनआईए जज जगदीप सिंह के जिन्होंने समझौता बम धमाके के मुक़दमे की सुनवायी की। जज की यह टिप्पणी किसी भी कानूनी स्ट्रिक्चर से अधिक महत्वपूर्ण है। 2007 में हुए इस धमाके में कुल 70 लोग मारे गए थे। आज का विमर्श इसी मुक़दमे में मुल्जिमों के बरी होने और एनआईए की विवेचना के दौरान की गयी भूलों और गलतियों पर है जिसका जिक्र जज ने अपने फैसले में किया है।

यह घटना 18/19 फरवरी 2007 के रात की है जब समझौता एक्सप्रेस, पानीपत के पास पहुंची तो ट्रेन में एक जबरदस्त धमाका होता है और उक्त धमाके में कुल 70 लोग मारे जाते हैं। यह एक बड़ी घटना थी। इस मुक़दमे की विवेचना शुरू में एक एसआईटी गठित कर के की गयी फिर इसे नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी को विवेचना के लिये सौंप दिया गया।

विवेचना से यह तथ्य सामने आए कि यह एक कट्टरपंथी संघठन अभिनव भारत द्वारा की गयी आतंकी कार्यवाही है। इसमें स्वामी असीमानंद नामक एक व्यक्ति का नाम आया जो पहले भी 2007 में हुए मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह पर हुये विस्फोट कांड का मुल्ज़िम था। हालांकि वह उन दोनों ही मुकदमो में 2017 और 2018 में बरी हो गया है। समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के मामले में असीमानंद के साथ लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजेंद्र चौधरी आदि भी मुल्ज़िम थे। ये सभी 20 मार्च को सुनाए गये 160 पृष्ठों वाले फैसले के अनुसार इल्ज़ाम से बरी हो गए हैं।

इस फैसले के आलोक में देश की सबसे बड़ी और सक्षम जांच एजेंसी, एनआईए, जिसके गठन का उद्देश्य ही आतंकी घटनाओं की विवेचना और तथ्यान्वेषण का रहा है की क्षमता, नीति और नीयत पर देश भर में आलोचना की जा रही है। जज के इस टिप्पणी पर कि एनआईए ने जानबूझकर कर स्वतंत्र गवाहों का न तो परीक्षण किया और न ही उनसे गहरी पूछताछ की। एनआईए ने उन सुबूतों को जानबूझकर अदालत से दूर रखा जिनसे विस्फोट के बारे में अन्य तथ्य जाने जा सकते थे। जज के ही शब्दों में, पढ़े " सबसे कारगर और प्रमाणित सुबूत अदालत में पेश ही नहीं किये गए। "

अभियोजन के अनुसार, इस मुक़दमे का आधार ही असीमानंद का इकबालिया बयान था जो सीआरपीसी की धारा 164 के अंतर्गत पुलिस ने लिया था। असीमानंद बाद में अपने इस बयान से मुकर गया। अगर कोई मुल्ज़िम 164 सीआरपीसी के अंतर्गत दिए गए अपने बयान से मुकर जाता है तो केवल उक्त बयान के ही आधार पर  कुछ नहीं किया जा सकता है पर उससे जुड़े अन्य सुबूतों की खोज की जाती है। वैसे भी उक्त इकबालिया बयान में केवल एक बात स्वीकार की गयी थी यह धमाके एक अन्य मुल्ज़िम सुनील जोशी के कहने पर किये गये थे, और सुनील जोशी का देहांत मुक़दमे की सुनवायी के ही दौरान हो गया था।

इसके साथ ही असीमानंद फरारी की हालत में हरिद्वार में अजय सिंह और शक्ति सिंह के यहां रुका था और उन दोनों से अपने जुर्म की स्वीकारोक्ति की थी जिसे कानून की भाषा मे एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन कहा जाता है, पर अदालत में उक्त दोनों ने जिसके सामने यह कनफेशन हुआ था, इस बात से इनकार कर दिया और वे दोनों ही होस्टाइल हो गए।

अदालत ने विवेचना में कई गम्भीर त्रुटियां पायी हैं। जैसे,
* दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगे हुए सीसीटीवी कैमरे के फूटेज अदालत में पेश नहीं किये गए। जबकि सीसीटीवी कैमरे घटना के दिन सक्रिय थे। फैसले के अनुसार,
" यदि सीसीटीवी कैमरे के फूटेज के आधार पर तफ्तीश आगे की गयी होती तो निश्चय ही अपराधियों के खिलाफ और भी सुबूत मिले होते। "
* दिल्ली रेलवे स्टेशन की डॉरमेट्री के रजिस्टर सुबूत के रूप में नहीं पेश किए गए। एक रजिस्टर भी इसमें मिला था जिस पर असीमानंद के हस्ताक्षर थे पर उसकी भी पुष्टि नहीं करायी गयी।
* पुलिस ने उन बैग को बरामद किया था जिसमे बम लाये गये थे। वे बैग इंदौर के बने हुए थे। पर उनकी पहचान नहीं करायी गयी। जज ने इस पर भी हैरानी व्यक्त की है।
* जज ने इस बात पर भी हैरानी जतायी है कि जांच एजेंसी ने कोई शिनाख्त परेड क्यों नहीं करायी।
* जांच एजेंसी एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कनफेशन के तथ्यों को भी प्रमाणित नहीं कर पायी।
* अभियोजन के एक गवाह इस्तकार अली ने यह बताया था कि दिल्ली से चलने के बाद थोड़ी दूर पर कुछ समय के लिये यह ट्रेन रोकी गयी थी और यह चर्चा थी की एक बैग रख कर कुछ लोग अंधेरे में उतर गए थे। जांच एजेंसी ने इस तथ्य की सघन जांच पड़ताल नहीं किया।
* अदालत ने इस बात पर भी टिप्पणी की कि सभी अभियुक्तों में तालमेल और षडयंत्र का आधार जानने के लिये जांच एजेंसी ने उनके बीच हुयी बातों का कॉल डिटेल रिकॉर्ड जो विवेचना की सबसे पहली सीढ़ी होती है एकत्र नहीं किया जिससे इस घटना का षडयंत्र अनावृत्त रहा।
* फिंगर प्रिंट के नमूनों का भी मिलान नहीं किया गया।
अदालत के यह कुछ ऑब्जर्वेशन हैं जो फैसले में हैं। ये विंदु लाइव लॉ से लिये गये हैं।

अदालतों द्वारा मुल्जिमों को बरी कर देना कोई अनोखी खबर नहीं है। आपराधिक मामलों में साज़याबी का प्रतिशत बहुत उत्साहजनक नहीं है। अगर हम सामूहिक हिंसा और अपराध के मामलों में सज़ायाबी का प्रतिशत देखें तो बहुत ही निराशाजनक स्थिति सामने आएगी। कई महत्वपूर्ण मामलों में अभियुक्तों को बरी किया जा चुका है। इसका कारण विवेचना की कमी है या गवाहों का टूट जाना या लंबे समय तक चलने वाले ट्रायल से गवाहों और अभियोजन की उदासीनता इस पर कोई कानून या पुलिस का संस्थान शोध करे तो रोचक तथ्य सामने आएंगे।

इसी मामले जज अपने फैसले में यह लिखते हैं कि " अभियोजन ने अपराध के मोटिव पर कोई टिप्पणी ही नहीं की जब कि किसी भी अपराध को साबित करने की यह पहली शर्त होती है। " इस घटना का मोटिव स्पष्ट था। मोटिव था कि भारत पाक के बीच तमाम विरोध और विवादों के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस जो जनता को आवागमन का एक आसान साधन उपलब्ध कराती है, को पटरी से उतारना। लेकिन यह बात अदालत में नहीं कही गयी।

इस मामले की विवेचना पहले एसआईटी करती है। फिर एनआईए को इसकी जांच सौंपी जाती है। 2014 के बाद  जांच की दिशा केंद्र में सरकार बदलते ही स्वतः बदल जाती है। असीमानंद जिसका असली नाम नब कुमार दास है और आरएसएस का प्रचारक है जिसने अपने अपराध को स्वीकार किया है, सरकार बदलते ही अपने बयान से मुकर जाता है और देश की सबसे कुशल जांच एजेंसी जो आतंकी घटनाओं की विवेचना के लिये गठित हुयी है इस मामले में कोई और सुबूत जुटा नहीं पाती है और मुल्जिमों के बरी होने का एक आसान मार्ग दे देती है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, "अभियोजन की थियरी के अदालत में खुलने के बाद अभियुक्तों को अपने बचाव में कुछ कहने के लिये रहा ही नहीं ! "

इसी विषय पर हरियाणा के पूर्व डीजी विकाश नारायण राय के एक लेख से निम्न अंश ले रहा हूँ पढ़े,
* एसआईटी की शुरुआती जांच में यह स्थापित हुआ कि इस अपराध का केंद्र बिंदु इंदौर था और इसके तार पाकिस्तानी संगठनों से नहीं बल्कि उग्र हिन्दुत्ववादी समूहों से जुड़े हुए थे।
* इसके बाद यह जांच सीबीआई को मिली जिसने करीब दो वर्ष जांच की मॉनिटरिंग की और जांच उपरोक्त लाइन पर ही आगे बढ़ी लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं की जा सकी|
* 2010 में एनआईए के गठन के बाद जांच उसके पास आ गयी और गिरफ्तारियां शुरू हुयीं। जांच की दिशा वही रही जो हरियाणा एसआईटी ने निर्धारित की थी। तीन अपराधी गिरफ्तार नहीं किये जा सके लेकिन नवम्बर 2011 में अदालत में चालान दे दिया गया।
* 2014 में भाजपा  सरकार बनने बाद एनआइए चीफ शरद कुमार ने सरकार के दबाव में पलटी मारी और एजेंसी की सारी शक्ति केस में आरोपियों को बरी कराने में लग गयी। महत्वपूर्ण गवाह या तो बिठा दिए गए या उनकी गवाहियाँ ही नहीं कराई गयीं। तीन भगोड़े अपराधियों को पकड़ने के कोई प्रयास ही नहीं हुए। इस सब का लाभ आरोपियों को मिला।

सरकार के एक विचित्र निर्णय यह है कि, समझौता विस्फोट के मामले में अभियुक्तों के बरी होने के फैसले के विरुद्ध एनआईए ने हाईकोर्ट में अपील करने से मना कर दिया है । आपराधिक न्याय व्यवस्था में निचली अदालत के फैसले पर ऊपर की अदालत में अपील करने का एक वैधानिक प्राविधान है। पर सरकार का यह फैसला हैरान करने वाला है। लगता है कि एनआईए को जो दायित्व सौंपा गया था कि मुलजिम बचाओ उसे उसने अपनी तरफ से पूरा कर लिया है। अब अगर अपील होती है तो उसकी चाल खुल भी सकती है।

अगर सभी साक्ष्यों को प्रस्तुत, उनके परीक्षण तथा उस पर बहस के बाद मुलजिम बरी होते तो कोई बात नहीं है। पर जज ने फैसले में जो यह बात कही है कि महत्वपूर्ण सुबूत नहीं रखे गए यह अभियोजन और एनआईए की नीयत को ही संदिग्ध बना देते हैं। ऊपर से अपील न करने की सरकार की घोषणा ने तो सीधे मुलजिम छुड़ाने में मदद करने वाली एनआईए और अभियोजन को ही मुलजिम के कठघरे में खड़ा कर देती है।

यह एक्विटल अगर सही है तो फिर यह विस्फोट किया किसने था ? यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा। क्या कारण है कि हाई प्रोफाइल मामलो में तफ्तीश 'जेसिका को किसी ने नहीं मारा' की तर्ज़ पर अनसुलझी रह जाती है ? यह तफ्तीश की कमी है, सुबूत नज़रअंदाज़ करने के कारण है या पहले से ही किसी निश्चित तयशुदा निष्कर्ष पर पहुंचने  का इरादा ? यह पुलिस और एनआईए की विफलता तो है ही। पर सुबूत जानबूझकर अदालत तक नहीं पहुंचने देना यह नाकामी और प्रोफेशनल अक्षमता ही नहीं एक आपराधिक षडयंत्र है। यह अपराध है, अपराधी को बचाने का।

अदालतों से अभियुक्तों का बरी हो जाना एक गंभीर चूक समझी जाती है। इसकी जांच भी होती है और उन कारणों की पड़ताल कर के जिम्मेदारी भी तय की जाती है कि किसकी गलती से यह चूक हुयी है। साथ ही एक मज़बूत अपील तैयार करके बड़ी अदालत में दोषमुक्ति के फैसले को चुनौती दी जाती है। पर यहाँ तो सरकार ने बेशर्मी से ही अपील करने से मना कर दिया। एक पुलिस अफसर होने के नाते मेरे लिये यह सचमुच ही हैरान करने वाला निर्णय है। आपराधिक क्षवि के लोगों को लगभग सभी दल टिकट देते रहते हैं, पर अदालत में मुल्जिमों को बरी होने पर सरकार द्वारा अपील न करने की यह एक नयी परम्परा चल पड़ी है।

पुलिस के स्थानांतरण और नियुक्तियों में राजनीतिक संरक्षण आम बात है पर क्या विवेचना, गिरफ्तारी, अभियोजन आदि जो प्रोफेशनल पुलिसिंग है, वह भी सरकार और सत्तारूढ़ दल की मर्जी और सोच से निर्देशित होंगी ? अगर ऐसा हुआ तो कानून व्यवस्था की स्थिति भयावह हो जाएगी। यह फैसले पर यह सवाल भी उठता है कि क्या एनआईए को सरकार और सत्तारूढ़ दल की मर्जी के अनुसार मुकदमो की विवेचना करने के लिये एनआइए प्रमुख को रिटायर होने के बाद दो वर्ष तक सेवा विस्तार और फिर भारत सरकार के विजिलेंस कमिश्नर के पद से नवाजा गया ? क्या  यह लाभ, समझौता विस्फोट और अन्य कई आतंकी मामलों में असीमानंद और उसके साथियों के विरुद्ध केस कमजोर करने के पुरस्कार स्वरूप दिया गया है ?

आतंकवाद एक जघन्य हिंसक कृत्य है। अगर हम मानवता के विरुद्ध होने वाले ऐसे अपराधों की जांच, अभियोजन और अपील पर सत्तारूढ़ दलों की सोच और मानसिकता से प्रेरित होकर निर्णय लेने लगेंगे तो आतंकवाद के विरुद्ध अपनी ही प्रतिबद्धता को खोखला कर बैठेंगे। अपराध अपराध है और उसे देश के कानून के अनुसार बिना किसी राजनैतिक सोच और ऊहापोह के प्रोफेशनल तरीके से निपटा जाना चाहिये।

© विजय शंकर सिंह