Wednesday, 6 March 2019

खोजी पत्रकारिता चोरी नहीं है, यह चोरी उजागर करने का एक नेक माध्यम है / विजय शंकर सिंह

राफेल मामले में प्रशांत भूषण एडवोकेट की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज 6 मार्च को सुनवायी होनी थी। नियत समय पर सुनवायी शुरू भी हुयी। प्रशांत भूषण ने अपना पक्ष रखते हुए अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में छपे एक लेख का हवाला दिया और यह कहा कि भारतीय समझौता दल की बातचीत के समानांतर प्रधानमंत्री कार्यालय की भी एक बातचीत चल रही थी। पीएमओ द्वारा समानांतर चल रही बातचीत में क्या मुद्दे हैं और क्या क्या मसले उठे हैं यह भारतीय समझौता दल की जानकारी में नहीं है। गुपचुप रूप से चल रहे पीएमओ की बातचीत से आईएनटी ( INT ) द्वारा की जा रही समझौता शर्तो में परेशानी खड़ी हो सकती है अतः समझौता दल के प्रमुख ने रक्षा सचिव और रक्षा मंत्री को बातचीत की इस समस्या से अवगत कराते हुए यह अनुरोध किया कि अगर पीएमओ द्वारा कोई समानांतर बातचीत चल रही है तो, उसे ही चलने दिया जाय। पर तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह लिख कर कि पीएमओ हो सकता है इस सौदे पर हो रही आईएनटी की बातचीत की मॉनिटरिंग कर रहा हो, यह पत्रावली वापस कर दिया। 


द हिन्दू ने उसी फाइल से जुड़े कुछ दस्तावेज और नोट और ऑर्डरशीट की फ़ोटो अपने अखबार में कई किश्तों में खबरों के साथ छापी। प्रशांत भूषण ने उन्ही दस्तावेजों को अदालत में प्रस्तुत करने के लिये अदालत से सरकार को निर्देश देने के लिये अनुरोध किया। तब सरकार के अटॉर्नी  जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि द हिन्दू में प्रकाशित दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चुराए गए थे। और यह भी कहा कि इस पर दी ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट का मुकदमा चल सकता है। लेकिन अटॉर्नी जनरल ने यह नहीं कहा कि वे दस्तावेज जो द हिन्दू में छपे थे वे फर्ज़ी हैं और गलत हैं। इसपर सरकार मौन है।

सरकारी दफ्तरों में फाइलों के रखरखाव की भी एक संहिता होती है। कौन सी फाइल किस अफसर तक जाती है और लौट कर कब कहां वापस आती है इन सबका ज़िक्र ऑफिस मैनुअल में हैं। कौन सी फाइल कितने समय तक रखी जायेगी और कितने समय के बाद नष्ट होगी। नष्ट करने का निर्णय कौन अधिकारी लेगा आदि आदि सभी बातें ऑफिस मैनुअल या रूल्स ऑफ बिजनेस में लिखा रहता है। राफेल से जुड़ी फाइलें निश्चित ही गोपनीय और महत्वपूर्ण होंगी। उनका मूवमेंट, फाइलों की मूवमेंट स्लिप से पता चल सकता है। अभी यह नहीं पता है कि कौन कौन सी और कितनी फाइलें चोरी हुयी हैं और इनके चोरी होने से किसे लाभ पहुंच सकता है ? इस चोरी पर तो सवाल उठेगा ही। आज ये फाइलें गायब हैं कल रक्षा से जुड़े और महत्वपूर्ण दस्तावेज भी चोरी हो सकते हैं या चुराये जा सकते हैं। साउथ ब्लॉक से दस्तावेज चोरी हो जाना एक बड़ी घटना है। सरकार के लिये यह निश्चित रूप से यह एक चिंताजनक प्रकरण होगा।

राफेल मामले में जब द हिन्दू ने खबर छापी तो वे ये दस्तावेज भी छपे थे। तब रक्षामंत्री ने यह आरोप लगाया था कि हिन्दू ने दुर्भावना से अधूरा दस्तावेज जिसमे रक्षामंत्री की नोटिंग छुपा ली गयी थी, छापा था, और उन्होंने पूरा दस्तावेज जिसमे रक्षा मंत्री की नोटिंग भी थी को सदन में सार्वजनिक रूप से दिखाया । इसकी भी खबर दूसरे दिन अखबारों और न्यूज़ वेबसाइटों पर छपी थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि रक्षामंत्री के सदन में प्रस्तुत करने तक वे दस्तावेज सरकार के पास थे और रक्षामंत्री को ये दस्तावेज उनके मंत्रालय ने ही उपलब्ध कराए होंगे। दस्तावेज कभी भी किसी मंत्री या प्रधानमंत्री के पास नहीं रहते हैं । या तो वे मंत्रालय में रखे जाते हैं या पीएमओ के यहां अगर पीएमओ ने उन दस्तावेजों को किन्ही कारण से मंगाया है तो।  इसका मतलब यह हुआ कि दस्तावेजों की चोरी उस दिन, जब सदन में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिखाया था, के बाद ही हुयी होगी।

उधर पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का एक ऑडियो टेप सोशल मीडिया पर घूम रहा था, जिनमे उन्होंने कहा था कि फाइलें उनके शयन कक्ष में हैं। उक्त ऑडियो टेप के सत्यता की जांच आज तक तो हुयी नहीं, और हुयी भी हो तो आज तक कुछ पता भी नहीं चला। यह गम्भीर मामला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सुप्रीमकोर्ट ने राफेल सौदा मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहा कि वह ऐसे किसी भी पूरक हलफनामों अथवा अन्य दस्तावेजों पर गौर नहीं करेगा जो उसके समक्ष दखिल नहीं किए गए हैं। अदालत में क्या हुआ इसे अब पढिये। 

प्रशांत भूषण ने कोर्ट में कहा- जब प्राथमिकी दायर करने और जांच के लिए याचिका दाखिल की गईं तब राफेल पर महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाया गया। अगर तथ्यों को दबाया नहीं गया होता तो सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदा मामले में प्राथमीकि और जांच संबंधी याचिका को खारिज नहीं किया होता। 
अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अधिवक्ता प्रशांत भूषण जिन दस्तावेजों पर भरोसा कर रहे हैं, वे रक्षा मंत्रालय से चुराए गए हैं. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने राफेल सौदे पर जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया है वे गोपनीय हैं और आधिकारिक गोपनीयता कानून का उल्लंघन हैं। राफेल सौदे से जुड़े दस्तावेजों की चोरी होने के मामले की जांच चल रही है। 
अटॉर्नी जनरल ने कहा, राफेल सौदे से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने वाला सरकारी गोपनीयता कानून के तहत और अदालत की अवमानना का दोषी है। 

तब चीफ जस्टिस ने अटॉर्नी जनरल से लंच के बाद यह बताने को कहा कि राफेल सौदे से जुड़े दस्तावेजों के चोरी होने पर क्या कार्रवाई की गई ?
चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रशांत भूषण को सुनने का यह अर्थ नहीं है कि उच्चतम न्यायालय राफेल सौदे के दस्तावेजों को रिकॉर्ड में ले रहा है।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि राफेल पर ‘द हिंदू' की आज की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय में सुनवाई को प्रभावित करने के समान है जो अपने आप में अदालत की अवमानना है। 
अटॉर्नी जनरल ने राफेल पर पुनर्विचार याचिका और गलत बयानी संबधी आवेदन खारिज करने का अनुरोध करते हुये कहा कि ये चोरी किए गए दस्तावेजों पर आधारित है.

इस संबंध में कानूनी दृष्टिकोण इस प्रकार है। 
* अगर कोई दस्तावेज जो तथ्यपूर्ण और वास्तविक हों, पर चुरा कर ही प्राप्त किये गए हों और उन्हें अदालत में पस्तुत किया गया हो तो भी यदि अदालत उक्त मुक़दमे के संदर्भ में उन्हें प्रासंगिक समझती है तो उन्हें अदालत सुबूत के रूप में स्वीकार करने पर संज्ञान ले सकती है। 
* अगर वे दस्तावेज ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के अंतर्गत क्लासिफाइड दस्तावेज के रूप में चिह्नित हैं तो उनकी गोपनीयता भंग करने वालों पर इस अधिनियम के अंतर्गत कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। 
* चोरी आईपीसी के अंतर्गत एक दंडनीय और संज्ञेय अपराध है। उसकी अलग से मुक़दमा दर्ज कर तफ्तीश होगी और जिसकी लापरवाही से चोरी हुयी है उसके लापरवाही की अलग विभागीय जांच होगी। 
* अगर उक्त लापरवाही, विभागीय जांच से  चोरी में संलिप्तता और षड़यंत्र तक पहुंच जाती है तो फिर यह आपराधिक मामला बनता है और इसकी उसी चोरी के साथ दर्ज एफआईआर के अनुसार जांच होगी। 
* अगर प्रस्तुत किया गया दस्तावेज फर्जी है तो यह अदालत की अवमानना है और उक्त फ़र्ज़ी दस्तावेज दायर करने वाले व्यक्ति के खिलाफ अदालत जो समझे वह कार्यवाही कर सकती है। 
जब द हिन्दू के प्रधान संपादक एन राम से यह पूछा गया कि उन्हें यह दस्तावेज कहां से मिले तो उन्होनें कहा, 
" मीडिया अपनी खबरों के लिये प्राप्त दस्तावेजों का स्रोत बताने के लिये बाध्य नहीं है। अखबार और मीडिया किसी भी दस्तावेज का स्रोत बताने के लिये कि वह उन्हें कहां से मिला है, बाध्य नहीं है। उन्हें अपने श्रोत को बताने के लिये धरती पर ऐसा कोई है जो उन्हें बाध्य कर सके । "
वे आगे कहते हैं कि, 
" आप उन्हें चुराया हुआ कह सकते हैं। हमारा इससे कोई सरोकार नहीं है। हमसे कोई भी कोई सूचना उगलवा नहीं सकता है। लेकिन दस्तावेज और उससे जुड़ी खबरें खुद ही सच बयान कर रही हैं।" 
उनका बयान आगे पढ़ें, 
" राफेल से जुड़े ये सारे दस्तावेज जनहित में ही छापे गये हैं। द हिन्दू अखबार से कोई भी इन गोपनीय दस्तावेजों की प्राप्ति का स्रोत नही पता कर सकता है।

पत्रकार कृष्ण कांत ने इस संदर्भ में एक बड़ी मार्के की बात कही है जिसे मैं यहां उद्धृत कर रहा हूँ। उनके अनुसार, 
" जहां तक दस्तावेज चोरी की बात है तो इतिहास में जितने घोटाले सामने आए हैं, वे सब पिछले दरवाजे से ही आये हैं। कोई सरकार अपना घोटाला खुद नहीं बताती। पत्रकार अपने आधिकारिक सूत्रों से सूचनाएं बाहर लाते हैं और जनता को पता चलता है कि कौन बोफोर्स चोर है, कौन कोयला चोर है, कौन कफन चोर है और कौन राफेल चोर. इस बार शायद ये पैंतरे काम न आएं। "
आगे वे लिखते हैं, 
" एक और दिलचस्प बात है कि राफेल घोटाले के सारे तथ्य अब जनता के सामने हैं, लेकिन हिंदी मीडिया इन तथ्यों के सार्वजनिक होने के बाद भी अपने पाठकों तक नहीं पहुंचा रहा है. हिंदी मीडिया सिर्फ वही सूचनाएं अपने पाठकों तक पहुंचाता है जिसे सरकार चाहती है या जो सरकार के फायदे में है.।"

अब यह देखना है कि सरकार जो इन दस्तावेजों की चोरी की बात सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार कर चुकी है, वह अब क्या करती है। मुझे लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि गायब फाइलों के दस्तावेज कुछ दिन में ही सोशल मीडिया और कुछ अखबारों में छपने लगें। इस दौरान ए गर्दमगरदा में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को राफेल फाइलों की चोरी की जांच होने और जिम्मेदारी तय होने तक त्यागपत्र दे देना चाहिये। राफेल जैसे मामले जिसमे सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप है, कोई भी अफसर चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो बिना पीएम की मर्ज़ी के कुछ भी नहीं कर सकता है। 

© विजय शंकर सिंह 

अयोध्या मामले में मध्यस्थता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित / विजय शंकर सिंह

अयोध्या मामले में मध्यस्थता पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले की बुधवार को सुनवाई की. हालांकि, अभी सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं बताया कि वह इस पर फैसला कब सुनाएगी। 

सुनवाई के दौरान जहां मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए तैयार दिखा, वहीं हिंदू महासभा और रामलला पक्ष ने इस पर सवाल उठाए। हिंदू महासभा ने कहा कि जनता मध्यस्थता के फैसले को नहीं मानेगी। सुप्रीम कोर्ट  ने पिछली सुनवाई के दौरान सुझाव दिया था कि दोनों पक्षकार बातचीत का रास्ता निकालने पर विचार करें. अगर एक फीसदी भी बातचीत की संभावना हो तो उसके लिए कोशिश होनी चाहिए। मीडिया रिपोर्ट्स और एनडीटीवी के अनुसार निम्न विंदु आज की सुनवायी में उठे हैं। 

* सुनवाई की शुरुआत में हिंदू महासभा ने पीठ से कहा जनता मध्यस्थता के लिए तैयार नहीं होगी. तो इस पर संविधान पीठ ने कहा कि आप कह रहे है कि इस मसले पर समझौता नहीं हो सकता. 

* जस्टिस बोबड़े ने हिंदू महासभा से कहा- आप कह रहे हैं कि समझौता फेल हो जाएगा. आप प्री जज कैसे कर सकते हैं ?

* संविधान पीठ ने कहा यह केवल जमीन का विवाद नहीं है, यह भावनाओं से जुड़ा हुआ है. यह दिल दिमाग और हीलिंग का मसला है. इसलिए कोर्ट चाहता है कि आपसी बातचीत से इसका हल निकले।

* जस्टिस बोबड़े ने कहा जो पहले हुआ उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं. विवाद में अब क्या है हम इस उस पर बात कर रहे हैं. कोई उस जगह बने और बिगड़े निर्माण या मन्दिर, मस्जिद और इतिहास को बदल नहीं कर सकता। बाबर था या नहीं, वो किंग था या नहीं ये सब इतिहास की बात है. सिर्फ आपसी बातचीत से ही बदल सकता है।

* मुस्लिम पक्षकार की ओर ओर से राजीव धवन ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह कोर्ट के ऊपर है कि मध्यस्थ कौन हो ? मध्यस्थता इन कैमरा हो।  

* इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि यह गोपनीय होना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा पक्षकारों द्वारा गोपनीयता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. मीडिया में इसकी टिप्पणियां नहीं होनी चाहिएं. प्रक्रिया की रिपोर्टिंग ना हो. अगर इसकी रिपोर्टिंग हो तो इसे अवमानना घोषित किया जाए.

* जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह केवल पार्टियों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि दो समुदायों को लेकर विवाद है. हम मध्यस्थता के माध्यम से लाखों लोगों को कैसे बांधेंगे? यह इतना आसान नहीं होगा.

* जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से संकल्प की वांछनीयता एक आदर्श स्थिति है. लेकिन असल सवाल यह है कि ये कैसे किया जा सकता है? मध्यस्थता का मकसद पक्षकारों के बीच समझौता कराना है. इस पर मुस्लिम पक्ष के वकील ने कहा कि हम मध्यस्थता के लिए खुले हैं.

* जब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि मध्यस्थता के जरिए हुए फैसले को लाखों लोगों के लिए बाध्यकारी कैसे बनाया जाए? तो मुस्लिम पक्ष ने कहा कि मध्यस्थता का सुझाव कोर्ट की तरफ से आया है और बातचीत कैसे होगी ये कोर्ट को तय करना है?

* जस्टिस बोबड़े ने कहा कि जब कोई पार्टी किसी समुदाय की प्रतिनिधि होती है, चाहे वह प्रतिनिधि के मुकदमे में कोर्ट की कार्यवाही हो या मध्यस्थता हो. उसे बाध्यकारी होना चाहिए।

* जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि कोर्ट का फैसला एक बाध्यकारी चरित्र है। मध्यस्थता में हम कैसे लोगों को बाध्यकारी बना सकते हैं ?

* हिन्दू पक्ष ने कहा कि मान लीजिये की सभी पक्षों में समझौता हो गया तो भी समाज इसे कैसे स्वीकार करेगा? 

* इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि अगर समझौता कोर्ट को दिया जाता है और कोर्ट उस पर सहमति देता है और आदेश पास करता है. तब वो सभी को मानना ही होगा।

* भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सुनवाई के दौरान कहा कि मध्यस्थता के कुछ पैरामीटर हैं और उससे आगे नहीं जा सकता। उन्होंने 1994 में संविधान पीठ के फैसले का जिक्र किया, जिसमें पासिंग रिमार्क था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अंदरूनी हिस्सा नहीं है।

* रामलला विराजमान की ओर से सीएस वैद्यनाथन ने बहस की. रामलला विराजमान की तरफ से कहा गया कि हाईकोर्ट ने इस मामले में आपसी बातचीत से विवाद को हल करने की कोशिश की थी लेकिन नहीं हो पाया था।

* रामलला विराजमान की तरफ से कहा गया अयोध्या का मतलब राम जन्मभूमि। यह मामला बातचीत से हल नहीं हो सकता। साथ ही कहा कि मस्जिद किसी दूसरे स्थान पर बन सकती है।

* इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि आप अपना यह पक्ष मध्यस्थता के दौरान रख सकते हैं. इस पर रामलला विराजमान की तरफ से कहा गया कि फिर मध्यस्थता का मतलब क्या है ?

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 5 March 2019

पाकिस्तान से एक अच्छी खबर / विजय शंकर सिंह

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सूचना और संस्कृति मंत्री फय्यजुल हसन चौहान को हिन्दू समुदाय के विरुद्ध आपत्तिजनक बात कहने पर अपने पद से हटा दिया गया है। फय्यजुल हसन चौहान की बात का संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि, " अल्पसंख्यकों के लिये ऐसी टिप्पणी करने वालों के लिये इस्लाम मे कोई स्थान नहीं है। "


पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार उस्मान बुज़दार ने फ़ैयाज़ चौहान के इस आपत्तिजनक बयान के बाद तलब किया था, जिसके बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। पाक पंजाब के मुख्यमंत्री की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी में किसी भी तरह के भेदभाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चौहान ने हिंदुओं को गाय का मूत्र पीने वाला बताते हुए कहा था कि भारत पाकिस्तान का मुक़ाबला नहीं कर सकता है। इस बयान के बाद से ही उनकी जमकर आलोचना हो रही थी।

पाकिस्तान बदल रहा है या नहीं यह तो अभी नहीं कहा जा सकता है पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिये। क्या हम भी बात बात में मुस्लिम समाज के लोगों के प्रति आपत्तिजनक बात कहने वाले मंत्रियों के विरुद्ध इस संदर्भ में कोई कार्यवाही करने की सोच सकते हैं ? 

उदार और धर्मांधता से मुक्त पाकिस्तान भाजपा के लिये सबसे बड़ा खतरा होगा। हालांकि यह अभी नही  होने जा रहा है। भाजपा और संघ की सारी राजनीति ही मुस्लिम विरोध और सावरकर तथा जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत जिसमे हिन्दू और मुस्लिम अलग अलग राष्ट्र हैं, कहा गया था कभी, पर टिकी हुआ है। जब भी रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े मुद्दे को आप उठाएंगे तो न तो सरकार का कोई प्रवक्ता बोलेगा और न ही सरकार कुछ कहेगी। यहां तक कि सरकार के समर्थक जो बालकोट हमले पर कुछ भी पूछने पर सेना के मनोबल के शोर में ये वाजिब सवाल गुम कर देना चाहिते हैं वे भी कमेंट बॉक्स में नहीं नज़र आएंगे और अगर नज़र आये भी तो मूल मुद्दे से हट कर। 


भाजपा और संघ की प्राणवायु ही है कि हिंदुओ में भय, घृणा और आक्रोश का संचारी भाव स्थायी रूप से बना रहे। भय, घृणा और आक्रोश के भाव को सनातन धर्म मे कभी भी प्रशंसनीय नहीं माना गया है। पाकिस्तान के अंदर भी ऐसे तत्व हैं जिनकी जीविका ही भारत से घृणा और विरोध पर चलती रहती है। मैं इस मुगालते में नहीं हूं कि पाकिस्तान बदल रहा है, पर मैं चाहता हूं पाकिस्तान उदार हो और उस घृणा से मुक्त हो जिसके आधार पर वह खड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही एक भाषण का अंश उद्धृत करना चाहूंगा जिसमें उन्होंने एक बार कहा था कि, गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ापन दोनों ही मुल्क़ों के साझे दुश्मन हैं जिनसे साथ साथ जंग ज़रूरी है। 


मुझे नहीं पता कि भारत के बारे में पाकिस्तान के अवाम का एक बड़ा हिस्सा क्या सोचता है और वह अभी तक अपने जन्म के सिद्धांत से कितनी प्रतिबद्ध है । लेकिन यह बात भी ध्रुव सत्य है कि भारतीय उपमहाद्वीप में पलने वाले  अधिकतर आतंकी संगठन पाकिस्तान की सेना और आईएसआई द्वारा पालित और पोषित हैं। जब तक पाकिस्तान इन आतंकी समूहों के खिलाफ कोई निर्णायक और प्रभावी कार्यवाही नहीं करता तब तक पाकिस्तान की सदाशयता, अगर वह दिखाए तो भी संदेहों के घेरे में रहेगी। 


© विजय शंकर सिंह 


प्रधानमंत्री का भाषाई छिछलापन / विजय शंकर सिंह

घर मे घुस के मारने की भाषा क्या, भारत जैसे महान और गौरवपूर्ण अतीत वाले देश के  प्रधानमंत्री की भाषा है ? आश्चर्य है।

आतंकवाद का दमन तो बिना  गुंडो और लफंगों की भाषा का प्रयोग किये भी हो सकता है । घर मे घुस के तो सेना को मारना है और वह घर मे हर बार सक्षमता से घुस कर मार चुकी है। 1971 में सेना ने तो घर मे घुस कर मारा ही नहीं बल्कि उसने घर को तोड़ कर अलग भी कर दिया। एक नया घर ही बना दिया है। आप को घर मे घुसना ही नहीं है और न मारना है। आप को तो गांव के हर घर को जो इस समय आपके साथ बना रहे यह देखना है। और यह कूटनीतिक कला  गुंडे और लफंगई वाली शब्दावली से नहीं बल्कि गम्भीर, प्रभावपूर्ण वाक चातुर्य और देश के अंदर सभी की एकता से ही सम्भव है।

गाली अक्सर मन मे पल रहे छिछले खीज और तर्कशून्यता का परिणाम होती है। गाली तब लोग शुरू करते हैं जब वे समझ जाते हैं कि अब उनके पास तर्क के लिये न बुद्धि शेष है न विवेक। अगर प्रतिद्वंद्वी अपशब्द प्रहार के बीच भी स्थितप्रज्ञ बना रहता है तो गालीबाज बहस करने वाले का रक्तचाप खुद ही बढ़ने लगता है। तब उस पर केवल तरस आती है।

भारत के प्रधानमंत्री का भाषण पूरी दुनिया मे गम्भीरता से पढ़ा और सुना जाता है। यह किसी सामान्य नेता का भाषण नहीं है। इन भाषणों की न केवल हर  पंक्ति पढ़ी जाती हैं, बल्कि पंक्तियों के बीच भी पढ़ा जाता है। उसके कूटनीतिक निष्कर्ष भी निकाले जाते हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी जी जब भी सार्वजनिक मंच पर आते हैं तो वे बहक जाते हैं। वे न केवल तथ्यात्मक गलतियां कर जाते हैं पर अपने विरोधियों पर ऐसे ऐसे छिछले और हास्यास्पद आरोप लगाते हैं कि बाद में सरकार को उन पर सफाई देनी पड़ती है। आज भारत के प्रधानमंत्री अपनी भाषा, झूठ गलत तथ्यों से भरे भाषणों से मज़ाक़ के पर्याय बन चुके हैं । प्रधानमंत्री को ऐसे हल्केपन से बचना चाहिये।

प्रधानमंत्री के फोटो साड़ियों और महिलाओं के अंतर्वस्त्रों पर छप रहे हैं। मुझे नहीं पता प्रधानमंत्री की सहमति ऐसे फ़ोटो पर है या नही। प्रधानमंत्री की फ़ोटो विज्ञापन के रूप में प्रयोग नहीं हो सकती है। यह एक दंडनीय अपराध है। और बिना पीएमओ और सूचना प्रसारण मंत्रालय की अनुमति के तो उसे कहीं भी नहीं छापा जा सकता है। सरकार को इसका स्वतः संज्ञान लेना चाहिये।

पर यह बात भी सही है कि वर्तमान प्रधानमंत्री के अधिकतर समर्थक ऐसी ही भाषा शैली सुनने और बोलने के आदी हैं, तो यह उनकी भी मज़बूरी है कि वे आखिर बोलें भी तो क्या बोलें, शब्द चुनें भी तो कहां से चुनें। पर जब इसी भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की वक्तृता शैली, शब्द चयन, शालीन परिहास बोध और विरोध की अद्भुत शैली मन मस्तिष्क में बैठी हुयी हो तो उसी दल जो खुद को संस्कार और संस्कृति का झंडाबरदार मानती है के  प्रधानमंत्री को ऐसी छिछोरी शब्दावली से बचना चाहिये।

© विजय शंकर सिंह

Monday, 4 March 2019

आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

आतंकवाद से भारत एक लंबे समय से पीड़ित है। पहले 1980 से 2000 तक पंजाब में फिर 1980 से ही अब तक जम्मू कश्मीर में। इन दोनों ही प्रदेशों में आतंकवाद की घटनाएं पाक प्रायोजित थीं और आज भी पाक प्रायोजित ही हो रही हैं। पंजाब का आतंकवाद तो अब समाप्त हो गया, पर कश्मीर का आतंकवाद न केवल लगातार हो रहा है बल्कि और बढ़ रहा है। इस कड़ी में सबसे बड़ी घटना हाल ही में पाक पोषित आतंकी संगठन, जैश ए मोहम्मद द्वारा  पुलवामा में सीआरपीएफ के कानवाय पर हमला करके 40 जवानों की ह्त्या करना रहा है। इसके जवाब में सरकार ने जवाबी कार्यवाही की और जैश के बालाकोट स्थित एक अड्डे को नष्ट कर दिया। इससे जुड़ी कार्यवाही में हमारा एक पायलट विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान द्वारा पकड़ लिया गया था जो बात में सरकार के कूटनीतिक प्रयासों से छूटा। यह न तो पहली घटना है, और न ही अंतिम । अभी भी कश्मीर में आतंकवाद उफान पर है और रोज़ कोई न कोई हिंसक घटना आतंकियों द्वारा की जा रही है।

आतंकवाद का सीधा संबंध धर्म की कट्टरता से है। अक्सर हम यह कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है। पर यह एक कटु तथ्य है कि हर आतंकी अपने धर्म के कट्टर विचारों से प्रभावित होकर ही हिंसक कार्यों में लिप्त होता है। यही पंजाब के आतंकी काल मे खालिस्तान आंदोलन के समय हुआ था और यही अब कश्मीर में हो रहा है। पर धार्मिक कट्टरता ही आतंकवाद का अकेला कारण हो यह बात भी सच नहीं है। धर्मांध कट्टरपंथी भावुक , बेरोजगार और अतार्किक युवा जिन्हें आसानी से बरगलाया जा सकता है, को गोलबंद करके हिंसक कार्यो में झोंक देने के लिये एक लॉन्चिंग पैड की तरह धर्म को इस्तेमाल करते हैं।  धार्मिक कट्टरता के साथ साथ नस्लीय कट्टरता की भी भूमिका आतंकवाद के प्रसार में रहती है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि कट्टरता ही ऐसे हिंसक आतंकवाद को जन्म देती है। आज जब हम किसी को कट्टर हिन्दू या कट्टर मुस्लिम कहते देखते सुनते हैं तो यह बात एक मनोविकार की तरह लगती है। कट्टरता का अर्थ प्रतिबद्धता नहीं है। प्रतिबद्धता किसी भी विचार के प्रति हो सकती है। उस विचारधारा को फैलाने, बहस करने तथा उसे विकसित करने का अधिकार सभी को है। पर उस विचारधारा को किसी अन्य विचारधारा के मानने वाले व्यक्ति पर थोपने की बात उचित नहीं है। यह थोपना ही एक प्रकार की ज़िद है और हिंसा को जन्म देती है। धर्म, जाति, नस्ल और रंग का श्रेष्ठतावाद भी एक प्रकार की कट्टरता है। इस कट्टरता को फैलाने की ज़िद हिंसक बनाती है और यही सामुहिक हिंसा आतंकवाद में बदल जाती है।

दुनिया के इतिहास में अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिये हिंसा का सहारा लेने की यह प्रवित्ति नयी नहीं है बल्कि आदिम है। जब विवेक का विस्तार नहीं हुआ था, तर्क की बात गौड़ थी तो बाहुबल का उपयोग वैचारिक विस्तार के लिये होता था। पर धीरे धीरे जैसे समाज और इतिहास विकसित होता गया बाहुबल के स्थान पर बुद्धि और तर्क का प्रयोग होने लगा। इसी प्रकार के परिवर्तन युद्धकला में भी हुये और अब युद्ध बाहुबल से कम बल्कि तकनीक और प्रत्युत्पन्नमति कौशल से अधिक लड़े जाने लगे। नस्लीय और धार्मिक कट्टरता ने वैचारिक और तार्किक बहसों की किताबें बंद कर के हिंसा का रास्ता ग्रहण कर लिया जिससे धर्म, जो समाज और लोगों को उन्नत और गरिमापूर्ण जीवन के लिये कभी अवधारित किया गया था का औचित्य ही समाप्त हो गया।

कश्मीर का आतंकवाद पाकिस्तान के एक अधूरे एजेंडे को पूरा करने की चाल है। 1947 में जब धर्म के आधार पर एक नया मुल्क बना तो, मुस्लिम बहुल इलाके उक्त नए मुल्क में गये। कश्मीर तब भी मुस्लिम बहुल था। लेकिन कश्मीर ब्रिटिश भारत मे न होकर एक रियासत था तो वह इस फॉर्मूले से पाकिस्तान में नहीं जा सकता था। यह दर्द जिन्ना को तब भी था और वह दर्द पूरे पाकिस्तान को अब भी है। इसी एजेंडे को पूरा करने के लिये पाकिस्तान ने कबायलियों से हमला करवा दिया,और श्रीनगर तक वे हमलावर पहुंच गए। आनन फ़ानन में कश्मीर के राजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और तब भारतीय फौजों ने इन कबायलियों को पीछे खदेड़ा और अब जहां तक उन्हें खदेड़ा जा सका वह सीमा नियंत्रण रेखा बन गयी।

1947 के हमले की विफलता का प्रतिशोध लेने की कोशिश 1965 में पुनः पाकिस्तान ने किया और उसे ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा। 1971 में जो हुआ वह पहले पाकिस्तान का आंतरिक मामला था, पर जब पूरा पूर्वी पाकिस्तान उबल कर विद्रोह पर आ गया तो फिर भारत पाक युद्ध हुआ और पाकिस्तान टूट गया और बांग्लादेश बना। 90,000 पाक सैनिक युद्धबंदी बने और पाकिस्तान बुरी तरह हारा। लेकिन कश्मीर का मोह उसके एजेंडे से गया नही। 1999 में करगिल घुसपैठ हुयी और यह युद्ध भी उसे हारना पड़ा। लगातार असफल होने की खीज से पाकिस्तान की रणनीति बदली और उसने आतंकी समूहों को कश्मीर में भेजना शुरू किया और कट्टर वहाबी इस्लाम की विचारधारा से ओतप्रोत ये आतंकी तंजीमें आज भी कश्मीर में सक्रिय है।

पाकिस्तान ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये कट्टरपंथ का बुरी तरह प्रयोग किया है। चरमपंथी विचारधारा का इस्लाम कश्मीर के सूफियाना धार्मिक मानस पर आतंकी संगठनों से जुड़े मदरसों और जमातों द्वारा थोपा गया। प्रत्यक्ष में दीन की बात करने वाली इन तंजीमों का मक़सद ही यह है कि वे कश्मीर को इस्लाम का वास्ता देकर तोड़ लें, और पाकिस्तान के हित को साधे। यही एजेंडा न केवल कश्मीर में ही अपनाया जा रहा है बल्कि इसे पूरे भारत मे फैलाने की चाल है। यह एजेंडा इस सिद्धांत पर बनाया गया है कि भारत की साझी विरासत और साम्प्रदायिक सौहार्द की नींव खिसके और पूरा देश 1937 से 47 वाले जहरीले सांप्रदायिकता के वातावरण में बंट जाय। यह एजेंडा ही देश के अखंडता को तोड़ने के उद्देश्य से लाया गया है और यह योजना जनरल जिया उल हक के समय बनाई गयी भारत तोड़ो योजना का एक अंग है।

आतंकवाद के खिलाफ कोई भी लड़ाई धार्मिक कट्टरता की पैरवी करके नहीं लड़ी जा सकती है। यह लड़ाई लड़ी जा सकती है साम्प्रदायिक सद्भाव, एका, और समूह में एकजुट रह कर। पाकिस्तान और उसके पोषित आतंकी संगठन यह बात अच्छी तरह समझते हैं। वे साम्प्रदायिक सद्भाव और हिंदू मुस्लिम एका की बात सोच ही नहीं सकते हैं। क्योंकि कि पाकिस्तान का जन्म ही इसी साम्प्रदायिक विद्वेष के आधार पर हुआ है। पाकिस्तान आज भी उसी पिनक में जी रहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप में जहां जहाँ भी मुस्लिम आबादी है, वह उसके देश का हिस्सा है। जब कि यह द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत 1971 में ही मर गया था और अब यह सिद्धांत अस्तित्वहीन हो चुका है।

आतंकवाद भले ही नस्लीय या धार्मिक कट्टरता से उपजा हुआ ज़हर हो, पर इसका स्थायी भाव हिंसा है। हिंसा जन्य भय इसका आधार है। यह एक आपराधिक कृत्य भी है। आपराधिक कृत्य का समाधान ही अपराध और दंड की संहिता और कानून से होता है। पंजाब में जो कुछ हुआ और कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, वह बड़ी आपराधिक घटनाएं हैं जो उक्त प्रदेश के कानून व्यवस्था पर जबरदस्त असर डालती है। उनसे निपटने के लिये सेना और अन्य सुरक्षा बल लगाए जाते हैं। कश्मीर में पिछले दस सालों का आंकड़ा देखें तो लगभग हर दूसरे तीसरे दिन या तो आतंकी घटनाओं में नागरिक या जवान मरे हैं, या आतंकी,सुरक्षा बलों से हुये मुठभेड़ों में मारे गए हैं। आतंकी इन हिंसक घटनाओं से दो उद्देश्य प्राप्त करते हैं। एक तो जनता निरन्तर भयभीत बनी रहे और अपनी सरकार में अपना विश्वास खोने लगे और दूसरे सुरक्षा बल भी लंबे समय तक हो रहे इस प्रछन्न युद्ध मे ऊब जाय या ऊब और चिढ़ कर कुछ ऐसे उन्मादित कृत्य कर दे कि उसका बतंगड़ और तमाशा बन जाय और इसका सीधा असर सुरक्षा बल के मनोबल पर पड़े। सुरक्षा बल कितने भी अनुशासन से अपना कार्य करे, पर जब उसका डिप्लॉयमेंट लंबे समय के लिये प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है तो अनुशासनहीनता की छोटी बड़ी गलतियां होती ही हैं। आतंकी और उनके समर्थक इन घटनाओं का लाभ एक प्रोपैगैंडा के रूप में करने से चूकते नहीं हैं। यह आप नार्थ ईस्ट, पंजाब, कश्मीर और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां काफी अरसे से सुरक्षा बल नियुक्त हैं, देख सकते हैं।

कश्मीर का आतंकवाद, भारत पाक आपसी संबंधों के जटिल समीकरण पर आधारित है। जब देश बंटा तो देश का नेतृत्व सबसे कद्दावर नेताओं के हांथ में था, पर गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद, जिन्ना, लियाकत अली, बादशाह खान, आदि आदि के कद धरे के धरे रह गया, और मुल्क बंट गया। न सिर्फ बंटा बल्कि इस त्रासदी में 10 लाख लोग मारे गए तथा 50 लाख की आबादी का विस्थापन हुआ। मैं इस दुखद त्रासदी को नियति कह कर अलग हट जाता हूँ। यह नियति ही तो है कि 1857 से 1947 तक हिन्दू मुसलमान एकजुट हो अंग्रेजों से लड़ते रहे और जब आज़ाद हुये तो आपस मे लड़ कर मरने लगे। 1947 के दंगे में एक भी अंग्रेज़ नहीं मारा गया जबकि वह साझा दुश्मन था। आज भी दुःखद यह है नियति अभी भी पिंड नहीं छोड़ रही है।

देश में गत दो-तीन दशकों से जिस प्रकार आतंकवाद पनप रहा है, उससे देश की अखण्डता को ही खतरा उत्पन्न हो रहा है तथा देश के  राजनीतिज्ञ इस आसन्न खतरे से अनभिज्ञ अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए ही प्रयासरत हैं। आतंकवाद के शमन के लिए देश की संसद  में शायद ही कोई सार्थक बहस कभी चली हो। न तो कभी सर्वदलीय बैठक बुला कर समस्या के मूल में जाने की कोशिश की गयी और न ही सर्वसम्मति से आतंकवाद के विरूद्ध कोई कार्ययोजना ही तैयार की गयी। यदि आतंकवाद का उन्मूलन शीघ्र ही प्रभावपूर्ण तरीके से नहीं किया गया तो यह एक ऐसी जटिल समस्या बन जायेगा कि उसका हल मुश्किल से ही होगा।

धार्मिक कट्टरता से उपजे आतंकवाद का उत्तर प्रति धार्मिक कट्टरता तो नहीं ही हो सकती है। इसका उत्तर साम्प्रदायिक सद्भाव ही होगा। पाकिस्तान का उद्देश्य केवल कश्मीर ही नहीं है, बल्कि उसका एक ही उद्देश्य है भारत को तोड़ना। अगर कोई यह सोचता है कि पाक अधिकृत कश्मीर पाकिस्तान को देकर इस जटिल समस्या से पिंड छुड़ाया जा सकता है तो वह बेहद भ्रम में हैं। इससे और भी समस्या पैदा होगी। भारत तोड़ने के  इसी घृणित उद्देश्य से तो उसने खालिस्तान समर्थकों को पालना पोसना शुरू किया था। पर पंजाब में 20 साल तक आतंक फैलाने के बाद पाकिस्तान का यह प्रयोग असफल हो गया। देश न टूटे इसकी फिक्र हमे करनी होगी और हर वह तत्व, विचार, और कदम जो भारत भंग की ओर ले जाते हैं के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना पड़ेगा। यह तभी संभव है जब साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहे हम विविध भाषा, धर्म, संस्कृति के बावजूद भी एक समृद्ध उपवन की तरह फलते फूलते रहे। सरकार तो आतंकवाद से निपटने के लिये जो भी कर रही है उसे करने दीजिये पर हम तो एकजुट बने रहें।

© विजय शंकर सिंह