Saturday, 5 May 2018

AMU ( एएमयू ) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का जिन्ना तस्वीर विवाद - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

उनका खेल बिल्कुल साफ है। वे चाहते हैं कि भारतीय मुस्लिम, जिन्ना के तस्वीर की आड़ में खड़े हों ताकि वे यह कह सकें कि सारे मुसलमान अभी भी जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के साथ हैं। वे मौलाना आज़ाद की परंपरा के नहीं है। वे सेक्यूलर मूल्यों के साथ नहीं है। मुसलमानों का सेक्यूलर भाव एक भ्रम है। ऐसे बहुत से तर्क मेरे संघी मित्र अक्सर निजी बातचीत में देते रहते हैं। वे इसके लिये व्हाट्सएप्प शोध फैक्टरी से गढ़े हुये गल्प भी सुनाते रहते हैं। वे उदार सोच  वालों से दूर रहते हैं। चाहे यह उदार सोच हिन्दू में हो या मुस्लिमों में। वे खुद को कट्टर कहते हुये गर्व भी वे महसूस करते हैं । वे यही चाहते हैं कि मुसलमान नमाज़ी टोपी और ऊंचा पायजामे और बिना मूंछ की दाढ़ी में ही नज़र आये। आधुनिक और प्रगतिशील सोच के मुस्लिम से उनका अधूरा मिशन बाधित होता है। जिन्ना भी जब तक धर्म निरपेक्ष और प्रगतिशील सोच के थे तब तक वे न तो अंग्रेज़ों के प्रिय बने और न ही सावरकर के। सावरकर को हिन्दू राष्ट्र चाहिये था यह बिना मुस्लिम राष्ट्र की बात किये सम्भव ही नहीं था। 1940 के 22 मार्च को लाहौर में हुये मुस्लिम लीग के अधिवेशन में जब जिन्ना ने दोनों धर्मो को दो राष्ट्रीयता बता कर प्रस्तुत कर दिया तो सावरकर कैंप यह समझ बैठा कि धर्म के आधार पर जिन्ना एक मुस्लिम देश ले लें और शेष भारत हिन्दू राष्ट्र हो जाएगा।

पर जनता में तो गांधी का जादू था। कांग्रेस धर्म निरपेक्ष देश पर अड़ी थी। पर जिन्ना जिनके साथ उस समय मुस्लिम बहुत अधिक संख्या में थे , अंग्रेज़ो की साज़िश से अपना लक्ष्य, पाकिस्तान पाने में सफल हो गए। पर हिन्दू महासभा जिसका प्रभाव बहुत कम था, नकार दी गयी। हिन्दू महासभा से जो लोग धर्म के आधार पर जुड़े थे वे भी राजनीतिक रूप से कांग्रेस के साथ ही थे। जिन्ना का जिंदा रहना संघ के मनोवृति के लिये जरूरी है। यह संघ भली प्रकार से जानता है। एएमयू छात्र संघ को इस मामले में कोई विवाद नहीं बनाना चाहिये। उन्हें आंदोलन करने का अधिकार है। पर यह आंदोलन हो किस लिये रहा है यह तो स्पष्ट हो ?  जिन्ना की तस्वीर को लेकर अगर यह आन्दोलन हो रहा है तो इसका सीधा लाभ संघ की विचारधारा को मिलेगा। कट्टर इस्लाम की प्रतिक्रिया में कट्टर हिंदुत्व और पनपता है। जिस दिन लोग धार्मिक कट्टरता से दूर होने लग जाएंगे उसी दिन से संघ की विचारधारा अप्रासंगिक होने लगेगी।

देश के बंटवारे के लिये गांधी को पानी पी पी कर कोसने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि देश का बंटवारा गांधी की ज़िद से नहीं, बल्कि जिन्ना की ज़िद और हिन्दू महासभा के कांग्रेस विरोधी दृष्टिकोण से हुआ है।
सावरकर यह कहते थे किअंत मे मुसलमानों को हिन्दू महासभा से बात करनी पड़ेगी न कि कन्ग्रेस के साथ।
एमए जिन्ना ने 22 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में धर्म ही राष्ट्र है पर जो कहा था उसे भी पढ़ लें। जिन्ना उर्दू कम जानते थे। उनकी अंग्रेज़ी गज़ब की थी। वह भाषण अंग्रेज़ी में था। उसका अंश पढें।

" It is extremely difficult to appreciate why our Hindu friends fail to understand the real nature of Islam and Hinduism. They are not religions in the strict sense of the word, but are, in fact, different and distinct social orders, and it is a dream that the Hindus and Muslims can ever evolve a common nationality, and this misconception of one Indian nation has troubles and will lead India to destruction if we fail to revise our notions in time. The Hindus and Muslims belong to two different religious philosophies, social customs, litterateurs. They neither intermarry nor interdine together and, indeed, they belong to two different civilizations which are based mainly on conflicting ideas and conceptions. Their aspect on life and of life are different. It is quite clear that Hindus and Mussalmans derive their inspiration from different sources of history. They have different epics, different heroes, and different episodes. Very often the hero of one is a foe of the other and, likewise, their victories and defeats overlap. To yoke together two such nations under a single state, one as a numerical minority and the other as a majority, must lead to growing discontent and final destruction of any fabric that may be so built for the government of such a state. "

1947 में जो मुस्लिम मुहम्मद अली जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के विचारों से सहमत थे वे पाकिस्तान चले गए। जो असहमत थे, उन्होंने सेकुलर भारत मे रहना स्वीकार किया। वह बेहद दर्द और दुःखद काल था। वह, वह सुबह बिल्कुल नहीं थी जिसकी अभिलाषा ले कर एक लंबी लड़ाई हमारे पुरखों ने धर्म की सारी बंदिशें तोड़ कर साथ साथ लड़ी थी। अब जिन्नाह साहब की तस्वीर का एएमयू में कोई मतलब नहीं है। जिन्नाह मर चुके हैं। उनकी ज़िद सख्त मिजाजी से उपजा उनका धर्म ही राष्ट्र है का सिद्धांत मर चुका है। अतः अब उस जिन्न को बाहर निकालने का मतलब है अभी भी द्विराष्ट्रवाद की पिनक में जी रहे जिन्ना के सहोदर को पुनः प्रासंगिक कर देना। मुस्लिम या इस्लाम एक राष्ट्र है, या हिन्दू एक राष्ट्र है, का नारा देने वाले दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज जिन्ना पर विवाद के पीछे दो उद्देश्य है,
पहला, सरकार के चार साल के कामकाज पर उठ रही बहस को साम्प्रदायिकता की बहस में तब्दील करना, और
दूसरा, जो बात आज के हिन्दुत्व के सिद्धान्तकार 1937 से  कह रहे हैं कि धर्म से राष्ट्र अलग नहीं है उसे और सैद्धांतिक आवरण फैलाना ।

सावरकर अखंड भारत के पक्ष में ज़रूर थे। जैसे संघ आज भी अखंड भारत के पक्ष की बात करता है। पर क्या सामाजिक और पंथ समरसता के बिना कोई देश अखंड रह सकता है ? 1940 से जब साप्रदायिकता का घात प्रतिघात शुरू हुआ तो 1947 तक जब तक, देश बंट नहीं गया तब तक सारे समीकरण बिगड़ते चले गए। लोगो मे धर्म के आधार पर अविश्वास बढ़ता गया। चीजें बिगड़ती रहीं और जिन्ना मुस्लिम राष्ट्र के कायदे आज़म के तौर पर उभर आये, सावरकर हिन्दू राष्ट्र का चेहरा बन गए और गांधी, नेहरू , पटेल आज़ाद सेक्युलर भारत के अड़े रहे । जिन्ना तो सफल हो गए, पर हिन्दू महासभा और संघ गांधी के सामने कहीं थे ही नहीं। यही कुंठा और विफलता गांधी जी के हत्या का कारण बनी। साप्रदायिकता के घात प्रतिघात का यह खेल समझिये और इस ट्रैप से दूर रहिये।

© विजय शंकर सिंह

Friday, 4 May 2018

Ghalib - Use kaun dekh saktaa hai / उसे कौन देख सकता है / विजय शंकर सिंहः

ग़ालिब - 75.
उसे कौन देख सकता है, यगाना है वो यकता,
जो दुइ की बू भी होती, तो कहीं दो चार होता !!

Use kaun dekh saktaa hai, yagaanaa hai wo yakataa,
Jo dui kii buu bhii hotii, to kahiin do chaar hotaa !!
- Ghalib

यगाना - एकाकी , अकेला, आत्मीय
यकता - अद्वितीय, 

उसे देख पाना रंच मात्र भी सम्भव नहीं है । वह अद्वितीय तो अकेला ही है ।  यदि उसमे द्वैतता का लेश मात्र भी अंश होता तो, कहीं न कहीं उस से सामना हो ही जाता । वह एक से अधिक हो ही नहीं सकता ।

यह शेर एक दार्शनिक पुट लिये हुए है। यह ईश्वर के अस्तित्व और अद्वैतवाद के बारे में ग़ालिब का शायराना पक्ष है। उसे देख पाना सम्भव ही नहीं है। वह अकेला है, एक ही है और एकाकी है। वह अगर दो होता या अनेक होता तो वह कहीं न कहीं तो टकराता, पर वह तो अकेला है एक है। दो या अनेक होने की तो कोई बात ही नहीं।
कबीर की यह पंक्तियां पढ़ें। कबीर और ग़ालिब की कुछ रचनाओं में दार्शनिक समता है। यह एक दूसरे का सटीक भावानुवाद तो नहीं है, पर जब दार्शनिक गहराइयों में डूब कर उसका अध्ययन करते हैं तो दोनों में कहीं कहीं गज़ब की समता मिलती है।

लोग जाने इहु गीत है,
इहु तो ब्रह्म विचार !!
( कबीर )

मेरी रचनाओं को सुन कर लोग समझते हैं कि यह तो गीत है, पर यह तो ब्रह्न विचार है।
कबीर अपनी रचनाओं को ब्रह्म विचार कहते हैं, पर लोग उनकी रचनाओं को एक गीत समझते हैं। यह गीत तो हैं पर गीत की देह के भीतर जो निर्गुण ब्रह्म है वही कबीर की मूल अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार ग़ालिब की अनेक रचनायें रूमानी दिखती हैं पर जैसे ही उनके अंदर गहराई तक पैठ कर उनकी व्याख्या की जाती है तो सूफियाना नूर रोशन होने लगता है। यह शेर भी उसी प्रकार का है।

© विजय शंकर सिंह

Ghalib - Us lab se mil hii jaayegaa bosaa / उस लब से मिल ही जायेगा बोसा - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 73.
उस लब से मिल ही जायेगा बोसा कभी तो, हां,
शौक़ ए फ़िज़ूल ओ जुरअत ए रिंदाना चाहिये !!

Us lab se mil hii jaayegaa bosaa kabhii to, han,
Shauq e fizool o jur'ate, rindaanaa chaahiye !!
- Ghalib

बोसा - चुम्बन
शौक़ ए फ़िज़ूल - अतिरिक्त प्रेम, लालसा, चुम्बन प्राप्ति की उत्कंठा.।
जुरअत ए रिंदाना - एक मद्यपी जैसा साहस.

उनके अधरों का चुम्बन मुझे कभी न कभी तो मिल ही जायेगा, बशर्ते कि हृदय में अतिरिक्त प्रेम और मद्यपी जैसा साहस हो ।

ग़ालिब इस बात पर तो मुतमईन हैं कि देर सबेर तो प्रेयसी के अधरों का चुम्बन तो उन्हें मिल ही जायेगा, पर उसके लिये ह्रदय में और प्रेम का भाव तथा एक मद्यपी के साहस की आवश्यकता है। चुम्बन यहां प्रेम या प्रेयसी को पाने की मंज़िल है। लेकिन उस मंज़िल तक पहुंचने के लिये उन्हें उत्कट प्रेम और साहस की ज़रूरत है। यदि हृदय में उत्कट प्रेम और साहस है तो निश्चय ही भले ही देर हो जाय पर लक्ष्य, जो यहां उसके अधरों के चुम्बन का प्रतीक है, कभी न कभी मिलेगा ही। साहस और उत्कट अभिलाषा ( प्रेम ) अपने निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंचने में निश्चय ही सफलता देता है। यह ग़ालिब का विश्वास है।

यह शेर उतना आसान भी नहीं है जितना इसे पढ़ते या सुनते ही अधरों पर स्मिति खिल जाय। चुम्बन यहां लक्ष्य का प्रतीक है, और हृदय का प्रेम भाव उस लक्ष्य तक पहुंचने का उत्कंठा। पर लक्ष्य भी हो, लक्ष्य तक पहुंचने की उद्दाम लालसा या उत्कंठा हो पर साहस न हो तो सारी लालसा धरी की धरी रह जाती है। साहस भी, ग़ालिब यहां एक मद्यपी के साहस के समान चाहते हैं। मद्यपी का जुनूनी साहस होता । उन्माद से भरा हुआ । ऐसा साहस और हृदय में लक्ष्य को पाने की उत्कंठा तो, मंज़िल मिल ही जाती है।

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 3 May 2018

Ghalib - Us shamma kii tarah se / उस शम्मा की तरह से - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह


ग़ालिब - 74.
उस शम्मअ की तरह से, जिसको कोई बुझा दे,
मैं भी जले हुओं में हूँ, दाग ए नातमामी !!

Us shamm'a kii tarah se, jisko koi bujhaa de,
Main bhii jale huon mein, daagh ai naatamaamee !!
- Ghalib

जलते हुये दीपक को जैसे कोई बुझा दे, मैं भी उस जले बुझे दीपक की तरह अशेष चिह्न हूँ।
जलते हुये दीपक को बुझा कर देखिये। ज्योति तो नहीं रहती, प्रकाश भी नहीं रहता, धूम्र भी कुछ समय के बाद उड़ जाता है। अब तक सबको प्रकाश दिखाने वाला दीपक व्यर्थ हो जाता है। ग़ालिब यहां अपनी तुलना उसी दीपक से कर रहे हैं जो कल तक सबको रोशनी दिखाता था, और आज वह व्यर्थ है, अपना अर्थ खो चुका है। वह उसी व्यर्थता के अशेष चिह्न हैं। दाग ए नातमामी है।

एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी इस शेर का है। दीपक , देह  और प्रकाश आत्मा या जीवन का प्रतीक है। जब तक आत्मा है तब तक दीपक का महत्व है। वह संसार के लिये उपयोगी है। वह अंधेरे को छांटता है । पर जैसे ही वह प्रकाश तिरोहित हो जाता है, दीपक बुझ जाता है, फिर वह देह व्यर्थ हो जाती है। ज्योति के महा ज्योति या अखंड ज्योति में समाहित होते ही दीपक अपनी प्रासांगिकता खो बैठता है। वह अर्थहीन हो जाता है। ग़ालिब के इस शेर में उनका सूफियाना रूप बहुत ख़ूबसूरती से उभरा है।

© विजय शंकर सिंह

3 मई - विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म - बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे / विजय शंकर सिंह


3 मई को पूरे विश्व मे वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम डे मनाया जाता है। प्रेस अभिव्यक्ति का वाहक है। यह लोकतंत्र की प्राण वायु है। किसी भी देश और शासन व्यवस्था में प्रेस को कितनी आज़ादी है, यह किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का मापदंड हो सकता है।

इस अभिव्यक्ति के पर्व पर, उर्दू के महानतम शायरों में से एक, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की यह नज़्म पढ़ें।
O
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है

तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है

देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन

खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन

बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले ।
O


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ( 13 फरवरी 1911 - 20 नवम्बर 1984 ) पाकिस्तान के एक तरक़्क़ीपसन्द और विद्रोही शायर थे। उन्होंने नज़्मों, ग़ज़लों और लेखों पर बहुत प्रचुर और उच्च कोटि की रचनाएं की हैं। वे आज़ाद खयाल के थे और उनके इंक़लाबी विचारों के कारण, उन्हें पाकिस्तान की जेल में भी रहना पड़ा। इंक़लाबी ही नहीं उन्होंने बेहद मर्मस्पर्शी और प्रेम की कविताएं भी लिखी हैं। उनकी सारी रचनाओं का एक संकलन सारे सुखन हमारे हिंदी में उपलब्ध है। भारत विभाजन की त्रासदी पर उन्होंने दिल को झकझोर देने वाली एक कविता, ये वो सुबह तो नहीं है, लिखी है। वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े रहे हैं और पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के भी वे सदस्य रहे हैं। उन्होंने अरबी और अंग्रेज़ी में एमए किया था और अध्यापन को अपना कैरियर बनाया था। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिये भी नामित किया गया था, पर यह पुरस्कार उन्हें मिल नहीं सका। उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ के प्रतिष्ठित लेनिन शांति पुरस्कार से 1962 में सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें  1953 में निगार पुरस्कार, 1990 में निशान ए इम्तियाज से सम्मानित किया गया है। फ़ैज़ की यह नज़्म अभिव्यक्ति की शक्ति को अभिव्यक्त करती है। यह नज़्म पाकिस्तान में जब भी आंदोलन होते हैं, खूब गायी जाती है। 

© विजय शंकर सिंह

Tuesday, 1 May 2018

Ghalib - Us bazm mein mujhe nahin banatee / उस बज़्म में मुझे नहीं बनती - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 72.
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किये,
बैठा रहा, अगर्चे इशारे हुआ करे !!

Us bazm mein mujhe nahin bantee hayaa kiye,
Baithaa rahaa, agarche ishaare huaa kare !!
- Ghalib

उनकी महफ़िल में शर्म करने से मेरा काम नहीं बन सकता है। वे अगर उस महफ़िल से उठ कर जाने की भी बात करें तो भी मैं उठ कर नहीं जाने वाला ।

इस शेर की भी दो प्रकार से व्याख्या आलोचकों ने की है। एक व्याख्या लौकिक है दूसरी आध्यात्मिक। लौकिक से तात्पर्य है यह समाज, परिवेश और समय जिसमे हम रह रहे हैं। ग़ालिब का मंतव्य यह है कि जब वे बादशाह के दरबार मे हैं तो वहां उन्हें झिझक, शर्म से अपनी बात कहने में गुरेज नहीं करना चाहिये। उस दरबार मे वे जो चाहते हैं उन्हें खुल कर कहना चाहिए। ऐसा अक्सर हम सब के साथ होता है कि जब जम सक्षम के सामने होते हैं तो अपनी बात कह नहीं पाते। याचक की अपनी शर्म और स्वाभाविक झिझक होती है। अगर व्यक्ति स्वाभिमानी है, उसके में आत्मसम्मान का भाव है तो वह अपनी आवश्यकताओं, भावनाओं आदि को खुल कर कहने से, और अगर अवसर सार्वजनिक स्थान पर कहने हो तो, हिचकता है। यह झिझक, हया या शर्म का ही परिणाम होती है। ग़ालिब यही बात खुद से कहते हैं। वे स्वाभिमानी थे। यहां वे खुद को यह समझा रह हैं कि मुझे जब अपनी बात कहनी है तो महफ़िल में शर्म कैसी। मैं अपनी बात, अपना पक्ष रखूंगा। अगर चुप भी रहने को कहा जायेगा तो भी अपनी बात कहे बगैर नहीं रहूंगा। यहां स्वाभिमान के साथ समझौता करने का उद्देश्य नहीं है बल्कि स्पष्टवादिता है। ग़ालिब, अपनी बेलौस अंदाज़ ए बयानी , स्वाभिमान और स्पष्टवादिता के कारण दिल्ली दरबार मे चाटुकार मुसाहिबों , जो लगभग सभी दरबारों का स्थायी भाव होता है, के सदैव निशाने पर थे। वे दरबार मे दाखिल तो गये थे, दरबार से उन्हें कुछ अनुग्रह राशि भी मिलती थी, पर वे दरबारी मानसिकता अपने अंदर अंत तक नहीं पा लाये। उनकी यह पीड़ा अक्सर उनकी रचनाओं में छलक पड़ती है। यह शेर उसी पीड़ा का प्रतिभाव है। वे खुद को तसल्ली देते हुये यहां दीख पड़ते है।

कुछ आलोचकों ने इस का एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी देखा है। वहां महफ़िल , इबादतगाह का प्रतीक है। इबादतगाह में कैसा संकोच । ईश्वर के समक्ष कैसा स्वाभिमान। यहां तो सब कुछ तिरोहित कर के बेहद स्पष्टता से अपनी बात कहना चाहिये। बिल्कुल कबीर के इस पंक्ति की तरह,
सीस उतारे भुंहि धरे खाला का घर नाहिं !
ग़ालिब कबीर से अवगत थे या नहीं यह तो मुझे नहीं पता और अभी तक ऐसा कोई संदर्भ भी नहीं मिला पर मुझे वह कहीं कहीं वे बिल्कुल कबीर के पैटर्न पर सोचते और बोलते नज़र आते हैं ।

एक व्याख्या इसकी इश्क़ ए मजाज़ी की भी है। यह महफ़िल प्रेमिका का साथ और उससे प्रयण निवेदन के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। वहां भी अगर ऐसी परिस्थिति आ जाय तो अपनी बात कह देनी चाहिये । प्रणय निवेदन का आनंद अक्सर शर्म हया और झिझक बाधित कर देता है। उसी बाधा से मुक्त होने की बात भी ग़ालिब इस शेर में कह रहे हैं । 

कुल मिला कर इस शेर का मूल भाव यह है कि  जब भी ऐसा अवसर और स्थान उपलब्ध हो तो हमें अपनी बात बिना शर्म या हया या झिझक या भय के कह देनी चाहिये। अगर चुप रहने का इशारा भी हो या कोई चुप रहने को कुछ कहे तो भी ऐसे अवसर पर चुप नहीं रहना चाहिये। अपनी बात कह देनी चाहिए।

© विजय शंकर सिंह

1 मई - जन्मदिन - मधु लिमये और आरएसएस के बारे में उनके विचार - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह


आज 1 मई को भारतीय समाजवादी आंदोलन के एक सशक्त स्तम्भ और लोक सभा के प्रखर सदस्य मधु लिमये का जन्मदिन है। मधु जी, जो इनका लोकप्रिय संबोधन था, डॉ लोहिया के निकटतम सहयोगियों में से एक थे। लोकसभा में जब वे बोलने के लिए खड़े होते थे सबकी निगाहें उन्ही पर होती थीं। गोवा के आज़ादी की लड़ाई में भी वे अगली पंक्ति में थे। वे सरल, सादगी पसंद और समाजवाद के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वे जब 1977 में आये थे तो उनको सुनने और उनसे मिलने का सौभाग्य मुझे भी मिला था।
1977 में जब सभी प्रमुख दल इंदिरा गांधी के विरुद्ध एक होकर चुनाव लड़े तो जो पार्टी बनी थी वह जनता पार्टी थी। यह सभी दलों का वह कोई गठबंधन नहीं था, बल्कि सभी दलों का विलय हो गया था। सभी दलों ने अपना अस्तित्व समाप्त कर लिया था।  यह विलय जयप्रकाश नारायण जी के प्रयासों से हुआ था जो उस समय देश के सबसे बड़े नेता थे। इस चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। वह हार इतनी शर्मनाक थी कि उत्तरप्रदेश और बिहार में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। पर यह मेल सतही था। वैचारिक मेल था भी नहीं और न ही हो सकता था। अतः जनता पार्टी में वैचारिक जद्दोजहद पार्टी बनने के दो साल के अंदर  ही शुरू हो गयी और मधु लिमये ने जन संघ से जनता पार्टी में शामिल हुए लोगों से आरएसएस की सदस्यता छोड़ने और संघ से सम्बंध विच्छेद करने के लिये कहा। यहीं पर राजनीतिक विचारधारा का संघर्ष शुरू हो गया। आरएसएस से संबंध, जन संघ से जनता पार्टी में गये नेता अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, नाना जी देशमुख आदि छोड़ नहीं सकते थे क्यों कि संघ ही इनकी पितृ संस्था थी। तभी जनसंघ से जनता पार्टी में गया धड़ा, दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अलग हो गया और भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। आरएसएस के बारे में मधु लिमये क्या सोचते थे, यह उनके इस संक्षिप्त लेख से ज्ञात हो जाएगा।
अब आप यह संक्षिप्त लेख पढिये।
***
प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक मधु लिमये द्धारा लिखित, आर.एस.एस. पर, एक विस्तृत नोटः 
आरएसएस क्या है?
----मधु लिमये

मैंने राजनीति में 1937 में प्रवेश किया. उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी. मैंने मैट्रिक की परीक्षा जल्दी पास कर ली थी, इसलिए कॉलेज में भी मैंने बहुत जल्दी प्रवेश किया. उस समय पूना में आरएसएस और सावरकरवादी लोग एक तरफ और राष्ट्रवादी व विभिन्न समाजवादी और वामपंथी दल दूसरी तरफ थे. मुझे याद है कि 1 मई 1937 को हम लोगों ने मई दिवस का जुलूस निकाला था. उस जुलूस पर आरएसएस के स्वयंसेवकों और सावरकरवादी लोगों ने हमला किया था और उसमें प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सेनापति बापट और हमारे नेता एसएम जोशी को भी चोटें आई थीं. उसी समय से इन लोगों के साथ हमारा मतभेद था.

* हमारा संघ से पहला मतभेद था राष्ट्रीयता की धारणा पर. हम लोगों की यह मान्यता थी कि जो भारतीय राष्ट्र है, उसमें हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोगों को समान अधिकार है. लेकिन आरएसएस के लोगों और सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की कल्पना सामने रखी. जिन्ना भी इसी किस्म की सोच के शिकार थे-उनका मानना था कि भारत में मुस्लिम राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्र दो राष्ट्र हैं और सावरकर भी यही कहते थे.

* दूसरा महत्वपूर्ण मतभेद यह था कि हम लोग लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे और आरएसएस के लोग लोकतंत्र को पश्चिम की विचारधारा मानते थे और कहते थे कि वह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है. उन दिनों आरएसएस के लोग हिटलर की बहुत तारीफ करते थे.
गुरुजी संघ के न केवल सरसंघचालक थे, बल्कि आध्यात्मिक गुरु भी थे. गुरुजी और नाजी लोगों के विचारों में आश्चर्यजनक साम्य है. गुरुजी की एक किताब है ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ जिसका चतुर्थ संस्करण 1947 में प्रकाशित हुआ था. गुरुजी एक जगह कहते हैं:

‘हिन्दुस्तान के सभी गैर हिन्दू लोगों को हिन्दू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिन्दू धर्म का आदर करना और हिन्दू जाति और संस्कृति के गौरवगान के अलावा कोई और विचार अपने मन में नहीं लाना होगा'.
एक वाक्य में कहें तो वे विदेशी होकर रहना छोड़ें नहीं तो उन्हें हिन्दू राष्ट्र के अधीन होकर ही यहां रहने की अनुमति मिलेगी- विशेष सुलूक की तो बात ही अलग है, उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा, उनके कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे- यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं.’ तो गुरुजी करोड़ों हिन्दुस्तानियों को गैर-नागरिक के रूप में देखना चाहते थे. उनके नागरिकता के सारे अधिकार छीन लेना चाहते थे और यह कोई उनके नए विचार नहीं हैं. जब हम लोग कॉलेज में पढ़ते थे, उस समय से आरएसएस वाले हिटलर के आदर्शों पर ले चलना चाहते थे. उनका मत था कि हिटलर ने यहूदियों की जो हालत की थी, वही हालत यहां मुसलमानों और ईसाइयों की करनी चाहिए.
नाजी पार्टी के विचारों के प्रति गुरुजी की कितनी हमदर्दी है, यह उनकी ‘वी’ नामक पुस्तिका के पृष्ठ 42 से, मैं जो उदाहरण दे रहा हूं, उससे स्पष्ट हो जाएगा-

‘जर्मनी ने जाति और संस्कृति की विशुद्धता बनाए रखने के लिए सेमेटिक यहूदियों की जाति का सफाया कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर दिया था. इससे जातीय गौरव के चरम रूप की झांकी मिलती है. जर्मनी ने यह भी दिखला दिया कि जड़ से ही जिन जातियों और संस्कृतियों में अंतर होता है, उनका एक संयुक्त घर में रूप में विलय असंभव है. हिन्दुस्तान में सीखने और बहस करने के लिए यह एक सबक है.’

आप यह कह सकते हैं कि वह एक पुरानी किताब है- जब भारत आजाद हो रहा था, उस समय की किताब है. इनकी दूसरी किताब है ‘ए बंच ऑफ थॉट्‌स’. मैं उदाहरण दे रहा हूं उसके ‘लोकप्रिय संस्करण’ से, जो नवंबर 1996 में प्रकाशित हुआ. इसमें गुरुजी ने आंतरिक खतरों की चर्चा की है और तीन आंतरिक खतरे बताए हैं.

●एक हैं मुसलमान,
●दूसरे हैं ईसाई और
●तीसरे हैं कम्युनिस्ट.

सभी मुसलमान, सभी ईसाई और सभी कम्युनिस्ट भारत के लिए खतरा हैं, यह राय है गुरुजी की. इस तरह की इनकी विचारधारा है.
गुरुजी के साथ, मतलब आरएसएस के साथ।

* तीसरा मतभेद यह है कि गोलवलकर जी और आरएसएस वर्ण व्यवस्था के समर्थक हैं और मेरे जैसे समाजवादी वर्ण-व्यवस्था के सबसे बड़े दुश्मन हैं.
मैं अपने को ब्राह्मणवाद और वर्ण व्यवस्था का सबसे बड़ा शत्रु मानता हूं. मेरी यह निश्चित मान्यता है कि जब तक वर्ण-व्यवस्था और उस पर आधारित विषमताओं का नाश नहीं होगा, तब तक भारत में आर्थिक और सामाजिक समानता नहीं आ सकती है.

लेकिन गुरुजी कहते हैं कि ‘हमारे समाज की दूसरी विशिष्टता थी वर्ण-व्यवस्था, जिसे आज जाति प्रथा कह कर उपहास किया जाता है.’ आगे वे कहते हैं कि ‘समाज की कल्पना सर्वशक्तिमान ईश्वर की चतुरंग अभिव्यक्ति के रूप में की गई थी, जिसकी पूजा सभी को अपने-अपने ढंग से और अपनी अपनी योग्यता के अनुसार करनी चाहिए.

* ब्राह्मण को इसलिए महान माना जाता था, क्योंकि वह ज्ञान-दान करता था.
* क्षत्रिय भी उतना ही महान माना जाता था, क्योंकि वह शत्रुओं का संहार करता था.
* वैश्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, क्योंकि वह कृषि और वाणिज्य द्वारा समाज की आवश्यकताएं पूरी करता था और
* शूद्र भी, जो अपने कला-कौशल से समाज की सेवा करता था. इसमें बड़ी चालाकी से शूद्रों के बारे में कहा गया है कि वे अपने हुनर और कारीगरी द्वारा समाज की सेवा करते हैं.’

लेकिन इस किताब में चाणक्य के जिस अर्थशास्त्र की गुरुजी ने तारीफ की है, उसमें यह लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करना शूद्रों का सहज धर्म है. इसकी जगह पर गुरुजी ने चालाकी से जोड़ दिया- समाज की सेवा.
* चौथा मतभेद का विंदु है, भाषा.
हम लोग लोक भाषा के पक्ष में हैं. सारी लोकभाषाएं भारतीय हैं, लेकिन गुरुजी की क्या राय है? गुरुजी की यह राय है कि बीच में सुविधा के लिए हिंदी को स्वीकारा, लेकिन अंतिम लक्ष्य यह है कि राष्ट्र की भाषा संस्कृत हो. ‘बंच ऑफ थॉट्‌स’ में उन्होंने कहा है, ‘संपर्क भाषा की समस्या के समाधान के रूप में जब तक संस्कृत स्थापित नहीं हो जाती, तब तक सुविधा के लिए हमें हिन्दी को प्राथमिकता देनी होगी.’ सुविधा के लिए हिन्दी, लेकिन अंत में वे संपर्क-भाषा चाहते हैं संस्कृत. हमारे लिए यह शुरू से मतभेद का विषय रहा.
महात्मा गांधी की तरह, लोकमान्य तिलक की तरह हम लोग लोक भाषाओं के समर्थक रहे. हम किसी के ऊपर हिन्दी लादना नहीं चाहते. लेकिन हम चाहते हैं कि तमिलनाडु में तमिल चले, आंध्र में तेलुगु चले, महाराष्ट्र में मराठी चले, पश्चिम बंगाल में बंगला भाषा चले. अगर गैर-हिन्दी भाषी राज्य अंग्रेजी का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो वे करें. हमारा उनके साथ कोई मतभेद नहीं. लेकिन संस्कृत इने-गिने लोगों की भाषा है, एक विशिष्ट वर्ग की भाषा है. संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने का मतलब है देश में मुट्‌ठी भर लोगों का वर्चस्व, जो हम नहीं चाहते.

* पांचवीं बात, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में संघ-राज्य की कल्पना को स्वीकार किया गया था. संघ-राज्य में केन्द्र के जिम्मे निश्चित विषय होंगे, उनके अलावा जो विषय होंगे, वह राज्यों के अंतर्गत होंगे. लेकिन मुल्क के विभाजन के बाद राष्ट्रीय नेता चाहते थे कि केन्द्र को मजबूत बनाया जाए, इसलिए संविधान में एक समवर्ती सूची बनाई गई. इस समवर्ती सूची में बहुत सारे अधिकार केन्द्र और राज्य दोनों को दिए गए. जो विशिष्ट अधिकार हैं, वे पहले तो राज्य को मिलने वाले थे, लेकिन केन्द्र को मजबूत करने के लिए केन्द्र को दे दिए गए. बहरहाल, संघ-राज्य बन गया. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आध्यात्मिक गुरु गोलवलकर- इन्होंने हमेशा भारतीय संविधान के इस आधारभूत तत्व का विरोध किया.
ये लोग ‘ए यूनियन ऑफ स्टेट्‌स’ संघ-राज्य की जो कल्पना है, उसकी खिल्ली उड़ाते हैं और कहते हैं कि हिन्दुस्तान में यह जो संघ-राज्य वाला संविधान है, उसको खत्म कर देना चाहिए. गुरुजी ‘बंच ऑफ थॉट्‌स’ में कहते हैं, ‘संविधान का पुनरीक्षण होना चाहिए और इसका पुनः लेखन कर शासन की एकात्मक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए.’ गुरुजी एकात्मक प्रणाली यानी केन्द्रानुगामी शासन चाहते हैं. वे यह कहते हैं कि ये जो राज्य वगैरह हैं, ये सब खत्म होने चाहिए. इनकी कल्पना है कि एक देश, एक राज्य, एक विधायिका और एक कार्यपालिका. यानी राज्यों के विधानमंडल, राज्यों के मंत्रिमंडल सब समाप्त. यानी ये लोग डंडे के बल पर अपनी राजनीति चलाएंगे. अगर डंडा इनके हाथ में आ गया राजदंड, तो केन्द्रानुगामी शासन स्थापित करके छोड़ेंगे.
इसके अलावा स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय झंडा था तिरंगा. तिरंगे झंडे की इज्जत के लिए, शान के लिए सैकड़ों लोगों ने बलिदान दिया, हजारों लोगों ने लाठियां खाईं, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज नहीं मानता. वह तो भगवा ध्वज को ही मानता था और कहता था, भगवा ध्वज हिन्दू राष्ट्र का प्राचीन झंडा है. हमारा वही आदर्श है, हमारा वही प्रतीक है.
जिस तरह संघ-राज्य की कल्पना को गुरुजी अस्वीकार करते थे, उसी तरह #लोकतंत्र में भी उनका विश्वास नहीं था.

लोकतंत्र की कल्पना पश्चिम से आयात की हुई कल्पना है और पश्चिम का संसदीय लोकतंत्र भारतीय विचार और संस्कृति के अनुकूल नहीं है, ऐसी उनकी धारणा है.

जहां तक समाजवाद का सवाल है, उसको तो वे सर्वथा पराई चीज मानते थे और कहते थे कि यह जितने ‘इज्म’ हैं यानी डेमोक्रेसी हो या समाजवाद, यह सब विदेशी है और इनका त्याग करके हमको भारतीय संस्कृति के आधार पर समाज रचना करनी चाहिए. जहां तक हमारे जैसे लोगों का सवाल है हम लोग तो संसदीय लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं, समाजवाद में विश्वास रखते हैं और यह भी चाहते हैं कि शांतिपूर्ण ढंग से और महात्मा जी के सृजनात्मक सिद्धांत को अपना कर हम लोकतंत्र की प्रतिष्ठापना करें, सामाजिक संगठन बनाएं और समाजवाद लाएं.
जब कांग्रेस के एकतंत्रीय शासन के खिलाफ हमारी लड़ाई चल रही थी, तो हमारे नेता डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे कि जिस कांग्रेस ने चीन के हाथ भारत को अपमानित करवाया, उस कांग्रेस को हटाने के लिए और देश को बचाने के लिए हमको विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों के साथ तालमेल बैठाना चाहिए. इस विषय पर डॉक्टर साहब से मेरी बहुत चर्चा होती थी. दो साल तक बहस चली. आखिर तक मैं यह कहता रहा कि आरएसएस और जनसंघ के साथ हमारा तालमेल नहीं बैठेगा.

अंत में डॉक्टर साहब ने कहा कि मेरे नेतृत्व को तुम मानते हो या नहीं? मैंने कहा- हां, मैं मानता हूं. वे बोले, क्या यह जरूरी है कि सभी प्रश्नों पर तुम्हारी और मेरी राय मिले या सभी प्रश्नों पर मैं तुमको सहमत करूं. एक-आध प्रश्न ऐसा भी रहे जो हम दोनों के बीच मतभेद का विषय हो और मैं तो इस तरह का तालमेल चाहता हूं एक बड़े दुश्मन को हराने के लिए, तो इस मामले में तुम मान जाओ, इसको ‘ट्रायल’ दे दो. हो सकता है कि अंत में आरएसएस और डॉक्टर राममनोहर लोहिया की विचारधारा में संघर्ष हो कर रहेगा।
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मधु लिमये को उनके जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण।

© विजय शंकर सिंह