Monday, 2 April 2018

Ghalib - Aariz e gul dekh, roo e yaad aayaa Asad / आरिज़ ए गुल देख याद आया असद - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 42.
आरिज़ ए गुल देख, रू ए याद आया 'असद '
जोशिश ए फ़स्ल ए बहारी इश्तियाक अंगेज़ है !!

Aariz e ghul dekh, roo e yaad aayaa 'Asad '
Joshish e fasl e bahaaree ishtiyaaq angez hai !!
- Ghalib.

आरिज़           - कपोल, गाल.
जोशिश          - उबाल, उफान, तीव्रता.
फ़स्ल ए बहारी - बसंत का मौसम
इश्तियाक़       - इच्छाएं, कामनाएं, लालसा. उत्कण्ठा.
अंगेज़            - उठाने वाला, उभारने वाला.

पुष्प के कपोल को देख कर मुझे अपनी प्रेयसी का स्मरण हो आया. वसंत ऋतू का यह उन्माद, मेरी कामनाओं को तीव्र करने वाला है ।

बसंत अनेक उत्कण्ठायें ले कर आता है. कामनाओं को उभारने वाली यह ऋतु ऐसे ही ऋतुराज नहीं कही जाती है. शीत के बाद जब मौसम थोडा गर्म होने लगता है तो शीत जनित स्वाभाविक जड़ता मन और तन दोनों ही की धीरे धीरे क्षरित होने लगती है. पुष्प खिलने लगते हैं. हवा में मादकता छाने लगती है. कितना कुछ बसंत पर लिखा गया है ! कालिदास से ले कर कीट्स तक, चंद बरदाई से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर तक सबको बसंत के आगमन ने प्रेरित किया है. उर्दू साहित्य में इस फ़स्ल ए बहाराँ , बहारों की ऋतु पर बहुत ही उच्च कोटि की रचनाएं की गयी है. ग़म यानी जीवन के चिरंतन दुःख की व्याख्या करता हुआ उर्दू साहित्य ऋतुराज पर लिखे गए सन्दर्भों से भरा पड़ा  है. अपनी नाज़ुक खयाली के लिए प्रसिद्ध यह साहित्य बहुत ही समृद्ध है.  ग़ालिब को उपवन में खिले पुष्प पर अपनी प्रेमिका के कपोल नज़र आते है. चेतन और अवचेतन में पडी प्रेमिका की याद हर अवसर पर कहीं न कहीं आ ही जाती है. बसंत उत्कण्ठायें ही नहीं, अभिलाषाएं भी लाता है. इसी की और ग़ालिब इंगित करते हुए कहते हैं , बसंत का यह आगमन उनकी इच्छाओं , कामनाओं और अभिलाषाओं में वृद्धि करेगा  यह कामनाओं का ही कमाल है कि विकसित पुष्प की पंखुड़ियाँ उन्हें अपनी प्रेमिका के कपोल की तरह कोमल और आकर्षक लगती हैं. यह श्रृंगार का संयोग पक्ष है या वियोग पक्ष इस पर सुधीजन मीमांसा करते रहेंगे. पर यह एक आशावाद भी है. प्रेमिका, लक्ष्य है, और बसंत अवसर . विकसित पुष्प के दल प्रेरक. यह प्रेरक भाव ही लक्ष्य की और अग्रसर करेगा. पर कोई भी अभियान विपरीत परिस्थितियों में बाधित होता है. अब बसंत जो अवसर के रूप में आया है, लक्ष्य की और बढ़ने और उसे प्राप्त करने की और सहायक होगा.

ग़ालिब बहुत गहरे हैं. जिन खोजा तिन पाइयाँ की तरह से जितनी ही डुबकी लगाई जाती है, उतने ही आयाम दृष्टिगोचर होते हैं. एक और शेर पढ़े,

अदा ए ख़ास से ग़ालिब हुआ है, नुक़्ता सरा,
सला ए आम है, यारा ए नुक़्तादां के लिए !!

ग़ालिब अपनी बात विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त कर रहा है. गुणग्राही लोगों को आमंत्रण है कि वह इसे सुने. "

© विजय शंकर सिंह 

Ghalib - Aaraaish e jamaal se faarig nahin hanoz / आराइश ए जमाल से फारिग नहीं हनोज - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 42.
आराइश ए जमाल से फारिग नहीं हनोज़,
पेश ए नज़र है आईना, दायम नक़ाब में !!

Aaraaish e jamaal se faarig nahin hanoz,
Pesh e nazar hai aaiinaa, daayam naqaab mein !!
- Ghalib.

आराइश-श्रृंगारकरना.सुसज्जितहोना.सजावट.
जमाल    -सौंदर्य.
फारिग    - मुक्त.आज़ादहोंना.
हनोज़     -अभी.

श्रृंगार की लालसा से तू अभी मुक्त नहीं हुआ है। परदे मे रहते हुये भी तू अपने सामने सदैव दर्पण रखता है. तू अब भी श्रृंगार अर्थात सजने संवरने में लिप्त है। अपने सामने पड़े दर्पण के सहारे तू सदैव श्रृंगार में रत हैं।

© विजय शंकर सिंह

भगत सिंह का साहित्य - 23. शहादत से पहले साथियों को अन्तिम पत्र - 22 मार्च, 1931 / विजय शंकर सिंह

भगत सिंह को फांसी 23 मार्च 1931 को भोर में दी गयी थी। उन्होंने एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को अपने साथियों के नाम अंतिम संदेश दिया था। यह उनका आखिरी पत्र है। 23 साल के ऊर्जा और मेधा से भरा यह जाज्वल्यमान नक्षत्र एक दिन बाद ही अनन्त की महायात्रा पर प्रस्थान करने वाला था। मृत्यु भी उसका हौसला डिगा न सकी। जाते जाते भी वह अपने साथियों को संघर्ष का पैगाम दे गया। अपने उन्ही साथियो को वे अपना अंतिम पत्र लिखते हैं जिनके साथ मिल कर दुनिया के सबसे बड़े और ताकतवर साम्राज्य को मिटाने और एक समतामूलक समाज की स्थापना का मंसूबा बांधते हैं। यह पत्र उन्होंने उर्दू में लिखा था। वे उर्दू, हिंदी, गुरुमुखी और अंग्रेज़ी बहुत ही अच्छी तरह लिख बोल पढ़ पाते थे। यही पत्र नही बल्कि अपने भाइयों कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह को भी जो पत्र लिखे थे वे भी उर्दू में ही थे। उर्दू पंजाब की अधिकृत भाषा थी। यह भाषा इन्होंने बचपन से पढ़ी थी। उर्दू पंजाब के स्कूलों की सरकारी भाषा थी।

भगत सिंह से जानबूझकर अपने मुक़दमे की सुनवायी को लंबा खींचा था। उन्हें यह पता था कि उन्हें मृत्युदंड ही मिलेगा, और किसी भी सूरत में यह दंड किसी भी अपील में खत्म नहीं होगा। लेकिम ब्रिटिश न्याय व्यवस्था के पाखण्ड को उघाड़ने और उसे बेनक़ाब करने के लिये वे लम्बी सुनवायी चाहते थे। उनका मकसद पूरा हुआ। अखबारों में खूब चर्चा हुई। देश भर में वे एक जीवित आख्यान बन गये थे। अपने पत्र में वे लिखते हैं, कि, मैं अपनी कामनाओं का एक हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका। यदि मैं जीवित रहता तो शायद उन्हें पूरा कर सकता। भगत सिंह ने अपने इसी पत्र में देश और मानवता का उल्लेख किया है। वे देश ही नहीं मानवता को भी शोषण और आज़ादी से मुक्त कराना चाहते थे। वह केवल भारत की आज़ादी या ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे तक ही सीमित नहीं थे,, बल्कि वे मानव समाज के शोषण से मुक्ति के पक्षधर थे। यही विशिष्टता उन्हें भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के सभी हुतात्माओं में एक अलग और विशिष्ट स्थान दिलाती है।
अब आप उनका यह पैगाम पढ़ें ।
***
अपनी शहादत से पहले भगत सिंह का अपने साथियों को लिखा अंतिम पत्र ।

साथियो,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ,कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता।

मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता।

आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर स्वतन्त्र, जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इन्तजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।
आपका साथी –

भगतसिंह
इंक़लाब ज़िंदाबाद ।
***

( विजय शंकर सिंह )

2 अप्रैल भारत बंद में हिंसा - एक प्रतिक्रिया  / विजय शंकर सिंह

भारतबंद में जगह जगह हिंसा हो रही है। जैसे साम्प्रदायिक दंगे सख्ती से निपटे जाते हैं वैसे इसे भी सख्ती से नियंत्रित करना चाहिये।

सामूहिक हिंसा की इन वारदातों को जो शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर हो रही हैं वह कानून व्यवस्था की एक गम्भीर समस्या है। पर इन समस्याओं से निपटने में सरकार ने दल या विचारधारा के हित को विधि के हित को ऊपर रखा। चाहे गौरक्षकों की अराजक गुंडई हो, या गूजरों का आन्दोलन हो, या हरियाणा के जाटों का हिंसक आंदोलन हो, या राम रहीम के सज़ा के बाद उनके समर्थकों का आंदोलन हो, या भीमा कोरेगांव हिंसा हो, या बंगाल का मालदा पुरुलिया और आसनसोल हो, या भागलपुर का केंद्रीय मंत्री के बेटे द्वारा आयोजित हिंसक तमाशा हो, हर जगह दल और दल की विचारधारा, विधि के ऊपर हावी रही। इन सभी दंगो से कुछ न कुछ राजनीतिक फल की कामना की गयी। यह मैं पिछले चार साल का किस्सा बता रहा हूँ, पीछे आप को और भी उदाहरण मिलेंगे। आज दलितों का भारत बंद भी उन्ही सब हिंसक उदाहरणों से ली गयी सीखों का परिणाम है। जब दंगाइयों के खिलाफ मुक़दमे वापस लेने की वकालत करेंगे तो पुलिस और जिला प्रशासन से कैसे यह उम्मीद करेंगे कि वह दंगाइयों के नेताओं को पकड़े और उन पर एनएसए लगाए ? आज के भारत बंद में भी जो जो दोषी हों और हिंसा में लिप्त हैं उनके खिलाफ तत्काल प्रभावी करनी होगी। विरोध का अधिकार संविधान ने दिया है , हत्या करने और फूंकने तापने का नहीं।

सरकार को चाहिये कि कानून और व्यवस्था के मामले में दलगत सोच और एजेंडा को हावी न होने दे। जो भी कानून तोड़ता है वह एक अपराधी है उससे कानून में ही दिए गए प्राविधानों के अनुसार निपटना चाहिये। अन्यथा हम अच्छे दंगाई और बुरे दंगाई की मानसिकता जो इस्लास्मिक आतंकवाद झेल रहे देशों में पनप रही मानसिकता बुरा आतंकवाद और अच्छा आतंकवाद के समान मानते हुये से पीड़ित हो जायेंगे। पीड़ित ही नहीं हम असाध्य रूप से रुग्ण हो जाएंगे।  इतनी अराजक हालत के बाद क्या कोई विदेशी निवेशक यहां तशरीफ़ ले आएगा। आंकड़े चाहे जो बनाते रहिये, पर सच तो यह है कि, गोलगप्पे का ठेले वाला भी उस चौराहे पर नहीं जाता जहां रोज़ रोज़ मारपीट होती है। 

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर गुंडई और अराजकता फैलाने का महामार्ग किसने दिखाया है मित्रों ?

अदालत के आदेश की अराजक अवहेलना की परंपरा किसने और कब शुरू की थी ?

ज़रा याद कीजियेगा ।
तलवार का खुलेआम प्रदर्शन तो कोई भी कर सकता है। कल राम के नाम पर तलवार भांजी जा रही थी, आज भीमराव रामजी आंबेडकर के नाम पर !!

जो जो हो चुका है उसका लोग अपनी सुविधा के अनुसार अपने हित लाभ के लिये अनुसरण करते हैं। और आगे भी करेंगे।

राजनीति और स्वार्थ की चाशनी में पगी अधिकार की लड़ाई हिंसक भी हो सकती है।


© विजय शंकर सिंह 

जब तक जाति के साथ सम्मान जुड़ा रहेगा तब तक आरक्षण की मांग चलती रहेगी / विजय शंकर सिंह

अपराध और दंड की मूल अवधारणा बदला लेना या प्रतिशोध नहीं है बल्कि दोषी को सुधारना है। यह आधुनिक अवधारणा है किसी धर्म संहिता की नहीं। धर्म संहिता कर्मों के भोग की बात करता है, पाप और पुण्य की बात करता है, नर्क और स्वर्ग की बात है, और पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर इस जन्म के कर्म को निर्धारित करने की बात करता है। पाप, पुण्य, स्वर्ग , नर्क, पुनर्जन्म, कर्मों का भोग होता है या नहीं यह सनातन वाद विवाद का विंदु रहा है और आगे भी रहेगा। लेकिन आधुनिक न्यायशास्त्र के अनुसार अपराध एक विधि के प्राविधान का उल्लंघन है और विधि के अनुसार ही उसका दण्ड भी निर्धारित है। दण्ड का उद्देश्य भी अपराधी को सुधारना है और उसे सुधार कर समाज की मुख्य धारा में लाना है।

एससीएसटी एक्ट के लागू करने से ही समाज में समता आ जायेगी और हम एक जातिविहीन समाज बन जाएंगे ऐसा मैं नहीं मानता हूं। कानून से कानून तोड़ने वालों में भय का संचार होता है और वे उस भय के कारण अपराध कर्म में लिप्त होने से बचते भी हैं पर न तो अपराध विहीन समाज कभी रहा है और न होगा। इसकी कल्पना करना, एक यूटोपिया है, काल्पनिक आदर्शवाद है। जाति व्यवस्था केवल सनातन धर्म या हिन्दू धर्म की ही व्याधि नहीं है यह दुनिया के हर समाज मे किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है और है। लेकिन केवल जाति के आधार पर किसी का अपमान करना, उसे सामान्य जीने, उपासना के अधिकारों से वंचित करना यह भी उचित नहीं है। जब डॉ आंबेडकर ने दलित समाज ( यह शब्द depressed class जो वे सदैव प्रयोग करते थे का अनुवाद है ) के लिये मुस्लिमों को अलग निर्वाचन क्षेत्र, अंग्रेजों द्वारा दिये जाने के बाद, अपने लिये मांगा तो उन्हें गांधी जी का विरोध झेलना पड़ा। गांधी जी ने कहा दलित हिन्दू समाज के अभिन्न अंग हैं और उन्हें अलग बिल्कुल ही नहीं माना जा सकता है। वे अनशन पर बैठे और अंत मे आंबेडकर को झुकना पड़ा और पूना में इस विंदु पर दोनों का समझौता हुआ। यह समझौता, 24 सितम्बर 1932 को साय पांच बजे यरवदा जेल पूना में गाँधी और डा. अंबेडकर के बीच  हुआ, जो बाद में पूना पैक्ट के नाम से मशहूर हुआ। इस समझौते में डॉ. अंबेडकर को कम्युनल अवॉर्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ना पड़ा तथा संयुक्त निर्वाचन (जैसा कि आजकल है) पद्धति को स्वीकार करना पडा, परन्तु साथ हीं कम्युनल अवार्ड से मिली 78 आरक्षित सीटों की बजाय पूना पैक्ट में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 148 करवा ली। साथ ही अछूत लोगो के लिए प्रत्येक प्रांत में शिक्षा अनुदान में पर्याप्त राशि नियत करवाईं और सरकारी नौकरियों से बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित किया। इसी आधार पर जब संविधान बना तब आरक्षण की व्यवस्था लागू हुयी।

समाज बदल रहा है। जो स्थिति दलित समाज की मेरे बचपन मे गांवों में थी वह अब नहीं रही। हो सकता है आगे और सुधरे। लेकिन क्या यह स्थिति इस अधिनियम के कारण सुधरी है ? या कोई और कारण है ? समाज आवश्यकतानुसार बदलता है। जो लोग और समाज समय की ज़रूरतों के अनुसार नहीं बदल पाता वह जड़ हो जाता है और फिर मरने लगता है। आज दलित समाज जाग्रत है। वह अपने अधिकारों के लिये सचेत हैं और सन्नद्ध है। छुआछूत अब बहुत कम दिखती है। शहरों में तो बहुत ही कम। लेकिन अभी भी जिस जाति विहीन समाज की बात हम सोच रहे हैं वह बहुत दूर है। जब तक सम्मान का भाव जाति से ही जुड़ा रहेगा, आरक्षण की मांग होती रहेगी । आरक्षण ने दलित समाज को सम्पन्न किया है और आर्थिक संपन्नता ने उन्हें समाज मे, सम्मान भी दिलाया है।

© विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट का अनुसूचित जाति / जनजाति निवारण अधिनियम पर हालिया फैसला - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटी एक्ट के फैसले पर पक्ष और विपक्ष अपने अपने मन से राजनीतिक दांव खेल रहा है।

गिरफ्तारी विवेचना का एक अंग है। गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती यह पुलिस का विधि प्रदत्त अधिकार है जो उसे दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्राप्त है। जन मानस में यह धारणा बैठ गयी है कि उधर उन्होंने थाने में मुक़दमा लिखवाया नहीं कि दरोगा जी ने मुल्ज़िम को हवालात की राह दिखाई । लेकिन कानून ऐसा नहीं कहता है। मुक़दमा लिखाने या एफआईआर दर्ज कराने के बाद उस मामले की विवेचना शुरू होती है और सुबूत आदि एकत्र किये जाते हैं। गिरफ्तारी भी उसी विवेचना का एक अंग है। तत्काल गिरफ्तारी हो, पहले गिरफ्तारी हो, आदि आदि बातें प्रशासनिक आवश्यकता के कारण भले होती हैं पर कानून में यह कहीं नहीं लिखा है कि मुक़दमा लिखाते ही मुल्ज़िम जो धर पकड़ लिया जाय ।

गिरफ्तारी के बारे में सुप्रीम कोर्ट का ही यह मंतव्य भी पढ़ लिया जाय जो इसी फैसले में दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार,

" While registration of FIR is mandatory, arrest of the accused immediately on registration of FIR is not at all mandatory. In fact, registration of FIR and arrest of an accused person are two entirely different concepts under the law, and there are several safeguards available against arrest.Moreover, it is also pertinent to mention that an accused person also has a right to apply for “anticipatory bail” under the provisions of Section 438 of the Code if the conditions mentioned therein are satisfied. Thus, in appropriate cases, he can avoid the arrest under that. "

अब अदालत के फैसले के इस अंश को पढिये।

" We are of the view that cases under the Atrocities Act also fall in exceptional category where preliminary inquiry must be held. Such inquiry must be time-bound and should not exceed seven days in view of directions in Lalita Kumari (supra)."

इसके बारे में कहना है कि,
पहके प्राथमिक जांच की जाय फिर  के बाद ही एफआईआर दर्ज होने के निर्णय का तो बहुत ही दुरुपयोग होगा। असरदार लोगों के खिलाफ तो एफआईआर ही दर्ज नहीं हो पाएगी। फिर प्राथमिक जांच जिस प्रार्थना पत्र पर शुरू होगी कानून के अनुसार वही प्रथम सूचना हो जाएगी । फिर प्राथमिक जांच का एक प्रावधान इस एक्ट के और दुरुपयोग को भी बढ़ाएगा, और साथ ही साथ इस एक्ट के जो सच मे भुक्तभोगी होंगे वे और पीड़ित होंगे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश धारा 4 अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दर्ज हुए मुक़दमे के बारे में है न कि सभी मामलों के लिये । लेकिन उचित स्पष्टीकरण के अभाव में यह भ्रम फैला और जानबूझकर फैलाया भी गया कि सरकार इस अधिनियम को कमज़ोर करना चाहती है।

दो कानूनों का दुरूपयोग बहुत हुआ है। एक तो दहेज निषेध अधिनियम और 498 A आईपीसी का और दूसरा एससीएसटी एक्ट का। एससीएसटी एक्ट का दुरूपयोग सवर्ण जाति के लोगों ने दलितों को सामने कर के अपनी दुश्मनी साधने के लिये भी कम नहीं किया है। यह एक्ट जब बना था तभी यह प्राविधान रखा गया था कि इस अभियोग की विवेचना डीएसपी स्तर का अधिकारी करेगा। डीएसपी स्तर के अधिकारी को विवेचक बनाने के पीछे दो तर्क थे, एक तो विवेचना गंभीरता से होगी क्यों कि थाने के विवेचक के पास काम बहुत होता था, और डीएसपी स्तर का अधिकारी मामले की वास्तविकता को तह में जा कर बिना किसी दबाव के इसे निपटाएंगे। हमने खुद कई विवेचनायें की हैं और दुरूपयोग की बात भी कुछ विवेचनाओं में मिली है।मैंने अपने सेवाकाल के दौरान ऐसे भी उदाहरण पाये हैं जब विपक्षी को केवल फंसाने की नीयत से उसके परिवार के किसी प्रतिभावान छात्र को या ज़िसे कोई नौकरी मिली हो उसे संकट में डालने के लिये मुल्ज़िम के रूप में उनके नाम लिखा दिये गये हों। दुरूपयोग रोकने के लिये ही ऐसी विवेचनाओं में सभी तथ्यों की पड़ताल की जाती है और यह भी देखा जाता है कि एक्ट की मंशा कि जातिगत आधार पर उत्पीड़न हुआ है या नहीं अथवा जाति के आड़ में यह दुश्मनी साधने का खेल है। जब सुबूत मिल जाते हैं तभी गिरफ्तारी होती है। कभी कभी सुबूत घटनास्थल पर जाते ही मिल जाते हैं तो तुरंत गिरफ्तारी भी हो जाती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के बारे में एक और अहम फैसला पहले दिया था। उसके अनुसार सात साल से कम सज़ा के मामले में गिरफ्तारी न हो। यह फैसला सुनने में तो बहुत ठीक लगेगा पर व्यवहारिक रूप से इस से अपराध नियंत्रण में इस से दिक्कतें आएंगी। एससीएसटी एक्ट में भी सुप्रीम कोर्ट को गिरफ्तारी पर किसी भी नए निर्देश की ज़रूरत नहीं थी। यह फैसला भी मेरी समझ मे बिना किसी ज़रूरत के ही दे दिया गया है। गिरफ्तारी कब हो, किसकी हो, क्यों हो, क्यो न हो, यह काम पुलिस के विवेचक का है । अगर विवेचक गलती करता है तो उसके खिलाफ कार्यवाही करने के लिये वरिष्ठ अधिकारियों का तंत्र है। खुद एक्ट में ही यह प्राविधान है कि विवेचक के खिलाफ भी इसी एक्ट की धाराएं लगायी जा सकती हैं। सरकार ने राज्य स्तर पर विशेष जांच विभाग, ज़िले स्तर पर विशेष जांच, राज्य और केंद्र के अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के गठन कर रखे हैं। यह सब विभाग इस एक्ट के दुरुपयोग होने और एक्ट को नज़रअंदाज़ करने पर कार्यवाही कर सकते हैं और करते भी हैं। लेकिन महज़ दुरुपयोग के आरोपों के आधार पर कोई कानून न तो रद्द हो सकता है और न ही उसे शिथिल किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय में कि तत्काल गिरफ्तारी न हो, ऐसा कुछ भी नहीं है कि शोर मचाया जाय। कोई भी सरकार या अदालत यह कैसे कह सकती है कि तुरन्त गिरफ्तारी की जाय। तुरन्त गिरफ्तारी जैसा शब्द केवल धारा 151 सीआरपीसी जो शान्ति भंग की आशंका में होती है , की जाती है। मुकदमों में गिरफ्तारी जब भी होगी विवेचना के दौरान जो सुबूत मिलेंगे उसी के आधार पर होगी और होनी चाहिये। बिना सुबूतों की गिरफ्तारी पर अदालतें नाराज़गी भी ज़ाहिर करती हैं और विवेचक बहुधा दण्डित भी होते हैं। कानून का पालन कानून के अनुसार ही होना चाहिये। चाहे एससीएसटी एक्ट हो या कोई भी अधिनियम, यह पुलिस के विवेचक को ही तय करना है कि वह कब, किसे, कहाँ और क्यों गिरफ्तार करे पर गिरफ्तारी का यह फैसला भी उसे सुबूतों के ही आधार पर करना है न कि स्वेच्छाचारी तरीके से ।

( विजय शंकर सिंह )

Sunday, 1 April 2018

भगत सिंह का साहित्य - 22 - भगत सिंह का जेल से पत्र अपने भाई कुलबीर सिंह के नाम / विजय शंकर सिंह

भगत सिंह के जीवन और कृतित्व पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल ने बहुत काम किया है। भगत सिंह पर यह सीरीज़ प्रस्तुत करते समय, चमन लाल का एक लेख प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी पत्रिका मेनस्ट्रीम के 2008 के अंक में मिला। उनके अनुसार भगत सिंह से सम्बंधित कुल 107 दस्तावेज, उनके जेल डायरी या जेल नोटबुक के अतिरिक्त और डॉन ब्रीम की पुस्तक माय फाइट विथ आयरिश फ्रीडम, My Fight With Irish Freedom, का हिंदी अनुवाद है। इन 107 दस्तावेजों में से 45 दस्तावेज़, पत्राचार के रूप में हैं। जिनमे पत्र, तार, और विभिन्न परचे शामिल हैं।भगत सिंह के पत्राचार का क्रम 1918 से प्रारम्भ होता है जब वे मात्र 11 साल के थे। उनके पत्रों को दो भागों में बांट कर अध्ययन किया गया है। एक भाग में निजी पत्र हैं और दूसरे भाग में राजनीतिक पत्र हैं । दूसरे भाग के राजनीतिक पत्र पिता, मित्रों, अखबारों के संपादकों और अन्य लोगों को लिखे गए हैं। उनके कुल 38 पत्रों ( पर्चों, तार आदि को छोड़ कर ) में से 15 पत्र बिल्कुल निजी हैं और 23 पत्र राजनीतिक दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। 1918 से 1921 यानी जब भगत सिंह की उम्र 11 से 14 वर्ष तक की थी, तो उनके लिखे 5 पत्र उपलब्ध हैं शेष मिल नहीं पाये हैं । अपने बंदी जीवन 1930 से 1931 के बीच उन्होंने कुल 22 पत्र लिखे थे। ये 22 पत्र भगत सिंह के वैचारिक परिपक्वता को प्रदर्शित करते हैं। उन्ही में यह पत्र उन्होंने अपने भाई को लिखा है।
अब आप यह पत्र पढिये ।
***
भगत सिंह का पत्र, कुलबीर सिंह के नाम ।
O
लाहौर सेण्ट्रल जेल,
3 मार्च, 1931

प्रिय कुलबीर सिंह,

तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया। मुलाक़ात के वक़्त ख़त के जवाब में कुछ लिख देने के लिए कहा। कुछ अल्फाज़ (शब्द) लिख दूँ, बस- देखो, मैंने किसी के लिए कुछ न किया, तुम्हारे लिए भी कुछ नहीं। आजकल बिलकुल मुसीबत में छोड़कर जा रहा हूँ। तुम्हारी जिन्दगी का क्या होगा? गुजारा कैसे करोगे? यही सब सोचकर काँप जाता हूँ, मगर भाई हौसला रखना, मुसीबत में भी कभी मत घबराना। इसके सिवा और क्या कह सकता हूँ। अमेरिका जा सकते तो बहुत अच्छा होता, मगर अब तो यह भी नामुमकिन मालूम होता है। आहिस्ता-आहिस्ता मेहनत से पढ़ते जाना। अगर कोई काम सीख सको तो बेहतर होगा, मगर सब कुछ पिता जी की सलाह से करना। जहाँ तक हो सके, मुहब्बत से सब लोग गुजारा करना। इसके सिवाय क्या कहूँ?

जानता हूँ कि आज तुम्हारे दिल के अन्दर गम का सुमद्र ठाठें मार रहा है। भाई तुम्हारी बात सोचकर मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं, मगर क्या किया जाए, हौसला करना। मेरे अजीज, मेरे बहुत-बहुत प्यारे भाई, जिन्दगी बड़ी सख्त है और दुनिया बड़ी बे-मुरव्वत। सब लोग बड़े बेरहम हैं। सिर्फ मुहब्बत और हौसले से ही गुजारा हो सकेगा। कुलतार की तालीम की फिक्र भी तुम ही करना। बड़ी शर्म आती है और अफ़सोस के सिवाय मैं कर ही क्या सकता हूँ। साथ वाला ख़त हिन्दी में लिखा हुआ है। ख़त ‘के’ की बहन को दे देना। अच्छा नमस्कार, अजीज भाई अलविदा... रुख़सत।

तुम्हारा खैर-अंदेश
भगत सिंह
O
Date Written: March 3, 1931
Author: Bhagat Singh
Title: Last Letter to Kulbeer (Kulbeer ke nam antim patra)
***

© विजय शंकर सिंह