Monday, 5 February 2018

Kakistocracy, काकिस्टोक्रेसी या मूढ़तन्त्र - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

अनेक शासन पद्धतियों के बीच एक अल्पज्ञात शासन पद्धति है काकिस्टोक्रेसी, Kakistocracy . इसका अर्थ है, सरकार की एक ऐसी प्रणाली, जो सबसे खराब, कम से कम योग्य या सबसे बेईमान नागरिकों द्वारा संचालित की जाती है। इसे कोई शासन प्रणाली नहीं कही जानी चाहिये बल्कि इसे किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के एक ग्रहण काल की तरह कहा जा सकता है जब हम निकम्मे लोगों द्वारा शासित हो रहे हों तब। यह शब्द 17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस्तेमाल किया गया जब फ्रांस का लोकतंत्र और इंगलेंड का शासन गड़बड़ाने लगा था। इंग्लैंड ने तो अपनी समृद्ध लोकतांत्रिक परम्परा के कारण  खुद को संभाल लिया था पर फ्रांस ख़ुद को संभाल नहीं पाया था। तब अयोग्य और भ्रष्ट लोगों द्वारा शासित होने के कारण , 1829 में यह शब्द एक अंग्रेजी लेखक द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मैने अपनी समझ से इसका हिंदी नाम मूढ़तन्त्र रखा है। मुझे शब्दकोश में इसका शाब्दिक अर्थ नहीं मिला।

इस का शाब्दिक अर्थ यूनानी शब्द काकिस्टोस जिसका मतलब ' सबसे खराब ' होता है और क्रेटोस यानी ' नियम ' , को मिला कर बनता है, सबसे खराब विधान । ग्रीक परम्परा से आया यह शब्द पहली बार अंग्रेजी में इस्तेमाल किया गया था, फिर राजनीति शास्त्र के विचारकों ने इसे अन्य भाषाओं में भी रूपांतरित कर दिया ।

राजनीतिशास्त्र के अनुसार इस की अकादमिक परिभाषा इस प्रकार है ~

A "kakistocracy" is a system of government which is run by the worst, least qualified, or most unscrupulous citizens.

काकिस्टोक्रेसी, शासन की एक ऐसी प्रणाली है जो सबसे बुरे, सबसे कम शिक्षित और सबसे निर्लज्ज लोगों द्वारा संचालित की जाती है ।

यह कोई मान्य शासन प्रणाली नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र का ही एक विकृत रूप है । लोकतंत्र जब अपनी पटरी से उतरने  लगता है और शासन तंत्र में कम पढ़े लिखे और अयोग्य लोग आने  लगते हैं तो व्यवस्था का क्षरण होंने लगता है। उस अधोगामी व्यवस्था को नाम दिया गया काकिस्टोक्रेसी । लोकतंत्र में सत्ता की सारी ताक़त जनता में निहित है। जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है और वे चुने हुये प्रतिनिधि एक संविधान के अंतर्गत देश का शासन चलाते हैं। शासन को सुविधानुसार चलाने के लिये प्रशासनिक तंत्र गठित किया जाता है जो ब्यूरोक्रेसी के रूप में जाना जाता है। ब्यूरोक्रेसी, सभी प्रशासनिक तंत्र के लिये सम्बोधित किया जाने वाला शब्द है। जिसने पुलिस, प्रशासन, कर प्रशासन आदि आदि सभी तंत्र सम्मिलित होते हैं। इसी को संविधान में कार्यपालिका यानी एक्ज़ीक्यूटिव कहा गया है। ब्यूरोक्रेसी मूलतः सरकार यानी चुने हुये प्रतिनिधियों के मंत्रिमंडल के अधीन उसके दिशा निर्देशों के अनुसार काम करती है। पर ब्यूरोक्रेसी उस मन्त्रिमण्डल का दास नहीं होती है और न ही उनके हर आदेश और निर्देश मानने के लिये बाध्य ही होती है । ब्यूरोक्रेसी का कौन सा तंत्र कैसे और किस प्रक्रिया यानी प्रोसीजर और विधान यानी नियमों उपनियमों के अधीन काम करती है , यह सब संहिताबद्ध है। नौकरशाही से उन्हीं संहिताओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है । पर यहीं पर जब ब्यूरोक्रेसी कमज़ोर पड़ती है या स्वार्थवश मंत्रिमंडल के हर काम को दासभाव से स्वीकार कर नतमस्तक होने लगती है तो प्रशासन पर इसका बुरा असर पड़ता है और एक अच्छी खासी व्यवस्था पटरी से उतरने लगती है । ऐसी दशा में चुने हुये प्रतिनिधियों की क्षमता, मेधा और इच्छाशक्ति पर यह निर्भर करता है कि वे कैसे इस गिरावट को नियंत्रित करते हैं। अगर सरकार का राजनैतिक नेतृत्व प्रतिभावान और योग्य नेताओं का हुआ तो वे ब्यूरोक्रेसी को वे कुशलता से नियंत्रित भी कर लेते हैं अन्यथा ब्यूरोक्रेसी बेलगाम हो जाती है और फिर तो दुर्गति होनी ही है। इसी समय राजनैतिक नेतृत्व से परिपक्वता और दूरदर्शिता की अपेक्षा होती है। इसे ही अंग्रेज़ी में स्टेट्समैनशिप कहते हैं।

लोकतंत्र में जनता का यह सर्वोच्च दायित्व है कि वह जब भी चुने अच्छे और योग्य लोगों को ही चुने और न ही सिर्फ उन्हें चुने बल्कि उन पर नियंत्रण भी रखे। यह नियंत्रण, अगर चुने हुये प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कोई प्राविधान संविधान में नहीं है तो, वह मीडिया, स्थानीय प्रतिनिधि पर दबाव, आंदोलन आदि के द्वारा ही रखा जा सकता है और दुनिया भर में जहाँ जहाँ लोकशाही है, जनता अक्सर इन उपायों से अपनी व्यथा और नाराज़गी व्यक्त करते हुये नियंत्रण रखती भी है। इसी लिये दुनिया भर में जहां जहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहां वहां के संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। जनता का यह दायित्व और कर्तव्य भी है कि वह निरन्तर इस अधिकार के प्रति सजग और जागरूक बनी रहे और जिन उम्मीदों से उसने सरकार चुनी है उसे जब भी पूरी होते न देखे तो निडर हो कर आवाज़ उठाये । इसी लिये लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को पर्याप्त महत्व दिया है और विरोध कोई हंगामा करने वाले अराजक लोगों का गिरोह नहीं है वह सरकार को जागरूक करने उसे पटरी पर बनाये रखने के उद्देश्य से अवधारित किया गया है । यह बात अलग है कि इसे देशद्रोही कह कर सम्बोधित करने का फैशन हो गया है।

लोकतंत्र तभी तक मज़बूत है जब तक जनता अपने मतदान के अधिकार के प्रति सचेत है और सरकार चुनने के बाद भी इस बात पर सचेत रहे कि चुने हुये प्रतिनिधि उसके लिये, उसके द्वारा  चुने गए हैं। पर हम चुन तो लेते हैं पर चुनने के बाद सरकार को ही माई बाप मानते हुये उसके हर कदम का दुंदुभिवादन करने लगते हैं । यही ठकुरसुहाती भरा दासभाव लोकतंत्र को क्षरित करता है और ऐसे ही लोकतंत्र फिर, धीरे धीरे मूढ़तन्त्र में बदलने लगता है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 4 February 2018

ऑनर किलिंग या सम्मान हत्यायें और बीमार बनता समाज - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

अंकित की हत्या उसी मानसिकता का परिणाम है जिस ने देश की आबोहवा खराब कर रखी है। यह आबोहवा है धर्म के कट्टरता की, धर्म से जुड़े मिथ्याभिमान की, धर्म के मध्ययुगीन आक्रामक सोच की, जाति और नस्ल के श्रेष्ठता के भ्रम की । अंकित दिल्ली का एक फोटोग्राफर था। वह एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था। धर्म के फैलते ज़हर से संक्रमित मस्तिष्क ने उस अंकित की हत्या कर दी। हत्या का कारण जो बताया गया वह ऑनर किलिंग यानी ' सम्मान बचाने के लिये हत्या ' थी। किसका सम्मान इस हत्या से बढ़ा है ?हत्यारे का ? अंकित का ? अंकित की प्रेमिका का ? समाज का ? हत्यारे के धर्म, इस्लाम का ? या ईश्वर, अल्लाह आदि अनदेखे उस अस्तित्व का जिसके सम्मान और नाम पर हम घृणित से घृणित कुकर्म करने के लिये तत्पर हो जाते हैं ? संसार मे धर्म या पंथ या सम्प्रदाय जो भी कह लीजिये और ईश्वर, अल्लाह, गॉड जिस भी भाषा मे तर्जुमा कर के पढ़ लीजिये ,के नाम और एक अनदेखे जन्नत की उम्मीद पर जितनी हिंसा, बर्बरता, और निर्दोषों के खून हमने बहाए हैं उतने तो किसी और कारण से कभी नहीं बहाए हैं। ढाई आखर का शब्द प्रेम की पैरवी करते धर्म और धर्म से जुड़े लोग कभी नहीं थकते पर जैसे ही यह व्यवहार में दिख जाता है तो लोग खुद ही इसके विरुध्द खड़े हो जाते हैं। जहाँ सजातीय प्रेम विवाह पर भी लोग नाक भौं सिकोड़ते दिख जाँय वहां अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाह तो आत्मघात ही लगेगा।

लेकिन अन्तर्धामिक विवाह और प्रेम भरतीय समाज मे नए नहीं है। पर यह सभी तबके में स्वीकार्य भी नहीं है। अत्यंत उच्च वर्ग में जो धन संपदा से समृद्ध हैं में यह कभी भी कोई समस्या नहीं रहे है। आप सिने जगत को देखिये। वहां यह कोई समस्या ही नहीं है। वहां के समाज से इस प्रेम और विवाह को स्वीकार कर लिया है। हिन्दू अभिनेताओं की मुस्लिम अभिनेत्रियों से और मुस्लिम अभिनेताओं की हिन्दू अभिनेत्रियों से खूब विवाह हुये हैं और आज भी हो रहे हैं। पर समाज के अपेक्षाकृत निचले पायदान पर खड़े समाज के लोगो के मन ने धर्म और जाति के मिथ्या अहंकार का संक्रमण अधिक होता है। वे इस ग्रन्थि से सदैव आशंकित और पीड़ित रहते हैं कि लोग उनके बारे में क्या कहेंगे , क्या सोचेंगे, आदि आदि। जब यही भाव हद से अधिक बढ़ जाता है तो वह अपराध का प्रेरक भाव या मोटिव हो जाता है। यह मोटिव दो धर्मों के बीच ही नहीं है बल्कि दो जातियों के बीच भी है। ऑनर किलिंग के कई उदाहरण अंतरजातीय विवाहों के संदर्भ में भी बहुतायत से हैं।

यह हत्यायें इस धारणा का परिणाम हैं कि कोई भी व्यक्ति जिसके किसी कृत्य के कारण यदि उसके कुल या समुदाय या जाति या धर्म का अपमान होता है तो उस कुल या समुदाय या जाति या धर्म  के सम्मान की रक्षा के लिए उस व्यक्ति विशेष की हत्या जायज़ है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (#यूएनएफपीए) का अनुमान है कि, दुनिया भर में सालाना 5000 के लगभग हत्यायें, सम्मान हत्यायें होती है। मानव अधिकार संस्था ह्यूमन रॉइट्स वॉच, सम्मान हत्या को निम्न रूप में परिभाषित करती है:

“सम्मान की रक्षा के लिये किये गये अपराध, हिंसा के वो मामले हैं, जिन्हें परिवार के पुरुष सदस्यों ने अपने ही परिवार की महिलाओं के खिलाफ इसलिये अंजाम दिया है, क्योंकि उनके अनुसार उस महिला सदस्य के किसी कृत्य से समूचे परिवार की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंची है। इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे कि: परिवार द्वारा नियत शादी करने से इंकार, किसी यौन अपराध का शिकार बनना, पति से (प्रताड़ना देने वाले पति से भी) तलाक की मांग करना या फिर अवैध संबंध रखने का संदेह। केवल यह धारणा ही उस महिला सदस्य पर हमले को उचित ठहराने के लिये पर्याप्त है कि उसके किसी कदम से परिवार की इज्जत को बट्टा लगा है।”

अक्सर हम अपराध और हत्याओं को हम सापेक्ष भाव से देखते है। एक हत्या हमे विचलित करती है तो ऐसी ही ऐसे ही कारणों से की गयी एक अन्य हत्या हमे कहीं न कहीं कभी न कभी तोष प्रदान करती है। कभी हत्यारे का हम महिमामंडित कर उसमें हम अपना रोल मॉडल खोजने लगते है तो कभी वैसे ही हत्या के अपराधी को हम फांसी देने और गोली मार देने  की मांग करने लगते हैं। अपराध और हत्या को भी सुविधा भाव से देखने की यह प्रवित्ति एक बीमार समाज की पहचान है। यह व्याधि बीमार समाज को और अधिक संकीर्ण बनाएगी। हत्या , हत्या है। यह भारतीय दंड विधान का सबसे नृशंस अपराध है। पुलिस हत्या के हर अपराध को इसी दृष्टिकोण से देखती है और अपना प्रोफेशनल दायित्व निभाती है । लेकिन धर्म और जाति के कठघरे में जैसे जैसे समाज बंटता जाएगा, लोग मानसिक रूप से अलग थलग पड़ते जाएंगे वैसे वैसे हम रुग्ण समाज मे बदलते जाएंगे। पुलिस के पास इसका कोई इलाज नहीं है। पुलिस भी उसी समाज से आती है जो समाज इस बुराई से रूबरू हो रहा है।

अंकित की हत्या बहुत ही नृशंस भाव से की गयी है। हत्या के तरीके से हत्यारे की मनोदशा, प्रतिशोध भाव और हत्या का कारण जाना जा सकता है। जैसी बीभत्स फ़ोटो सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, उस से हमलावर की दरिंदगी साफ जाहिर है। पुलिस ने हमलावरों को पकड़ लिया है और अब यह देखना है कि सभी सुबूत एकत्र कर अदालत के सामने रखे जाँय ताकि कड़ी से कड़ी सजा दी जा सके। अंकित की बर्बर हत्या एक बीमार समाज की पहचान है। पुलिस ऐसी हत्याओं को रोक भी नहीं सकती है बस हत्यारे पकड़ कर सज़ा भले दिला दे । समाज को खुद ही इस व्याधि से मुक्त होना होगा।

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 3 February 2018

सीबीआई और पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

सीबीआई, बोफोर्स में मामले में पुनः अपील दायर करने जा रही है। बोफोर्स भारत का वाटरगेट कांड रहा है। अमेरिका के सत्तर के दशक में वाटरगेट कांड ने दुनिया के सबसे ताकतवर संवैधानिक प्रमुख अमेरिकी राष्ट्रपति को पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। अमेरिका का राष्ट्रपति अपने देश के संविधान में प्रदत्त अधिकारों के अनुसार विश्व का  सबसे ताकतवर राष्ट्रपति होता है। पर उसे भी वाटरगेट कांड में पद त्याग करना पड़ा। बोफोर्स के कारण किसी ने पद तो नहीँ छोड़ा पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ऐतिहासिक बहुमत के बाद में अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में अस्थिर हो गए थे और फिर उन्हें चुनाव हारना पड़ा । बोफोर्स के ही कारण वीपी सिंह को सत्ता मिली थी।

लेकिन उस बोफोर्स कांड में सत्य क्या है इसका कुछ पता भी नहीं चला। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे  भूरे लाल के नेतृत्व में एक जांच कमेटी भी बनी थी और सीबीआई जांच भी हुयी पर सत्य का पता नहीं चला तो नहीं चला। यह भी आरोप लगा कि इटालियन व्यापारी क्वात्रोची इस घूस कांड का मुख्य सूत्रधार था पर उसका भी कुछ नही पता लगा। यह भ्रष्टाचार का पहला मामला था जिसमे प्रधानमंत्री पर सीधे आरोप लगा था। अब जब सीबीआई दुबारा इस मामले को खोल रही है तो उम्मीद की जानी चाहिये कि उसके पास इस मामले से जुड़े पुख्ता सबूत होंगे या वह इस आशा में है कि वह आवश्यक सुबूत जुटा लेगी। अगर बोफोर्स का खुलासा होता है तो यह खुशी की बात होगी। कानून की सर्वोच्चता ज़रूरी है।

एक आरोप ज़रूर लगेगा कि सीबीआई इस मामले को इस लिये खोल रही है कि इस मामले में गांधी परिवार की लिप्तता है। यह कहा जायेगा कि यह एक प्रकार का राजनीतिक प्रतिशोध है। यह आरोप नया नहीं है। लगभग 15 सालों तक संसद का हर अधिवेशन बाधित हुआ और खुल कर आरोप लगे। पर वे साबित नहीं हुये। आरोप जब तक साबित नहीं हो तब तक उनका कोई मतलब नहीं है। सीबीआई इस प्रकरण को पुनः खोलना चाहे तो खोले। उसके परिणाम की प्रतीक्षा सबको रहेगी ।

सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप सरकारों पर पहले से ही लगते रहे है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को भरी अदालत में पिंजड़े वाला तोता कह दिया था। मज़े की बात जब पत्रकारों ने तत्कालीन सीबीआई निदेशक से यह पूछा कि सीबीआई को अदालत ने पिंजड़े वाला तोता कहा है और आप की क्या प्रतिक्रिया है तो सीबीआई प्रमुख सिन्हा ने कहा कि अदालत ने सही कहा है। यह नहीं पता यह स्वीकारोक्ति सवाल जवाब टालने की गरज से की गयी थी या सीबीआई प्रमुख का क्षोभ था। बाद में वही सीबीआई प्रमुख एक पक्ष को विवेचना में लाभ देने के आरोप में घिर गए।

ऐसा ही आरोप सीबीआई के एक अन्य निदेशक राकेश सिन्हा पर भी लगा है कि उन्हें प्रधानमंत्री का कृपापात्र होने के कारण सभी प्रचलित कानूनों और परम्पराओं को ताख पर रख कर सीबीआई में लाया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने एक याचिका भी दायर कर रखी है।

यह सारे उदाहरण यह बतलाने के लिये पर्याप्त हैं कि सीबीआई पर कोई भी सरकार हो अपना नियंत्रण ज़रूर रखना चाहती है। यह भी लोग कह सकते है कि इसमें आपात्तिजनक क्या है ?  कानून लागू करने वाली एजेंसियां सरकार के अधीन नहीं रहेगी तो किसके अधीन रहेंगी ? आखिर सरकार, सर कार है।  लेकिन यह आपात्तिजनक है। सरकार भी किसी न किसी नियम और कानून के अंतर्गत चुनी गयी है और उसी नियमों के अंतर्गत काम करने के लिये बाध्य भी है। इसी प्रकार,  जांच और विवेचना आदि के लिये निर्धारित प्रक्रिया, अधिकार और कानून बहुत स्पष्ट है। जहां तक पुलिस विवेचना का सवाल है , सीआरपीसी जिसके प्राविधानों से पुलिस को विवेचना करने की शक्तियां मिलती हैं वह स्पष्ट रूप से विवेचना के दौरान किसी भी विवेचक को किसी अन्य के दखल से महफूज़ रखता है। यहां तक कि विधि के मामले में सर्वशक्तिसम्पन्न सुप्रीम कोर्ट भी विवेचना के दौरान दखल नहीं देता है। विवेचना के समय यह सुरक्षा केवल इस लिये पुलिस को दी गयी है कि विवेचना, निष्पक्ष, बिना किसी पूर्वाग्रह के और विधिसम्मत हो सके। पर सरकार और सरकारी दल के लोग चाहे वे किसी के दल के हों हस्तक्षेप करते ही रहते हैं। यहां पुलिस सरकार के अधीन होते हुये भी सरकारी काम काज के दौरान सरकार के नियंत्रण से मुक्त रखी गयी है । केरल के एक डीजी पुलिस शिवकुमार के केरल सरकार द्वारा डीजी के पद से हटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका के निस्तारण के समय जो निर्णय अदालत ने दिया उसमे सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कहा कि पुलिस अपने काम काज के मामलों में  विधि के अधीन और विधि के अनुसार चलने के लिये बाध्य है। वह सरकार और सरकारी दल के राजनैतिक एजेंडा पर चलने के लिये बाध्य नहीं है।

अभी मुम्बई के मृत सीबीआई जज लोया का प्रकरण ज्वलंत है। सीबीआई जज लोया भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की संदिग्ध लिप्तता से घिरे एक हत्या के मामले की सुनवाई कर रहे थे कि अचानक उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। आरोप है कि उनकी हत्या की गयी। उनके स्थान पर जिस जज को वही मुक़दमा सुनवायी के लिये मिला उन्होंने जल्दी से अमित शाह की बरी कर दिया और आनन फानन में उस मामले में सीबीआई ने बड़ी अदालत में अपील करने से मना कर दिया। अब एक याचिका और दायर हुयी है कि सीबीआई को यह निर्देश दिया जाय कि वह इस मामले में अपील दायर करे। उसकी भी सुनवाई चल रही है । जज लोया के संदिग्ध मृत्यु के कारणों की जांच के लिये भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर है। सुनवाई चल रही है।

होना तो यह चाहिये था कि, सीबीआई तुरन्त नियमानुसार सीबीआई जज के अमित शाह को बरी करने के मामले के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील दायर करती। पर जब यह मामला जान बची और लाखों पाये जैसा दिख रहा है तो वह सत्ता के सर्वशक्तिमान व्यक्ति के खिलाफ भला अपील कैसे दायर कर सकती है ? सीबीआई ने अपील को बस्ता ए खामोशी में ही नहीं बल्कि निर्लज्जतापूर्वक यह कह कर कि अपील की कोई आवश्यकता नहीं है यह मामला बन्द कर दिया। जब कि एक सामान्य से हत्या के मामले में भी सीबीआई या पुलिस उच्चतर अदालतों में अपील दायर करतीं हैं। यह प्रकरण सीबीआई की कार्यकुशलता और उसकी साख पर एक आघात है। पर साख की चिंता किसे है ? यह जांच एजेंसी का खुला दुरुपयोग है। यह किसी से छुपा भी नहीं है। इसीलिये जब भी कोई राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा कोई अपराधिक मामला सीबीआई के पास जाता है तो यह माना जाने लगता है कि या तो यह मामला सीबीआई के पास किसी को फंसाने के लिये भेजा गया है या बचाने के लिये। सीबीआई को खुद ही इस स्थापित हो रही दुःखद अवधारणा से निकलना होगा। नौकरशाही को सत्ता के नज़दीक पहुंचने की ललक के ठकुरसुहाती परम्परा से हटना ही होगा। अन्यथा विधि का विधि सम्मत शासन एक मृगमरीचिका ही साबित होगा।

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 1 February 2018

कश्मीर के बड़े मुफ़्ती का देशद्रोही बयान और सरकार की अकर्मण्य चुप्पी / विजय शंकर सिंह

कल 30 जनवरी को एक टीवी चैनल पर मुफ़्ती नासिर उल इस्लाम जो कश्मीर का  डिप्टी ग्रैंड मुफ़्ती है, और श्रीनगर के रहने वाला है ने एक अजीब तर्क दिया और प्रकारांतर से मुसलमानों के लिये एक अलग मुल्क की मांग कर दी। मुफ़्ती का कहना था कि, जब मुसलमान 17 करोड़ थे तो पाकिस्तान मिला अब जब वे 18 करोड़ हैं तो पाकिस्तान क्यों नहीं। यह बात चैनल पर कही गयी और दुनिया भर ने सुनी।

क्या मुफ़्ती के बयान पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिये ? मुफ़्ती का बयान न तो सभी मुस्लिम देशवासियों का बयान है और न ही यह किसी की इच्छा है। यह बयान देश को अस्थिर करने उसे तोड़ने और अराजकता फैलाने की एक चाल है।

सरकार को मुफ़्ती के बयान पर तत्काल संज्ञान ले कर कार्यवाही करनी चाहिये। यह बयान देशद्रोह का एक फिट केस है । देश के बंटवारे की बात करना देश के अखण्डता एकता और सम्प्रभुता के विरोध में उठा स्वर है । इसे अगर नज़रअंदाज़ किया गया तो ऐसी प्रवित्तियाँ बढ़ती जाएंगी और देश का अहित ही होगा। जेएनयू के देश तोड़ने का नारा लगाने वाले कौन थे आज दो साल बाद भी यह पता नहीं लग सका। कन्हैया , खालिद उमर, और अनिर्बान जिन पर यह आरोप है कि वे इस अभियान के अगुआ थे तो आज तक उनके खिलाफ आरोप पत्र क्यों नहीं पुलिस दे पायी ? दिल्ली पुलिस को तत्काल उनके खिलाफ सुबूत इकट्ठा कर के आरोप पत्र देना चाहिये।

टीवी चैनल का डिबेट शो कोई वाद विवाद या विचार विमर्श का मंच नहीं रह गया है यह शोर के डेसीबल नापने का एक स्थान बन गया है। पढ़े लिखे कहे जाने वाले अपने समाज और दलों के प्रवक्ता जिस तरह से उत्तेजित और अनियन्त्रित हो कर अपनी बात कहते हैं वह अभिव्यक्ति कम अभिनय अधिक लगता है। यह मंच विषवमन का या एक दूसरे के प्रति आक्षेप और कटाक्ष का स्थान बन गया है। बहुत कम ही टीवी डिबेट ऐसे होते हैं जो कुछ तथ्यात्मक चर्चा करते हों।

मुफ़्ती के बयान को अगर गम्भीरता से नहीं लिया गया और इस पर कोई कानूनी कार्यवाही नही की गयी तो इसका संदेश बहुत ही गलत जाएगा। अधिकतर लोग इसे इग्नोर करेंगे । पर नज़रअंदाज़ करने से समस्या का हल नही बल्कि समस्या का बीजारोपण हो जाता है। चौधरी रहमत अली को भी आज से अस्सी नब्बे साल पहले बहुत गम्भीरता से किसी ने नहीं लिया था पर बाद में जो हुआ वह सब को ज्ञात है।

1954 में जब कश्मीर में ही कश्मीर के सबसे कद्दावर नेता शेख अब्दुल्ला , जिनके जवाहरलाल नेहरू से बहुत करीबी सम्बन्ध भी थे को जब शेख अब्दुल्ला ने भारत विरोधी बात और आचरण करने शुरू किये तो, उनको भी गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया गया । वे लंबे समय तक जेल में रहे। ऐसा ही एक अन्य मुख्यमंत्री बख्शी ग़ुलाम मुहम्मद के साथ भी हुआ था।

अगर टीवी चैनल पर मुफ़्ती के दिये गए इस बयान पर कार्यवाही नहीं होगी तो ऐसे तत्वों का मनोबल और बढ़ेगा और टीवी चैनल डिबेट इस तरह के उन्मादित और पागलपन भरे प्रलाप के केंद्र बन कर रह जाएंगे।

डॉ प्रमोद पाहवा टीवी डिबेट में जाते रहते हैं और विदेशी मामलों के जानकार हैं का टीवी चैनलों के बारे में यह कहना है,
" इसमें चेंनेंल भी बराबर का दोषी है क्योकि एडिटर के पास इतना समय होता है कि वो विवादीत अंश को एयर न होने दे।
सम्भव है कि इस प्रकार के बयान जान बूझकर दिलवाए जाते हो क्योकि ध्रुवीकरण ही एकमात्र विकल्प है जो चुनाव में साथ दे सकता है और केवल चुनाव जीतना ही वर्तमान नेतृत्व का एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है।"

धर्म के नाम पर अलग देश की सार्वजनिक रूप से मांग करने वाले मुफ़्ती पर अब तक कोई कानूनी कार्यवाही नहीं और सेना के मेजर के खिलाफ आत्मरक्षार्थ गोली चलाने पर मुक़दमा कायम किया गया है।

फिर भी इस सरकार और इसके समर्थकों का यह जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है कि वे चाहते हैं कि सभी यह मानें कि केवल वही देशभक्त है, बाकी सब देशद्रोही।

क्या मुफ्ती के विरुद्ध कार्यवाही करने से यह सरकार इस लिये पीछे हट रही है कि इसके वैचारिक पुरखे कभी द्विराष्ट्रवाद के मृत सिद्धांत के साथ थे ?
क्या ये स्वयं आज भी मान के चल रहे हैं कि धर्म के ही आधार पर राष्ट्र बनता है ?

© विजय शंकर सिंह