Sunday, 5 November 2017

सर्वहारा की तानाशाही - डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी का एक लेख / विजय शंकर सिंह

चीन में एक परिवर्तन हो रहा । चीन में चीन की सेना को एक आदेश दिया गया है कि वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति वफादार रहे । एक व्यक्ति के प्रति वफादारी का यह आदेश तानाशाही का संकेत है । सेना भी राज्य के विविध अंगो के समान राज्य का एक अंग होता है । राज्य स्वयं किसी न किसी विधान के अंतर्गत ही शासित होता है । बिना किसी विधान के शासित राज्य अराजकता की ओर ही ले जाता है । चीन एक साम्यवादी मुल्क़ है । साम्यवादी शासन प्रणाली में राज्य का तंत्र जिस लोकतंत्र की बात करता है वह उसे सर्वहारा की तानाशाही कहता है । सर्वहारा की तानाशाही और एक दल या सत्तारूढ़ दल की तानाशाही या फिर शक्ति का केंद्र और केन्द्रीभूत होते हुये एक व्यक्ति की तानाशाही तक पहुंचने लगता है तो वह राज्य किसी फासिस्ट राज्य की तरह ही हो जाता है ।

सर्वहारा की तानाशाही पर यह लेख डॉ Jagadishwar Chaturvedi जी की टाइमलाइन से ले कर साझा कर रहा हूँ । यह लेख विशेषतः चीन के संदर्भ में नहीं है बल्कि इस विषय की सैद्धांतिक व्याख्या है ।

सर्वहारा की तानाशाही का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं है। व्यवहार में अनेक पूर्व समाजवादी देशों में इस अवधारणा का इसी रुप में इस्तेमाल किया गया। पूर्व समाजवादी देशों में सर्वहारा की तानाशाही का जिस तरह दुरुपयोग हुआ उससे यह धारणा विकृत हुई और इसकी गलत समझ प्रचारित हुई। मुश्किल यह है कि एक तरफ बुर्जुआजी का कु-प्रचार और दूसरी ओर कम्युनिस्टों के द्वारा इस धारणा का भ्रष्टीकरण ये दो चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। कार्ल मार्क्स की अनेक धारणाओं को इन दोनों ओर से गंभीर खतरा है। तीसरा खतरा सोशल मीडिया ने पैदा किया है। इसके यूजरों का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्क्सवाद को एकदम नहीं जानता लेकिन मार्क्सवाद ,साम्यवाद और उससे जुड़ी धारणाओं के बारे में आए दिन फेक प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं। यहां हम ''सर्वहारा की तानाशाही'' के बारे में मार्क्स के विचारों के विवेचन तक सीमित रखेंगे।

मौजूदा दौर में हमारे समाज पर विश्वव्यापी वित्तीय संस्थाओं ,बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों का नियंत्रण है। वे ही तय कर रहे हैं कि देश और दुनिया में क्या होगा ?किस तरह का विकास होगा और किस तरह के सामाजिक मूल्य और राजनीतिक संरचनाएं काम करेंगी? इन संस्थाओं के निदेशकों को जनता कभी नहीं चुनती,यानी आज दुनिया को वे लोग चला रहे हैं जिनका चयन जनता नहीं करती।जबकि इनके फैसलों से करोड़ों लोग सीधे प्रभावित होते हैं।ये ही वे लोग हैं जिन्होंने सत्तादास की नयी राजनीतिक श्रेणी निर्मित की है जो सरकार चलाती है।सतह पर सरकारें कभी –कभी अपने इन आकाओं के खिलाफ फैसले लेती हैं, टैक्सचोरी के आरोप लगाकर जुर्माना वसूलती हैं,किसी न किसी अपराध में उनके बड़े अफसरों को गिरफ्तार भी करती हैं। यहां तक कि उनके ऊपर असामाजिक आचरण का आरोप तक लगाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिनको मार्क्स में तानाशाही नजर आती है लेकिन उनको वित्तीय-संस्थाओं की तानाशाही नजर नहीं आती।बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों के मालिकों के आचरण में कहीं तानाशाही नजर नहीं आती।जबकि ये संस्थाएं खुलेआम अ-लोकतांत्रिक व्यक्तियों के निर्देशन में काम करती हैं। सच्चाई यह है कि मौजूदा पूंजीवादी समाज ने मानवता की अपूरणीय क्षति की है। इसके बावजूद हमारा पूंजीवाद के प्रति आकर्षण किसी भी तरह कम नहीं हो रहा। हम इस या उस पूंजीवादी दल के अनुयायी होने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमें कांग्रेस से नफरत है या भाजपा या बसपा या सपा आदि से नफरत है लेकिन अंततः हम यही चाहते हैं कि कोई न कोई पूंजीवादी दल सत्ता में आए। जबकि पूंजीवाद की जनविरोधी,लोकतंत्र विरोधी भूमिका के प्रमाण पग-पग पर बिखरे पड़े हैं।इनकी ओर हम कभी देखते तक नहीं हैं और आए दिन कम्युनिस्टों और मार्क्सवादियों पर हमले करते रहते हैं। मार्क्सवादियों पर किया गया प्रत्येक हमला बर्बर पूंजीवाद की सेवा ही माना जाएगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसे ध्यान रखें और मार्क्स प्रतिपादित ''सर्वहारा की तानाशाही'' की अवधारणा पर विचार करें।

मार्क्स ने 'फ्रांस में गृह-युद्ध' नामक कृति में विस्तार के साथ अपने लोकतांत्रिक नजरिए का प्रतिपादन किया है। मार्क्स ने रेखांकित किया है कि मजदूरवर्ग कभी भी राज्य की तैयारशुदा मशीनरी के साथ हाथ मिलाकर काम नहीं कर सकता।क्योंकि राज्य की मशीनरी का मकसद और मजदूरवर्ग के मकसद में अंतर है। दूसरा कारण यह कि राज्य मशीनरी में यथास्थितिवाद के प्रति पूर्वाग्रह भरे होते हैं। आज हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें अनेक अ-लोकतांत्रिक चीजें मुखौटे लगाकर सक्रिय हैं वे अलोकतांत्रिक हितों की खुलेआम रक्षा कर रहे हैं।

मार्क्स के लोकतांत्रिक स्व-शासन के मॉडल को देखना हो तो सन् 1871 के पेरिस कम्यून के शासन को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। यह वह दौर है जिसमें कुछ समय के लिए फ्रांस के मजदूरों और आम जनता ने शासन अपने हाथों में ले लिया था। 'फ्रांस में गृहयुद्ध' नामक कृति में मार्क्स ने बताया है कि कम्यून का अर्थ क्या है ? यह मूलतः नगरपालिका के स्थानीय कौंसलरों का शासन है, जिनमें अधिकतर कामकाजी लोग थे,ये लोकप्रिय मतदान के जरिए चुनकर आए थे और उनको जनता को वापस बुलाने का भी अधिकार था। यहां पर उनको मजदूरों की मजदूरी के बराबर काम करने के लिए वेतन मिलता था। कोई विशेषाधिकार या विशेष सुविधाएं उनके पास नहीं थीं। स्थायी सेना समाप्त कर दी गयी थी।पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया था।कम्यून आने के पहले फ्रांस के राज्य,कमाण्डरों और पादरियों के हाथों में सत्ता हुआ करती थी,कम्यून का शासन स्थापित होने के बाद ये सब सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। शिक्षा संस्थानों के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए गए।शिक्षा को राज्य और चर्च के दखल से मुक्त कर दिया गया।मजिस्ट्रेट,जज और सार्वजनिक पदों पर काम करने वालों का जनता चुनाव करती थी। वे जनता प्रति जबावदेह थे और जनता को उनको वापस बुलाने हक भी था। कम्यून के शासन ने निजी संपत्ति को भी खत्म कर दिया था।उसकी जगह सामुदायिक उत्पादन ने ले ली थी। पूंजीवादी वर्गीय शोषण को खत्म करके सामाजिक जनतंत्र की नींव रखी गयी।स्थायी सेना को खत्म करके जनता को हथियारबंद कर दिया गया।

पेरिस कम्यून की स्थापना जनता के द्वारा चुने गए सभासदों के जरिए की गयी। मार्क्स ने लिखा है ''कम्यून नगर सभासदों को लेकर गठित हुआ था,जो नगर के वार्डों से सार्विक मताधिकार द्वारा चुने गए थे,जो उत्तरदायी थे और साथ ही किसी भी समय हटाये जा सकते थे।कम्यून के अधिकांश सदस्य स्वभाववतया मजदूर अथवा मजदूर वर्ग के जाने –माने प्रतिनिधि थे। कम्यून संसदीय नहीं ,बल्कि एक कार्यशील संगठन था,जो कार्यकारी और विधिकारी दोनों कार्य साथ-साथ करता था।''( का,मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स,पेरिल कम्यून,प्रगति प्रकाशन, 1980, पृ.84) पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया और यही काम प्रशासन के अन्य अंगों के बारे में भी किया गया। कम्यून के सदस्यों को वही मजदूरी मिलती थी जो मजदूरों को मिलती थी। विभिन्न किस्म के भत्तों का अंत कर दिया गया।किसी भी विभाग के पास कोई विशेषाधिकार नहीं थे, सब कुछ कम्यून के हवाले था।पादरियों को सार्वजनिक पदों से मुक्त करके एकांत में जीने के लिए भेज दिया गया। उन्हें धार्मिक महात्माओं की तरह जीवन-यापन करने के लिए कहा गया।इसी तरह विज्ञान को भी वर्गीय-पूर्वाग्रहों और सरकारी दबावों से मुक्त कर दिया गया। चर्च की संपत्ति जब्त कर ली गयी। बंद पड़े वर्कशाप और फैक्ट्रियों को मुआवजे की शर्त के साथ खोल दिया गया । वर्ग-संपत्ति को खत्म कर दिया गया।

कम्यून के संचालक यह नहीं मानते ते कि वे कभी गलती नहीं कर सकते। उनकी जानकारी में यदि कोई गलती लायी जाती थी तो वे उसे तुरंत दुरुस्त करते थे।उनकी कथनी और करनी में साम्य था। वे जो कहते थे वही करते थे। पेरिस कम्यून स्थापित होने के बाद पेरिस की शक्ल ही बदल गयी। भ्रष्ट आडंबरयुक्त पेरिस खत्म हो गया। मुर्दाखाने में लाशें न थीं,रात को चोरियां होना बंद हो गयीं,राहजनी बंद हो गयी।फरवरी 1848 के बाद पेरिस की सड़कें पहलीबार निरापद हुईं। सड़कों पर पुलिस का पहरा नहीं होता था।पेरिस की वेश्याएं गायब हो गयीं।हत्या,चोरी और व्यक्तियों पर हमले की घटनाएं एकदम बंद हो गयीं। यही वह शासन है जिसको उस समय ''सर्वहारा की तानाशाही'' का नाम दिया गया। उस समय इसका वह अर्थ नहीं था जो इन दिनों प्रचारित किया जाता है।

मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन ने लिखा है कि उस समय इस पदबंध का अर्थ था ''लोकप्रिय लोकतंत्र''। ''सर्वहारा की तानाशाही'' का सामान्य अर्थ था बहुमत का शासन। आज ''तानाशाही'' का जो अर्थ लिया जाता है वह अर्थ मार्क्स के जमाने में नहीं था। आजकल तानाशाही का अर्थ है संविधान का उल्लंघनकर्ता। असल में कार्ल मार्क्स ने ''सर्वहारा की तानाशाही''पदबंध लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी (1805-1881) से लिया। ब्लांकी फ्रांसीसी क्रांतिकारी थे और उन्होंने ही इस पदबंध को जन्म दिया। उनकी नजर में ''सर्वहारा की तानाशाही'' का अर्थ था साधारण जनता का स्व-शासन। मार्क्स ने भी इसी अर्थ में इस पदबंध का इस्तेमाल किया है। उल्लेखनीय है लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी बाद में पेरिस कम्यून के जनता के द्वारा चुने गए राष्ट्रपति बने लेकिन उस समय जेल में डाल दिए गए थे।
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Thursday, 2 November 2017

असग़र वजाहत की एक कहानी - नया विज्ञान / विजय शंकर सिंह

लोग उसे घेरे खड़े थे।वह बड़ा उत्तेजित लग रहा था।शब्द उसके मुंह से गोलियों की तरह निकल रहे थे। उसके समर्थक उसके कुछ बोलने से पहले ही तालियां बजाकर दिल बढ़ा रहे थे वह लगातार बोल रहा था। किसी को सोचने या कुछ पूछने तक का मौका नहीं दे रहा था। उसके शब्द लोगों पर असर कर रहे थे और लोग उसके प्रशंसकों और समर्थकों ने शामिल हो रहे थे।

वह कह रहा था कि देखो हमने इतिहास बदल डाला ।हमने शासकों के नाम, घटनाओं का घटनाक्रम बदल दिया। हार को जीत बना दिया, अच्छे को बुरा बना दिया और बुरे को अच्छा कर दिया। काले को सफेद कर दिया और स्त्री को पुरुष बना दिया और पुरुष को स्त्री बना दिया ।

देखो हमने क्या कर दिया। हमने 1000 साल के इतिहास को बदल दिया। हमने किताबें बदल दी। किताबों के लिखने वालों को बदल दिया है।  हमने  एक दिन में  सैकड़ों इतिहासकार  पैदा कर दिए हैं जो सच्चा और पक्का इतिहास लिख रहे हैं। किताबों में  जो पहले लिखा था वह गलत था । अब जो हमने लिखा है वह सही है । अब वही पढ़ाया जाएगा। हमने इतिहास बदल दिया।

तालियों की गड़गड़ाहट के बाद उसकी जय जयकार होने लगी लोग खुशी से पागल हो गए उसने कहा कि हमारा इतिहास वास्तव में बड़ा गंदा इतिहास था। अच्छा किया जो उसे बदल दिया। इससे बड़ी देश की सेवा क्या हो सकती है।

फिर उसने कहा इतिहास को ही नहीं हमने भूगोल को भी बदल दिया है। हमने देश की सीमाओं को बदल दिया है ।तुम जहां तक समझते हो वहां तक देश नहीं है। देश की सीमाएं दूर दूर तक फैल गई है ।वह सब जो पहले विदेश  कहा जाता था वह विदेश नहीं, अब  देश का भाग हैं। भूगोल बदल दिया है। नदियों को पवित्र कर दिया है। पर्वत और जंगल जो कट गए थे उनको लगा दिया गया है।

इतिहास और भूगोल बदल दिया है ।

फिर उसने कहा अब हम विज्ञान बदलने जा रहे हैं ।वैज्ञानिक अब तक बड़ा झूठ बोलते रहे हैं। पश्चिम के वैज्ञानिकों ने हमारे विज्ञान को ठीक से नहीं समझा है ।और अब हम सिद्ध करने जा रहे हैं कि पश्चिम का विज्ञान गलत है । हमारे देश में आज से 10000 साल पहले सुपरसोनिक जेट से अधिक तेज चलने वाले वायुयान थे। यूरोप आज प्लास्टिक सर्जरी पर गर्व करता है पर हमारे देश में यह सर्जरी 10000 साल पहले हुआ  करती थी ।हमारे देश में 10000 साल पहले वह सब कुछ था जो आज भी आधुनिक से आधुनिक देश के पास नहीं है ।हमारे महापुरुषों का एक-एक वाण  सौ- सौ एटम बम के बराबर हुआ करता था ।हम यह बात सिद्ध करने जा रहे हैं। सबसे पहले हम यह सिद्ध करेंगे की पश्चिम के वैज्ञानिक बड़े झूठे और बेईमान थे। हमारे ही देश से हमारे वैज्ञानिक आचार्यों के फार्मूले चुराकर अपने देश ले गए और वहां उसको प्रचारित कर दिया। हम लोग प्रचार नहीं कर सके इसलिए हमारी बात  पहुंच नहीं सकी।

उसने कहा, सिद्ध कर दूंगा कि न्यूटन ने जो कुछ लिखा है सब झूठ है। वैसे न्यू न्यूटन पक्का चरित्रहीन था । एक वेश्या के साथ उसके अनैतिक संबंध थे  और अपनी पत्नी को लेकर  भाग गया था।  उसको मोहल्ले के लोगों ने पकड़ कर पीटा भी था।  लड़कियों को छेड़ने में  उसका कोई जवाब न था। गैलेलियो अपने एक टेलिस्कोप पर गर्व करता था  और हमारे यहां बिना टेलिस्कोप के दूर-दूर तक देखने वाले पैदा हुए हैं। आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी फ्राड है। वह बड़ा अज्ञानी था। असली खोजों से पता चला है कि वह तो भारत  में झुमरी तल्लइया के एक छोटे से कॉलेज में होम साइंस पढ़ाया करता था और यूरोप जाकर उसने थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी की घोषणा कर डाली। डार्विन तो बिल्कुल मूर्ख था। स्कूल में हमेशा फेल हो जाता था। उसके अध्यापक  उससे बहुत दुखी रहा करते थे । किसी को आशा तक न थी  कि वह हाईस्कूल पास कर सकेगा। उसके पिताजी की परचून की दुकान थी और माता धोबिन का काम करती थी ।उसके दादा कसाई थे और परदादा गाड़ीवान थे ।यह सब नयी खोजों से पता चला है।

तो मितरों आइए हम न्यूटन को, जिसकी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पर  पूरा यूरोप  गर्व करता है,को गलत सिद्ध करते हैं।

न्यूटन कहते हैं कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण है। मतलब यह कि पृथ्वी में शक्ति है ।हम कहते हैं कि आकाश में शक्ति है।  न्यूटन कहते हैं किसी चीज को ऊपर  फेंको तो वह पृथ्वी की ओर आएगी, नीचे गिर जाएगी। हम कहते हैं कि किसी चीज को ऊपर फ़ेकों तो आकाश में चली जाएगी। देवलोक में चली जाएगी। देवलोक में बड़ी शक्ति है। हम आज यही सिद्ध करेंगे। हम अपने शिष्यों से कहते हैं कि वह एक भारी पत्थर ले आए। भारी पत्थर को हम ऊपर फेकेंगे और वह आकाश में चला जाएगा।

उनके सौ शिष्य एक बड़ा भारी पत्थर लाए ।उसने अकेले  पत्थर को उठा लिया। तालियां बजने लगीं। लोग उसकी जय जयकार करने लगे। उसने पत्थर को दोनों हाथों से उठाकर आकाश की ओर फेंका और पत्थर ऊपर जाने लगा। तालियों की गड़गड़ाहट और बढ़ गई। जय जय कार के नारे लगने लगे। हर्षोल्लास छा गया। जरा देर में बहुत भव्य मंच लग गया। फूलों से सज गया। बैनर पोस्टर से लग गए। लाउडस्पीकर आ गए। अपार जनता आ गई और भाषण शुरू हो गए। देश प्रेम के भाषण। देश की उपलब्धियां । देश का गौरवशाली अतीत। देश का विज्ञान। देश का बदला हुआ इतिहास ।देश का बदला हुआ भूगोल । आगे और आगे और आगे बढ़ता हुआ देश।

अचानक देखा गया की आकाश में उछाला गया पत्थर बहुत तेजी से नीचे आ रहा है। उसका आकार भी बहुत बढ़ गया है। जैसे-जैसे वह नीचे आ रहा है वैसे वैसे उसका आकार बढ़ता जाता है। लोगों ने इधर-उधर भागने की कोशिश की । मंच से नेता कूदे। भागो ,बचाओ-बचाओ की बहुत सी आवाज़ें आने लगीं है लेकिन ऊपर से गिरने वाला पत्थर इतना बड़ा और इतना भारी हो गया था कि पूरा मंच और जय जयकार करने वाले सभी लोग और दर्शक उसके नीचे आ गए हैं।
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Wednesday, 1 November 2017

क़तील शिफ़ाई और उनकी एक नज़्म - खुला है झूठ का बाज़ार / विजय शंकर सिंह

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें,
न हो बला से ख़रीदार ,आओ सच बोलें !!

सुकूत छाया है इन्सानियत की क़द्रों पर,
यही है मौक़ा-ए-इज़हार , आओ सच बोलें !!

हमें बनाया है गवाह वक़्त ने अपना,
ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार ,आओ सच बोलें !!

तमाम शहर में क्या एक भी नही मन्सूर,
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार , आओ सच बोले !!

जो वस्फ़ हममें नही , क्यूँ करें किसी में तलाश,
अग़र ज़मीर है बेदार ,आओ सच बोलें !!

छुपाए से कही छुपते है दाग़ चेहरें के,
नज़र है आईना-बरदार , आओ सच बोलें !!
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#क़तील_शिफ़ाई का जन्म अविभाजित पंजाब के तहसील हरीपुर ज़िला हज़ारा जो अब पाकिस्तान में है में ,  दिसम्बर 1919 में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इस्लामिया मिडिल स्कूल, रावलपिंडी में हुयी थी, उसके बाद वे गवर्नमेंट हाई स्कूल में दाखिल हुए लेकिन पिता के देहान्त और कोई अभिभावक न होने के कारण उनकी शिक्षा जारी न रह सकी और पिता की छोड़ी हुई पूँजी समाप्त होते ही उन्हें तरह-तरह के व्यापार और नौकरियाँ करने पड़े। साहित्य में क़तील के पिता की बहुत रुचि थी और ‘क़तील’ के कथनानुसार,
‘‘उन्होंने शुरू में मुझे कुछ पुस्तकें लाकर दीं जिनमें ‘क़िस्सा चहार दरवेश’ ‘क़िस्सा हातिमताई’ आदि भी थीं। मैं अक्सर उन्हें पढ़ता रहता था जिससे मुझे भी लिखने का शौक़ हुआ। अतएव प्रारम्भ में मैंने कहानियाँ लिखनी शुरू कीं, लेकिन कहानियों में कठिनाई यह थी कि मुझे उन्हें नक़ल करते समय बड़ा कष्ट होता था। मैंने कहानियाँ लिखनी छोड़ दीं और नज़्में लिखने की कोशिश की।"
इस तरह एक शायर का जन्म हुआ ।

आगे उन्ही के शब्दों में,
" सबसे पहले पाठशाला के दिनों में मैंने एक नाअ़त (मुहम्मद साहिब की छन्दोबद्ध प्रशंसा) लिखी जिस पर मुझे काफ़ी प्रोत्साहन मिला और मैंने बाकायदा नज़्में लिखनी शुरू कर दीं। उन्हीं दिनों पिता का देहान्त हो गया फिर ताऊ चल बसे और एक वर्ष भी नहीं गुज़रा था कि फूफी भी उठ गईं। इन घटनाओं का मुझ पर गहरा असर हुआ और मैं बेहद भावुक हो गया। जब तक हरीपुर में रहा, परम्परागत क़िस्म की शायरी से जी बहलाता रहा लेकिन जब रावलपिंडी में आया तो साहित्य की नई धारा, जिसे प्रगतिशील धारा कहा जाता है, के अनुकरण में शैली के नए-नए प्रयोग किए। यहीं अहमद नदीम कासमी से मेरा पत्र-व्यवहार प्रारम्भ हुआ और कविता सम्बन्धी उनके परामर्शों ने मेरी बड़ी सहायता की, और जब मैं लाहौर आया तो प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘अदबे-लतीफ’ के सम्पादक की हैसियत से उनका बड़ा सहयोग मिला "

क़तील उर्दू सबसे लोकप्रिय और सबसे अधिक पढ़े जाने वाले शायर हैं । प्रकाश पंडित जिन्होंने हिन्द पॉकेट बुक्स की लोकप्रिय शायरों की श्रृंखला का संपादन किया था ने उनके बारे में यह कह रहा है,
" इस प्रकार हम देखते हैं कि दूसरे महायुद्ध के बाद नई पीढ़ी के जो शायर बड़ी तेजी से उभरे और जिन्होंने उर्दू की ‘रोती-बिसूरती’ शायरी के सिर में अन्तिम कील ठोंकने, विश्व की प्रत्येक वस्तु को सामाजिक पृष्ठभूमि में देखने और उर्दू शायरी की नई डगर को अधिक-से-अधिक साफ, सुन्दर, प्रकाशमान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उनमें ‘क़तील’ शिफ़ाई का विशेष स्थान है। बल्कि संगीतधर्मी छंदों के चुनाव, चुस्त सम्मिश्रण और गुनगुनाते शब्दों के प्रयोग के कारण उसे शायरों के दल में से तुरन्त पहचाना जा सकता है।
समय, अनुभव और साहित्य की प्रगतिशील धारा से सम्बन्धित होने के बाद जिस परिणाम पर वह पहुँचा, उसकी आज की शायरी उसी की प्रतीक है। उसकी आज की शायरी समय के साज़ पर एक सुरीला राग है- वह राग, जिसमें प्रेम-पीड़ा, वंचना की कसक और क्रान्ति की पुकार, सभी कुछ विद्यमान है। उसकी आज की शायरी समाज, धर्म और राज्य के सुनहले कलशों पर मानवीय-बन्धुत्व के गायक का व्यंग्य है।......"

प्रकाश पंडित द्वारा क़तील शिफ़ाई के लिए कहे गए ये शब्द सही माएने में उनकी शायरी को सारगर्भित करते हैं।

© विजय शंकर सिंह

अंजुम कानपुरी की 1984 के दंगों पर लिखी गयी एक कविता / विजय शंकर सिंह

यह भोगा हुआ सच है । निर्मम और यथार्थ । मनुष्य के पशु होने की करुण कथा । बर्बर मध्ययुग की ओर जहां हिंसा ही जीवन का आधार हुआ करता था कभी की ओर लौटते हुये मनुष्य की एक विडंबना है । वह दंगा था । किसी व्यक्ति द्वारा किये गए अपराध की सजा उसका धार्मिक भुगता था । आज भी यह मनोवृत्ति शेष है ।

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे उत्तर भारत मे सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे । 3 दिन तक पूरे देश के कुछ इलाक़ों में प्रशासन और पुलिस व्यवस्था पंगु हो गयी थी। दिल्ली, कानपुर और बोकारो सबसे बुरी तरह से पीड़ित रहे । 1986 में जब मैं कानपुर में डीएसपी हो कर गया था उस भयावह दंगे के निशान मौजूद थे । घाव तब तक भरा नहीं था । 1947, 1984 और 2002 के धार्मिक आधार पर फैले दंगे प्रशानिक अक्षमता के साथ साथ धर्म की विकृति और कट्टरवादी सोच के परिणाम है । इन दंगों का तात्कालिक और दूरगामी कारण जो भी रहा हो पर इन सब के पीछे धर्मान्धता का मूल कारण है । इस घटना पर यह कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह कविता गुरुदीप सिंह कोहली अंजुम कानपुरी की है। यह उनका भोगा हुआ सच है । इस दंगे के कारण, परिणाम और इसके लिये जिम्मेदार लोगों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और हो सकता है आगे भी इतिहास के विद्यार्थी इस पर शोध करें । यह #कविता एक मित्र ने भेजी है । मैं जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

जो देखा जो जाना और जो बीता |
“फिर याद ताज़ा हो गयी”

आज इक दोस्त ने याद दिलाया ‘’८४ का मंज़र|
जिस पे गुज़री वो जानता है नर्क कहते किसको||
जिसने न देखा है न समझा है नहीं झेला है कभी|
शख्स वो क्या जाने हालाते फर्क कहते किसको||

मुसलसल जुनून में डूबे हुए बेदर्द लोगों के हुजूम|
बेकुसूर लोगों को निशाना ए नफरत बनाते देखा||
घर में घुस कर इज्ज़ते हौव्वा को तार तार किया|
मैनें बेशर्मी से कितनो ही को जिंदा जलाते देखा||

छिड़क पेट्रोल या जो भी कुछ हाथ आया उन के|
कितने भागते लाचारों को मैंने आग लगाते देखा||
वो तड़पते हुए सड़कों पर गिरे बने लाशों के टीले|
उनके चारों तरफ वहशियों को नाचते गाते देखा||

वो बेजुबान से नन्हे से बच्चे को गोदी में ले कर|
भाग रही थी सड़कों पर शायद बचा ले भाई कोई||
चीख चीख कर पुकारा पर दर तो सारे बंद ही रहे|
कहीं आगे मोड़ पर फिर मिल गया कसाई कोई||

छीन बच्चे को पटका ज़मीं पर औ छुरा दे भोंका|
न रोया न चीखा वोह बस मर गया यूं सहम कर||
माँ तड़प तड़प कर बोले भाई मेरा कुसूर तो बता|
खुदा का वास्ता मुझे मार मेरे बच्चे पे रहम कर||

नज़र घूमी तो देखा ठठ के ठठ और आते ही गए|
वहीं सड़क पर उसकी इज्ज़त पर नाच नंगा हुआ||
पहले पीटा फिर लूटा फिर कपड़े तार तार किये|
लोगों ने तो बस इतना ही कहा कि हाँ दंगा हुआ||

जिनकी इज्ज़त गयी जान गयी और परिवार गए|
उनसे कभी पूछा किसी ने कि दर्द किसको कहते||
आज इतने बरस बाद भी जब है इसका ज़िक्र उठा|
दिल टूट सा गया न रुके मेरे आंसू भी बहते बहते||

जो रहते रहे हैं साथ लख्त ए जिगर बन के कभी|
वक़्त ए परीशां में वही सब यूं कैसे बुरे हो जाते हैं||
वक़्त की धूल से ढके ढांपे पन्ने हाय कुरेदे अंजुम|
ज़ख्म तो ज़ख्म ही हैं यह फिर से हरे हो जाते हैं||

© गुरदीप सिंह कोहली ( अंजुम कानपुरी ) कानपुर के निवासी है । इनकी लेखन रुचि कविताओं और गज़लों में हैं । इन्होंने बहुत सी सुंदर कविताएं और गज़लें लिखी हैं ।

( विजय शंकर सिंह )