Monday, 16 January 2017

सेना प्रमुख का बयान, सुरक्षा बल और सोशल मीडिया - एक विचार / विजय शंकर सिंह

सेना दिवस पर थल सेना प्रमुख ने सैनकों को आगाह किया है कि वे सोशल मीडिया पर अपनी समस्याएं प्रचारित न करें । जनरल रावत का यह निर्देश कानून के अनुसार है । जब सोशल मिडिया नहीं थी और परम्परागत मिडिया अखबार और पत्रिकाओं के रूप थी और जब बाद में दूरदर्शन आया तब भी राजकीय कर्मचारी आचरण नियमावली में सरकारी कर्मचारी के सार्वजनिक रूप से सरकार के नीतियों की आलोचना को निषिद्ध किया गया है । ऐसा इस लिए कि सरकार एक ईकाई है और कर्मचारी उस इकाई का एक अंग । सरकार की किसी नीति से किसी अधिकारी या कर्मचारी को समस्या या असहमति हो तो सरकार को ही अपनी असहमति दर्ज़ कराने पर तो कोई प्रतिबंध नहीं है पर उस असहमति को सार्वजनिक करने पर, उससे कतिपय समस्याओं के उत्पन्न होने वाले खतरों के कारण प्रतिबन्ध ज़रूर लगाया गया है । बहुत से सरकारी संस्थाओं में श्रमिक यूनियन होते हैं जो अपनी बात, दुःख दर्द सरकार तक पहुंचाते हैं और वे अखबारों में वक्तव्य भी देते हैं । उन्हें हड़ताल करने की भी छूट कुछ गाइडलाइनों के अनुसार दी गयी है । लेकिन ऐसी छूट सेना, पुलिस और अर्ध सैनिक बल जिसमे केंद्रीय पुलिस बल आते हैं नहीं दी गयी हैं । और न ही दी जानी चाहिए ।

सेना , पुलिस या केंद्रीय पुलिस बल, का संगठन, उद्देश्य और कार्यप्रणाली , किसी भी अन्य सरकारी संस्थाओं से अलग होता है । शस्त्रजीवी होने और संवेदनशील कार्यों के कारण इन संगठनों में किसी भी प्रकार के संघ या संघटन की अनुमति नहीं दी जाती है । और दी भी नहीं जानी चाहिए ।  लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि इन संगठनों के जवानों और अधिकारियों में असंतोष नहीं होता है । असंतोष एक मानवीय प्रवित्ति है वह जब भी कोई बात मनोनुकूल नहीं होती है तो स्वाभाविक रूप से असंतोष उत्पन्न होने लगता है । इन बलों के जवान अक्सर बैरेक्स में अकेले और अपने परिवार से दूर रहते हैं । वे सामूहिक रूप से मेस में भोजन करते हैं और सामूहिक रुप से रहते भी हैं । उनके बैरक में रहने का मापदंड, मेस में भोजन का मेन्यू, भोज्य सामग्री की मात्रा और गुणवत्ता आदि का एक तय पैमाना होता है , यह सबको मालूम भी होता है । जवान ही अपना मेस मैनेजर चुनते हैं, अपना मेन्यू तय करते हैं । किसी अव्यवस्था होने पर वे अपना मेस मैनेजर बदल भी देते हैं । एक तय व्यवस्था के अनुसार उनका भोजन बनता है और अन्य सुविधाएँ भी मिलती है । यही हाल इनसे जुड़े लॉजिस्टिक्स का भी होता है । अब यह समस्या उठती है कि जो अधिकारी इन सब के पर्यवेक्षण और क्रियान्वयन के लिए रखा गया है वह कितनी निष्ठा से काम करता है । ऐसा नहीं है कि जली रोटी और पतली दाल का मुद्दा पहली बार बीएसएफ के तेज प्रताप यादव ने उठाया है । बल्कि जब भी इन सैनकों का मासिक सम्मेलन आयोजित होता है तो उसमें जवान अपनी खाने पीने की समस्याओं को उठाते हैं । समस्याएं भी दो तरह की होती हैं । एक सामूहिक और दुसरी निजी । निजी समस्याओं में किसी को छुट्टी न मिलने की समस्या, किसी को इन्क्रीमेंट न लगने या बकाया वेतन के एरियर मिलने की समस्या या अन्य कोई पारिवारिक समस्या होती है । सामूहिक समस्याओं में बैरेक्स की कोई कमी, ड्यूटी की कोई कमी, और मेस की कोई अव्यवस्था की बात उठायी जाती है । ऐसे सैनिक सम्मेलन जिसे पहले दरबार कहा जाता था , हर सैन्य बल की इकाई में हर माह होते हैं और यह एक ऐसा अवसर होता है जिसमें सभी अपनी बात कहते हैं । अब जिम्मेदारी यूनिट चीफ की है कि वह इन सम्मेलनों में उठाये गए सवालों पर कितना कार्यवाही करता है और क्या बदलाव करता है ।

इन बलों में यूनिट चीफ की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है । यूनिट का अनुशासन, लोगों में असंतोष तथा मनोबल आदि उसकी दक्षता और कुशलता पर निर्भर करता है । उसकी जिम्मेदारी है कि अगर कोई कमी या विसंगति है तो वह अपने उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाये । इन अनुशासित बलों में चेन ऑफ़ कमांड का बहुत महत्व होता है । और यह चेन ऑफ़ कमांड न केवल जवानों के लिए ही होता है बल्कि अफसरों के लिए भी होता है । जब अपनी बात कहने के लिए एक उचित और मान्य फोरम उपलब्ध है तो सोशल मिडिया या किसी अन्य माध्यम से समस्याओं को प्रचारित करने का कोई औचित्य नहीं है । अगर यूनिट चीफ के स्तर पर भी सुनवाई नहीं होती है तो उस से वरिष्ठ अधिकारी से बात कही जा सकती है । जैसा कि जनरल रावत ने कहा है कि, जवान अपनी समस्याएं उन्हें सीधे बता सकते हैं । जवानों के कल्याण की कई योजनाएं इन सुरक्षा बलों में चलती हैं और उनकी समीक्षा भी होती है । फिर भी कुछ न कुछ कमियाँ रह जाती हैं । ये बल किसी संस्थान की तरह नहीं एक परिवार की तरह होते हैं । यूनिट चीफ उस परिवार के प्रमुख की तरह  होता है । अक्सर हम मनोबल की बात करते हैं । सुरक्षा बल जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते हैं उसमे मनोबल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है । जवान अपनी निजी और खाने पीने की समस्याओं से निश्चिन्त हो कर ही उन प्रतिकूल समस्याओं का सामना कर सकते हैं । जब इन जवानों के पास सैनिक सम्मेलन के फोरम को छोड़ कर अपनी समस्या कहने के लिए कोई विकल्प नहीं है और हर विकल्प अनुशासन पर प्रश्न चिह्न उठाता है तो ऐसे समय में यूनिट चीफ की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है । परिवार के एक जिम्मेदार प्रमुख की तरह अगर उसका आचरण और दृष्टि नहीं हुयी तो अनसुलझी छोटी छोटी समस्याएं , व्यापक असंतोष का कारण बन सकती हैं और इसके भयावह परिणाम हो सकते हैं । ऐसा ही एक भयावह परिणाम 1973 के पीएसी विद्रोह के रूप में उत्तर प्रदेश में हम देख चुके हैं ।

सोशल मिडिया पर समस्याओं के प्रसारित करने के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि
इन बलों के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार को सरकार के संज्ञान में लाया जा सकेगा । और इन बलों पर इन समस्याओं के निस्तारण तथा तथा वे फिर न हो सकें इस लिए मनोविज्ञानिक दबाव पड़ेगा। 
यह तर्क बेमानी है । चीज़ें जैसे ही सार्वजनिक होंगी तो कुछ मामलों में वे तत्व जो उन समस्याओं के समाधान के लिए जिम्मेदार हैं , समस्या उजागर करने वाले के प्रति लामबंद हो सकते है और उस समस्या का तो समाधान होगा नहीं उलटे और नयी समस्याएं पैदा हो जाएंगी । हालांकि यह एक गलत प्रवित्ति है । होना तो यह चाहिए कि सोशल मीडिया पर आयी किसी भी शिकायत पर तुरंत संज्ञान ले कर उसका समाधान किया जाय और अगर वह झूठ है तो तदनुसार कार्यवाही की जाय । पर होता क्या है , यह भी यूनिट चीफ के व्यक्तित्व और विचार पर भी निर्भर करता है । अगर सोशल मीडिया पर फ़ैल रहे समस्याओं का संज्ञान नहीं लिया गया तो इससे अफवाहें फैलने का भी खतरा रहता है । सुरक्षा बल किसी भी राजनीतिक दल के प्रति निष्ठावान नहीं होते हैं । उनकी निष्ठा और स्वामिभक्ति देश के संविधान और देश के प्रति है । जब कि अन्य श्रमिक संघटन खुल कर किसी न किसी राजनीतिक दल के आनुषांगिक संगठन होते हैं । हमारी सेनाएं और सुरक्षा बलों  का अराजनीतिक स्वरूप दुनिया भर के लिए एक मिसाल है । यही कारण है कि राजनीतिक उठापटक के बावज़ूद भी सेना के मूल चरित्र पर कभी भी कोई असर नहीं पड़ता है । सोशल मीडिया पर सक्रिय मित्र जो अनुशासन की इस बारीकी और रेजिमेन्टेशन की संवेदनशीलता से परिचित नहीं हैं , इन खबरों को किसी अन्य दृष्टिकोण से देखते हैं ।  वे मेस की कतिपय अव्यवस्था को सरकार की कमी और राजनैतिक दल की विफलता से जोड़ कर देखने लगते हैं जिस से इन बलों के जवानों का कोई सरोकार नहीं है । एक मेस में खाना खराब मिल रहा है तो उस यूनिट के अफसर जिम्मेदार हैं न कि कोई सरकार या राजनीतिक दल । यह स्थानीय कुप्रबंधन है । कोई नीतिगत विफलता नहीं है ।

अक्सर एक सवाल उठाया जाता है कि अनुशासन और मनोबल के नाम पर जवानों की आवाज़ दबायी जाती है । यहां यह स्पष्ट करना है कि सेना या पुलिस का ढांचा , उद्देश्य और कार्यप्रणाली सभी अन्य विभागों से अलग हैं । यह एक प्रकार का रेजिमेन्टेशन है । अनुशासन के नाम पर ज्यादतियां होती होंगी इनसे इनकार नहीं किया जा सकता है । पर अनुशासन में ज़रा सी ढील इस पुरे तंत्र को एक भीड़ में बदल कर रख देगी । सेना प्रमुखों और पुलिस बलों के प्रमुखों का यह मुख्य दायित्व है कि वह कल्याण संबंधी मामलों और भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के प्रति अत्यघिक सतर्क रहें । अब जो लड़के फ़ौज़ और पुलिस में भर्ती हो रहे हैं , वे पहले की तरह महज आज्ञापालक ही नहीं है बल्कि वे अपने आस पास घट रहे घटनाक्रम से पूर्णतया भिज्ञ हैं । वे अपने अधिकार और उन्हें जो सरकार दे रही है , से पूरी तरह सचेत भी हैं । दुनिया अब उनके लिए गोल नहीं रही कि वे केवल क्षितिज तक ही देखे । दुनिया उनके लिए चपटी हो गयी है । अब वे आर पार सब देख और समझ रहे हैं । अफसरों को भी तदनुसार बदलना होगा । केवल अनुशासन के डंडे से ही उन्हें नहीं हांका जा सकता है । उन्हें पूरी सुविधाएं जो भी उन्हें अनुमन्य हों मिलें और तनाव मुक्त वातावरण मिले जिस से वे अपना काम कर सकें ।

© विजय शंकर सिंह .

Friday, 13 January 2017

एक कविता - निर्मम इतिहास, याद किसे रहता है !

वाटरलू , 
वह एक निर्णायक युद्ध था ,
जो वह हार गया था
अंतिम और त्रासद भरे दिन
ज़ुल्मत भरी रातें
उदास और
खोखली चमक लिए सूरज,
जिनमे वह अपनी प्रेयसी के लिए
दिल को छू देने वाली
प्रतीकों और विम्बों से सजी
कविताओं को लिखता रहता,
मिटाता रहता !

सोचता रहता वह उन युद्धों को
जिसमें वह  शौर्य के साथ
एक एक कर राज्यों को
भूलुंठित करते हुए
अपने बाहों में समेट कर,
बन गया था, अवतार ईश्वर का !

रूस की हाड़ कंपाती,
खून को भी जमा देने वाली,
कड़कड़ाती सर्दी में पड़े हुए,
सैनिकों के क्षत विक्षत शव,
जले हुए गाँव के गाँव ,
सब कुछ जीत कर भी
पराजय के एहसास के साथ
लौटता हुआ वह,
सब कुछ फ़्लैश बैक की तरह,
जेहन में उसके
उतराता रहा , डूबता रहा !

द्वीप का एकांत कारागार
संसार से अलग करती हुयी
पत्थर की हृदयहीन दीवारें,
लहराता और डराते हुए सागर की ध्वनि
नीला और खूबसूरत समुद्र नहीं ,
कालिमा लिए जहरीला सागर वह,
आह, कल का विश्व विजेता,
बंदी है आज,
विचित्र है, नियति की गति भी !

कभी प्रेम, कभी युद्ध,
कभी राजनीति तो कभी उदासी भरी याद,
कितनी कहानियों के
अक़्स उसे अपने ही,
खोल में समेटते जा रहे थे ,
वह एक अज़ीब दुनिया में है ।

जनप्रियता, त्राता, अवतार,
भारी भरकम शब्द,
अपना अर्थ खोते हुए,
सागर में भग्न पोत की तरह,
दिशाहीन पड़े हैं ।
अहंकार और जनप्रियता कभी कभी,
दृष्टिदोष भी लाती है .
खुद की आँखें खुद के
प्रकाश से चुंधियाती
मिचमिची सी
खुद को संसार से अलग कर देती हैं ।

लोकप्रियता और
अहम्  का यह माया लोक
पतन की ओर उठते हुये  क़दम का
प्रथम चरण है .
पर निर्मम इतिहास , याद किसे रहता है !!

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 12 January 2017

सहारा - बिरला दस्तावेजों के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट का हैरानी भरा फैसला / विजय शंकर सिंह

प्रशांत भूषण की याचिका जो सहारा और बिरला डायरी के सन्दर्भ में है पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हैरानी भरा है । प्रकरण इस प्रकार है । 2013 में कोयला घोटाले की जांच के दौरान सीबीआई ने आदित्य बिरला ग्रुप और उनकी कुछ कंपनियों पर छापा मारा था जिनमे से हिंडाल्को जैसी बड़ी कम्पनी भी थी । छापे के दौरान 25 करोड़ नक़द   तथा कंपनी के सीईओ अमिताभ के कम्प्यूटर में संरक्षित एक डाटा मिला । जब उस डाटा का अध्ययन किया गया तो, पाया गया कि पर्यावरण क्लियरेंस के लिए बिरला ग्रुप ने गुजरात के मुख्य मंत्री को 25 करोड़ रूपये दिए जाने की बात लिखी है । उस समय बिरला ग्रुप अपने एक प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण क्लियरेंस हेतु प्रयासरत था । नियमतः इस प्रविष्टि पर ही सीबीआई को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत करके विवेचना करनी चाहिए थी । वैधानिक प्रक्रिया यही है । पर सीबीआई ने ऐसा न कर के यह प्रकरण आय कर विभाग को अग्रिम कार्यवाही के लिए सौंप दिया । आय कर विभाग ने जांच शुरू की और सीईओ अमिताभ से पूछ ताछ की । प्रविष्टि  " Gujrat CM paid ₹ 25 crores. 12 paid 13 " इस प्रकार थी । अमिताभ ने इन प्रविष्टियों के बारे में बताया कि यह पैसा गुजरात केमिकल्स और अल्कली के खाते में दिया गया है । पर जब आय कर विभाग ने सख्ती से पूछ ताछ की तो वे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाये और आय कर विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अमिताभ झूठ बोल रहे हैं । जांच से आयकर को यह भी ज्ञात हुआ कि भारी संख्या में हवाले के माध्यम से धन का आदान प्रदान हुआ है और उस से कुछ लोगों को रिश्वतें दी गयी हैं । आय कर विभाग को अपने इन निष्कर्षों को सीबीआई को अग्रिम और गहन जांच हेतु सौंपना चाहिए था , जो उन्होंने नहीं किया और यह मामला बस्ता ए खामोशी में चला गया ।

22 नवम्बर 2014 को सहारा के नोयडा मुख्यालय में आय कर का एक छापा पड़ा जिसमे ₹ 135 करोड़ नकद और सहारा प्रमुख के निजी स्टाफ के पास और उनके कम्प्यूटर से कुछ दस्तावेज़ और डाटा मिले । इन दस्तावेजों की जब छानबीन की गयी तो, विभिन्न श्रोतों से 115 करोड़ रूपये का आना और एक कागज़ पर कुछ लोगों को रूपये का भुगतान करने की प्रविष्टियाँ मिली । उनका परीक्षण करने पर पता चला कि, एक कागज़ में यह अंकित है, " cash given at Ahemadabad Modi ji " तथा एक अन्य कागज़ में , " cash given to CM Gujrat " फिर इसके बाद उन्हें ₹ 40 करोड़ अहमदाबाद में मोदी जी को दिए गए अंकित है । इसके अतिरिक्त, ₹ 10 करोड़ , मुख्य मंत्री मध्य प्रदेश, ₹ 4 करोड़ मुख्य मंत्री छत्तीसगढ़, ₹ 1 करोड़ मुख्य मंत्री दिल्ली को दिए जाने का उल्लेख है । दिल्ली की मुख्य मंत्री उस समय शीला दीक्षित थीं । यह सारी प्रविष्टियाँ 2013 और 14 की हैं । जब गुजरात , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री क्रमशः नरेंद्र मोदी , शिव राज सिंह चौहान और रमन सिंह थे । शिव राज सिंह चौहान और रमन सिंह आज भी मध्य प्रदेश और छत्तीस गढ़ के मुख्य मंत्री हैं पर नरेंद्र मोदी अब देश के प्रधान मंत्री हैं । इन कागजों पर भी कोई अग्रिम कार्यवाही न तो आय कर विभाग ने की और न ही यह प्रकरण सीबीआई को जांच हेतु भेजा गया । इन कागजों और प्रविष्टियों पर जो अधिकारी आय कर विभाग के जांच कर रहे थे उनका नाम केवी चौधरी था और  आज कल वह मुख्य सतर्कता आयुक्त हैं । चौधरी साहब की मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर हुयी नियुक्ति को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी, क्यों कि इनका नाम कई बार पूर्व सीबीआई प्रमुख से संदेहास्पद परिस्थितियों में मिलने वाले लोगों के रूप में उनके आगंतुक पुस्तिका में दर्ज़ है । यह सारे कागज़ और तथ्य सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के लिए याचिका कर्ता प्रशांत भूषण द्वारा एक जनहित याचिका के रूप में दायर की गयी जिसे सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया ।

यह याचिका कॉमन कॉज नामक एक संस्था जो एचडी शौरी द्वारा स्थापित की गयी है के द्वारा दायर की गयी है । इसी संस्था द्वारा सीवीसी चौधरी की भी नियुक्ति को चुनौती, इस आधार पर दी थी कि चौधरी ने आय कर विभाग के इन्वेस्टिगेशन विंग के प्रमुख रहते हुए भी बिरला सहारा छापों में मिले दस्तावेजों की छान बीन गहराई से नहीं की और उन्होंने उस पर कोई अग्रिम कार्यवाही भी नहीं की । वह सीवीसी जैसे महत्वपूर्ण पद जो भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए उत्तरदायी है, के सर्वथा उपयुक्त नहीं है । 2015 में दायर इस याचिका पर अभी भी सुनवायी चल रही है । याचिका का निस्तारण अभी तक नहीं किया गया है । इसी कॉमन कॉज के द्वारा बिरला सहारा पेपर्स के सदर्भ में भी याचिका दायर की गयी है । इस याचिका में यह मांग की गयी है कि बिरला सहारा पेपर्स में जिन के विरुद्ध धन लेने के नाम और प्रविष्टियाँ अंकित हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अभियोग कायम कर के विवेचना की जाय ।

इस याचिका पर 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया और सुप्रीम कोर्ट ने इन कागजों में अंकित प्रविष्टियों पर जांच कराने से इनकार कर दिया । अदालत का कहना है कि किसी की डायरी या दस्तावेज़ में किसी भी व्यक्ति के नाम के सामने अगर कोई धनराशि दर्ज़ कर दी जाय तो उस व्यक्ति को उत्कोच लेने वाला कैसे मान लिया जाय । वह धनराशि उस व्यक्ति को ही मिली है यह कैसे प्रमाणित होगी । जब तक धन का प्रदान और उसका आदान ,और उस धनराशि के लेने देने का उद्देश्य स्पष्ट न हो तब तक इसे प्रथम दृष्टया उत्कोच का मामला कैसे मान लिया जाय । अदालत ने इसे बिना जांच के आदेश के ही खारिज कर दिया ।

इस आदेश के गुण दोष में जाये बिना पुलिस दृष्टिकोण से एक मौलिक प्रश्न उठता है कि क्या बिना विवेचना किये ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि सुबूत पर्याप्त हैं या नहीं है । प्रथम सूचना रिपोर्ट जो सीआरपीसी के अनुसार किसी भी अपराध की एक प्राथमिक सुचना होती है । पुलिस उस सूचना के बाद उस अपराध की छानबीन और तफ्तीश का काम शुरू करती है । वह जैसा मुक़दमा है उसी के अनुसार साक्ष्य एकत्र करती है , गवाहों के बयान लेती है , अभिलेखों की छानबीन और उनका परीक्षण करती है और जब साक्ष्य एकत्र हो जाता है तो आवश्यकतानुसार अभियुक्त की गिरफ्तारी , तलाशी आदि जो विवेचना के ही अंग होते हैं उन्हें करती है । फिर अभियोग के सम्बन्ध में आरोप पत्र या अंतिम आख्या जैसा सुबूतों से स्पष्ट हो अदालत के सामने रखा जाता है । तफ्तीश के दौरान कानून से पुलिस को पर्याप्त शक्तियां और सरक्षण प्राप्त हैं । इस मामले में जितना मैं समझ सका हूँ कि प्रथम दृष्टया धन देने के अभिलेखीय साक्ष्य हैं । धन देने का कारण भी मौजूद है । इतना साक्ष्य नहीं है कि किसी के खिलाफ अभियोग चलाया जा सका पर इतना सुबूत और प्रारंभिक सूचना अवश्य है कि इस मामले में सीबीआई या अन्य किसी भी एजेंसी से तफ्तीश करायी जा सके ।

इस फैसले को क्या सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग या व्यवस्था मानी जायेगी या नहीं ? यह फैसला इस से मिलते जुलते प्रकरणों पर एक दिशा निर्देश की तरह काम करेगा या नहीं ? यह तो विधि के जानकर और मेरे एडवोकेट और जज मित्र ही बता पाएंगे पर यह फैसला कुछ लोगों के लिए ढाल की तरह राहत भी देगा । देश में अगर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दर्ज़ हुए मुक़दमों में सज़ायाबी के प्रतिशत को देखा जाय तो वह, जितना वास्तविक भ्रष्टाचार दिखायी देता है, उसकी तुलना में बहुत ही कम है । अमूमन सुबूत मुश्किल से मिलते हैं और जो मिलते भी है, उन्हें सिद्ध करना कठिन भी हो जाता है । मैंने ट्रैप ( रंगे हाँथ रिश्वत लेते पकड़े जाने वाले मामले ) के प्रकरणों में भी अभियुक्त को छूटते देखा है । कभी विलम्ब, कभी कोई तकनिकी कारण, कभी स्वतंत्र गवाहों का पक्षद्रोही हो जाना, कभी और कोई न कोई कारण, ऐसा आ जाता है जिस से मुक़दमे छूट जाते हैं । यह फैसला कि उत्कोच देने वाले की सूची में की गयी प्रविष्टि के ही आधार पर जांच नहीं की जा सकती, उन भ्रष्टाचारी तत्वों को बच निकलने का एक रास्ता ही देगी जिनके ऊपर रिश्वत लेने का प्रमाण , रिश्वत देने वाले के बही खातों में दर्ज़ है । रिश्वत देने वाला , और ख़ास कर व्यापारी वर्ग कभी भी दिए गए रिश्वत के बारे में खुल कर नहीं कहते हैं । वे व्यक्तिगत बात चीत में जो आरोप घूसखोरी के लगाते हैं , वही वह लिख कर कभी नहीं देते है । इसका एक मात्र कारण यह है कि वे तंत्र से भिड़ कर अपने व्यापारिक हितों पर कुठाराघात नहीं करना चाहते हैं । ऐसी स्थिति में तंत्र ही कोई ऐसा  स्वयंशुचिता का तंत्र विकसित करे जिस से भ्रष्टाचार के इस रोग से मुक्ति मिल सके या यह कम हो सके । सुप्रीम कोर्ट की यह आशंका कि इसका दुरुपयोग हो सकता है , भी सही मान लें तो भी प्रश्न केवक जांच कराने का है न कि उन प्रविष्टियों के आधार पर अभियोग चलाने का ।

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 7 January 2017

पद के दुरुपयोग के आरोप में आरबीआई के गवर्नर पर मुकदमा क्यों न चलाया जाय ? / विजय शंकर सिंह

यह मैं नहीं कह रहा हूँ । यह कहा है संसद की लोक लेखा समिति या Public Accounts Committee PAC ने । यह एक संवैधानिक समिति है जो सरकार से विभिन्न मामलों पर विचारोपरान्त पूछ ताछ करती है । इसका अध्यक्ष विपक्षी दल का कोई सांसद होता हैं। सीएजी की सभी ऑडिट रिपोर्ट इस समिति को भेजी जाती है और वह उसका पड़ताल कर सरकार से पूछ ताछ करती है या रिपोर्ट मांगती है । इस समिति के वर्तमान अध्यक्ष हैं कांग्रेस के सांसद केवी थॉमस । समिति ने 28 जनवरी को आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल को समिति के समक्ष उपस्थित हो कर यह बताने को कहा है कि,
" अगर नकदी निकालने पर पाबंदी लगाने को लेकर कोई कानून नहीं है तो उन पर ”शक्तियों का दुरुपयोग करने के लिए” मुकदमा क्‍यों न चले और उन्‍हें हटाया क्‍यों न जाए। "
पीएसी ने यह भी जानना चाहा है कि
कितनी नकदी पर प्रतिबंध लगा था और उसमें से कितनी बैंकिंग व्‍यवस्‍था में लौट आई है।

समिति ने आरबीआई के गवर्नर से 10 प्रश्न भी पूछे हैं । इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, वे इस प्रकार हैं ।
1. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने सदन में कहा है कि नोटबंदी का फैसला आरबीआई और इसके बोर्ड द्वारा लिया गया था। सरकार ने सिर्फ सलाह पर कार्रवाई की। क्‍या आप सहमत हैं?
2. अगर फैसला आरबीआई का ही था, तो आखिर कब आरबीआई ने तय किया कि नोटबंदी ही भारत के हित में हैं?
3. रातोरात 500 और 1,000 रुपए के नोट बंद करने के पीछे आरबीआई ने क्‍या कारण पाए?
4. आरबीआई के अपने अनुमान दिखाते हैं कि भारत में सिर्फ 500 करोड़ रुपए की नकली/जाली करंसी है। जीडीपी के मुकाबले भारत में कैश 12 फीसदी था जो कि जापान (18%) और स्विट्जरलैंड (13%) से कम है। भारत में मौजूद नकदी में उच्‍च मूल्‍य के नोटों का हिस्‍सा 86% था, लेकिन चीन में 90% और अमेरिका में 81% है। तो, अचानक ऐसी क्‍या जरूरत आ पड़ी थी कि आरबीआई को विमुद्रीकरण का फैसला लेना पड़ा?
5. 8 नवंबर को होने वाली आपातकालीन बैठक के लिए आरबीआई बोर्ड सदस्‍यों को कब नोटिस भेजा गया था? उनमें से कौन इस बैठक में आया? कितनी देर यह बैठक चली? और बैठक का ब्‍योरा कहां है?
6. नोटबंदी की सिफारिश करते हुए कैबिनेट को भेजे गए नोट में, क्‍या आरबीआई ने साफ-साफ लिखा था कि इस फैसले का मतलब देश की 86 प्रतिशत नकदी को अवैध करना होगा? आरबीआई उतनी ही नकदी कब तक व्‍यवस्‍था में लौट सकेगी?
7. सेक्‍शन 3 c(v) के तहत 8 नवंबर, 2016 को आरबीआई की अधिसूचना द्वारा बैंक खातों से काउंटर के जरिए 10,000 रुपए प्रतिदिन और 20,000 रुपए प्रति सप्‍ताह निकासी की सीमा तय कर दी गई। एटीएम में भी 2,000 रुपए प्रति दिन निकासी की सीमा लगाई गई। किस कानून और आरबीआई को मिली शक्तियों के तहत लोगों पर अपनी ही नकदी निकालने पर सीमा तय की गई? देश में करंसी नोटों की सीमा तय करने की ताकत आरबीआई को किसने दी? अगर ऐसा कोई नियम आप न बता सकें, तो क्‍यों न आप पर मुकदमा चलाया जाए और शक्‍त‍ियों का दुरुपयोग करने के लिए पद से हटा दिया जाए?
8. पिछले दो महीनों से आरबीआई के रेगुलेशंस में बार-बार बदलाव क्‍यों हुए? कृपया हमें उस आरबीआई अधिकारी का नाम बताएं जिसे निकासी के लिए लोगों पर स्‍याही लगाने का विचार आया? शादी से जुड़ी निकासी वाली अधिसूचना किसने तैयार की थी? अगर यह सब आरबीआई ने नहीं, सरकार ने किया था तो क्‍या अब आरबीआई वित्‍त मंत्रालय का एक विभाग है?
9. कितने नोट बंद किए गए और पुरानी करंसी में से कितना वापस जमा किया जा चुका है? जब 8 नवंबर को आरबीआई ने सरकार को नोटबंदी की सलाह दी तो कितने नोटों के वापस लौटने की संभावना थी?
10. आरबीआई ने आरटीआई के तहत जानकारी देने से मना क्‍यों किया है, वह भी निजी चोट का डर जैसा कारण बताकर? आरटीआई के तहत मांगी जाने वाली जानकारी देने को आरबीआई क्‍यों नहीं दे रहा?

आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल 28 जनवरी को पीएसी के समक्ष क्या उत्तर प्रस्तुत करते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा । देश की मौद्रिक नीति के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार आरबीआई को है । वह एक स्वायत्त संस्थान है । उसकी स्वायत्तता इस लिए बनायी गयी है ताकि देश के आर्थिक स्वास्थ्य को देखते हुए वह उचित और प्रोफेशनल निर्णय ले सके । सरकार ऐसे निर्णय जो लोक को तत्काल कष्ट दे रहे हों को लेने से कतराती भी रहती है पर आरबीआई की ऐसी कोई बाध्यता नहीं है । वर्तमान नोटबन्दी के संदर्भ में चर्चा करें तो, यह स्पष्ट है कि आरबीआई ने जिस तरह से लगातार अपने आदेशों निर्देशों को जारी किया है , और फिर संशोधित , पुनः संशोधित , रद्द किया है इस से उसकी साख पार बहुत बुरा असर पड़ा है । ऐसे समय में जब हम विदेशी निवेश लाने के लिए मोक्ष प्राप्ति की तरह सन्नद्ध हैं तो इस प्रकार के फैसले से देश की अफरातफरी भरी अर्थ व्यवस्था का ही सन्देश विश्व के निवेशकों पर जाएगा । इसका असर जीडीपी पर भी पड़ना शुरू हो गया हैं । आंकड़े लाख मायाजाल या झूठ का पुलिंदा कह कर खारिज किये जाते रहें पर जब भी निवेश या मूल्यांकन का समय आएगा तो इन्ही आंकड़ों के आधार पर योजनाएं बनायी जाएंगी और बनायी जाती रहती हैं । समिति के समक्ष उर्जित पटेल क्या कहते हैं यह तो अनुमान लगाना फ़िलहाल कठिन है, पर यह निश्चित है कि वे उन सवालों और उन पर उठने वाले पूरक प्रश्नों से असहज भी होंगे । उन परिस्थितियों का खुलासा देश के समक्ष होना चाहिए , जिन के कारण 8 नवम्बर को रात 8 बजे अचानक एक घोषित हुयी और उसे मास्टरस्ट्रोक कहा गया । साहसिक कदम कहा गया । पर अब यह साहसिक कदम आत्मघाती दिख रहा है और मास्टर स्ट्रोक बॉउंड्री पर कैच हो गया है ।

ज्ञातव्य है कि सरकार या आरबीआई को मौद्रिक प्रतिबंध लगाने की शक्तियां हैं , पर वह तभी लगाई जा सकती है जब कोई आपात स्थिति आ गयी हो । संविधान आपात काल लगाने की अनुमति देता है । और उन आपात परिस्थितियों में मौलिक अधिकारों तक को प्रतिबंधित करने की शक्ति सरकार के पास है । पर यह सारी बातें जनता के समक्ष रखनी होती हैं । ऐसा नही कि किसी शाम सरकार को इलहाम हो जाय और वह नशे की पिनक में बिना तैयारी के ही एक ऐसा आर्थिक निर्णय ले ले जिस से देश की अर्थ व्यवस्था पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ने लगे । फिर उस कुप्रभाव की बौखलाहट में या तो रोना धोना शुरू हो जाय, या मसखरेपन का प्रदर्शन , या मुद्रा उपलब्ध न करा पाने की खीज में कैशलेस या लेसकैश के जुमले या यह न कर पाऊं तो मार देना, वह न कर पाऊं तो जला देने का विक्षिप्त प्रलाप करना । प्रधानमंत्री जी की बौखलाहट, देहभाषा, भाषण, आदि का अगर थोडा सा भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन आप करें तो स्पष्ट समझ लेंगे कि वे अस्थिर हो चुके हैं । ऊहापोह की स्थिति में सभी से गलतियां होती हैं और वे भी इंसान ही हैं । नोटबंदी होनी चाहिए थी या नही यह तो आर्थिक इतिहास के अध्येता अनंत काल तक शोध करते रहेंगे पर इस के जो कुप्रभाव पड़ रहे हैं फिलहाल सरकार को उससे निबटने के लिए स्थिर और हठ योग से बाहर आ कर प्रयास करना होगा । कुहरा अब भी है । धुंध और ठंडक में सूरज की प्रतीक्षा अक्सर बेसब्री से ही होती है ।

( विजय शंकर सिंह )