Wednesday, 6 April 2016

एन आई टी ( NIT ) श्रीनगर काण्ड - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

एन आई टी श्रीनगर में जो हुआ है वह घोर निंदनीय है । पर हुआ क्यों ? आज के पहले तो यह रोग नहीं था । यह आया कहाँ से ? इसकी पड़ताल भी ज़रूरी है और इसकी रोक थाम भी  । भारत माता हैं या पिता यह तो वे जाने जो भारत के अस्तित्व और स्वरूप को लेकर संशय में हों । मेरे लिए यह मेरा देश है और इस देश के सभी नागरिकों का दायित्व है कि वह देश के संविधान को अक्षरशः माने ।  जो नहीं मानना चाहता , उसकी बात भी सुनिए भले ही उसकी बात से सहमति हो या नहीं हो। अगर वह विधि विरुद्ध हो तो उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाय । कुछ सालों से माहौल में जो ज़हर कुछ लोगों ने इंजेक्ट करना शुरू किया था, वह अब फैलने लगा है । आग और ज़हर कभी नियंत्रित नहीं रह सकते हैं । वह जब अनियंत्रित हो जाते हैं तो किसी को भी नहीं बख्शते हैं। वेदों के काल से ही वैश्वानर की स्तुति का विधान है । अग्नि चाहे चूल्हे की हो या यज्ञ कुण्ड की इसे नियंत्रित रखना ही पड़ता है । और घृणा भी एक प्रकार की अग्नि का परिणाम है । वह अग्नि है इर्श्यग्नि। ईर्ष्या का एक रूप वैमनस्य भी है । यह वैमनस्य धर्म जनित भी हो सकता है और जाति से जुड़ा भी । वैमनस्य हिंसा का मार्ग भी अंत में ग्रहण करता है । चाहे वह परिवार में हो, या समाज में , या देश में , या विश्व में । युद्धों का इतिहास खंगालिए आप खुद ब खुद इसी निष्कर्ष पर पहुँच जाएंगे ।

भारत में रहना होगा तो वंदे मातरम् कहना होगा । जो भारत माता की जय नहीं बोलेगा वह देश में नहीं रह पायेगा। इन नारों का जन्म किस दिमाग और मानसिकता की उपज है मित्रों ? जब मैं,  धवल वस्त्र धारण किये चन्दन सुशोभित मस्तक लिए, आँखों से चरण स्पर्श करने वालों को अत्यंत ओढ़ी गयी गरिमा और चरण न छूने वालों की और हिकारत की नज़र से देखते हुए कुछ लोगों को जब यह फतवा जारी करते हुए कि जो इन मन्त्रों का जाप नहीं करेगा वह देशभक्त नहीं माना जाएगा, देखता हूँ तो, वितृष्णा हो जाती है । वितृष्णा इस लिए नहीं कि उनके वस्त्र धवल हैं, इस लिए नहीं कि, उनके ललाट चंदनासुशोभित हैं, बल्कि इस लिए कि किसने उन्हें और कब यह अधिकार दे दिया कि वे यह तय करें कि क्या बोलना देश भक्ति का पैमाना है । दर असल यह एक प्रकार का स्वमहत्व बोध है । अंग्रेज़ी की एक कविता की प्रसिद्ध पंक्ति की तरह , I am the monarch , what I survey !  जहां तक मैं देखता हूँ  वहाँ का मैं सम्राट हूँ । यह कविता ग्रीक सम्राट सिकंदर के सन्दर्भ में है । इस प्रकार का भाव एक प्रकार का दम्भ है, अहमन्यता है ।

कभी कभी यह भी एक मानवीय प्रवित्ति होती है कि जो आप कहते हैं या कहना चाहते हैं, वही मैं भी कहता हूँ और कहना चाहता हूँ पर आप की ज़िद , घमंड और जिस टोन और टेनर से आप चाहते हैं कि मैं वही कहूँ, तो मैं उखड जाता हूँ। नहीं कहूँगा और आप के अहम् की संतुष्टि के लिए तो कदापि नहीं । मेरा विरोध उस वाक्य से नहीं है , मेरा विरोध आप की ज़िद से है, आप के दर्प से है और आप की मानसिकता से है। यह मैं अपनी बात कह रहा हूँ । मैं सिर्फ कोई बात इस लिए मान लूँ कि आप ने कहा है मानो और कहो तो वह मेरे और मुझ जैसे मानसिकता के लोगों के लिए संभव नहीं है । आज जो भारत माता की जय को एक मुद्दे के रूप में  प्रस्तुत कर रहे है और विवादित बना रहे हैं सच में वही लोग भारत माता के जाने या अनजाने , विरुद्ध हैं । भारत का अहित कर रहे हैं । यह एक बहु भाषी देश है। अनेक  भाषा परिवारों का देश है । भारोपीय, द्रविड़ , आदि प्रमुख भाषा परिवारों के अतिरिक्त अनेक भाषा परिवार हैं । मैं इन परिवारों के अलग अलग भाषाओं की बात अभी नहीं कर रहा हूँ। इसी प्रकार अनेक धर्म और उनके अनेक मत मतान्तर भी हैं। सबके रीति रिवाज़ अलग अलग हैं । फिर अगर कोई अपने देश के प्रति अपनी भावना , संस्कृति , भाषा और ऐतिहासिक विरासत के अनुसार भारत माता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहे तो किसी को आपत्ति क्यों है ? ज़िद क्यों है ? सनातन धर्म विभिन्नता में एकता का अनुपम उदाहरण है । जहां हर पूजा के पूर्व पुरोहित सबसे पहले आप का नाम, गोत्र पूछता है और फिर कहता है ईष्ट का ध्यान कीजिये, वह ईष्ट खुद नहीं बताता है , उसे चुनने का विकल्प व्यक्ति पर ही छोड़ देता है, इस से निजी स्वतंत्रता का अधिकार दुनिया के किसी भी धर्म या समाज में दुर्लभ है । ईष्ट , महादेव से ले कर गांव के बाहर एक चबूतरे पर स्थापित अनगढ़ से डीह बाबा भी हो सकते हैं । इसी लिए इस समाज में जब ज़िद और अहंकार से जुडी बातें होंने लगतीं हैं तो विरोध उठने लगता है।

यह सारी समस्याएं पिछले दो साल में ही क्यों जन्म ले रही हैं। इन्ही दो सालों में बीफ विवादित हुआ, तिरंगा और भगवा को एक कहा गया, प्रधान मंत्री की आलोचना को देश निंदा और कभी कभी ईशनिंदा भी कहा गया, भारत माता की जय न बोलने पर पाकिस्तान भेजने की बात की गयी , बिना दुर्गा सप्तशती पढ़े और तमिल संस्कृति सहित देश की आटविक संस्कृति जाने समझे महिषासुर पर विवाद खड़ा किया गया और अब विभुं विश्वनाथम् को पदावनत कर के राष्ट्रपिता बनाने और घोषित करने की बात होने लगी । यह बौद्धिक विपन्नता  , जितना ही यह बौद्धिक सुनते हैं उतना ही बढ़ती जा रही है । भारत माता की जय आज़ादी के संघर्ष का एक प्रिय उद्घोष रहा है।धरती को माँ लगभग सभी धर्मों में। कहा गया है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाएं आकाश को पिता और धरती को माँ कहती हैं । इस से उपजे अन्न को हम खाते हैं । फिर  इस उदगार को ले कर राजनीति क्यों ? राजनीति तो जो इसे बोलने के लिए गर्दन पर छुरी रखने के बाद भी राजी नहीं होने की ज़िद पाले हैं वह भी और जो गर्दन पर छुरी रख कर सिर काट लेने की इच्छा केवल इस लिए रोक रहे हैं कि उनके सामने क़ानून आ जाता है , वह भी , कर रहे हैं । दोनों के अपने अपने एजेंडे हैं । दोनों ही घृणा के दलदल में डूबे हुए हैं और मेरी नज़र में दोनों ही देश का अहित कर रहे हैं । जैसे ओवैसी के 15 मिनट पुलिस हटाने और हिंदुओं के खात्मा की बात पर, उनके खिलाफ मुक़दमा कायम किया गया और वे जेल भेजे गए , वैसा ही मुक़दमा रामदेव जो पतंजलि उत्पाद के मालिक हैं के खिलाफ भी कायम किया जाना चाहिए। ऐसा उन्मादी व्यक्ति भला किस मुंह से योग की बात करता है ? योग पेट फुलाना और पचकाना तथा सिर्फ आसन ही नहीं है। अष्टांग योग आहार से समाधि तक की एक दिव्य यात्रा है। जहां तक आप जा सकें यह आप पर निर्भर करता है ।

आज एन आई टी श्रीनगर में सी आर पी ऍफ़ गयी और तिरंगा फहराया गया । अब यह स्थिति आ गयी है कि जिसके अभिन्न अंग होने का  दावा हम सब उठते ,बैठते ,सोते , जागते करते रहते हैं, वहाँ एक सामान्य से अवसर पर भी तिरंगा फहराने के लिए सी आर पी ऍफ़ को घुसना पड़े  , यह एक शर्मनाक स्थिति है । अफज़ल ज़िंदाबाद और भारत की बरबादी के नारे लगाने वाले आज तक न तो पकडे गए और न ही पहचाने जा सके । इन नारे लगाने वालों और उन सब को जिन्होंने एन आई टी श्रीनगर में , उन छात्रों को पीटा है जो तिरंगा फहरा रहे थे और भारत माता की जय का उद्घोष कर रहे थे की पहचान करना और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना आवश्यक है। कानूनी रूप से भी तिरंगा फहराने से रोकने पर कार्यवाही की जा सकती है । लेकिन  हर कार्यवाही निष्पक्ष करनी होगी। ऐसा नहीं कि ओवैसी धमकी के आरोप में जेल जाएँ और रामदेव् सी आर पी एफ के घेरे में सुरक्षित रहें । क़ानून के आँख पर बंधी पट्टी इस बात की प्रतीक है कि वह सबको निष्पक्ष भाव से देखे और निर्णय दे। वह चुपके से कनखिया के , जैसे हम सब बचपन में आईस पाईस खेलते समय जुगाड़ से कुछ देख लेते थे , वैसा न देखे ।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 5 April 2016

पीलीभीत फ़र्ज़ी मुठभेड़ का फैसला - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

पीलीभीत मुठभेड़ फ़र्ज़ी साबित हुयी । 47 पुलिस कर्मी दोषी पाये गए और उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुयी। साथ ही प्रत्येक इन्स्पेक्टर पर ग्यारह ग्यारह लाख,  सब इंस्पेक्टर पर आठ , आठ लाख, और सिपाहियों पर पौने तीन लाख जूर्माना भी लगा। 47 आरोपियों में से दस की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गयी है । यह दुःखद समाचार है, विभाग के लिए । पर अपराध और दंड का यही दर्शन है ।

पुलिस सेवा में मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी थे, जो अब नहीं हैं । वह 1981 / 82 में जिला मैनपुरी में डी एस पी थे । उनका सरकारी जीवन और कार्यकाल अत्यंत दुखद रहा। वे पढ़ने में मेधावी थे और पी पी एस की सीधी भर्ती के अधिकारी थे । नौकरी के शैशव में उत्साह और उमंग भी कम नहीं होता । आदेश पालन की भावना और आदर्शवाद भी बहुत होता है । कुछ तो उम्र का असर और कुछ तो लगता है कि सब कुछ जो अनैतिक और गैरकानूनी हो रहा है, उसे सुधारने का भी दायित्व मेरा ही है । 1980 के आस पास का मैनपुरी अत्यंत अशांत और दस्यु प्रभावित क्षेत्र था। अनार सिंह, क्षविराम , महावीर , पोथी, अलवर आदि के  गैंग चलते थे । मैनपुरी, एटा, फतेहगढ़, आगरा, इटावा आदि ज़िले इन दस्यु गिरोहों की गतिविधियों से बहुत प्रभावित थे । गिरोह भी ऐसे दुर्दांत थे कि , उनका पकड़ा जाना मुश्किल था और पकड़ते ही मुठभेड़ हो जाती थी। डकैत तो मारे ही जाते थे, पर पुलिस की भी जन हानि होती थी । उसी ज़िले में एक मुठभेड़ की घटना हुयी। मैनपुरी शहर में ही एक मुठभेड़ हुयी और उस मुठभेड़ करने वाले पुलिस दल का नेतृत्व यही डीएसपी कर रहे थे । यह मुठभेड़ विवादित हो गयी और इसकी शिकायत हुयी । शिकायत पर इसकी जांच सीबीसीआईडी द्वारा की गयी। उनके खिलाफ हत्या का मुक़दमा कायम हुआ । और अदालत में चार्ज शीट भेजी गयी। अदालत में भी इस मुक़दमे में सजा हुयी । अन्य जो भी कर्मचारी उन डीएसपी साहब के साथ इस मुठभेड़ में शामिल हुए उन सब को हत्या का दोषी साबित कर अदालत ने आजीवन कारावास की सजा दी। यह सजा सुप्रीम कोर्ट से भी बहाल रही । और उनका कैरियर जो महज़ तीन साल का ही था, न केवल बरबाद हो गया बल्कि वे जेल में ही मर गए । यह एक प्रतिभाशील अधिकारी का दुःखद अंत था ।

यह एक अकेला उदाहरण नहीं है। चूँकि वे मेरे मित्र थे और जब वे संकट झेल रहे थे तो मैं उनके गृह जनपद में ही नियुक्त था और अक्सर वे जब दुखी होते थे तो मेरे पास आते थे । उनके अलावा मैं ऐसे कई पुलिस इंस्पैक्टरों और सिपाहियों को जानता हूँ , जो फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के मामले में न केवल मुल्ज़िम है बल्कि अपना बहुत कुछ गँवा चुके हैं । यह समस्या उत्तर प्रदेश पुलिस की ही नहीं है बल्कि देश के अन्य प्रांतों की भी है। इशरत जहां के मुठभेड़ के मामले में गुजरात में कई आईपीएस अफसर भी जेल की हवा खा चुके हैं ।मैं इशरत जहाँ के आतंकी होने या न होने के पचड़े में नहीं पड़ रहा हूँ। मैं उस मुठभेड़ के बारे में अपनी बात कह रहा हूँ, जिसे सी बी आई जांच और अदालती कार्यवाही में, फ़र्ज़ी पाया गया है ।

आप की उत्कण्ठा होगी कि मैनपुरी की घटना और गुजरात के इस चर्चित मामले का आज ज़िक्र क्यों किया जा रहा है । दोनों में क्या अंतरसंबंध है। आज जब पीलीभीत के एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मुक़दमे में अदालत ने पुलिस के 47 लोगों को दोषी पाया तो इन सारी घटनाओं में अन्तर्सम्बन्ध दिखाई दिया ।
यह अन्तर्सम्बन्ध है, फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में लोगों की हत्या का । मैं यहॉं जानबूझ कर लोगों शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ । किसी दुर्दांत से दुर्दांत व्यक्ति की भी फ़र्ज़ी मुठभेड़ जिसे साफ़ साफ़ कहें तो, पकड़ कर मार देने की इज़ाज़त क़ानून कभी नहीं देता। साफ़ अर्थों में यह कृत्य बिधि विरुद्ध है और हत्या है ।

पीलीभीत में भी एक घटना हुयी थी, 1991 में । जैसे 1981 के आस पास मैनपुरी दस्यु प्रभावित इलाके में आता था, वैसे ही पीलीभीत भी आतंकवाद से पीड़ित था। उस समय पंजाब में आतंकवाद ज़ोरों पर था और बहुत से खालिस्तान समर्थक गुटों से प्रभावित भी था। पीलीभीत ही नहीं, तराई के वे सभी ज़िले प्रभावित थे, जहां भारत विभाजन के बाद बहुत से सिख परिवार यहाँ बस गए थे और अपनी मेहनत से इन्होंने इस क्षेत्र की काया पलट कर दी थी । उसी साल 10 सिख युवकों की जो नानकमता गुरूद्वारे से लौट रहे थे को पुलिस ने फ़र्ज़ी मुठभेड़ दिखा कर मार दिया और उन्हें सिख आतंकी गिरोहों से जुड़ा घोषित कर दिया । खैर, खून खांसी खुसी कभी छुपती नहीं है और यह खून भी नहीं छुपा। आर एस सोढी जो एक वकील थे ने दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर के इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई की जांच हुयी और 47 पुलिस वालों के खिलाफ चार्ज शीट दी गयी। न्याय ने अपना मुक़ाम कच्छप गति से ही प्राप्त किया पर कल इसका फैसला आया तो न केवल पुलिस की इसी मुठभेड़ पर सवाल खड़ा हुआ बल्कि उन मुठभेड़ों पर भी संदेह के बादल घिर गए, जो सच में आमने सामने और वीरता के साथ हुयी थी। संदेह बड़ा विचित्र भाव है। एक बार किसी भी घटना या व्यक्ति के बारे में उत्पन्न हो गया तो फिर उस घटना और व्यक्ति पर विश्वास जमना लगभग असंभव हो जाता है।

अक्सर सोशल मिडिया और जनता के बीच यह सुनने को मिलता है कि सजा तो होगी नहीं, गवाही कोई देगा नहीं, तो आसान रास्ता यही है कि निपटा दिया जाय । हत्या किसी भी समस्या का सबसे आसान समाधान है । मुक़दमे में किसी अपराधी की गिरफ़्तारी कठिन नहीं होती है । कठिन होती है , उसके अपराध के सम्बन्ध में सुबूतों का इकठ्ठा करना और फिर अदालत को यह विश्वास दिलाना कि , सुबूत तार्किक हैं । लेकिन पुलिस को विवेचना के सारे अधिकार, और प्रशिक्षण इसी लिए तो दिए जाते हैं । हत्या करना न तो पुलिस का काम है और न ही उसे हत्या करने की ट्रेनिंग ही दी जाती है। अगर माफिया या संगठित गिरोह के अपराधियों को सजा नहीं हो पाती तो समय समय पर साक्ष्य अधिनियम और अन्य अभियोजन व्यवस्था की कमियों का निराकरण क़ानून बना कर किया जा सकता है । पुलिस के कंधे पर बन्दूक रख कर , अभियोजन की खामियों के कारण , उसे हत्या करने के लिए उकसाना भी अपराध है ।

मैं अपने विभागीय साथियों से यही कहूँगा कि, क़ानून को लागू करते समय क़ानून के ही मार्ग का अनुसरण उचित है । अन्यथा क़ानून के लंबे हाँथ जैसे संवाद जो हम सब अक्सर बोलते हैं, वे हमारी गर्दन पर भी आ सकते हैं ।

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 2 April 2016

भगवा ध्वज बनाम राष्ट्रीय ध्वज - भैया जी जोशी का तर्क - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

संघ के विचारक भैया जी जोशी का बयान आया है कि भगवा झंडा को राष्ट्रध्वज मानना गलत नहीं है । तिरंगा तो बाद में बना ।

भगवा ध्वज मूलतः धर्म के प्रतीक रंग का ध्वज है। यह रंग मूलतः सन्यासियों का है। हर व्यक्ति सन्यासी नहीं हो सकता था । स्त्रियों को सन्यास ग्रहण करने की अनुमति नहीं थी । आश्रम व्यवस्था की बाध्यताएं जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के पड़ाव से गुज़रती थी, के नियम स्त्रियों पर लागू नहीं होते थे । संन्यास ब्रह्मचर्य आश्रम में भी लिया जा सकता था। आदि शंकराचार्य ने स्वयं 12 वर्ष की अल्पायु में ही संन्यास ले लिया था। संन्यास लेने की भी एक निर्धारित प्रक्रिया और  विधि थी । अपने जीवित रहते हुए ही संन्यास लेने को इच्छुक व्यक्ति द्वारा अपने अंत्येष्टि , जो प्रतीक रूप से ही की जाती थी, कर ली जाती थी । और साथ ही तेरह दिन बाद होने वाला त्रयोदशाह और बरसी भी उसकी हो जाती थी। सन्यासी का इस दुनिया में रखा हुआ नाम और वल्दियत भुला दी जाती थी और संन्यास के बाद एक नया नाम रखा जाता था और वल्दियत में गुरु का नाम होता था । सन्यासी का यह पुनर्जन्म होता था और संन्यास पूर्व के सभी सामाजिक रिश्ते समाप्त हो जाते थे। ऐसे ही सन्यासियों का पहचान के लिए यह रंग विशेष  जो भगवा होता था  निश्चित किया गया है । सनातन धर्म के सन्यासियों का यही रंग उनकी ध्वजा का हो गया । आज भी कुम्भ या जहाँ भी धर्म संगमन आयोजित होता है, यह ध्वजा फहरायी जाती है ।

सनातन धर्म अपने बाद आये हुए सभी धर्मों से अलग है । यह अकेला धर्म है जिसका कोई प्रवर्तक नहीं है, कोई एक पुस्तक नहीं है, कोई एक प्रतीक नहीं है, कोई एक देवता नहीं है और न ही कोई एक पवित्रतम स्थल। सेमेटिक धर्मो  यहूदी, ईसाई और इस्लाम तथा भारतीय धर्म जैन बौद्ध और सिख धर्मों के कोई न कोई प्रवर्तक हैं। सेमेटिक धर्मों में, ओल्ड टेस्टामेंट, न्यू टेस्टामेंट, जो बाइबल के ही अंग हैं और कुरआन अपने अपने धर्मों यहूदी, ईसाई और इस्लाम के सर्वोच्च ग्रन्थ है । इन धर्मों का मानने वाला, कोई भी व्यक्ति हो इन पुस्तकों की सवोच्चता और वैधानिकता पर प्रश्न नहीं उठा सकता है । जब कि सनातन धर्म में आप ईश्वर और धर्म के अस्तित्व पर भी प्रश्न ही नहीं बल्कि उन्हें नकार कर भी रह सकते हैं । जैन और बौद्ध तो निरीश्वर वादी धर्म हैं ही और चार्वाक तो एक अलग ही दर्शन है ।

वेदों को भी अपौरुषेय कहा गया है । पर इस धर्म की कोई एक निश्चित पुस्तक  नहीं है । यह उन प्राकृतिक शक्तियों जिन्हें उनकी उपादेयता के कारण देवता मान लिया गया है, की स्तुतियाँ हैं । कहीं कहीं तत्कालीन इतिहास भी है। जैसे ऋग्वेद के सप्तम मंडल का देवासुर संग्राम । पुराण तो इतिहास की गाथा है ही । उपनिषद दर्शन का श्रोत है और रामायण तथा महाभारत तो साहित्य की कोटि में आते हैं । गीता तो कठिन और द्वंद्व के समय में कैसे उस दुविधा से पार पाया जाय , का एक अद्भुत दर्शन है । इन सभी ग्रंथों को इनमे बिखरे हुए सद्विचारों के कारण हम धार्मिक ग्रन्थ मान लेते हैं । पर यह नहीं कहा जा सकता कि अमुक ग्रन्थ ही सर्वोच्च है । वेद चूँकि सृष्टि की सबसे प्राचीन ग्रन्थ परम्परा है अतः उसका महत्व सबसे अधिक है ।

आर एस एस के भैया जी जोशी, जिस भगवा ध्वज की बात करते हैं वह आर एस एस द्वारा अंगीकृत किया हुआ भगवा ध्वज है । यह ध्वज दो मुंहा होता है और इसे अग्नि ज्वाल कहते हैं । यह ध्वज शिवाजी जिन्हें हिन्दू पद पादशाही का प्रतीक समझा जाता है वहाँ से लिया गया है । शिवाजी ने औरंगज़ेब को कड़ी चुनौती दी और वर्तमान महाराष्ट्र के काफी बड़े भूभाग पर अपना राज्य स्थापित किया । उनके राज्य की व्यवस्था अष्ठ प्रधान संभालते थे और उनका प्रमुख पेशवा होता था । यह परंपरागत प्राचीन राज्य व्यवस्था जहां राजा तो क्षत्रिय होता था पर उसका महामंत्री ब्राहण होता था के ही अनुरूप था। ब्राह्मण राजा नहीं हो सकता था , चाहे वह कितना भी सबल और प्रभावी हो जाय । पेशवा के नेतृत्व में दक्षिण से मराठा साम्राज्य का विस्तार उत्तर तक हुआ पर 1761 के अंतिम पानीपत के युद्ध में मराठा फौजों की हार हुयी और फिर तो देश को एक नये प्रकार के साम्राज्यवाद से रू ब रू होना था, जो घोड़ों की पीठ पर तलवार ले कर नहीं बल्कि, सागर पार से तिज़ारती शातिरपने से भरा हुआ था। वह था ब्रिटिश साम्राज्यवाद ।

आर एस एस की विरासत मराठा राज्य की विरासत रही है । शिवाजी के हिन्दू पदपादशाही के ही सिद्धांत को इसने अंगीकार किया और विराट हिन्दू वांग्मय और परम्परा से , सनातन धर्म के एक नए रूप को आसुत किया जिसका नाम दिया गया हिंदुत्व। 1857 के विप्लव को अँगरेज़ कभी भूल नहीं सकते थे । अगर उस विप्लव के समय गुरखे, सिख और मराठों के सिंधिया ,होलकर आदि साथ आ गए होते तो इतिहास किसी और राह पर चल पड़ता। पर इतिहास के साथ ऐसा नहीं होता है । अंग्रेजों ने एक रणनीति के अंतर्गत कभी मुस्लिमों को तो कभी मुस्लिम विरोध में हिन्दू संगठनों को खड़ा किया । कांग्रेस जो इनकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थी को इन्होंने कभी मुस्लिम लीग से लड़ाया तो कभी इनके खिलाफ हिन्दू संघटनों हिन्दू महासभा और आर एस एस को खड़ा किया । इसी लिए जब आज़ादी के लिए अंतिम संघर्ष 1942 में भारत छोडो आंदोलन के रूप में प्रारम्भ हुआ तो , उस समय मुस्लिम लीग और आर एस एस तथा हिन्दू महासभा ने अंग्रेजों का साथ दिया । दो विपरीत ध्रुव एक साथ खड़े हैं जो इस सिद्धांत का ही प्रतिपादन करते हैं कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता है और यह संभावनाओं का खेल है । इस साथ देने के एवज़ में मुस्लिम लीग को तो पाकिस्तान मिला पर हिन्दू महासभा और आर एस एस , वह नहीं पा सके जो ये चाहते थे । क्यों कि कांग्रेस शुरू से ही धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत चाहती थी, और अँगरेज़ कांग्रेस को ही देश का प्रतिनिधि मानते थे । गांधी से आर एस एस की यही खुन्नस है । जनता में आर एस एस या बाद में बने इसके राजनीतिक अवतार भारतीय जनसंघ को जनता का कोई समर्थन न तो आज़ादी के संघर्ष के दौरान प्राप्त था और न ही आज़ादी के बाद ही। आर एस एस ने या तो भारतीय परम्परा और संस्कृति के बहुलतावादी स्वरुप को समझा ही नहीं या समझने की कोशिश नहीं की  ।

भैया जी जोशी इसी ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के बराबर मानते हैं । राष्ट्रीय ध्वज के विकास का इतिहास देखेंगे तो पाएंगे कि वर्तमान ध्वज , कभी कांग्रेस का झंडा जिसमे चरखा बना था से ही लिया गया है । रंगों का अर्थ किसी सम्प्रदाय या धर्म की और इंगित नहीं करता है वरन् उसकी अलग ही व्याख्या है । केसरिया रंग शौर्य और बलिदान का प्रतीक, सफ़ेद रंग शान्ति का तो, हरा रंग शस्य श्यामला का प्रतीक है । चक्र जिसमे 24 तीलियाँ होती हैं  , प्रगति और निरंतर गतिमान रहने का प्रतीक है । आप इसकी व्याख्या चरैवेति चरैवेति से भी कर सकते हैं । वैसे यह सम्राट अशोक के मशहूर चार सिंह के स्तम्भ के नीचे बने चक्र से लिया गया है । इस तिरंगे को देश के संविधान के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता दी गयी है । इसके आरोहण और उतारने की एक निश्चित ड्रिल और बिगुल ध्वनि होती है । इसका अपमान करने वालों को दण्डित करने का भी प्राविधान भी है । पर भगवा ध्वज एक संगठन का ध्वज है जिसका भारत के वर्तमान स्वरुप में कोई भी योगदान नहीं हैं । अगर जिन्ना ने मुस्लिम लीग के लिए पागलपन भरा उन्माद न दिखाया होता तो  आर एस एस और हिन्दू महा सभा एक अल्पज्ञात संगठन ही बना रहता । भारत के बंटवारे और तत्समय हुए भयानक दंगे जो पाकिस्तान के अंदर एकतरफा हुए और जिन्हें वहाँ रोकने वाला कोई नहीं था ने , की स्वाभाविक और व्यापक प्रतिक्रिया भारत में हुयी। परिणामस्वरूप एक वर्ग यह तर्क देने लगा कि जब मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बना तो  भारत या हिन्दुस्तान जिसे वे बेहद चालाकी से हिन्दुस्थान कहते हैं, को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जाना चाहिये । यह कुछ नहीं बल्कि जिन्ना के दिमाग की उपज द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के सिक्के का दूसरा पहलु ही था ।

सभी राजनीतिक दलों और संगठनों के अपने अपने ध्वज होते हैं । सबको अपनी अपनी रूचि के अनुसार ध्वज डिजाइन करने और उनकी व्याख्या करने का अधिकार है । आर एस एस भी इस अधिकार के अंतर्गत अपना ध्वज भगवा रखने के लिए स्वतंत्र है।  पर उस भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज जैसा सम्मान या उसके बराबर माना जाय यह सर्वथा अनुचित और यह नॅशनल ऑनर एक्ट के अंतर्गत दंडनीय अपराध भी है ।

( विजय शंकर सिंह )