Friday, 6 November 2015

A Poem - Our Generation....


This poem by a US teenager which was posted on Twitter by his older brother.  Derek Nichols, from North Carolina wrote on Twitter:
"Read this... My 14 year old brother wrote this...Crazyyyy,"
And then tweeted a picture of the poem written out on a sheet of paper. In a month, over 150,000 likes and almost an equal number of retweets on twitter - this 25-line verse has a completely different meaning from the top-to-bottom version when read in reverse. 



Our generation will be known for nothing.
Never will anybody say,
We were the peak of mankind.
That is wrong, the truth is
Our generation was a failure.
Thinking that
We actually succeeded
Is a waste. And we know
Living only for money and power
Is the way to go.
Being loving, respectful, and kind
Is a dumb thing to do.
Forgetting about that time,
Will not be easy, but we will try.
Changing our world for the better
Is something we never did.
Giving up
Was how we handled our problems.
Working hard
Was a joke.
We knew that
People thought we couldn't come back
That might be true,
Unless we turn things around

(And now read this bottom to top)





Thursday, 5 November 2015

शाहरुख खान का प्रकरण और असहिष्णुता - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह


बरसों पहले  एक फ़िल्म आई थी.  ‘वीर जारा’ . उसमें  पाकिस्तानी मां की भूमिका अदा करने वाली कलाकार थीं किरण खेर , जो अनुपम खेर की पत्नी हैं और अब भाजपा से सांसद हैं . शाहरुख़ खान उस फ़िल्म में हीरो थे, और किरण खेर ने उनकी माँ की भूमिका उस फ़िल्म में निभाई थी. किरण खेर फिल्म में  शाहरुख खान से पूछती हैं-
‘क्या भारत का हर बेटा तुम्हारे जैसा होता है?’
एक जज़्बाती उत्तर , फिल्म में शाहरुख एक देते हैं-
‘यह तो नहीं मालूम, लेकिन हर मां आप जैसी होती है.’
यह संवाद तो स्क्रिप्ट और कहानी की मज़बूरी है, लेकिन याद दिलाता है कि ज़िंदगी में भी रिश्तों की सरहद बहुत बड़ी होती है, वह राजनीति के भूगोल को नहीं पहचानती, वह राजनेताओं, तथाकथित धर्मगुरुओं और सांप्रदायिक संगठनों की नफ़रत के आगे जाती है. इसी फिल्मी दुनिया में साहिर जैसा शायर लिख पाता है-
तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, 
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा, 
और शैलेंद्र कह सकते हैं कि
‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, 
मिल सके तो ले किसी का दर्द उधार, 
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, 
जीना इसी का नाम है.‘ 
बंटवारे और भारत पाक संबंधों पर बनी फिल्में बहुत लोकप्रिय होती है. गरम हवा से ले कर बजरंगी भाई जान सभी फिल्मों ने लोकप्रियता पाई है. कुछ फिल्में तो पाक प्रायोजित आतंकवाद, भारत पाक युद्धों पर, जैसे बॉर्डर, एल ओ सी , थीं  पर बनी, बहुत ही लोकप्रिय हुईं, पर परस्पर मानवीय संबंधों को गहरे छूते हुयी फिल्मों ने भी बॉक्स ऑफिस पर कम नाम नहीं कमाया है. 

बहुत सारे लोगों के लिए जीना इसी का नाम नहीं है. इंसान को हिंदू-मुसलमान बनाए बिना, हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बताए बिना उनको चैन नहीं पड़ता, उनकी राजनीति का पेट नहीं भरता. इन दिनों शाहरुख खान ऐसे ही लोगों के निशाने पर हैं. भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि ,
" शाहरुख खान का दिल भारत के लिए नहीं, पाकिस्तान के लिए धड़कता है. वे यहां करोड़ों कमाते हैं, यहीं रहते हैं, लेकिन मन उनका पाकिस्तान में रमता है. "
हालांकि यह ट्वीट उन्होंने  वापस भी ले लिया . भाजपा ने भी उनके बयान से किनारा कर लिया , पर विजयवर्गीय ने अपनी मानसिकता का परिचय दे दिया. इस से जो हानि और विवाद होना था वह हो भी गया. शाहरुख़ खान ने बस यह मान लिया है कि ,
" इस देश में फिलहाल असहिष्णुता बढ़ रही है, कि पुरस्कार लौटाने वालों ने जो हिम्मत दिखाई है, उसके लिए उनका सम्मान होना चाहिए और अगर उनके सम्मान लौटाने से कोई फर्क पड़ता है तो वे भी यह सम्मान लौटाने को तैयार हैं. "
आखिर यह कौन सा पाकिस्तान है जो भाजपा की मानसिकता में इस हद तक धंसा हुआ है, कि उसके नेताओं को और कोई मुल्क जंचता भी नहीं. 
भाजपा और उसके सहयोगियों ने पिछले दिनों सामान्य शिष्टाचार से लेकर सांस्कृतिक साझेदारी तक के कितने तार तोड़ने की कोशिश की है. किसी के चेहरे पर स्याही पोतना एक तरह का हिंसक प्रतिरोध ही है जिसमें अपमानित करने का भाव शामिल रहता है और जिसे कहीं से सभ्यता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. लेकिन मुंबई में सुधींद्र कुलकर्णी के साथ और दिल्ली में इंजीनियर राशिद के साथ भाजपा की दो सहयोगी सेनाओं- शिवसेना और हिंदू सेना ने यही किया. इन शिवसैनिकों को उद्धव ठाकरे ने घर बुलाकर सम्मानित किया- यह भी भाजपा देखती रही. शिवसेना की धमकी पर गुलाम अली जैसे गायक का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया. यह वही शिवसेना है जिसने बरसों पहले दिलीप कुमार को पाकिस्तानी करार दिया था.
दरअसल यह पाकिस्तान बाघा बॉर्डर के पार नहीं बल्कि,  शिवसेना के दिमाग में बसता है, भाजपा की प्रतिशोधी चेतना में बसता है, उसके राष्ट्र निर्माण ( ? ) की परियोजना में बसता है और एक हानिकारक वायरस की तरह उपस्थित रहता है. अज़ीब मानसिकता है, जिसने भी मोदी का विरोध किया, उनके वादों की याद दिलाई, संघ के एजेंडे से असहमति दिखाई , भाजपा का विरोध किया,  वह देशद्रोही घोषित हो गया. हम क्या मध्ययुगीन राजतंत्र में रह रहे हसीन या हज़ारों साल की संगच्छद्वम की अमर विरासत समेटे  एक लोकतांत्रिक देश में ? विरोध करने वाला अगर वह मुस्लिम  हुआ तो अनिवार्यतः पाकिस्तानी हो जाता है. संस्कार की बात बात में बात करने वाले कुसंस्कारियों का यह कैसा गिरोह है, जिन्हें केवल अपशब्द और अतार्किक बात ही समझ आती है. भाजपा पाकिस्तान का विरोध भी करती है और हिंदुस्तान को उसी तरह का बनाने पर तुली भी हुई है.
पुस्तक का जवाब पुस्तक होना चाहिए . विचारधारा का सामना विचारधारा से किया जाना चाहिए।  कालिख और गालियों से नहीं। नहीं। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री अगर कोई पुस्तक लिखेंगे तो , निशचय ही उसका झुकाव पाकिस्तान की और ही रहेगा। वह कभी भी समसामयिक इतिहास के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। यद कीजिये , जनरल परवेज़ मुशर्रफ का बयान , जब वे आगरा शिखर वार्ता के लिए आये थे और जब उनसे एक पत्रकार ने कश्मीर के मुद्दे के बारे में यह पूछा कि , कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान के लिए इतना अहम क्यों है ? मुशर्रफ ने जवाब दिया , अगर मैं यह मुद्दा छोड़ दूंगा तो फिर से मुझे पुरानी दिल्ली की उसी हवेली में रहना होगा जहां मैं पैदा हुआ था। ज्ञातव्य है कि परवेज़ मुशर्रफ का जन्म , पुरानी दिल्ली की ही एक हवेली में हुआ था। प्रश्न गंभीर था, पर उसका उत्तर भी परिहास से आवृत्त पर उतना ही गंभीर था. पाकिस्तान का एजेंडा कश्मीर ही नहीं है, पाकिस्तान का एजेंडा भारत को तोडना है. इसे बिखेर देना है. भारत के अंदर एक ऐसी परिस्थिति वे चाहते है जिस से देश के भीतर का साम्प्रदायिक सद्भाव छिन्न भिन्न हो और समाज एक ऐसे पड़ाव पर पहुँच जाए जहां यह लगे कि दोनों साथ साथ नहीं रह सकते हैं और तब बिखरने की एक नयी प्रक्रिया शुरू हो. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है. पर देश तो अस्थिर होगा ही और विकास भी बाधित होगा. आज जो स्थित पाकिस्तान की है वैसी स्थिति भारत में कभी नहीं आये ऐसी संभावना से बचना चाहिए. 
एक-दूसरे की कट्टरता या एक-दूसरे के बड़बोलेपन की नकल करके हुक्मरान सिर्फ अपने लिए एक कवच जुटाते हैं और अपनी जनता को कुछ और असुरक्षित छोड़ जाते हैं. हम यह उम्मीद करें कि, राष्ट्रवाद का अतीत बन चुका , फासिस्ट रोग, अंततः दूर होगा, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की नकली , दिमाग में बसी अवधारणाएं समाप्त होंगी.

Tuesday, 3 November 2015

Policing the Kitchen. Whether permissible under the Delhi Agricultural Cattle Preservation Act, 1994 ? By: Raghenth Basant | November 2, 2015.

Cow slaughter has always been a controversial topic in India. Many states have passed laws banning cow slaughter and such laws have been challenged before the Supreme Court of India. Article 48 of the Constitution of India, which forms part of the Directive Principles of State Policy states that the State shall take steps for prohibiting the slaughter of cows and calves and other milch and draught cattle. The Supreme Court of India as early as in 1959 in Mohammed Hanif Quareshi’s case upheld the laws banning cow slaughter. However, in the said judgment it was held that laws mandating a total ban on the slaughter of she buffaloes or breeding bulls or working bullocks (cattles or buffaloes) after they cease to be capable of yielding milk or of breeding or working as draught animals is not reasonable. However, subsequently in the year 2005, the Supreme Court in Mirzapur Moti’s case overruled Quareshi’s case on this aspect and held that even laws prohibiting slaughter of categories exempted by Quareshi is constitutionally valid. The correctness of these judgments are not being addressed here.
The recent controversy over the Delhi Police personnel entering Kerala House on a complaint being received that the canteen at Kerala House is serving cow meat has shocked the conscience of a lot of people. To understand the illegality on the part of the Delhi Police, one needs to examine the legal provisions governing the field. The Delhi legislature enacted the Delhi Agricultural Cattle Preservation Act, 1994 as far back as 1994. Agricultural cattle under the Act include cows, calves of cows, bulls and bullocks. Notably, buffalo is not included in the definition of agricultural cattle. Section 4 of the said Act prohibits slaughter of agricultural cattle. Under Section 5 of the said Act, transport or export of agricultural cattle for slaughter has been prohibited. Section 7 prohibits the sale and purchase of agricultural cattle for slaughter. Section 8 prohibits possession of flesh of agricultural cattle. Interestingly, Section 9 prohibits possession of flesh of agricultural cattle slaughtered outside Delhi. As per Section 12 of the said Act, any person contravening Sections 4,5 and 7 can be sent to jail for 5 years. Any person contravening Sections 8 and 9 can be sent to jail for one year.

The ordinary principle in criminal law is that the burden is on the prosecution to prove that the accused has committed an offence. However, Section 14 mandates that the burden is on the accused to prove that he has not committed an offence under the Act. Further, the offences under the Act are non bailable. The reverse burden of proof together with the offence being non bailable makes the said Act absolutely draconian.
Section 11(1) and 11(2) permits the Director, Animal Husbandry or the Veterinary Officer to enter and inspect any premises where they suspect that an offence has been committed. However, under Sections 11(4)(a) and 11(4)(b) police has been given the power of entry, search and seizure only in the following circumstances;
When any vehicle is used for the export of agricultural cattleWhen the police officer suspects that an offence has been committed with respect to any agricultural cattle, then the agricultural cattle along with the vehicle can be seized

A mere perusal of Section 11 makes it clear that the power of the police is essentially with respect to search and seizure when agricultural cattle are being transported in a vehicle for the purpose of slaughter. The power to enter a person’s kitchen on suspicion of an offence having been committed is a draconian provision and the legislature has consciously not given that power to the police. That power, as stated earlier, has been vested with the Director, Animal Husbandry or the Veterinary Officer.

Another aspect that is draconian is that under Section 9, possession of the flesh of agricultural cattle which is slaughtered outside Delhi has been made an offence. So, if someone carries beef from Kerala to Delhi, he can be arrested and put in jail for one year even though in Kerala there is no ban on cow slaughter. So what was not an offence when the person started his journey from Kerala will suddenly become an offence when he steps into Delhi! A similar provision was introduced in Maharashtra in the year 1995 by way of an amendment to Maharashtra Animal Preservation Act, 1976. The said amendment received the assent of the President only in the year 2015. The constitutionality of the said amendment was challenged before the Bombay High Court and the Bombay High Court has recently passed an interim order restraining the State from taking coercive steps against persons possessing beef till the time the case is decided finally by the High Court. Maharashtra and Delhi are the only two states where even possession of beef slaughtered outside the State has been made an offence.
Section 9 has in effect made the import of beef into Delhi an offence and as a necessary corollary has made consumption of beef an offence. An important question arises whether such a provision violates Article 21 of the Constitution of India. Such a law can arguably be also violative of Article 301 which provides for freedom of trade commerce and movement within the territory of India. What has been upheld by the Supreme Court is the law banning cow slaughter. However, the constitutionality of any law prohibiting import of beef or consumption of beef has not yet been tested in any Court of law. Therefore, Section 9 of the Delhi Act is violative of the right to life, which includes right to eat which has been upheld by the Apex Court in several cases. The Apex Court in Hinsa Virodhak Sangh’s case has gone on to hold that what one eats is one’s personal affair and it is a part of his right to privacy which is included in Article 21 of our Constitution. Assume a situation where all the States in India pass a law banning cow slaughter. In such a situation, if a person travels abroad and brings back beef for consumption in India, can the State enact a law stating that such a person can be put behind bars? According to me, that cannot be done and such a law would be violative of Article 21.

There is no doubt that the Delhi Act is draconian and many provisions border on absurdity. Any law which makes the eating habits of an individual a criminal offence has to be viewed with circumspection. The action of the Delhi police is illegal and also smacks of lack of propriety. The action of the Delhi police in rushing to Kerala House with a large number of personnel was unwarranted to say the least. The Delhi Police should know better that the Kerala House is the citadel of the Kerala Government in Delhi. If this can happen to an institution as important as Kerala House, one can only imagine what can happen to an ordinary citizen. The day is not far when police starts entering the kitchen of unsuspecting citizens. One only hopes that the same alacrity is shown by the Delhi Police when crime after crime is being committed in Delhi against women and children.

अथ श्री लंगोट कथा - बहुक़्म तोगड़िया जी / विजय शंकर सिंह



विश्व हिन्दू परिषद के एक बड़े नेता , डॉ तोगड़िया सर , एक अवतारी पुरुष हैं. इनका आकलन हम अभी नहीं कर पाएंगे. समसामयिक व्यकित्व के आकलन करने में बहुत दिक्कतें आती हैं. आग है उनमे. आग। बोलते हैं तो फेचकुर भी फेंक हैं कभी कभी। चेहरा भी दमकता है. उनसे वार्तालाप करने का अवसर भी मुझसे मिल चुका है। . हरिद्वार में 2010 के कुम्भ के दौरान वह आये थे और वहाँ के वी आई पी घाट पर उनसे सत्संग हुआ था. गंगा स्नान कर के वह मन्त्र जाप कर रहे थे. तभी उनसे मेरी बात हुयी. इस संस्मरण पर फिर कभी. अभी तो आप लंगोट पर आइये . अभी तक तो मुल्लों और धर्म के नाम पर साम्राज्य फैलाने वाले बादशाहों के मुंह से ही इस्लाम खतरे में है, का नारा सुना था मैंने. अब सुन रहा हूँ , हिंदुत्व संकट में है, संस्कृति संकट में है, और राष्ट्र संकट में है . भीड़ से उठता हुआ शोर भीड़ के दुहराने से तेज़ तो होता है पर रहता है अस्पष्ट ही . और जब भीड़ बिखरती है तो , वह शब्द भी खोखला हो जाता है। यह इस्लाम का प्रभाव है या संकट की पदचाप या राज्य करने की कुछ की रणनीति, इस पर विचार विमर्श चलता रहेगा. पर संस्कृतियों और समाज के संसर्ग से विचार , अच्छे हों या बुरे, एक दूसरे को प्रभावित तो करते ही है. किस का , किस पर, किस तरह, किस समय, कितना प्रभाव पड़ा, यह मध्ययुगीन इतिहास के पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है. लेकिन धर्म पर भी यह प्रभाव गया है। उस पर भी फिर कभी चर्चा होगी. अभी तो आप लंगोट पर आइये ! तोगड़िया जी ने अभी एल बयान में कहा है कि हिंदुओं को लंगोट पहनना चाहिए. इस परिधान का कोई शास्त्रीय प्राविधान है या नहीं यह तो हमारे त्राता तोगड़िया सर ही बताएँगे. पर उन्होंने भी एक फतवा, हुक्मनामा, जारी किया है कि सभी हिन्दू लंगोट पहनें. सनातन धर्म में फतवा या हुक्मनामा का कोई प्राविधान मुझे तो अभी तक नहीं मिला कहीं. हो सकता है तोगड़िया सर को वह प्राविधान ज्ञात हो. पर अब इस प्रकार की शंका समाधान की परम्परा जिसने उपनिषदों जैसी दिव्य ज्योतित विचार श्रृंखला दी है , का वक़्त नहीं रहा. वक़्त अब बदल रहा है. पूछो मत, नहीं तो समझौता एक्सप्रेस में ही नज़र आओगे. तो पूछताछ बंद. सवाल जवाब बंद . आर टी आई बंद. लिखना पढ़ना बंद . कह दिया लंगोट पहनो तो , चुप चाप पहन लो। आखिर लज्जा तो ढंकनी ही है। और कुछ जिज्ञासा हो तो , उसे डालिये भरसाईं में, पर अभी तो आप लंगोट पर आइये.

यह चित्र एक सुन्दर महिला का है। महिलाओं का सौंदर्य सदैव और सबको आकर्षित करता रहा है. आगे भी करता रहेगा. जो खुद को अत्यंत संस्कारी दिखाते हुए नारी में मातृ और भगिनी भाव खोजते हैं ,, उन्हें भी नारी सौंदर्य आकर्षित करता है. पर वह संस्कृति के रक्षा भार का गुरुतर दायित्व संभाले रहते हैं तो, वह सौंदर्य दर्शन जनित प्रतिक्रिया का दमन भी कर लेते हैं. इस सुन्दर और आकर्षक महिला ने एक लंगोट उठा रहा है. वह इसका प्रचार कर रही है बाज़ारवाद का भी एक अज़ीब गणित है. महिलायें वह सब प्रचारित करती हैं जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करती. नारी मुक्ति के पैरोकार इसे नारी शोषण, संस्कृति के पहरेदार इसे संस्कृति का प्रदूषण, और ऐड गुरु इसे बाज़ार का आकर्षण ही कहेंगे. पर यह सच तो यह है कि महिला के हाँथ में थामा हुआ लंगोट, बरबस सिगमंड फ्रायड की याद दिला देता है,. प्रचार, विज्ञापन, नारी शक्ति, नारी मुक्ति और संस्कृति पर फिर कभी बात करेंगे. अभी आप तो लंगोट पर आइये ! लंगोट का आविष्कार आदम और हव्वा के समय हुआ था. हालांकि यह पुराकथा सेमेटिक धर्मों की है. भारतीय परम्परा के धर्मों की नहीं . खुद के नग्न होने का संज्ञान होते ही जिस वृक्ष के पत्ते से दोनों ने अपने गुप्तांग ढंके होंगे , वह संभवतः पहला वस्त्र रहा होगा. तो यह गुप्तांग ढंकने का पहला उदाहरण मिलता है। मेरी राय में पहली बार लंगोट का जन्म हुआ. फिर तो दुनिया बनी. जैसे जैसे सभ्यता का विकास हुआ और ज्ञान का आलोक फैला , तो कुछ मौसम के कारण तो कुछ लज्जा के कारण वस्त्रों में नये प्रयोग हये , जिसे वस्त्रकला के इतिहास के रूप में आप पढ़ सकते हैं. टेक्सटाइल विज्ञान और कला के इतिहास में , इसे पढ़ाया जाता है। आप की रूचि हो तो इसका अध्ययन भी कर सकते हैं। अभी इस पर कोई पाबंदी नहीं लगी है। इतिहास का यह पक्ष अक्सर कम ही पढ़ाया जाता है. हम सब ताजमहल और तेजोमहालय के झगडे ही पढ़ते रहते हैं. सिलेबस में भी यही है. इस पर फिर कभी , अभी तो आप लंगोट पर आइये ! मैं वाराणसी का रहने वाला हूँ. यह तो आब ओ दाना है कि कानपुर में आ बसा हूँ. पर बनारस , मुझे , यही नाम अधिक जंचता है, जब भी जाता हूँ तो वहाँ से आने का मन कम ही करता है. बनारस की कल्पना गंगा के बिना नहीं की जा सकती है, और गंगा के किनारे आदि केशव से ले कर असी तक पक्के घाटों की जो परम्परा है वह अद्भुत है. इन घाटों पर कभी सुबह सुबह जाइए तो आप को अब भी लंगोट पहने मालिश कराते, मुगदर , जोड़ी भांजते , लोग मिल जाएंगे. लेकिन यह नज़ारा दशाश्वमेध घाट पर नहीं बल्कि पंचगंगा आदि घाट जो मणिकर्णिका घाट से गंगा के प्रवाह की दिशा में हैं, पर देखने को मिलेगा. मैंने अपने बचपन में लाल गमछे और लंगोट में बनारस के सभ्रांत वर्ग को भी एक हाँथ में एक लोटे के साथ प्रसन्न बदन , हर हर महादेव करते हुए जाते, देखा है. दो गमछों और एक लंगोट से अधिक कुछ भी नहीं.रहता है उनके पास। एक गमछा , कंधे पर और एक कमर में बंधा रहता था यह बनारस के मस्त और निर्द्वन्द्व मानसिकता का परिचायक भी है। . एक बार वाराणसी के जिला मैजिस्ट्रेट थे भूरे लाल. तब मेरा चयन पी पी एस में हो चुका था , पर ट्रेनिंग में नहीं गया था.. वे बहुत तेज़ तर्रार अधिकारी थे। उन्होंने एक दिन सुबह सुबह घाटों का निरीक्षण किया तो उन्हें लंगोटधारी स्नानार्थी भी दिखे. वे रहने वाले हरियाणा के थे। . उन्हें यह बहुत नागवार और अश्लील लगा. उन्होंने इस पर प्रतिबन्ध लगाने की सोची. पुलिस तो अक्सर सब काम करती है, भले उसका असली काम पीछे छूट जाए. सिपाही घाट घाट घूम घूम कर लंगोटधारियों की टोकाटाकी करने लगे. थोड़ी बहुत उत्कोच की भी शिकायतें मिलने लगी. फिर जनता में रोष हुआ और लोग लामबंद हो गए. शहर में चौक से गोदौलिया होते हुए दशाश्वमेध तक कुछ लोगों का जुलूस निकला, जो लंगोट बांधे, एक गमछा कमर में और एक कंधे पर रखे, बिलकुल शिव की बरात की तरह, ' कोउ मुख हीन, विपुल मुख काहू,' की तर्ज़ पर यह जुलूस, दशाश्वमेध घाट गया और वहाँ स्नान कर के , फिर बाबा विश्वनाथ के दरबार में जा कर उन्हें सारी समस्या से अवगत करा कर ,विसर्जित हो गया. शिव तो खुद ही अल्प वस्त्र धारी है. फिर तो बनारस फिर अपने रंग में आ गया. डी एम साहब का फरमान , बस्ता ए खामोशी में दफ़न हो गया. तोगड़िया , आज लंगोट पर आये हैं . और कंपनियां भी कल डिजायनर लंगोट ले कर आ जाएंगी. जितना आर एन्ड डी विभाग विश्व हिन्दू परिषद का तेज़ है , उतना ही कंपनियों का भी है . देखिये बाज़ार में सिली सिलाई धोती मिलने लगी हैं. लंगोट का हिंदुत्व से कोई सम्बन्ध है या नही यह मुझे नहीं मालूम. तोगड़िया सर से पूछने का मतलब पाकिस्तान ही जाना होता है। फिलहाल तो बनारस जाने का मूड है. ( विजय शंकर सिंह )

Monday, 2 November 2015

31 अक्टूबर 84 , विनम्र स्मरण , इंदिरा गांधी / विजय शंकर सिंह



1984 का आज का ही दिन था. 31 अक्टूबर. मैं चुनार में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर नियुक्त था. चुनार क्षेत्र में एक थाना आता है, अदलहाट. इस थाने के एक गाँव , कोलना में , सरदार पटेल के नाम पर एक विद्यालय है. वहाँ के विधायक थे राज नारायण सिंह.वह उसी गाँव के रहने वाले थे, और विद्यालय के प्रबंधक थे. हर साल वह 31 अक्टूबर को पटेल जयन्ती पर विद्यालय में एक उत्सव आयोजित करते थे. इस बार का आयोजन थोडा विशिष्ट था. सरदार पटेल की एक मूर्ति बनी थी, उसके अनावरण का दिन 31 अक्टूबर को रखा गया था. मूर्ति के अनावरण के लिये, उत्तर प्रदेश के मंत्री स्वर्गीय लोकपति त्रिपाठी को आना था. विधायक जी भी कांग्रेसी थे. मंत्री जी को हेलीकाप्टर से ही आना था. गाँव में अतिथि से अधिक अतिथि के वाहन का चार्म होता है. हेलीकाप्टर तो वैसे भी भीड़ खींचता है. और देवदूत आकाश से ही उतरते हैं !



कार्यक्रम दोपहर 11 बजे का था. मैं सुबह 9 बजे पहुँच गया था. सारी व्यवस्थाएं हो गयी थी. मेरे सहयोगी एस डी एम, गणेश शंकर त्रिपाठी थे. वह मिर्ज़ापुर शहर में रहते थे. मैं चुनार में ही रहता था. आवास मुझे मिला नहीं था तो, मैं चुनार के किले में स्थित डाक बंगले में रहता था. चुनार के एस डी एम एक डी डी वर्मा थे, जिनके अवकाश पर रहने के कारण , गणेश जी मेरे साथ थे. 11 बजा. 12 बजा. विधायक जी ने कहा कि ज़रा मंत्री जी का लोकेशन लीजिये. संचार की उतनी सुलभता नहीं थी, जितनी आज है. संचार का एक ही माध्यम था गाड़ी में लगा हुआ वायरलेस सेट, जो थाने के माध्यम से जिला कण्ट्रोल रूम से जुड़ा था. ज़िला मुख्यालय को भी कोई सूचना नहीं मिल रही थी. वह " जैसे ही कोई इत्तला मिलेगी , आप को बता दी जायेगी " का एक सन्देश दुहरा रहा था. 1 बजे सूचना मिली कि मंत्री जी का कार्यक्रम स्थगित हो गया और वह मुख्य मंत्री के साथ दिल्ली निकल गए हैं. कोलना का उनका कार्यक्रम निरस्त कर दिया गया है.



अब अटकलों का दौर शुरू हुआ. पर किसी को कोई सूचना नहीं थी. आने वाली आपदा का लेश मात्र भी भान किसी को नहीं था. उत्सव स्थल पर देशभक्ति के गीत बज रहे थे. मूर्ति का अनावरण एक बुज़ुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से करा दिया गया था. ड्यूटियां समाप्त कर दी गयीं. हम लोग भी वहाँ से अपने अपने घर दफ्तर के लिए रवाना हुए. वायरलेस से ही गणेश जी एस डी एम जो मिर्ज़ापुर में थे को बता दिया कि अब आने की ज़रुरत नहीं है. उनको भी तब एक कुछ पता नहीं था. थोड़ी देर तक घूमते फिरते जब मैं चुनार पहुंचा तो पता लगा कि दिल्ली में इंदिरा गांधी को गोली मार दी गयी है और वह एम्स में हैं. मृत्यु की कोई पुष्टि नहीं कर रहा था. रेडियो समाचारों का एक माध्यम था. पर उस पर भी कोई सूचना नहीं थी. शाम तक इस वज्रपात का पता चला कि वह नहीं रहीं. तब तक पूरा विवरण नहीं था. 8 बजे की बुलेटिन में सूचना मिली कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधान मंत्री की शपथ दिला दी है. इंदिरा गांधी के निधन की आधिकारिक घोषणा हो चुकी थी. वह अब दिवंगत थी.
नियति कैसे मंच पर अकस्मात अंक परिवर्तित करती है. यह उसका एक उदाहरण है.



देश की अत्यंत प्रतिभावान प्रधानमंत्री , जो विवादित और निन्दित भी कम नहीं रही हैं को , उनके शहादत पर विनम्र श्रद्धांजलि.

( विजय शंकर सिंह )

31 अक्टूबर, सरदार पटेल की जयन्ती पर, विनम्र स्मरण / विजय शंकर सिंह



अक्सर एक काल्पनिक प्रश्न उछाल दिया जाता है, हम सब के सामने कि, सरदार पटेल अगर नेहरू के स्थान पर देश के प्रधान मंत्री होते तो देश की तस्वीर ही अलग होती. इसका उत्तर क्या होगा, यह तो मुझे नहीं पता, पर यह हो नहीं पाया. और सरदार पटेल के किसी भी बयान और अभिलेख से यह ज्ञात नहीं होता है कि उनके दिल में इस बात का मलाल था. बारदोली में सफलता पूर्वक किसान आन्दोलन चलाने से ख्याति प्राप्त करने के कारण, गांधी ने उन्हें सरदार कहा था, और वे सच में, देश के अत्यंत संकटकालीन दौर में सरदार की ही तरह , सरदार की भूमिका में नज़र आये. उन्होंने देसी रियासतों का विलय जिस अदम्य इच्छा शक्ति से कराया वह अभूतपूर्व था. संभवतः नेहरू अपनी तमाम मेधा और लोकप्रियता के यह कार्य संपन्न नहीं कर पाते. पर सरदार ने इसे संपन्न कराया.

गांधी की हत्या पर आर एस एस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. हालांकि आर एस एस ने खुद को गोडसे से अलग कर दिया था.
पर गोडसे और आर एस एस के सम्बन्ध जग जाहिर हो गए थे. पटेल के इस कदम पर कहा जाता है कि उन्होंने यह कदम नेहरू के परामर्श पर उठाया था. निश्चित रूप से यह मंत्रिमंडल का सामूहिक निर्णय रहा होगा. पर पाकिस्तान के धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में बँट जाने के बाद भी देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरुप बना रहा. धार्मिक आंधी के उस पागलपन भरे दौर में, देश का बहुत धार्मिक सहिष्णु रूप बचा रह गया यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. पटेल कांग्रेस की परंपरा के नेता थे. नेहरू से कम कद उनका नहीं था और न ही उनका सम्मान कम था. दृढ निश्चयी भाव , उनमे नेहरू से अधिक था. धर्म निरपेक्षता पर उनके विचार स्पष्ट थे. लेकिन अब ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है, जैसे नेहरू और पटेल में धर्म निरपेक्षता को ले कर कोई वैचारिक मतभेद हो.
हालांकि मूलभूत रूप से दुनिया में किसी भी देश, सरकार और सम्विधान को धर्मनिरपेक्ष होना ही चाहिए।लेकिन सवाल ये है कि दुनिया के तमाम देशों में इस प्रकार की भौगोलिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता नहीं है, जैसी कि भारत में है। इसलिए साम्प्रदायिकता से आज़ादी पाना हमारे लिए सबसे बड़ी आवश्यकता और चुनौती है। इसी विविधता के एक देश में होने के कारण ही आज़ादी की लड़ाई, किसी धर्म के लोगों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक साझा लड़ाई थी, जो कि धर्म-पंथ  और संस्कृति की तमाम भिन्नताओं के बावजूद एक साथ लेकिन एक-दूसरे से अप्रभावित रहने की आज़ादी की लड़ाई थी। साम्प्रदायिकता को लेकर आज़ादी के आंदोलन के नायकों का नज़रिया, क्या था और वह इसको लेकर किस कदर गंभीर थे। इसका अंदाज़ा बंटवारे के समय की एक घटना से लगाया जा सकता है। सितंबर 1947 में सरदार पटेल को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वालेमुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं। सरदार पटेल अमृतसर गए और वहां करीब दोलाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा,
”इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिए हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था। …………… मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूं। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ………… एक हफ्ते तक अपने हाथ बांधे रहिए और देखिए क्या होता है।मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।”

इस घटना से समझा जा सकता है कि देश की बुनियाद सिर्फ एक आधार पर है, जो कि धर्मनिरपेक्षता है, क्योंकिधर्मनिरपेक्षता के बिना लोकतंत्र भी संभव नहीं है। किसी एक धर्म के प्रभाव, राज या नियमों के अंतर्गत, जब बाकी धर्मावलम्बियों या नास्तिकों के अधिकार सुरक्षित ही नहीं, तो लोकतंत्र कैसे हो सकता है? महात्मा गांधी को पढ़ते हुए आप पाते हैं, कि वह एक धर्म में आस्था रखते हुए, भी बाकी धर्मों की आज़ादी को लेकर किस कदर चिंतित थे। क्योंकि वह जानते थे कि लोकतंत्र और स्वतंत्रता, दरअसल धर्म की नहीं, मानवमात्र की स्वतंत्रता और निजता की लड़ाई है। वह कहते है,
”अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है. मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए. फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा.”

( विजय शंकर सिंह )

आचार्य नरेंद्र देव, 31 अक्टूबर जन्म दिवस पर विनम्र स्मरण / .विजय शंकर सिंह



आज एक ऐसे महापुरुष का भी जन्मदिन है, जिसके बारे में गूगलीय ज्ञान रखने वाली पीढी कम जानती है. आज 31 अक्टूबर को आचार्य नरेंद्रवदेव का जन्म हुआ था. आचार्य नरेंद्र देव एक प्रकांड विद्वान् और समाजवादी चिंतक थे  वह 1934 में जब इंडियन नेशनल कांग्रेस से टूट कर समाजवादी विचारधारा के लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया था, तो जो गुट अलग हो गया था, उसका नेतृत्व नरेंद्र देव ने ही किया था. मार्क्सवाद से अलग हट कर समाजवाद की जो विचारधारा भारतीय परिवेश में उद्भूत हुयी, उसकी चिंतन परंपरा में आचार्य नरेंद्र देव अग्रणी थे. हालांकि उस गुट में इनके साथ, जय प्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, ई एम एस नम्बूदिरीपाद और मीनू मसानी जैसे लोग भी थे. पर काल के प्रवाह में समाजवादी आंदोलन बिखरता रहा, जुटता रहा और थम थम कर बढ़ता भी रहा. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से सोशलिस्ट पार्टी से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी तक यह आंदोलन अनेक कलेवर बदलता रहा. अंततः लोहिया के निधन के बाद यह कमज़ोर पड़ गया. इसी आंदोलन के चिंतक थे आचार्य नरेंद्र देव.

इनका जन्म 31 अक्टूबर 1889 को सीतापुर में हुआ था. पर वह मूलतः फैज़ाबाद के थे. मार्क्सवाद अपनी विचारधारा के प्रचार प्रसार में सर्वहारा की तानाशाही की बात करता है. पर भारतीय परिवेश में जिस समाजवादी विचारधारा की नीव पडी वह डेमॉक्रेटिक सोशलिज़्म कहलाई. नरेंद्र देव ने इसी लोकतांत्रिक समाजवाद के विचारधारा की अवधारणा को बढ़ाया. मार्क्स के हिंसक क्रान्ति या मज़दूर आधारित क्रान्ति के विपरीत , लक्ष्य प्राप्ति के लिए सिविल नाफरमानी जैसे गांधी वादी विचारधारा को अपनाया गया. आचार्य से अन्य समाजवादियों जैसे डॉ लोहिया का रास्ता 1950 के बाद अलग हो गया। डॉ लोहिया जहां एक विचारक के साथ साथ संगठनकर्ता भी थे, वहाँ आचार्य नरेंद्र देव एक अकादमिक विचारक और चिंतक तथा शिक्षक थे. समाजवाद पर उन्होंने बहुत से अकादमिक लेख लिखे हैं. 1928 से 1956 तक के उनके लेखों और पुस्तकों का चार खण्डों में संकलन है. जिसका सम्पादन हरिदेव शर्मा ने किया है. इनके अध्ययन से समाजवाद के वैचारिक आधार और इनकी तीक्ष्ण मेधा का अभिज्ञान होता है.आज़ादी की लड़ाई के दौरान यह भी जब भारत छोडो आंदोलन के समय अहमद नगर जेल में बंद थे तो उसी जेल में जवाहर लाल नेहरू भी बंदी थे. नेहरू ने अपनी अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया , हिंदुस्तान की कहानी उसी अवधि में लिखी थी. उस पुस्तक के लिखने के दौरान नेहरू की आचार्य नरेंद्र देव से अक्सर पांडित्यपूर्ण चर्चा होती थी. नेहरू आचार्य के पांडित्य और वक्तृता से अत्यंत प्रभावित भी हुए.

1915 में पहली बार आचार्य नरेंद्र देव , बाल गंगाधर तिलक और अरविंदो घोष से प्रेरित हो कर राष्ट्रीय आंदोलन में आये थे. एक शिक्षक होने के कारण इन्होंने मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन का सम्यक अध्ययन किया और मार्क्सवाद को भारतीय परिवेश में व्याख्यायित करने का अकादमिक कार्य किया. वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भी जुड़े थे और उन्होंने वहाँ अध्यापन कार्य भी किया था. आज़ादी के बाद , 6 दिसंबर 1951 से 31 मई 1954 तक वह उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य भी थे. वह किसान आंदोलन से भी जुड़े रहे और अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे . 1956 में अपने निधन तक वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे. उनके निधन पर नेहरू की प्रतिक्रिया पठनीय है. नेहरू के ही शब्दों में इसे पढ़ें.

" The death of Acharya Narendra Deva is something much bigger for many of us and, I think, for the country than just the passing away of an important person. He was a man of rare distinction--distinction in many fields--rare in spirit, rare in mind and intellect, rare in integrity of mind and otherwise. Only his body failed him. I do not know if there is any person present here in this House who was associated with him for a longer period than I was. Over 40 years ago we came together and we shared innumerable experiences together in the dust and heat of the struggle for independence and in the long silence of prison life where we spent--I forget now--four or five years together at various places, and inevitably got to know each other intimately; and so, for many of us, it is a grievous loss and a grievous blow, even as it is a grievous loss for our country. There is the public sense of loss and there is the private sense of loss and a feeling that somebody of rare distinction has gone and it will be very difficult to find his like again."

( विजय शंकर सिंह )