Friday, 1 September 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.2) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 मामले की सुनवाई के बारहवें दिन की सुनवाई समाप्त करते हुए संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने को लेकर, एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया के एडवोकेट से पूछा कि, "पिछले कुछ वर्षों में जारी किए गए विभिन्न संवैधानिक आदेशों ने भारतीय संविधान के प्रावधानों को जम्मू और कश्मीर में क्रमिक रूप से लागू किया है।  इसलिए, उनहत्तर वर्षों में "पर्याप्त एकीकरण" हुआ था। इस संदर्भ में, क्या अगस्त 2019 में केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम एकीकरण हासिल करने के लिए "एक तार्किक कदम" थे?" 

जैसे ही, बारहवें दिन की सुनवाई समाप्त होने वाली थी, सीजेआई ने कहा, "एक आखिरी बात,  26 जनवरी 1950 को मौजूद, "पूर्ण स्वायत्तता" और 5 अगस्त 2019 को लाए गए "पूर्ण एकीकरण" के बीच की जो व्यापक खाई थी, इस कालखंड के बीच में, जो कुछ भी हुआ, उससे वह खाई (स्वायत्तता और एकीकरण के बीच की) काफी हद तक पाट दी गई थी। उस अर्थ में, यह कहना कि, पूर्ण स्वायत्तता से पूर्ण एकीकरण की ओर स्थानांतरण, पूरा नहीं हो पाया था, गलत है। यह स्पष्ट है कि 1950-2019 के बीच 69 वर्षों में काफी हद तक, जम्मू कश्मीर राज्य का भारत संघ में, एकीकरण पहले ही हो चुका था। और इसलिए 2019 में जो किया गया, क्या वह वास्तव में उस एकीकरण को प्राप्त करने के लिए, एक तार्किक कदम था?"

सीजेआई का सवाल, उस दावे के संदर्भ में है, जिसे सरकार यह कह कर प्रचारित करती है कि, अनुच्छेद 370 को साल 2019 में संशोधित कर के, सरकार ने जम्मू कश्मीर राज्य का भारत में पूर्ण एकीकरण किया है। निश्चित रूप से, यह एक चुनावी वादा था, भारतीय जनता पार्टी का, जिसे उसने सरकार में आने के बाद पूरा किया पर यह भी एक तथ्य है और जैसा कि, सीजेआई ने अदालत में कहा है कि, 1950 से 2019 के बीच जम्मू कश्मीर राज्य का भारत संघ से पर्याप्त एकीकरण हो चुका था। 2019 में की गई राज्य पुनर्गठन की कवायद एक अनावश्यक कवायद थी। जम्मू कश्मीर आज भी एक लोकतांत्रिक और चुनी हुई सरकार का मुंतजिर है। बारहवें दिन अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत भी शामिल हैं।

० क्या अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की 'सिफारिश' एक अनिवार्य शर्त थी?

भारत संघ की दलीलों के दौरान विवाद का एक दिलचस्प मुद्दा यह भी था कि, "क्या अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक थी।" यहां यह उल्लेखनीय है कि, अनुच्छेद 370(3) के अनुसार, राष्ट्रपति, अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय घोषित कर सकते हैं, बशर्ते कि, यह "राज्य की संविधान सभा की अनुशंसा (सिफारिश) " से किया गया हो।"
यह मुद्दा, पहली बार एसजी, तुषार मेहता की दलीलों के दौरान उठा जब, उन्होंने कहा कि अगर संविधान सभा अस्तित्व में रहती, तो भी इसकी सीमित भूमिका होती, क्योंकि इसका निर्णय प्रकृति में केवल "अनुशंसाजनक" यानी सिफारिशी होता और राष्ट्रपति, यदि संविधान सभा इस पर सहमत नहीं होती तो भी, कोई भी निर्णय ले सकते थे। ।"
अब बहस के केंद्र में सिफारिश या अनुशंसा की कानूनी स्थिति क्या है, यह विंदु आ गया। सॉलिसिटर जनरल के उपरोक्त दलील पर, सीजेआई ने कहा: "यह सही नहीं हो सकता है, क्योंकि जिस तरह से अनुच्छेद बनाया गया है उसे देखें - "सिफारिश...आवश्यक होगी"।
सीजेआई का कहना था कि, जम्मू कश्मीर के बारे में किसी भी संवैधानिक आदेश या संशोधन के लिए जम्मू कश्मीर की सिफारिश जरूरी थी। 
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि, "यहां, अनिवार्य यह था कि राष्ट्रपति संविधान सभा से सिफारिश लें।  हालाँकि, ऐसी अनुशंसा बाध्यकारी नहीं थी।"  
उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा, "अन्यथा संविधान कहता, उसके (सिफारिश के) अनुसार कार्य करें। जम्मू-कश्मीर का संविधान हमेशा भारतीय संविधान के अधीन रहेगा क्योंकि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा का निर्माण ही अनुच्छेद 370 द्वारा हुआ था।"
इसी तरह का तर्क बाद में भारत के अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने भी दिया। जिन्होंने तर्क दिया कि, "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के विघटन का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि, राष्ट्रपति के हाथ, हमेशा के लिए बंधे हुए हैं।" 

सीजेआई ने इस महत्वपूर्ण विंदु पर, सरकार के वकीलों से, स्पष्टीकरण मांगते हुए पूछा, "क्या सिफ़ारिश के लिए सकारात्मक सिफ़ारिश की आवश्यकता है या नहीं?"
एजी, आर वेंकटरमणी ने यह कहते हुए जवाब दिया कि, "सिफारिश केवल "एक सलाह" थी और अनुच्छेद 370 को लागू रखने की सिफारिश करने की शक्ति, विधानसभा के पास उपलब्ध नहीं थी।" 
एजी ने कहा, "इसे केवल 370 को निष्क्रिय करने की सिफारिश करनी है।"

इस पर सीजेआई ने, सिफारिश शब्द की कानूनी व्याख्या करते हुए कहा, "सिफारिश सिर्फ एक राय नहीं है। जब संविधान "सिफारिश" शब्द का उपयोग करता है, तो इसका मतलब एक सकारात्मक निर्णय होता है क्योंकि अनुच्छेद 370 विभिन्न वाक्यांशों का उपयोग करता है। यह परामर्श, सहमति, निर्णय और सिफारिश, शब्दों का उपयोग करता है।"
एजी ने जोर देकर कहा कि, "सिफारिश', राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है। इसलिए, यह सिफारिश है। यह सहमति नहीं है।"

सीजेआई ने तब स्पष्ट किया कि, "जब भी सिफारिश बाध्यकारी नहीं होती है, तो संविधान इसे स्पष्ट रूप से, (उचित जगह पर) निर्दिष्ट करता है।"  
उन्होंने विस्तार से बताया, "अनुच्छेद 109, वित्त विधेयक (मनी बिल) से संबंधित है। वित्त विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जाता है। इसे हमेशा लोकसभा में ही पेश किया जाता है। लोकसभा में विधेयक पारित होने के बाद, इसे सिफारिश के लिए राज्यसभा में भेजा जाता है। लेकिन, वे सिफारिशें, (लोकसभा के लिए) बाध्यकारी नहीं हैं। यह (लोकसभा) या तो उन्हें (वित्त विधेयक को) स्वीकार कर सकती है या उन्हें आंशिक रूप से स्वीकार कर सकती है, या उन्हें अस्वीकार कर सकती है। यह अनुच्छेद 109 (2) में स्पष्ट किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि, राज्यसभा (में वित्त विधेयक को भेजे जाने) की सिफारिश लोकसभा को बाध्य नहीं करती है। अब अनुच्छेद 117 देखें। यह कहता है कि, एक धन विधेयक  राष्ट्रपति की सिफारिश के अलावा इसे पेश नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 117 में, एक ही शब्द 'सिफारिश' का उपयोग किया गया है, लेकिन यहां सिफारिश अनिवार्य है। आप राष्ट्रपति की सिफारिश के अलावा वित्त विधेयक को आगे नहीं बढ़ा सकते हैं।"

सीजेआई के अनुसार, संविधान में जहां सिफारिश बाध्यकारी प्रकृति की है, वहां कोई अलग से निर्देश नहीं है। जहां वह बाध्यकारी प्रकृति की नहीं होनी चाहिए, वहां स्पष्ट इसका उल्लेख कर दिया गया है। इसे एक उदाहरण के रूप में उपयोग करते हुए, सीजेआई ने कहा कि,  "अनुच्छेद 370 के तहत प्रदान की जाने वाली 'सिफारिश,' निरस्तीकरण से पहले की एक शर्त थी और समय के संदर्भ में भी एक शर्त थी, जिसका अर्थ है कि, निरस्तीकरण से पहले सिफारिश की जानी चाहिए थी।"
अटॉर्नी जनरल, अपनी बात पर अड़े रहे और यह तर्क दिया कि, "(यहां) अभी भी केवल एक सिफारिश की आवश्यकता थी।" 
उन्होंने आगे इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि, "सिफारिश की आवश्यकता, सिफ़ारिश की भूमिका में कोई और सामग्री नहीं जोड़ती है। क्या जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा जैसी संस्था, अनुच्छेद 370 पर अंतिम निर्णय ले सकती है? यह भारत की संसद का एक घटक निकाय नहीं है। इसमें सभी गुण और शक्तियाँ नहीं हैं।"
एसजी तुषार मेहता ने, अटॉर्नी जनरल की दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा, "भारत के राष्ट्रपति का, भारत के संविधान से बाहर किसी संस्था से बंधा होना, शायद हमारे संविधान की सही व्याख्या नहीं हो सकती है। जम्मू-कश्मीर का संविधान हमारे संविधान से परे और बाहर है।"

हालाँकि, पीठ इस तर्क को स्वीकार करने में विफल रही कि, "जम्मू-कश्मीर संविधान सभा एक "बाहरी निकाय" थी।" न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा कि "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा में अनुच्छेद 370 का उल्लेख स्वयं मिलता है।" 
सीजेआई ने यह भी बताया कि केंद्र ने "संविधान सभा" का अर्थ "विधान सभा" बदलने के लिए अनुच्छेद 367 का इस्तेमाल किया था।" 
पीठ ने तब पूछा, "तो क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि, केंद्र स्वयं 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की सिफारिश की आवश्यकता के प्रति सचेत था।"

इस मुद्दे पर चर्चा जारी रही और इसी बीच, सीजेआई ने पूछा,  "यदि अनुच्छेद 370(3) का प्रावधान लागू नहीं हो सकता है, तो क्या इसका मतलब यह है कि, अनुच्छेद 370 के अंतर्गत निहित मूल शक्ति समाप्त हो गई है या खो गई है? यदि वह शक्ति समाप्त नहीं हुई है, तो क्या यह एकतरफा शक्ति है जिसका प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है? अनुच्छेद 367 था, इसका पालन किया गया, क्योंकि संविधान सभा का अभाव था और कोई विधान सभा नहीं थी, लेकिन इस प्रक्रिया में, एक कमज़ोरी है - यह अनुच्छेद 370(3) द्वारा निर्धारित भूमिका है। आप कहते हैं कि, भूमिका केवल अनुशंसात्मक (सिफारिशी) है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि, (अनुशंसा / सिफारिश के प्राविधान को) ओवरराइड किया जा सकता है।"

इस सवाल का जवाब एसजी ने दूसरे सवाल के जरिए दिया। एसजी तुषार मेहता ने कहा, "मेरे पास एक प्रश्न है जिस पर आप छुट्टी के दिन विचार कर सकते हैं - जब संविधान सभा को भंग किया जा रहा था, मान लीजिए कि सदस्य कहेंगे कि अब जम्मू-कश्मीर का संविधान एक राजतंत्र की तरह है और अब अनुच्छेद 370 को हटाया जा सकता है - क्या राष्ट्रपति को इस पर कार्रवाई करनी होगी ? इसका कोई साधारण कारण नहीं हो सकता है कि, संविधान सभा की बहसों में, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था।"

० क्या संसद किसी मौजूदा राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकती है?

बहस के दौरान एक और बहस यह उठी कि, क्या संसद के पास मौजूदा भारतीय राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने की शक्ति है।  संदर्भ के लिए, अनुच्छेद 3(1) में प्रावधान है कि, संसद किसी राज्य से एक क्षेत्र को अलग करके या दो या दो से अधिक राज्यों को एकजुट करके या किसी राज्य के किसी हिस्से को किसी क्षेत्र को एकजुट करके एक नया राज्य बना सकती है।  बाद में एक संशोधन द्वारा 'राज्य' शब्द में 'केंद्र शासित प्रदेश' भी शामिल करने की घोषणा की गई।  इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूछा कि, "क्या अनुच्छेद 3(1) में ऐसी स्थिति पर विचार किया गया है जहां किसी राज्य के पूरे क्षेत्र को केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया जा सकता है?"
इस पर एसजी ने स्पष्ट किया कि, "राज्य से दो केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए हैं, अर्थात्, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख और (संविधान में) ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस पर रोक लगाता हो।"

जस्टिस कौल ने पूछा, "मान लीजिए कि आपने लद्दाख को अलग नहीं किया है? तो शक्ति (भारत संघ की) पूरे राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने की होगी। आप एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने पर, कैसे विचार कर रहे हैं? और यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो, क्या आप एक केंद्रशासित प्रदेश बनाकर ऐसा कर सकते हैं?  और क्या अन्य (राज्यों) को भी यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) बना रहे हैं?”
एसजी तुषार मेहता ने कहा कि, "उनके पढ़ने के अनुसार ऐसी स्थिति में 'पृथक्करण' आवश्यक था।  इसका मतलब यह है कि पूरे राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तित नहीं किया जा सकता था, लेकिन एक राज्य को दो या दो से अधिक केंद्रशासित प्रदेशों में अलग करने की अनुमति थी।"
तर्क का परीक्षण करने के लिए, न्यायमूर्ति कौल ने पूछा, "आइए इसे थोड़ा जटिल बनाएं। मान लीजिए कि आप असम से एक केंद्रशासित प्रदेश बनाते हैं या आप असम को एक केंद्रशासित प्रदेश में बदल देते हैं। फिर?"
इस पर एसजी ने जवाब दिया, "यह एक चरम उदाहरण है लेकिन परीक्षण के उद्देश्य से, पृथक्करण आवश्यक होगा। एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश घोषित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यहां, यह किसी के लिए भी मामला नहीं है कि, हमने इससे बाहर निकलने के लिए लद्दाख को अलग कर दिया। हमारे पास अन्य कारण थे।"

बहस के इस विंदु को जारी रखते हुए, सीजेआई ने कहा कि, "केंद्रशासित प्रदेशों के निर्माण में, दो प्रकार के उदाहरण है, पहला प्रकार, चंडीगढ़ जैसा केंद्रशासित प्रदेश, जिसे पंजाब से अलग कर के बनाया गया और वह एक केंद्रशासित प्रदेश बना रहा।  दूसरा प्रकार "एक प्रगति" था, जहां कुछ क्षेत्र राज्य बनने की प्रगति में केंद्रशासित प्रदेश बन गए।  इनमें से उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा इसके उदाहरण थे।" 
उन्होंने कहा, "वे केंद्रशासित प्रदेश बन गए थे लेकिन उन्हें राज्य बनाने के लिए एक स्थिर प्रशासन बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। आप उन्हें तुरंत राज्य नहीं बना सकते।"  
इस प्रकार, उन्होंने पूछा कि क्या केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को फिर से एक राज्य में बदलने की योजना बना रही है और यदि हां, तो वह जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए समय-सीमा या रोडमैप कब प्रदान करेगी?"  
भारत सरकार ने, तब यह पुष्टि की कि, "वह जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करेगी।"

इसके बाद एसजी मेहता ने अपनी दलीलें जारी रखते हुए कहा कि, "यदि आप समग्र रूप से अनुच्छेद 3 और 4 को देखते हैं, और मैं इसे अकादमिक रूप से कह रहा हूं - अगर हम पुनर्गठन की एक सामान्य योजना के रूप में पढ़ते हैं तो, इसमें कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि, एक अच्छे कारण के लिए, एक राज्य को, यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) में परिवर्तित किया जा सकता है।"
उन्होंने राजा रामपाल के फैसले का हवाला देते हुए कहा, "भारत विनाशकारी इकाइयों वाला एक अविनाशी संघ है।"  
उन्होंने आगे कहा, "यह एक ऐसा प्रावधान है जहां सख्त अनुपालन पर जोर नहीं दिया जाता है, बशर्ते कि व्यापक अनुपालन हो, यानी पूरा देश यह मानते हुए कि यह पूरे देश को प्रभावित करता है। यह स्थिति सिर्फ, राज्यों या पड़ोसी राज्यों को प्रभावित नहीं करती है, यह प्रभावित करती है पूरे राष्ट्र को।"

उन्होंने अपने पहले के तर्कों को दोहराया कि जम्मू-कश्मीर में अभी भी विधानसभा क्षेत्र, चुनाव आयोग, विधान सभा, जनसंख्या अनुपात आदि सहित एक राज्य की सभी विशेषताएं मौजूद हैं। उन्होंने आगे कहा, "वे कहते हैं कि संसद में प्रतिनिधित्व कम हो गया है। नहीं, यह सही नहीं है। पहले, केवल स्थायी निवासी ही धारा, 16 के तहत चुनाव लड़ सकते थे। अब, किसी भी अन्य की तरह निर्वाचित होने के योग्य होने के लिए, आपको भारत  का नागरिक होना चाहिए, केवल, स्थायी निवासी नहीं।"
अभी सुनवाई जारी है।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.1) / विजय शंकर सिंह '
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Wednesday, 30 August 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.1) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370, मामले में संविधान पीठ की सुनवाई के बारहवें दिन, एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर (J&K) के, राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए एक समय-सीमा या रोडमैप प्रस्तुत करने के लिए कहा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसके कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ, 2019 में जम्मू-कश्मीर को एक राज्य से केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) में बदल देने के मुद्दे पर, सक्रिय रूप से विचार कर रही है। यह महत्वपूर्ण सुनवाई, अनुच्छेद 370 के तहत, जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर दिये जाने के खिलाफ दायर अनेक याचिकाओं के संबंध में हो रही है। 

केंद्र सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश करते समय संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा दिए गए एक बयान का उल्लेख किया कि, 'उचित समय में जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा।'  जब एसजी ने कहा कि यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) का दर्जा स्थायी नहीं है, तो मुख्य न्यायाधीश ने समय सीमा के बारे में पूछताछ की और पूछा, "यह (जम्मू कश्मीर का यूटी स्टेटस) कितना अस्थायी है? आप चुनाव कब कराने जा रहे हैं?"
सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि, "वह इस मामले पर निर्देश मांगेंगे, यह दोहराते हुए कि, राज्य का दर्जा बहाल करने की प्रक्रिया, पहले से ही प्रगति पर है।"

दलीलों के दौरान, सीजेआई ने इस बात पर भी विचार किया कि, "क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के, मुद्दे पर, संघ (केंद्र सरकार) के लिए किसी राज्य को अस्थायी अवधि के लिए, केंद्रशासित प्रदेश में बदलना संभव है?"
हालाँकि, सीजेआई ने इस बात पर भी जोर दिया कि, *ऐसे परिदृश्य में, सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक बयान देना होगा कि, एक यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) को एक राज्य में वापस लाया जायेगा।" 
सीजेआई ने कहा, "यह (कोई भी राज्य या जम्मू कश्मीर) स्थायी रूप से यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) नहीं हो सकता।"

सॉलिसिटर जनरल ने फिर से आश्वस्त किया कि, "सरकार का रुख इस दृष्टिकोण के अनुरूप है, जैसा कि संसदीय बयान में दर्शाया गया है।" मुख्य न्यायाधीश ने, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं की प्रासंगिकता को स्वीकार तो किया लेकिन, राज्य में लोकतंत्र बहाल करने के महत्व पर भी, प्रकाश डाला। सीजेआई ने टिप्पणी की, "हम समझते हैं कि यह सब, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले हैं... राष्ट्र का संरक्षण, सर्वोपरि चिंता का विषय है। लेकिन आपको बिना किसी बंदिश में बांधे, आप (सॉलिसिटर जनरल) और एजी (अटॉर्नी जनरल) उच्चतम स्तर (सरकार के) पर निर्देश मांग सकते हैं कि, क्या कोई समय सीमा (सरकार द्वारा) ध्यान में रखी गई है?  "
एसजी ने जवाब दिया, "मैं निर्देश लूंगा। और मैं (इस बारे में) बयान और (किए गए) प्रयास भी दिखाऊंगा..."

मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखा गया है, लेकिन राज्य में समान रूप से, लोकतंत्र की बहाली भी महत्वपूर्ण है।''

दोपहर बाद जब सुनवाई फिर से शुरू हुई, तो सॉलिसिटर जनरल ने निर्देश लेने के बाद पीठ को सूचित किया कि, "जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा, जबकि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बरकरार रखा जाएगा।"
एसजी ने कहा, "निर्देश (सरकार का) यह है कि यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) कोई स्थायी विकल्प नहीं है। लेकिन मैं परसों एक सकारात्मक बयान दूंगा। लद्दाख यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) ही रहेगा।"  एसजी ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि, "पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था को छोड़कर, अन्य सभी शक्तियां जम्मू-कश्मीर राज्य के पास हैं।"

सुनवाई के ग्यारहवें दिन, न्यायालय ने केंद्र से पूछा था कि, "क्या जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश में बदलना संघवाद के सिद्धांत के अनुरूप है, जैसा कि, तब किया गया था जब राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन था और इसकी विधानसभा भंग कर दी गई थी।" 
तब सॉलिसिटर जनरल ने कहा था, "यह (राज्य) पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था (लॉ एंड ऑर्डर) के मुड्डों को छोड़कर, सभी उद्देश्यों के लिए प्रभावी रूप से एक राज्य ही है।"

० क्या राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदला जा सकता है?

आज सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार किसी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने की संसद की शक्तियों के बारे में जीवंत चर्चा हुई।  यह तर्क देने के लिए कि जम्मू और कश्मीर के संबंध में अलग-अलग नीतिगत विचार लागू होंगे, एसजी ने एक सीमावर्ती राज्य के रूप में इसकी प्रकृति को रेखांकित किया। इस बिंदु पर, न्यायमूर्ति कौल ने उन्हे टोका कि, "कई अन्य सीमावर्ती राज्य भी हैं।" 
जवाब में, एसजी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि, "आतंकवाद और घुसपैठ के इतिहास को देखते हुए जम्मू-कश्मीर का एक अलग संदर्भ है।"

इस समय, सीजेआई ने पूछा कि, "यदि केंद्र के पास एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में परिवर्तित करने की शक्ति है, तो यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि अन्य राज्यों के संबंध में ऐसी शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा, जैसा कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है?"
सीजेआई ने पूछा, "एक बार जब आप प्रत्येक भारतीय राज्य के संबंध में संघ को वह शक्ति सौंप देते हैं, तो आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि जिस तरह के दुरुपयोग की उन्हें आशंका है- इस शक्ति का दुरुपयोग (आगे) नहीं किया जाएगा।"  
एसजी ने जवाब दिया कि, "जम्मू-कश्मीर (राज्य में) "एक (अलग) तरह की स्थिति" थी जो अन्य राज्यों के संबंध में उत्पन्न नहीं होगी।"

इसके जवाब में जस्टिस कौल ने कहा, ''यह अपनी तरह की अनोखी स्थिति नहीं है. हमने उत्तरी सीमा पंजाब को बहुत कठिन समय में देखा है. इसी तरह, उत्तर पूर्व के कुछ राज्य भी ऐसी स्थिति से गुजर चुके हैं। कल अगर ऐसी स्थिति बन जाए कि, इनमें से प्रत्येक राज्य को इस समस्या का सामना करना पड़े  ...मैं आपका तर्क समझ गया कि ये सीमावर्ती राज्य उनकी अपनी श्रेणी हैं। आप जम्मू-कश्मीर को किसी अन्य सीमावर्ती राज्य से कैसे अलग करते हैं?"
एसजी ने जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दोहराया, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से इसकी निकटता भी शामिल है।  उन्होंने पीठ को यह भी बताया कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद स्थानीय निकाय चुनाव सफलतापूर्वक हुए।

सीजेआई ने पूछा, "क्या संसद के पास मौजूदा भारतीय राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने की शक्ति है? अगर उसके पास वह शक्ति है, तो हम अनुच्छेद 3 को कैसे पढ़ेंगे?"
न्यायमूर्ति कौल ने पूछा, "उस शक्ति के प्रयोग की प्रकृति क्या है? क्या यह स्थायी है, अस्थायी है, यह क्या है?"
सुनवाई अभी जारी है।

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (11) / विजय शंकर सिंह '.
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Tuesday, 29 August 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (11) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 के संशोधित करने के आदेश के खिलाफ, चुनौती दी गई कई याचिकाओं की सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा, ग्यारहवें दिन भी जारी रही। ग्यारहवें दिन की मुख्य बहस, भारत सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) की ओर से, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जारी रखी और अटॉर्नी जनरल, आर वेंकटरमणी भी अदालत में उपस्थित थे और उन्होंने भी अपनी दलील रखी। आज की बहस मुख्यतः अनुच्छेद 35A के संदर्भ में हुई। इसकी चर्चा, पीठ के प्रमुख सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने ही शुरू की।

कार्यवाही के ग्यारहवें दिन, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि, "अनुच्छेद 35A, जो जम्मू और कश्मीर (J&K) के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष दर्जा प्रदान करता था, का असर, भारतीय नागरिकों के तीन मौलिक अधिकारों पर पड़ा था। अर्थात्, अनुच्छेद 16(1) (राज्य के अंतर्गत रोजगार के अवसर की समानता), पूर्ववर्ती अनुच्छेद 19(1(एफ) (अचल संपत्ति अर्जित करने का अधिकार, जो अब अनुच्छेद 300ए के तहत प्रदान किया गया है) और अनुच्छेद 19(1)(ई) (भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार)।" 
अदालत के अनुसार, ये मौलिक अधिकार, हटाए गए 35A के कारण, नागरिकों को प्राप्त नहीं थे। यह मौखिक टिप्पणी सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार द्वारा रखी गई दलीलों के दौरान की गई थी।

अनुच्छेद 35A पर, यह टिप्पणी करते हुए, सीजेआई ने बताया कि, "1954 के संविधान आदेश ने भारतीय संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) की संपूर्णता को जम्मू-कश्मीर पर लागू किया था।  हालाँकि, राज्य सरकार के तहत रोजगार, अचल संपत्ति का अधिग्रहण, और राज्य में निपटारे आदि के संदर्भ में, अनुच्छेद 35ए ने तीन क्षेत्रों के तहत एक अपवाद के रूप में था।" 
इस संदर्भ में सीजेआई ने कहा, "हालांकि भाग III लागू है, लेकिन, जब आप अनुच्छेद 35A पेश करते हैं, तो आप 3 मौलिक अधिकार छीन लेते हैं, जैसे, अनुच्छेद 16(1), अचल संपत्ति हासिल करने का अधिकार जो तब 19(1)(एफ) के तहत एक मौलिक अधिकार है, और, इन मामलों में, राज्य के अंतर्गत निपटारे का अधिकार, जो 19(1)(ई) के तहत एक मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 35A को लागू करके, आपने वस्तुतः, मौलिक अधिकार छीन लिये...और इस आधार पर किसी भी चुनौती से प्रतिरक्षा भी प्रदान कर दी, जो, आपको एक और मौलिक अधिकार से वंचित कर दे रहा और वह है, अनुच्छेद 16 के तहत, न्यायिक समीक्षा की शक्ति या अधिकार, जिसे छीन लिया गया था।।"

भारत संघ की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर सहमति जताई।  उन्होंने जोड़ा, "जो कुछ भी यहां विवादित कहा गया है, वह शक्ति का एक संवैधानिक प्रयोग है जो मौलिक अधिकार प्रदान करता है, संपूर्ण संविधान को लागू करता है, जम्मू-कश्मीर के लोगों को अन्य नागरिकों के बराबर लाता है। यह उन सभी कानूनों को लागू करता है जो जम्मू-कश्मीर के लिए कल्याणकारी कानून हैं, और जो पहले लागू नहीं किए गए थे। इनकी सूची मेरे पास है। अब तक, लोगों को, उनकी रहनुमाई करने वालों द्वारा आश्वस्त किया गया था कि, यह (अनुच्छेद 370 और 35A) आपकी प्रगति में बाधा नहीं है, बल्कि, यह एक विशेषाधिकार है, जिसके लिए आप लड़ते हैं। योर लॉर्डशिप, कम से कम, दो प्रमुख राजनीतिक दल, अनुच्छेद 370 का बचाव कर रहे हैं, जिसमें अनुच्छेद 35ए भी शामिल है!  अब लोगों को एहसास हो गया है कि उन्होंने क्या खोया था।”

एसजी ने, यह भी कहा कि, "अनुच्छेद 35A हटने से जम्मू-कश्मीर में निवेश आना शुरू हो गया है और पुलिस व्यवस्था केंद्र के पास होने से, राज्य में पर्यटन भी शुरू हो गया है।" 
एसजी तुषार मेहता ने बताया कि, "370 हटने  के बाद से लगभग 16 लाख पर्यटकों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया है और राज्य में, नए होटल खोले गए हैं, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला है।"

भारत के अटॉर्नी जनरल ने बताया कि, "1954 के राष्ट्रपति आदेश, जिसके द्वारा, अनुच्छेद 35A पेश किया गया था, का प्रभाव संविधान में एक नये अनुच्छेद बनाने के रूप में पड़ा।"
उन्होंने पूछा कि, "क्या पूर्ववर्ती अनुच्छेद 370 के तहत भारतीय संविधान को "संशोधनों और अपवादों" के साथ जम्मू-कश्मीर में लागू करने की राष्ट्रपति की शक्ति का प्रयोग संविधान में एक बिल्कुल नया प्रावधान जोड़ने के लिए किया जा सकता है?"
एजी आर वेंकटरमणी ने कहा, "अनुच्छेद 35ए अनुच्छेद 35 का संशोधन नहीं है। यह एक नए अनुच्छेद का निर्माण है।"

० अनुच्छेद 370 के कारण भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं हुए। 

आज अपनी दलीलों में एसजी मेहता ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान के लागू होने पर अनुच्छेद 370 के प्रभावों को रेखांकित किया।  उन्होंने कहा कि "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 को इस प्रावधान के साथ लागू किया गया था कि कोई भी संवैधानिक संशोधन स्वचालित रूप से जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होगा जब तक कि इसे अनुच्छेद 370 के तहत प्रदान की गई प्रक्रिया के माध्यम से पारित नहीं किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान के प्रावधानों के बीच, देश और राज्य के भीतर लागू होने वाले प्रावधानो में असमानताएं पैदा हुईं, जो बाकी हिस्सों पर लागू होती हैं।"

उन्होंने तर्क दिया कि निम्नलिखित प्रावधानों का जम्मू-कश्मीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा,
1. शिक्षा का अधिकार प्रदान करने के लिए भारत के संविधान में संशोधन किया गया और अनुच्छेद 21ए डाला गया।  हालाँकि, यह प्रावधान 2019 तक जम्मू-कश्मीर पर कभी लागू नहीं किया गया था।

2. भारतीय संविधान की प्रस्तावना संबंधी 1976 का संशोधन, संशोधनों के साथ लागू किया गया।  इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' शब्द कभी नहीं अपनाए गए।  इसके अलावा, "अखंडता" शब्द का भी प्रयोग नहीं किया गया।

3. राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत लागू नहीं किये गये।

4. 2019 तक जम्मू-कश्मीर में आदिवासी लोगों के लिए आरक्षण लागू नहीं किया गया था। अनुच्छेद 15(4) से अनुसूचित जनजातियों का संदर्भ हटा दिया गया था।

5. अनुच्छेद 19 में, संशोधन के माध्यम से एक उप-अनुच्छेद (7) जोड़ा गया जो 1979 तक रहा। इसके अनुसार, "उचित प्रतिबंध" शब्द का अर्थ "ऐसे प्रतिबंध जिन्हें उपयुक्त विधायिका उचित समझती है" के रूप में लगाया गया।"
इस संदर्भ में, एसजी ने कहा, "नागरिक राज्य के खिलाफ मौलिक अधिकार का आनंद प्राप्त करते हैं, लेकिन अब विधायिका तय करेगी कि उचित प्रतिबंध क्या हैं।"

 6. निवारक निरोध के संदर्भ में, अनुच्छेद 21 और 22 लागू नहीं होंगे।

उपरोक्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, एसजी ने आगे कहा, "अनुच्छेद 367 के साथ अनुच्छेद 370 का प्रभाव यह है कि, राष्ट्रपति और राज्य सरकार के एक प्रशासनिक कार्य द्वारा संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है, बदला जा सकता है, यहां तक ​​कि नष्ट किया जा सकता है और लागू नहीं किया जा सकता है, और नए प्रावधान लागू किए जा सकते हैं  यहां तक ​​कि भारत के संविधान में भी यही स्थिति बनाई गई है। जैसे, अनुच्छेद 35A बनाया गया था, जो भारत के संविधान का एक हिस्सा है, और इसे केवल जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू किया गया था। इस 370(1) के माध्यम और 367 तंत्र का उपयोग एक से अधिक बार किया गया है, क्योंकि, यह कवायद, 5 अगस्त, 2019 के बाद ही थम सकी। अन्यथा, कोई भी प्रावधान, कोई भी अनुच्छेद (हटाया जा सकता था)।"
अभी सुनवाई जारी है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (10) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/370-10.html

Monday, 28 August 2023

अपना पक्ष रखने के लिए अदालत में उपस्थित होने वाले लेक्चरर को जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा निलंबित किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत के अटॉर्नी जनरल से जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग के उस लेक्चरर को निलंबित करने के फैसले पर गौर करने को कहा, जिसने पिछले हफ्ते संविधान पीठ के समक्ष अनुच्छेद 370 मामले में बहस की थी।

आज (28/08/23) सुबह जैसे ही भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ, अदालत में सुनवाई शुरू करने के लिए एकत्र हुई, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने, उक्त लेक्चरर, जहूर अहमद भट के निलंबन का उल्लेख किया।  एडवोकेट सिब्बल ने कहा कि, जहूर अहमद भट ने, इस मामले में पेश होने के लिए दो दिन की छुट्टी ली थी और जब वह वापस गए तो उन्हें निलंबित कर दिया गया।  सिब्बल ने कहा, "यह अनुचित है, मुझे यकीन है कि एजी इस पर गौर करेंगे।"

सीजेआई ने एजी आर वेंकटरमणी से कहा, "मिस्टर एजी, कृपया इसे देखें।"

इस मौके पर भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "मैंने अखबारों में पढ़ने के बाद जांच की है। अखबारों में जो बताया गया है वह पूरा सच नहीं हो सकता है।"  
इसके बाद सिब्बल ने तुरंत अदालत को बताया कि "25 अगस्त को पारित निलंबन आदेश,  मामले में, सुप्रीम कोर्ट में, उनकी उपस्थिति का संदर्भ देता है।"

एसजी ने कहा, "वह विभिन्न अदालतों में पेश होते हैं और अन्य मुद्दे भी हैं। हम इसे अदालत के समक्ष रख सकते हैं।"
सिब्बल ने कहा, "तो फिर उन्हें पहले ही निलंबित कर दिया जाना चाहिए था, अब क्यों? यह उचित नहीं है। लोकतंत्र को इस तरह से काम नहीं करना चाहिए।"

इस मौके पर भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से पूछा कि "क्या हुआ है। जो कोई भी इस अदालत के समक्ष पेश हुआ है, उसे निलंबित कर दिया गया है..."।
एसजी तुषार मेहता ने कहा, "हम इस पर गौर करेंगे।"
सीजेआई ने एजी से कहा, "लेफ्टिनेंट जनरल से बात करें और देखें कि क्या हुआ है। अगर इसके अलावा कुछ है, तो यह अलग है। लेकिन इस मामले में उनके अदालत में अपीयर होने के बाद ऐसा क्यों हुआ?"  
एजी न इस मुद्दे पर गौर करने के लिए हामी भरी।

कपिल सिब्बल ने कहा, "24 तारीख को वह पेश हुए और अगले दिन उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश में इसका संदर्भ है। मुझे यकीन है कि अटॉर्नी जनरल इस पर ध्यान देंगे।"

एसजी ने कहा, "हर किसी को अदालत के सामने पेश होने का अधिकार है। यह प्रतिशोध के तौर पर नहीं किया जा सकता।"
"मिस्टर सॉलिसिटर, आदेश और दलीलों के बीच निकटता है, इसे भी देखें!", न्यायमूर्ति गवई ने, एसजी से कहा।
एसजी ने कहा, "निलंबन का यह समय उचित नहीं है। मैं सहमत हूं।"  
न्यायमूर्ति कौल ने तब कहा कि यदि निलंबन पत्र में उनकी उपस्थिति का संदर्भ है, तो "यह एक समस्या होगी।"

विचाराधीन याचिका में, लेक्चरर, जफूर अहमद भट, 24 अगस्त को अदालत में, पार्टी-इन-पर्सन के रूप में उपस्थित हुए थे, और जिस तरह से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था, उस पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने अपने छात्रों को भारतीय संविधान और लोकतंत्र के सिद्धांतों को सिखाने की कोशिश करते समय आने वाली कठिनाई पर जोर दिया था और कहा था, "यह मेरे जैसे शिक्षकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है जब हम जम्मू-कश्मीर में अपने छात्रों को इस खूबसूरत संविधान के सिद्धांतों और लोकतंत्र के आदर्शों को पढ़ाते हैं। छात्र अक्सर एक कठिन सवाल पूछते हैं - क्या अगस्त 2019 की घटनाओं के बाद भी हम एक लोकतंत्र हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।"

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (10) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दसवें दिन, केंद्र सरकार की तरफ से, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने, 2019 के राष्ट्रपति के आदेश (अनुच्छेद 370 के संशोधित करने) का समर्थन करते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं, जिसके अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को कमजोर कर दिया गया है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ के समक्ष भारत सरकार की तरफ से दलीलें शुरू हुई। शुरुआत में, सीजेआई ने संघ से एक दिलचस्प सवाल पूछा कि, "क्या साध्य, साधनों को उचित ठहरा सकता है।" और उन्होंने मौखिक रूप से टिप्पणी भी की कि, "साधन भी साध्य के अनुरूप होना चाहिए।"

० जीवन की रक्षा के लिए, शरीर का एक अंग काटा जा सकता है लेकिन, अंग बचाने के लिए जीवन कभी नहीं दिया जाता। 

अटॉर्नी जनरल, आर वेंकटरमनी ने अपनी  शुरुआती दलीलों, में इस (जीवन और शरीर का अंग) मुद्दे को संबोधित करते समय, समझ, निष्पक्षता और तटस्थता के संयोजन के, सरकार के दृष्टिकोण पर जोर दिया और कहा, "हमने इस भावना, जुनून से भरे मुद्दे पर अपनी समझ लाने की कोशिश की है। हमने आवश्यक वस्तुनिष्ठता और तटस्थता को ध्यान में रखा है।"  
उन्होंने अपनी बात समझाने के लिए अब्राहम लिंकन के एक उद्धरण का उल्लेख किया, "अब्राहम लिंकन ने, राष्ट्र को खोने और संविधान को सरक्षित करने के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही है।"
उन्होंने कहा कि, "सामान्य कानून के अनुसार, जीवन और अंग की रक्षा की जानी चाहिए। लेकिन जीवन बचाने के लिए एक अंग को काटा जा सकता है, जबकि एक अंग को बचाने के लिए जीवन कभी नहीं दिया जाता है।"

हालाँकि, एजी की दलील का संदर्भ लेते हुए, सीजेआई ने साध्य को उचित ठहराने वाले साधनों के सिद्धांत पर सवाल उठाया।  मुख्य न्यायाधीश ने वांछित परिणाम प्राप्त करने में वैध दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, "श्रीमान एजी, हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते जहां साध्य, साधन को भी उचित ठहराए। ठीक है? साधन भी साध्य के अनुरूप होने चाहिए।"

एजी और बाद में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) दोनों ने अपने रुख पर जोर दिया कि, "अनुच्छेद 370 को निरस्त करने में अपनाई गई विधियां और प्रक्रियाएं संविधान की सीमाओं के भीतर आयोजित की गईं।"  
एजी ने कहा, "राष्ट्रपति की इस उद्घोषणा के संबंध में कोई विचलन नहीं हुआ है। यह कहना कि संविधान के साथ धोखाधड़ी की गई है, गलत है।"

एजी ने आगे तर्क दिया कि, "इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (आईओए) और जम्मू-कश्मीर के महाराजा की उद्घोषणा के संयुक्त वाचन पर, जिसके बाद 370 को अपनाया गया, जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता के सभी निशान भारतीय प्रभुत्व को सौंप दिए गए।"  
उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद 370 को उसी तर्ज पर संवैधानिक एकीकरण प्रक्रिया में सहायता के लिए डिज़ाइन किया गया था, जैसा कि अन्य राज्यों के साथ हुआ था।  इसके अलावा, एक निश्चित अवधि में अनुच्छेद 370 के जारी रहने को इसके मूल उद्देश्य की विकृति के रूप में नहीं देखा जा सकता है।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि, "सीमावर्ती राज्य विशेष क्षेत्र हैं और उनके पुनर्गठन पर विशेष विचार की आवश्यकता है। इस प्रकार, न्यायालय, ऐसे राज्यों से संबंधित कार्यों के विकल्पों में, संसद की बुद्धिमत्ता का उल्लेख करेगा।"

० अनुच्छेद 370 को निरस्त करने से मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का समाधान हुआ।

एजी, आर वेंकटरमनी की प्रारंभिक बहस के बाद, सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने बहस शुरू की।  एसजी, तुषार मेहता ने कहा, "याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि, योर लॉर्डशिप, एक से अधिक मामलों और मायने में, एक ऐतिहासिक निर्णय लेंगे। 75 वर्षों के बाद यह पहली बार है कि, योर लॉर्डशिप, उन विशेषाधिकारों पर विचार करेंगे, जिनसे जम्मू-कश्मीर के नागरिक अब तक वंचित थे।"   
मामले की गहन प्रकृति को स्वीकार करते हुए। उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद 370 के अस्थायी या स्थायी होने को लेकर भ्रम की स्थिति ने, जम्मू-कश्मीर के भीतर एक 'मनोवैज्ञानिक द्वंद्व' पैदा कर दिया है। इस अनिश्चितता को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के साथ हल किया गया, जिससे स्पष्टता और एकता की भावना पैदा हुई।"

सॉलिसिटर जनरल ने, जोर देकर कहा, "तथ्यों को देखने के बाद, यह स्पष्ट हो जाएगा कि, अब जम्मू-कश्मीर के निवासियों को बड़ी संख्या में मौलिक अधिकार और अन्य अधिकार प्रदान किए जाएंगे, और वे पूरी तरह से, देश के, अपने बाकी भाइयों और बहनों के बराबर होंगे।"  
जम्मू-कश्मीर के विलय के इतिहास का उल्लेख करते हुए, एसजी ने दावा किया कि, "जिस क्षण विलय पूरा हुआ, जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता खो गई और यह भारत की बड़ी संप्रभुता में शामिल हो गई।

० जम्मू-कश्मीर आईओए में विशेष आरक्षण वाला एकमात्र रियासत नहीं था।

एसजी, तुषार मेहता की दलीलों के अगले चरण में जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष दर्जे के दावे को चुनौती दी गई।  इस धारणा के विपरीत कि, 1939 में अपने संविधान के कारण जम्मू-कश्मीर को ब्रिटिश भारत में एक विशेष स्थान प्राप्त था, जो बाद में भी जारी रहा, उन्होंने तर्क दिया कि 1930 के दशक के उत्तरार्ध के दौरान, कई रियासतें, उस समय के उपलब्ध, ख्यातनाम कानूनी विशेषज्ञों की सहायता से, अपने स्वयं के लिए, संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में थीं।"

उन्होंने कहा, "(उस समय) 62 राज्य थे जिनके पास अपने स्वयं के संविधान थे। यह तर्क कि जम्मू-कश्मीर को शुरू से ही विशेष दर्जा प्राप्त था जो आज तक जारी है, तथ्यात्मक रूप से गलत है।"  
एसजी, मेहता ने उल्लेख किया कि, "प्रसिद्ध कानूनी विशेषज्ञ अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर मध्य प्रदेश की एक रियासत के लिए, संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल थे।  हालाँकि, उनकी भागीदारी समाप्त हो गई क्योंकि उक्त रियासत उनकी फीस वहन नहीं कर सकी थी।"

उन्होंने आगे इस बात पर जोर दिया कि, "मणिपुर और पटना सहित कई राज्यों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के साथ-साथ संविधान निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, जो कुछ स्वायत्त विशेषताओं को बनाए रखते हुए भारत के बड़े ढांचे में एकीकृत होने के उनके इरादे का संकेत है।"
उन्होंने कहा, "मणिपुर ने 26 जुलाई 1947 को एक संविधान अपनाया, जिसमें मौलिक अधिकारों और शक्तियों के पृथक्करण का प्रावधान किया गया और महाराजा को इसके संवैधानिक प्रमुख के रूप में मान्यता दी गई। पटना (मध्य प्रांत वर्तमान मध्य प्रदेश की एक रियासत) के महाराजा ने 24 अक्टूबर 1947 को एक प्रतिनिधि संविधान बनाने वाली संस्था की स्थापना की घोषणा की। ये सभी रियासतें, अपना संविधान बनाने की प्रक्रिया में थे।"

हालाँकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि, "अंततः, एक बार भारत का संविधान बन जाने के बाद, प्रत्येक राज्य की संप्रभुता भारतीय प्रभुत्व में समाहित हो गई और एकमात्र संप्रभुता जो बची रही वह थी 'हम भारत के लोग'।"
उन्होंने तर्क दिया कि, "भारत का हिस्सा बनने वाले सभी राज्यों के पास अलग-अलग शब्दों में विलय के दस्तावेज थे और भारत का हिस्सा रहते हुए उन्हें आंतरिक स्वायत्तता का आनंद लेने के लिए भी कई प्रावधान बनाए गए थे।"  
आगे उन्होंने कहा, "संविधान बनाते समय 'स्थिति की समानता' (संविधान सभा का) लक्ष्य था। संघ के एक वर्ग को देश के बाकी हिस्सों को प्राप्त अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है।"

उन्होंने तर्क दिया कि विभिन्न रियासतों के आईओए में अलग-अलग बातें और प्राविधान थे। जिनमे, कुछ कराधान के संबंध में थे, तो कुछ भूमि अधिग्रहण के संबंध में। और साथ ही, यह कहते हुए कि, राज्य, भारत के भविष्य के संविधान को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होगा।"
अपनी दलीलें जारी रखते हुए एसजी तुषार मेहता ने कहना जारी रखा, "मैं यह सब (उदाहरण) यह स्थापित करने के लिए दिखा रहा हूं कि, यह रुख अपनाया गया है कि, हमारे पास एक विशिष्ट विशेषता थी और इसलिए हमें विशेष उपचार दिया गया था और यह प्रावधान, जो हमें दिया गया था, एक विशेषाधिकार था जिसे छीना नहीं जा सकता। मैं यह बता रहा हूं कि, कई रियासतें थीं। सभी रियासतों ने राज्य सिद्धांत के अधिनियम और अनुच्छेद 363 और अनुच्छेद 1 के कारण खुद को भारत संघ में शामिल कर लिया था।"

० भारत का हिस्सा बनने के लिए विलय समझौते पर अमल जरूरी नहीं।

एसजी, तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों द्वारा उठाए गए तर्कों का जिक्र करते हुए कहा कि, "विलय समझौता आवश्यक था और भारत के संघ के साथ पूर्ण एकीकरण के लिए एक पूर्व शर्त थी।"
उन्होंने तर्क दिया कि, "भारतीय राष्ट्र का हिस्सा बनने के लिए विलय समझौते का निष्पादन आवश्यक नहीं था।  उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी कई रियासतें थीं, जिन्होंने विलय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे और फिर भी वे केवल भारतीय संविधान लागू होने के समय विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के आधार पर भारत का हिस्सा बन गए।  
उन्होंने कहा, "कई राज्यों ने विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए! लेकिन जिस तारीख को भारत का संविधान और अनुच्छेद 1 लागू हुआ, वे भारत संघ का अभिन्न अंग बन गए।"

इस दलील पर, सीजेआई ने एसजी से उन सभी रियासतों की सूची प्रदान करने का अनुरोध किया, जिन्होंने भारत के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए और फिर भी भारतीय डोमिनियन का हिस्सा बन गए। एसजी ने सूची देने के लिए हामी भरी।

० निरस्तीकरण (अनुच्छेद 370 के) से पहले जम्मू-कश्मीर के साथ भेदभाव किया जा रहा था।

अपने तर्कों के माध्यम से, एसजी मेहता ने यह उजागर करने की कोशिश की कि, "जम्मू-कश्मीर के लोगों के खिलाफ, भेदभाव मौजूद था, क्योंकि 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त करने से पहले, (जम्मू कश्मीर) राज्य में भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू नहीं था।"
उन्होंने कहा, "1976 तक, अनुच्छेद 21 संक्षिप्त तरीके से लागू था। अनुच्छेद 19 में एक उप अनुच्छेद जोड़ा गया था, जिसे जम्मू-कश्मीर पर लागू किया गया था, कि, उचित प्रतिबंध वे होंगे, जो विधायिका द्वारा निर्धारित किए जाएंगे। जिसका अर्थ है कि, इसके खिलाफ व्यक्ति, कौन कौन से नागरिक अनुच्छेद 19 का उपयोग करते हैं, यह तय करेंगे कि, उचित प्रतिबंध क्या होंगे।"

इस संदर्भ में एसजी मेहता ने एन गोपालस्वामी अय्यंगार के भाषण का हवाला दिया जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था, “जम्मू और कश्मीर राज्य के अलावा व्यावहारिक रूप से सभी राज्यों के मामले में, उनके संविधान भी पूरे भारत के संविधान में शामिल किए गए हैं। वे सभी अन्य राज्य इस तरह से खुद को एकीकृत करने और प्रदत्त संविधान को स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए हैं।''
इस बिंदु पर, मौलाना हसरत मोहानी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा था, "कृपया यह भेदभाव क्यों?"
एसजी मेहता ने अपनी दलीलों में कहा कि, "यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि, भारत एक राज्य के लोगों के साथ दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभाव क्यों कर रहा है?

इसके बाद उन्होंने इस प्रश्न पर अय्यंगार की प्रतिक्रिया का एक अंश उद्धृत किया, “भेदभाव कश्मीर की विशेष परिस्थितियों के कारण है।  वह विशेष राज्य अभी इस प्रकार के एकीकरण के लिए तैयार नहीं है।  यहां हर किसी को आशा है कि समय आने पर जम्मू-कश्मीर भी उसी प्रकार के एकीकरण के लिए तैयार हो जाएगा जैसा कि अन्य राज्यों के मामले में हुआ है।  फिलहाल उस एकीकरण को हासिल करना संभव नहीं है.  ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से यह अब संभव नहीं है।"
अपने तर्कों में, एसजी मेहता ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि "इस 'भेदभाव' का व्यावहारिक परिणाम यह था कि दो संवैधानिक अंग- राज्य सरकार और राष्ट्रपति, एक-दूसरे के परामर्श से, संविधान के किसी भी हिस्से में अपनी इच्छानुसार संशोधन कर सकते हैं और इसे लागू कर सकते हैं।"  

जम्मू-कश्मीर के लिए.  इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा, "भारतीय संविधान की प्रस्तावना को 1954 में अनुच्छेद 370(1)(डी) के तहत एक संविधान आदेश के माध्यम से जम्मू-कश्मीर पर लागू किया गया था। इसके बाद, 42वें और 44वें संशोधन में, "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए।  इसे जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया गया था। 5 अगस्त 2019 तक, जम्मू-कश्मीर के संविधान में 'समाजवादी' या 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द नहीं था।"

० आंतरिक संप्रभुता को स्वायत्तता के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।

एसजी मेहता ने जोर देकर कहा कि, "याचिकाकर्ता 'आंतरिक संप्रभुता' को 'स्वायत्तता' के साथ जोड़ कर, भ्रमित कर रहे हैं। स्वायत्तता सभी राज्यों में निहित है क्योंकि वे भारत संघ की संघीय इकाइयाँ हैं।"  
इस पर सीजेआई ने टिप्पणी की, "यह (स्वायत्तता) वास्तव में हर संस्थान के साथ है। संवैधानिक मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए हमारे पास स्वायत्त प्राधिकरण है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि आंतरिक संप्रभुता हमारे पास है। हम संविधान के तहत एक स्वतंत्र, स्वायत्त संस्थान हैं। वे कह रहे हैं  इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमने बाहरी संप्रभुता को त्याग दिया है। वे कहते हैं कि घटनाक्रम और अनुच्छेद 370 को अपनाना यह संकेत देगा कि बाहरी संप्रभुता तो छोड़ी जा रही थी, लेकिन तत्कालीन महाराजा द्वारा प्रयोग की जाने वाली आंतरिक संप्रभुता भारत को नहीं सौंपी गई थी, हमारे संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार कर रहा है और संप्रभुता को उस संविधान को सौंप रहा है जहां संप्रभु "हम भारत के लोग" हैं।"

एसजी ने यह भी तर्क दिया कि उनके अनुसार, जम्मू-कश्मीर संविधान सभा एक विधायिका से ज्यादा कुछ नहीं है।  इस दलील पर सीजेआई ने कहा, "आखिरकार जब आप तर्क देते हैं कि यह एक संविधान सभा नहीं है, बल्कि अपने मूल रूप में एक विधान सभा है, तो आपको जवाब देना होगा कि, यह अनुच्छेद 370 के खंड (2) के अनुरूप कैसे है, जो विशेष रूप से कहता है कि, जम्मू कश्मीर का संविधान बनाने के उद्देश्य से संविधान सभा का गठन किया था। क्योंकि, एक पाठ्य उत्तर है जो आपके दृष्टिकोण के विपरीत हो सकता है। वैसे भी, हम उस पर बाद में चर्चा करेंगे।"

इसके साथ ही दिन भर की कार्यवाही समाप्त हो गई। सुनवाई अभी जारी है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (9) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/370-9.html 

Sunday, 27 August 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (9) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को भंग करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर संविधान पीठ की सुनवाई के नौवें दिन याचिकाकर्ता के वकीलों ने अपनी दलीलें पूरी कीं। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन, नित्या रामकृष्णन, मेनका गुरुस्वामी और वकील वरीशा फरासत ने बहस की। 

बहस की शुरुआत करते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा, 
० इस मामले के व्यापक निहितार्थ हैं, कश्मीर सिर्फ एक रास्ता है। 

वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने मामले की शुरुआत, प्रासंगिकता से करते हुए इस बात पर जोर दिया कि, "यह (याचिका और मुद्दा) केवल कश्मीर के बारे में नहीं है, बल्कि संविधान के व्यापक निहितार्थ और कार्यकारी शक्ति के संभावित दुरुपयोग के बारे में है।"  
उन्होंने कहा, "जब भी, कुछ भी, (कोई सोच या हमला) जो हमारे अधिकारों के करीब पहुंचता है या उनका अतिक्रमण करता है तो, उसे आपको, शुरू में ही खत्म कर देना चाहिए। यह उस चीज पर अतिक्रमण है, जिसे हम सबसे ज्यादा महत्व देते हैं, और वह है, हमारा संविधान। कश्मीर तो बस एक बहाना है।"

एडवोकेट शंकरनारायणन ने अगस्त 2019 के घटनाक्रम की तुलना 2018 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान की घटनाओं से की, जहां पाकिस्तानी सरकार ने संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से, स्थानीय स्वशासन को ही खत्म कर दिया। गिलगिट बाल्टिस्तान का उल्लेख करते हुए, शंकरनारायणन ने कहा, "प्रभावी रूप से, पाकिस्तान सरकार ने जो किया है वह (पाकिस्तान का उद्देश्य, गिलगिट बाल्टिस्तान पर) सीधा नियंत्रण रखना है और इसे प्रधान मंत्री के साथ एक परिषद को, सौंपना है। मैं खुद से पूछता हूं, क्या भारत, (इस दृष्टिकोण से पाकिस्तान से) अलग नहीं है? क्या हम संविधान द्वारा संचालित एक लोकतांत्रिक देश नहीं हैं? क्या हम वे नहीं हैं, कि, हम जो कुछ वादे (जनता से) करते हैं, उनका पालन करें जो, संविधान में मौजूद हैं, और जिस पर पांच संवैधानिक पीठों ने विचार किया है? या क्या, हम उन लोगों के उदाहरण का अनुसरण करने जा रहे हैं जिन्होंने, अपने प्रधानमंत्रियों को जेलों में डाल दिया?" 

यहां एडवोकेट शंकरनारायणन पाकिस्तान के शासन का दृष्टांत दे रहे हैं। अनुच्छेद 370 को, सीमांत नोट के अनुसार "अस्थायी" प्रावधान कहे जाने के मुद्दे को संबोधित करते हुए, शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि, "संविधान में कई प्रावधान भी, प्रकृति में अस्थायी थे" और उनके संदर्भ की जांच करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

० अनुच्छेद 367 का संभावित दुरुपयोग

इसके बाद शंकरनारायणन ने अनुच्छेद 367 के संभावित दुरुपयोग पर चर्चा की, जो संविधान के भीतर व्याख्या खंडों से संबंधित प्रावधान है। यहां, यह याद किया जा सकता है कि, वर्तमान मामले में, 5 अगस्त, 2019 को राष्ट्रपति द्वारा जारी संवैधानिक आदेश 272 ने अनुच्छेद 367 में परिभाषा खंडों में संशोधन करते हुए कहा कि, "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा" का अर्थ "जम्मू-कश्मीर की विधान सभा" होगा और "  जम्मू-कश्मीर सरकार" को "जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल" के रूप में समझा जाएगा।"
यहां यह सवाल और दलील, एडवोकेट शंकरनारायणन ने दी है कि, व्याख्या के खंडों का अनुच्छेद, संसद को मनचाही व्याख्या गढ़ने का अधिकार और शक्तियां नहीं देता है। 

आगे उन्होंने कहा, "यदि इस कार्रवाई (अनुच्छेद 367 के अधीन, मनचाही व्याख्या करने) की अनुमति दी जाती है, तो इसका मतलब यह होगा कि, कार्यपालिका, अनुच्छेद 368 के तहत प्रक्रिया का पालन करने के बजाय, अनुच्छेद 367 में ही एक साधारण संशोधन (अपनी सुविधा अनुसार) के साथ, शब्दों के अर्थ बदल सकती है, जैसे, संविधान के कुछ मूल प्रावधानों में संशोधन के लिए, यह निर्धारित है कि,  राज्य विधानसभाओं के बहुमत का अनुसमर्थन आवश्यक है। इस प्रकार, परिभाषा खंडों में संशोधन की आड़ में, मनमर्जी से ठोस संशोधन किये जा सकते हैं।"

एडवोकेट शंकरनारायणन, यह कहना चाहते हैं कि, संविधान संशोधन की प्रक्रिया जो अनुच्छेद 368 में दी गई है को, कोई भी सरकार बाईपास करके, अनुच्छेद 367 के माध्यम से परिभाषा और व्याख्या बदल कर, जो भी चाहे वह कर सकती है।
एडवोकेट शंकरनारायणन के ही शब्दों में, "यानी अनुच्छेद 368 जो संविधान संशोधनों की एक व्यापक शक्ति और प्रक्रिया देता है, से बचते हुए, व्याख्या खंड, यानी अनुच्छेद 367 के ही अनुसार, व्यख्याएं गढ़ कर, मनमर्जी से संविधान का संशोधन किया जा सकता है। फिर यह एक गंभीर और चिंताजनक परंपरा की शुरुआत होगी।"

एक अन्य उदाहरण से एडवोकेट शंकरनारायणन ने स्पष्ट किया कि, "उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 21 में 'व्यक्ति' शब्द की व्याख्या 'अपराध के आरोपी व्यक्ति' के रूप में की जा सकती है। अनुच्छेद 367 में, मैं एक व्याख्या खंड रखूंगा (इंट्रोड्यूस करूंगा) और कहूंगा कि, व्यक्ति का अर्थ अपराध का आरोपी व्यक्ति है। इसलिए अन्य सभी अधिकार, अनुच्छेद 21, खिड़की से बाहर (यानी समाप्त हो) हो जाएंगे"।
उन्होंने आगे कहा कि, "अनुच्छेद 367 का उपयोग करते हुए, सरकार यह कह सकती है कि "अनुच्छेद 368 में "आधे से कम राज्यों के विधानमंडल" वाक्यांश का अर्थ "राज्यसभा" या "कानून मंत्री" हो सकता है।"

इस बिंदु पर, सीजेआई चंद्रचूड़ ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, "आप ये सारे आइडिया दे रहे हैं, मिस्टर शंकरनारायणन।"
सीजेआई द्वारा हल्के फुल्के अंदाज में कही गई उपरोक्त टिप्पणी पर, सीनियर एडवोकेट शकारनारायणन ने कहा। 
"माई लॉर्ड, इसीलिए, कृपया इस पर एक हथौड़ा उठाएँ। माधवराव सिंधिया मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने कहा कि, वे क्या कर रहे हैं इसका परीक्षण करने के लिए हमें चरम उदाहरण लेने चाहिए। मैं यह दिखाने के लिए इन चरम उदाहरणों का सहारा ले रहा हूँ कि क्या उन्हें ऐसा करने की अनुमति है, भगवान ही जानता है कि, वे अभी और क्या क्या करेंगे!" 

 ० प्रिवी पर्स मामले का हवाला दिया गया

अपने तर्कों में, शंकरनारायणन ने प्रिवी पर्स मामले के फैसले (एच.एच.महाराजाधिराज माधव राव जीवाजी राव सिंधिया बहादुर और अन्य बनाम भारत संघ) का हवाला देते हुए कहा कि, "इसमें वर्तमान मामले के साथ, आश्चर्यजनक समानताएं हैं। वहां, सरकार ने संशोधन प्रक्रिया का पालन करने के बजाय, पूर्ववर्ती रियासतों के शासकों की मान्यता वापस लेने के लिए अनुच्छेद 366 का इस्तेमाल किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उक्त कार्रवाई को रद्द कर दिया। बाद में सरकार को प्रिवी पर्स ख़त्म करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।"
इस मिसाल का हवाला देते हुए उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि "लोकतंत्र में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन महत्वपूर्ण है।"
उन्होंने कहा, "कार्यपालिका संप्रभु नहीं है। हमारे संविधान में लोग संप्रभु हैं। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।"

० अनुच्छेद 356 का उपयोग अपरिवर्तनीय परिवर्तन करने के लिए नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत, राज्य की विशेष स्थिति को रद्द करने के लिए, लिए गए निर्णयों पर सवाल भी आगे उठाया। अनुच्छेद 356 के तहत "ऐसे आकस्मिक और परिणामी प्रावधान करने" की राष्ट्रपति की शक्ति का प्रयोग लोकतंत्र को बहाल करने के उद्देश्य से किया जाना है। अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर के, राज्य की तरफ से, राज्य की स्थिति में, कोई भी अपरिवर्तनीय बदलाव, नहीं किया जा सकता है।"
उन्होंने यहां एक और काल्पनिक उदाहरण का इस्तेमाल किया। "उदाहरण के लिए, एक राज्य ने, भारत संघ के विरुद्ध, उच्चतम न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। संघ, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकता है और राष्ट्रपति की "आकस्मिक और परिणामी प्रावधान" करने की शक्ति का प्रयोग, राज्य द्वारा संघ के खिलाफ दायर मुकदमे को वापस लेने का निर्णय करने के लिए किया जा सकता है।"

अन्य वकीलों ने भी अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन का उद्देश्य, राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली की संभावना की तलाश करना बताया है न कि, राज्य पर शासन करने की कोई स्थाई व्यवस्था है। 

सीनियर एडवोकेट, शंकरनारायणन ने याचिकाकर्ताओं के लिए तर्क समाप्त करते हुए, कुछ "चरम उदाहरणों" का उपयोग करते हुए तर्क दिया कि, "एक बड़ी शरारत के लिए, केंद्र के कार्यों को बरकरार रखना, एक बुरी मिसाल कायम कर सकता है, जिससे संशोधन (अनुच्छेद 368) के मार्ग का पालन करने के बजाय, अनुच्छेद 367 के तहत, परिभाषा और व्याख्या खंड को बदलकर, संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार, करते हुए, किया जा सकता है। यह याद रखना होगा कि, कार्यपालिका, सर्वोच्च नहीं हैं, लोग (हम भारत के लोग) सर्वोच्च हैं।

सीनियर एडवोकेट, शंकरनारायणन द्वारा दलीलें रखने के बाद, सीनियर एडवोकेट, नित्या रामकृष्णन ने अपनी दलीलें रखनी शुरू की। 

० एकीकरण केंद्र के नियंत्रण का उपाय नहीं।

वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने इस धारणा को चुनौती देते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं कि, "अनुच्छेद 370 अस्थायी था और 'अधिक एकीकरण' के साधन के रूप में कार्य करता था।"
उन्होंने अदालत से इस पारंपरिक धारणा पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया और तर्क दिया कि, "यह धारणा कि, अनुच्छेद 370 को अंतिम एकीकरण के लिए एक कदम के रूप में स्थापित किया गया था, मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।"
उन्होंने तर्क दिया कि, "एकीकरण, केवल केंद्रीय नियंत्रण का ही एक उपाय नहीं था, बल्कि एक जटिल प्रक्रिया थी जो प्रशासनिक शासन से, इतर और आगे तक फैली हुई है।" 
उन्होंने आगे कहा, "एकीकरण (कोई) यह पैमाना नहीं है कि, केंद्र के पास कितना नियंत्रण है। यह केंद्रीय नियंत्रण या शक्ति का कार्य नहीं है। यह कहना गलत होगा कि, केंद्र शासित प्रदेशों के लोग, अनुसूची VI के क्षेत्र के लोगों की तुलना में, अधिक एकीकृत हैं। ऐसा नहीं है कि, हमारा  लोकतंत्र ऐसे काम नहीं करता है।"

उन्होंने विस्तार से बताया कि, "एकीकरण के स्तर को केंद्र सरकार द्वारा प्रयोग किए गए नियंत्रण की डिग्री से नहीं, बल्कि साझी संप्रभुता और परस्पर लोकतांत्रिक समझौते से आंका जाना चाहिए, जो जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत में शामिल होने पर दर्ज किया था।"
उन्होंने, अदालत का ध्यान उस ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक संदर्भ की ओर आकर्षित किया, जिसने इस साझी संप्रभुता को आकार दिया गया और इस बात पर जोर दिया है कि, अनुच्छेद 370 इस साझेदारी के सार को दर्शाता है।"
नित्या रामकृष्णन ने अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर के लोगों की लोकतांत्रिक इच्छा का, शेष भारत के साथ विलय बताते हुए कहा, ''हम अब उनके एकीकृत होने का इंतजार नहीं कर रहे हैं।''

० अनुच्छेद 356 केवल कार्यों के अभ्यास या क्रियान्वयन की अनुमति देता है, न कि, शक्तियों की।

नित्या रामकृष्णन ने तब जोर देकर कहा कि, "क्षेत्र के लोकतांत्रिक लोकाचार को बनाए रखने के लिए, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार के बीच जांच और संतुलन की व्यवस्था, जैसा कि अनुच्छेद 370 में कल्पना की गई है, को बरकरार रखा जाना चाहिए।"
इस क्षेत्र में हालिया घटनाक्रम को संबोधित करते हुए, रामकृष्णन ने राज्यपाल शासन लागू करने और उसके बाद, राज्य विधानसभा को भंग करने की आलोचना की। उन्होंने, अनुच्छेद 370 में निहित साझी संप्रभुता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के आलोक में इस तरह की कार्रवाइयों की वैधता पर सवाल उठाया और आगे कहा, "70 वर्षों में, सभी पाँच संवैधानिक आदेश राष्ट्रपति शासन या राज्यपाल शासन के दौरान जारी किए गए हैं। एक 1986 में और चार '90-'96 के बीच वर्ष में राष्ट्रपति की उद्घोषणा की अवधि का विस्तार करते हुए।"

सीनियर एडवोकेट, नित्या रामकृष्णन के तर्कों का अगला चरण, संघ द्वारा अनुच्छेद 356 के प्रयोग पर केंद्रित था और कहा गया कि राष्ट्रपति केवल राज्य सरकार के कार्यों का प्रयोग कर सकता है, शक्तियों का नहीं। उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद 370 राज्य सरकार को शक्तियां प्रदान करता है, लेकिन केवल (रूटीन) कार्य करने के लिए।"  इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा, "कार्य एक कर्तव्य है. और शक्ति एक विवेक। यह एक जिम्मेदार राज्य सरकार को दी गई एक सामान्य शक्ति है।  इसे अनुच्छेद 356 के अंतर्गत (वापस) नहीं लिया जा सकता जो अनुच्छेद 370 के अधीन (उसे प्राप्त) है।”

अपने तर्क में, एडवोकेट, रामकृष्णन ने इस बात पर जोर दिया कि "अनुच्छेद 370 की शर्तों को बदलने के लिए एक जिम्मेदार राज्य सरकार की सहमति भी पर्याप्त नहीं होगी, और ऐसे किसी भी बदलाव की शुरुआत सीधे संविधान सभा से होनी चाहिए।"
अदालत के समक्ष बोलते हुए, रामकृष्णन ने दृढ़ता से तर्क दिया, "एक संविधान सभा एक विशेष एजेंसी का प्रतीक है, जो विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर के प्रतिनिधित्व के लिए समर्पित है। किसी भी बदलाव की सिफारिश एक ऐसी एजेंसी से आनी चाहिए जो जनादेश और कद में समान हो। आज, 1957 के बाद  , जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की तुलना में कोई एजेंसी (जो जनादेश और कद में) मौजूद नहीं है। जम्मू-कश्मीर के लोगों की इच्छा अनुच्छेद 370 में निर्दिष्ट शासन के तरीके का अभिन्न अंग है।"

० राज्यपाल द्वारा सदन का त्वरित विघटन दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने, चिंता व्यक्त की कि, "उचित संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अनुच्छेद 370 को संशोधित करने का कोई भी प्रयास अनुच्छेद में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है।"
उन्होंने उन प्रक्रियाओं के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के लोगों की लोकतांत्रिक इच्छाशक्ति के क्षरण की आलोचना की, जिन्हें वे "दुर्भावनापूर्ण" से प्रेरित मानती थीं।

एडवोकेट रामकृष्णन ने राज्यपाल शासन लागू करने और उसके बाद राज्य विधानसभा को भंग करने की परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राजनीतिक दलों द्वारा सरकार बनाने की इच्छा व्यक्त करने के 30 मिनट के भीतर सदन को तेजी से भंग करने पर सवाल उठाया। उन्होंने इस बात पर जोर देने के लिए व्हाट्सएप संदेशों और सार्वजनिक ट्वीट्स सहित साक्ष्य प्रस्तुत किए कि, "राज्यपाल का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया था और संभवत: इसमें उचित आधार का भी अभाव था।"

एडवोकेट रामकृष्णन ने, अपनी दलीलों के क्रम में यह सवाल उठाया, "राज्यपाल शासन इसलिए लगाया गया, क्योंकि एक पार्टी पीछे हट गई थी, और कोई अन्य राजनीतिक दल सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं था। इसी कारण से, यह नियम (अनुच्छेद 356) लागू किया गया था, किसी सुरक्षा मुद्दे या खतरे के कारण नहीं। फिर किस सांसारिक कारण से राज्यपाल को, 30 मिनट के भीतर विधानसभा भंग करनी पड़ी, जब, सदन में दो राजनीतिक दलों ने कहा था कि, वे सरकार बनाने के लिए तैयार हैं?"  

इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि, "राष्ट्रपति शासन की घोषणा और उसके बाद अनुच्छेद 370(1) के तहत राज्य सरकार के कार्यों पर राष्ट्रपति द्वारा अधिकार ग्रहण करना अनुच्छेद 356 के तहत स्वीकार्य नहीं था।" 
उन्होंने बताया कि, "अनुच्छेद 356 को राष्ट्रपति को अनुमति देने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि, राज्य सरकार के कार्यों को अपने हाथ में लें और राज्य विधायिका की संभावना को कम न करें।"
अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने कहा, "अक्टूबर 2019 में, एक दोस्त के साथ, मैंने घाटी का दौरा किया था। एक नाम जो घाटी के साथ गूंजता है, वह महात्मा गांधी का है। एक व्यक्ति जो अपने काम के लिए जीया और दिवंगत हो गया। किसी तरह, मामले का निर्णय करते समय, उस विरासत को ध्यान में रखा जाना चाहिए"।

सीनियर एडवोकेट, नित्या रामचंद्रन के बाद, सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया, 
० भारतीय संवैधानिक व्याख्या परिवर्तनकारी और व्यापक है। 

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की दलीलें संविधान के रचनाकारों के मूलभूत इरादों और वर्तमान मामले के लिए उनके निहितार्थों पर केंद्रित थीं।  उन्होंने अदालत की कार्यवाही के दौरान वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी के सामने रखे गए एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार के साथ शुरुआत की, "क्या मसौदा तैयार करने वाले या संविधान सभा के सदस्य के बयान को, लोगों की इच्छा पर लागू करने योग्य माना जा सकता है?"  
उन्होंने कहा कि, "इस प्रश्न ने एक मौलिक संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि, क्या किसी संविधान को संस्थापकों की मंशा के विपरीत तरीके से बदला जा सकता है?"

भारत के पहले प्रधान मंत्री के भाषण को याद करते हुए, जिसमें देश की आजादी की उथल-पुथल भरी, बलिदान और रक्तपात से भरी यात्रा पर प्रकाश डाला गया था, मेनका गुरुस्वामी ने संवैधानिक यात्रा में "संस्थापक" क्षणों पर प्रकाश डाला।  उन्होंने कहा कि "संवैधानिक व्याख्या के प्रति अदालत का दृष्टिकोण परिवर्तनकारी और व्यापक था।"
आगे उन्होंने कहा कि, "भारत की जटिल नींव के कारण यह सराहनीय भी है। इन न्यायशास्त्रीय सिद्धांतों को मसौदा तैयार करने वालों के संवैधानिक इरादे से वैधता प्राप्त हुई।"

इसके बाद उन्होंने पीठ का ध्यान जम्मू-कश्मीर संविधान के विशिष्ट प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 4 और 5 की ओर आकृष्ट किया, जिसके बारे में उनका तर्क था कि, "ये राज्य को दी गई अद्वितीय स्वायत्तता के प्रमाण हैं।" 
एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने बताया कि, "अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और उसके बाद के पुनर्गठन अधिनियम, जिसने राज्य की द्विसदनीय विधायी प्रणाली को भंग कर दिया, ने इस विशिष्ट स्वायत्तता को कमजोर कर दिया।"
जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 47 और 50 पर ध्यान आकर्षित करते हुए, उन्होंने राज्य की विधान सभा के भीतर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर जोर दिया।
एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा, "इस अद्वितीय, क्षेत्रीय निकाय का प्रावधान विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर के लिए किया गया था। यह निर्णय जानबूझकर लिया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य की विविधता को स्वीकार करना और इसके तीन क्षेत्रों: जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के हितों में सामंजस्य बिठाना था।"

एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी के बाद, वारिशा फरासत ने दलील शुरू की और कहा, 
० तीन पूर्व मुख्यमंत्री हिरासत में, कानून में स्पष्ट दुर्भावना। 

मामले में हस्तक्षेपकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रही वकील वारिशा फरासत ने भारत के संवैधानिक ढांचे के संदर्भ में अद्वितीय संघवाद की अवधारणा पर उत्साहपूर्वक चर्चा की।  फरासत की दलीलें जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के मद्देनजर पूर्व मुख्यमंत्रियों और विधान सभा के सदस्यों की नजरबंदी से उत्पन्न चुनौतियों पर केंद्रित थीं। फरासत ने अदालत को संबोधित करते हुए कहा, "माई लॉर्ड्स, तीन पूर्व मुख्यमंत्री, आपकी विधान सभा के एक महत्वपूर्ण हिस्से के साथ, हिरासत में थे। विधानसभा के माध्यम से लोगों की इच्छा का प्रयोग इन नजरबंदी से बाधित हुआ था, जिनमें से कई थे  सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत या आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 105 के तहत किया जाता है। यह स्थिति लगभग अस्वाभाविक है। यदि हम, एक ऐसे परिदृश्य की कल्पना करते हैं, जहां संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य और सभी राजनेता, जो वास्तव में प्रतिनिधि और समर्थक हैं, (जेल के) आधीन हैं, तो,  ऐसी बाधाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कानून में, स्पष्ट रूप से दुर्भावना का तत्व है।"

एडवोकेट, फरासत ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक नेताओं की नजरबंदी और राजनीतिक गतिविधियों पर लगाए गए प्रतिबंधों के महत्वपूर्ण प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने तर्क दिया कि, "इन कार्रवाइयों ने क्षेत्र (जम्मू कश्मीर राज्य) के भीतर लोकतंत्र के कामकाज के बारे में चिंताएं बढ़ा दी हैं और इसके बारे में भारतीय राज्य की लोकतांत्रिक प्रकृति के बारे में, संदेह उपजाया है।"

एक अन्य याचिकाकर्ता, जो जम्मू-कश्मीर में छात्रों को भारतीय राजनीति पढ़ाते हैं, ने अदालती कार्यवाही के दौरान अपनी गहरी चिंता व्यक्त की।  उन्होंने क्षेत्र में छात्रों को भारतीय संविधान और लोकतंत्र के सिद्धांतों को सिखाने की कोशिश करते समय आने वाली कठिनाई पर जोर दिया। याचिकाकर्ता ने साझा किया, "यह मेरे जैसे शिक्षकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, जब हम जम्मू-कश्मीर में अपने छात्रों को इस सुंदर संविधान के सिद्धांतों और लोकतंत्र के आदर्शों को पढ़ाते हैं। छात्र अक्सर एक कठिन सवाल पूछते हैं, "क्या हम
अगस्त 2019 की घटनाओं के बाद, अभी भी लोकतंत्र हैं? इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।"
सुनवाई अभी जारी है।

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (8) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/370-8.html

Friday, 25 August 2023

क्या आधुनिक विज्ञान, का स्रोत वेद हैं ? / विजय शंकर सिंह


इसरो के प्रमुख डॉ. सोमनाथ ने कहा है कि, अंतरिक्ष विज्ञान वेदों में था और आज के विज्ञान के सिद्धांत वेदों से ही आए हैं। मैने न वेद पढ़ा है और न ही अंतरिक्ष विज्ञान, पर अक्सर यह कहते सुनता हूं कि, यह सब वेदों में है। सोमनाथ सर तो, वेद पढ़े ही होंगे और अपने विषय के तो वे माहिर हैं ही। उन्हे या, उन सारे लोगों को, जो वेदों को विज्ञान का स्रोत बताते और मानते हैं, हम जैसे इस क्षेत्र के अज्ञानियो के ज्ञानवर्धन के लिए, वेदों की ऋचाओं सहित यह बात बतानी चाहिए कि, किस वेद के किस किस मंडल में, विज्ञान की बात कही गई है। 

अब एक नजर डॉ. एस सोमनाथ की पृष्ठभूमि पर डालते हैं। एस सोमनाथ, अंतरिक्ष विभाग के सचिव और अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष हैं और उन्होंने, टीकेएम कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, कोल्लम से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री पूरी की है।  उन्होंने स्वर्ण पदक के साथ संरचना, गतिशीलता और नियंत्रण के क्षेत्र में विशेषज्ञता भी हासिल  की है। टीकेएम कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की नींव 1956 में रखी गई थी और इसका उद्घाटन 3 जुलाई 1958 को हुआ था। यह केरल का पहला सरकारी सहायता प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेज है। यह सूचना इंडियन एक्सप्रेस अखबार से ली गई है। अब मुझे यह पता नहीं कि, बीटेक एमटेक के पाठ्यक्रम में, वेदों से कोई विषय रहा है या नहीं। 

आज का युग, सबकुछ तुरंत मान लेने का युग नहीं है। और वेदों, उपनिषदों का काल खंड भी तो, सबकुछ, तुरत फुरत और यथाकथा मान लेने का युग नहीं रहा है। हर ज्ञान पर सवाल उठता रहा है, शास्त्रार्थ होते रहे हैं और सत्य की तह तक जाने की जद्दोजहद होती रही है। सब कुछ वेदों में है, यह धारणा, वेदों पर भी सवाल उठाती है और एक सामान्य जिज्ञासा उभर आती है कि, सब कुछ वेदों में कहां है। वेद अब पिघले सीसे के दौर के नहीं रहे और न ही दुरूह और अपाठ्य हैं। दुनियाभर की भाषाओं में इनके अनुवाद उपलब्ध हैं और इनका अध्ययन हो भी रहा है। फिर वेदों में विज्ञान है, पर कोई शोध, क्या किसी शीर्ष वैज्ञानिक संस्था जैसे आईआईटी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने किया है? 

मोटे तौर पर हमें यह जानकारी है कि, वेद में कविताएं हैं, साहित्य हैं, देव स्तुतियां है, दाशराज्य युद्ध के वर्णन है, इंद्र की प्रशंसा है, संगीत है, जादू टोना जैसा भी कहीं कहीं कुछ है। अंतरिक्ष के प्रति जिज्ञासा है, चांद तारों को लेकर भी कहीं न कहीं कुछ लिखा है, पर यह सब उत्कंठा है, जिज्ञासा है, कोई समाधान नहीं है। उपनिषदों में, दर्शन है और पुराणों में इतिहास, लेकिन ऐसा इतिहास जो, अयस्क रूप में है, जिसका शोधन कर के, इतिहास निकलना पड़ता है। 

चरक और सुश्रुत संहिता जैसी आयुर्वेद के ग्रंथ हैं, साथ ही, आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि के खगोल अध्ययन के कुछ सूत्र, स्थापनाएं और धारणाएं हैं। पर आधुनिक विज्ञान का स्रोत वेद है, इसे स्पष्ट रूप से, वेद के पंडितो को, संसार के सामने लाना होगा। जब कोई भी व्यक्ति केवल सामान्यीकरण करते हुए कह देता है कि, वेदों से ही विज्ञान निकला है तो, यह धारणा, उतनी उत्कंठा नही जगाती है, जितनी कि, सोमनाथ जैसे एक मान्यताप्राप्त वैज्ञानिक के कहने पर, मस्तिष्क में अनेक सवाल उठ खड़े होते हैं। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh