Saturday, 14 October 2023

अडानी समूह पर कोयला घोटाले का आरोप, फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट, बिजली के दाम पर असर और सरकार की चुप्पी / विजय शंकर सिंह

ब्रिटेन के अखबार, फाइनेंशियल टाइम्स ने अडानी समूह के एक ऐसे घोटाले को उजागर किया है, जिसका बोझ देश के हर नागरिक पर पड़ रहा है। वह बोझ है, बिजली की लगातार बढ़ती कीमतों का। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, अडानी समूह ने बाजार मूल्य से,  काफी अधिक कीमत पर अरबों डॉलर मूल्य का कोयला आयात किया है। इससे यह संदेह पैदा हो गया है कि, देश का सबसे बड़ा निजी कोयला आयातक, जानबूझकर ईंधन की लागत बढ़ा रहा है और, उस बढ़ी लागत का भार, आम उपभोक्ताओं से लेकर कामर्शियल बिजली उपभोक्ताओं को, अधिक भुगतान करने के लिए मजबूर कर दे रहा है। लंदन स्थित फाइनेंशियल टाइम्स ने जुलाई 2021 से सीमा शुल्क रिकॉर्ड की जब पड़ताल की तो यह निष्कर्ष निकला कि अडानी समूह ने "बाजार कीमतों के लिए अधिक प्रीमियम पर कोयले के लिए, तीन कंपनियों को कुल 4.8 बिलियन डॉलर का भुगतान किया।" रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, ताइवान, दुबई और सिंगापुर स्थित, तीन ऑफशोर बिचौलियों को "काला प्रीमियम" प्राप्त हुआ जो "कई बार बाजार मूल्य के दोगुने से भी अधिक" था। यानी बाजार मूल्य से दुगुने पर अडानी ने कोयला विदेशों से आयात किया। 
अडानी समूह के खिलाफ घपले और घोटाले का, यह कोई पहला खुलासा नहीं है। आर्थिक मामलों में देश के प्रसिद्ध पत्रकार, परंजोय गुहा ठाकुरता और रवि नायर ने साल 2016 से ही अडानी समूह द्वारा लगातार किए जा रहे घोटालों, वित्तीय अनियमितताओं के बारे में, अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करते रहे हैं, पर सरकार की जांच एजेंसियों ने, चाहे वह प्रवर्तन निदेशालय हो या सीबीआई हो या सेबी हो, या कोई और, किसी ने कोई भी कार्यवाही करने की हिम्मत नहीं दिखाई। जबकि अडानी समूह ने, पत्रकार परंजोय गुहा ठाकुरता के खिलाफ मानहानि के कई केस कर दिए। हिंडनबर्ग खुलासे के बाद यह अब तक की सबसे ताजा खुलासा है, जो किसी विदेशी अखबार में छपा है, जिसके बाद,  अडानी समूह ने चुप्पी साध रखी है। अडानी समूह अभी तक,  जनवरी में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के कई खुलासे से, जिसने अदानी समूह के शेयरों में, बड़े पैमाने पर, गिरावट ला दी थी, और समूह अभी उसी से जूझ ही रहा था, तब तक फाइनेंशियल टाइम्स ने यह एक ऐसा खुलासा कर दिया, जिसका, असर देश के हर व्यक्ति पर पड़ रहा है।

फाइनेंशियल टाइम्स की इस खोजी रिपोर्ट के आने की भनक लगते ही, अडानी समूह ने संभावित स्टोरी का खंडन करना शुरू कर दिया था और अदालत में जाने की धमकी भी दी थी। एक रोचक तथ्य यह भी है कि, हिंडनबर्ग के खिलाफ भी अडानी ने, अदालती कार्रवाई की धमकी दी थी, पर आज तक अडानी समूह, उक्त अमेरिकी शॉर्ट सेलर कंपनी के खिलाफ, अदालत जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। जब अडानी समूह को यह पता चला कि, एफटी के पत्रकारों ने, अडानी समूह द्वारा कोयला आयात की विस्तृत जांच शुरू कर दी है तो, उसने, द टेलीग्राफ के एक लेख के अनुसार, "एफटी के कार्यालय पर,  हंगामा करना, कॉल करना, प्रश्नावली ईमेल करना और यहां तक ​​​​कि सिंगापुर में एक कार्यालय के दरवाजे के नीचे से लिखित प्रश्न भेजना शुरू कर दिया था," और यह भी धमकी दी थी कि, "उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स की आगामी रिपोर्ट को खारिज करने के लिए शेयर बाजार में नियामक फाइलिंग करने का अभूतपूर्व कदम उठाया है।" पर फाइनेंशियल टाइम्स पर कोई असर नहीं पड़ा और उसने कोयला आयात में किया जा रहा घोटाला उजागर कर दिया। 

अडानी ने एफटी पर अपने वही पुराने आरोप दुहराए, जो वह हर खुलासे के बाद, कहता रहता है कि, "अखबार की मंशा, अडानी समूह की छवि खराब करने की है।" समूह ने, एफटी पर दुर्भावनापूर्ण पूर्वाग्रह और हंगरी में जन्मे अमेरिकी निवेशक, जॉर्ज सोरोस और उनके द्वारा वित्त पोषित पत्रकार नेटवर्क जिसे, संगठित अपराध और भ्रष्टाचार परियोजना कहा जाता है, के साथ मिलीभगत करने का भी आरोप लगाया था। अडानी समूह ने यह भी कहा कि, "ये आरोप एक सीमा शुल्क न्यायाधिकरण के समक्ष जांच के समक्ष स्थापित नहीं हुए थे और राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), जो मामले को आगे बढ़ा रहा था, को इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था।"

अडानी समूह के इस बयान ने फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में, आर्थिक मामलों में रुचि रखने वालों की भारी दिलचस्पी पैदा कर दी थी। जब यह खोजी रिपोर्ट, प्रकाशित हुई, तो, उससे लगा कि, अखबार की पड़ताल बेहद गहरी है और खोजी पत्रकारों ने नवीनतम तकनीक और सूचनाओं के साथ यह रिपोर्ट तैयार की है। एफटी ने, भारत और इंडोनेशिया में सीमा शुल्क डेटाबेस का पता लगाया, शिपमेंट का मिलान किया, नौकायन कार्यक्रम का दायरा बढ़ाया और यहां तक ​​कि, आरोपों का एक बिल्कुल नया सेट तैयार करने के लिए एक उपग्रह डेटा कंपनी की सेवाओं का भी उपयोग किया था। लेकिन अडानी समूह के एक अधिकारी ने, एफटी के खुलासे के बाद कहा कि, वह सोमवार रात यानी, खोजी रपट के प्रकाशित होने के पहले, अपने जारी किए गए बयान पर, कायम है। कंपनी ने उस बयान में कहा था, "एफटी की प्रस्तावित कहानी डीआरआई के 30 मार्च 2016 के सामान्य अलर्ट सर्कुलर पर आधारित है।"

जबकि यह खोजी रिपोर्ट , 30 मार्च 2016, के लेख से अलग और अधिक तथ्यात्मक तथा सुबूतों से भरी है। एफटी ने, इस आधार पर अपनी जांच शुरू की थी कि, भले ही डीआरआई में अडानी का मामला लड़खड़ा गया था, लेकिन यह मानने के, पर्याप्त कारण हैं कि, अडानी समूह ने, कोयला आयात करने के लिए, 'बढ़ा कर बिलिंग' करने की परिपाटी को, छोड़ा नहीं है। फाइनेंशियल टाइम्स ने गौतम अडानी को "मोदी का रॉकफेलर" बताते हुए, अपनी रिपोर्ट में, लिखा है, "डीआरआई जांच की अनसुलझी प्रकृति और कुछ घटनाओं की, बार बार होने वाली स्पष्ट निरंतरता, अडानी समूह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन के बीच मौजूद परस्पर गहन संबंधों पर, नए सवाल उठाती है।" एफटी के अनुसार, अडानी समूह ने, भारत में कोयला आयात करने के लिए, तीन बिचौलियों की कंपनियों का उपयोग किया। एक, हाय लिंगोस जो ताइपे में एक आवासीय पते से ऑपरेट करती थी, दूसरी, दुबई स्थित टॉरस नामक कंपनी, और तीसरी, पैन एशिया ट्रेडलिंक नामक एक छोटी सी फर्म जो सिंगापुर में है। इन सबके बारे में अखबार ने अपनी पड़ताल में दावा किया है कि, " यह सब, अडानी समूह के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा संचालित हैं।"

अखबार ने सबसे पहले अपना ध्यान, कुल 73 मिलियन टन कोयले के 2,000 शिपमेंट पर केंद्रित किया, और उनकी पड़ताल गहनता से शुरू कर दी, जिन्हें सितंबर 2021 और जुलाई 2023 के बीच अडानी समूह द्वारा आयात किया गया था, और यह डीआरआई जांच में कवर नहीं हुआ था। "73 मिलियन टन कोयले में से 42 मिलियन टन के शिपमेंट, अडानी समूह द्वारा स्वयं किए गए थे और औसतन 130 डॉलर प्रति टन की कीमत घोषित की गई थी।" अखबार ने कहा कि, "शेष 31 मिलियन टन की आपूर्ति तीन बिचौलियों द्वारा की गई थी। इन तीन फर्मों द्वारा आपूर्ति किए गए कोयले के लिए घोषित औसत मूल्य $155 था, जो $800 मिलियन का 20 प्रतिशत प्रीमियम था।" हाय लिंगोस, जिसका स्वामित्व ताइवान के व्यवसायी चांग चुंग-लिंग के पास है, ने ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से 428 शिपमेंट में 12.9 मिलियन टन कोयले की आपूर्ति की।  कंपनी द्वारा आपूर्ति किए गए कोयले के लिये अडानी समूह ने लगभग 2 बिलियन डॉलर का भुगतान किया था।

 31 अगस्त को प्रकाशित फाइनेंशियल टाइम्स की एक पूर्व रिपोर्ट में चांग की पहचान गौतम अडानी के बड़े भाई, विनोद अडानी के करीबी सहयोगी के रूप में की जा चुकी है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट में भी इस चीनी व्यापारी का उल्लेख है। एफटी लिखता है, "चांग 2013 और 2017 के बीच अडानी समूह की तीन कंपनियों में, सबसे बड़े शेयरधारकों में से एक था। उसकी एक हिस्सेदारी जो कई टैक्स हेवन में स्थित कंपनियों की भूलभुलैया के माध्यम से पैसा लगाकर बनाई गई थी।" निश्चित रूप से यह मनी लांड्रिंग का एक महत्वपूर्ण मामला है पर आज तक ईडी ने इस अपनी नजरे इनायत नहीं की है। एफटी के अनुसार, "चांग का एक  कथित साथी, नासिर अली शाबान अहली नामक एक यूएई व्यवसायी है, जिसने मिड ईस्ट ओशन ट्रेड, मॉरीशस के माध्यम से अडानी कंपनियों में धन भेजा था, जिसमें अहली लाभकारी मालिक था;  और गल्फ एशिया ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (बीवीआई) जहां अहली, उसका "नियंत्रक व्यक्ति" था।"
एफटी की नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि, "कोयला शिपमेंट में दूसरा बिचौलिया दुबई स्थित टॉरस था, जिसका मालिक मोहम्मद अली शाबान अहली है।" अखबार इसे और स्पष्ट करते हुए कहता है कि, " दोनों नाम सुनने में एक जैसा लगता है लेकिन यह स्थापित नहीं हो सका कि मोहम्मद नासिर का रिश्तेदार था या नहीं।"

अखबार के खोजी पत्रकारों द्वारा खंगाले और पड़ताल किए गए भारतीय कस्टम्स रिकॉर्ड के अनुसार, "अडानी ने सितंबर 2021 से आपूर्ति किए गए 11.3 मिलियन टन कोयले के लिए टॉरस को 1.8 बिलियन डॉलर का भुगतान किया। लेकिन सबसे दिलचस्प खिलाड़ी पैन एशिया ट्रेडलिंक था जिसने "सितंबर 2021 से अदानी को 1.1 बिलियन डॉलर में 6.6 मिलियन टन कोयले की आपूर्ति की।" अखबार ने यह भी दावा किया है कि, "169 डॉलर प्रति टन की औसत कीमत अडानी द्वारा खुद से मंगाए गए कोयले की कीमत से 30 प्रतिशत अधिक थी।" अखबार ने, पहले की अवधि से संबंधित कोयला आयात पर डेटा के एक और सेट पर गौर किया जो, जनवरी 2019 और अगस्त 2021 के बीच थी। इस अवधि के दौरान, अखबार इंडोनेशिया से शिपमेंट और भारत में आगमन का मिलान करने में सक्षम था।

जांच इस अवधि पर इसलिए भी केंद्रित थी कि, भारत और इंडोनेशिया दोनों का सीमा शुल्क डेटा उपलब्ध था, जिससे, शिपमेंट के दस्तावेजों का मिलान संभव हो सका। अगस्त 2021 के बाद, इंडोनेशियाई सीमा शुल्क के रिकॉर्ड, अखबार के खोजी पत्रकारों को उपलब्ध नहीं हो पाए थे। आंकड़ों के इस ढेर में से, एफटी ने कुल 3.1 मिलियन टन की "30 प्रतिनिधि नौकायन" को,  पड़ताल हेतु, अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए चुना। एफटी का कहना है कि, "इंडोनेशिया में कोयले की कीमत 139 मिलियन डॉलर थी।  इसमें शिपिंग और बीमा लागत में $3.1 मिलियन और जोड़ा गया। हालाँकि, अडानी समूह ने शिपमेंट का मूल्य 215 मिलियन डॉलर घोषित किया, इस प्रकार, "इन यात्राओं ने 73 मिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया जिसमें 52 प्रतिशत लाभ का मार्जिन था।" अखबार आगे लिखता है, कि "कोयला व्यापार एक उच्च मात्रा वाला प्रतिस्पर्धी व्यवसाय है, जहां लाभ मार्जिन आमतौर पर "कम एकल अंक" में होता है।"

अडानी समूह की सबसे पुरानी और सबसे मूल्यवान कंपनी, अडानी एंटरप्राइजेज, अपनी बिक्री और मुनाफे का बड़ा हिस्सा अपने कोयला व्यापार प्रभाग, जिसे इंटीग्रेटेड रिसोर्सेज मैनेजमेंट कहा जाता है, से प्राप्त करती है। अखबार में आगे कहा गया है कि, "2023 में कंपनी की कुल बिक्री में, आईआरएम राजस्व का हिस्सा 72 प्रतिशत था।" एफटी रिपोर्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि, "कोयले की कीमत कैसे बढ़ी, यह समझने के लिए इसने (अखबार ने) एक शिपमेंट को ट्रैक किया।" जनवरी 2019 में, डीएल अकेशिया नामक एक थोक वाहक भारत में एक बिजली संयंत्र के लिए 74,820 टन थर्मल कोयला लेकर पूर्वी कालीमंतन में कलियोरंग के इंडोनेशियाई बंदरगाह से रवाना हुआ। अखबार ने लिखा: “यात्रा के दौरान, कुछ असाधारण हुआ: इसके माल का मूल्य दोगुना हो गया। निर्यात रिकॉर्ड में कीमत $1.9 मिलियन और शिपिंग और बीमा के लिए $42,000 थी।  अडानी द्वारा संचालित भारत के सबसे बड़े वाणिज्यिक बंदरगाह, गुजरात के मुंद्रा में पहुंचने पर, घोषित आयात मूल्य 4.3 मिलियन डॉलर हो गया था।"

अखबार को पता था कि, "कोयले की कीमतें उसकी गुणवत्ता और कैलोरी मान के आधार पर व्यापक रूप से भिन्न होती हैं।" इसमें कहा गया है कि, "बिचौलियों द्वारा आपूर्ति किया गया अधिकांश कोयला कैलोरी मान के आधार पर उच्च गुणवत्ता का था, जो दहन पर निकलने वाली कुल ऊर्जा है।" इसलिए, तब एफटी ने, डेटा प्रदाता, आर्गस से प्राप्त इंडोनेशियाई कोयले के लिए एक बेंचमार्क के मुकाबले बिचौलियों द्वारा आपूर्ति किए गए कोयले की तुलना की। इंडोनेशिया से आने वाले 311 शिपमेंट थे, जहां कैलोरी मान घोषित किया गया था। अखबार में कहा गया है, "कुछ को छोड़कर सभी की कीमत निकटतम आर्गस बेंचमार्क कीमत से अधिक थी।" अक्सर, उनकी कीमत,  बेंचमार्क से बहुत अधिक थी। अगस्त 2022 में 5,004 किलो कैलोरी के घोषित कैलोरी मान के साथ बनाई गई हाय लिंगोज़ की एक शिपमेंट की कीमत 179 डॉलर प्रति टन थी अखबार ने कहा, "पिछले तीन महीनों में आर्गस 5000 कैलोरी बेंचमार्क की उच्चतम कीमत 145 डॉलर प्रति टन थी।"

अडानी पर यह पहला घोटाला खुलासा नहीं है। इससे बड़े खुलासे और हुए हैं पर  हैरानी की बात यह है कि, इस सरकार के, कार्यकाल में, कभी भी, किसी जांच एजेंसी जैसे ईडी, सीबीआई, आयकर, डीआरआई आदि ने न तो कोई नोटिस जारी की और न ही किसी तरह की जांच ही की। ईडी जो, लगभग हर विपक्षी नेता जो इंडिया गठबंधन में है के खिलाफ, अक्सर सक्रिय रहती है, उसे, अडानी के, शेल कंपनियों द्वारा मनी लांड्रिंग कर किए गए निवेश, दिखते नहीं हैं और वह, इन आरोपों पर चुप्पी साधे है। इसका एक बड़ा कारण है, गौतम अडानी का, पीएम नरेंद्र मोदी जी से निकटता। हिंडनबर्ग खुलासा, खोजी पत्रकारों के समूह द्वारा किया गया खुलासा, एफटी का कोयला घोटाला का यह ताजा खुलासा, संसद में विपक्ष के आरोप और सत्यपाल मलिक के सबसे अधिक विस्फोटक आक्षेप कि, "अडानी का सारा पैसा मोदी जी का पैसा है" के बयान के बाद, सरकार की चुप्पी और संसद में अडानी मोदी रिश्ते पर सवाल उठने पर, सांसद का निलंबन और अडानी से जुड़े भाषणों को सदन की कार्यवाही से विलोपित कर देने की कार्यवाही, इसी बात की ओर संकेत करती है कि, अडानी का प्रभाव, और अडानी की सत्ता पर पकड़ कितनी मजबूत है।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Wednesday, 11 October 2023

इजराइल द्वारा फिलिस्तीन की भूमि का अवैध कब्जा, फिलिस्तीन इजराइल विवाद का कारण है / विजय शंकर सिंह

सन 1948 में जैसे ही इजराइल अस्तित्व में आया, उसने फिलिस्तीन की भूमि जबरन कब्जा करनी शुरू कर दी। उसके इस अवैध विस्तार के खिलाफ कोई आवाज यूएस और ब्रिटेन ने नहीं उठाई। एक तो यहूदी होम लैंड के नाम पर, इजराइल का गठन ब्रिटेन ने किया, और दूसरे जब इजराइल ने अपना सीमा विस्तार, फिलिस्तीन की जमीन को अवैध कब्जा करके करना शुरू किया तो, इसे इजराइल का अनुशासन, उन्नति, प्रगति और आत्मविश्वास कह कर इसे प्रचारित किया गया। 

जब इजराइल अपनी निर्धारित राज्य सीमा को लांघ कर फिलिस्तीन में घुस रहा था तब न तो, यूएनओ ने कोई हस्तक्षेप किया, और न ही किसी पश्चिमी देश ने इजराइल को रोका। ब्रिटेन तो, साम्राज्य गंवा कर, अपना घाव सहला रहा था, और अमेरिका, जो एक नई विश्व शक्ति बन गया था, को तो अपने देश से सैकड़ों किमी दूर एशिया में एक ऐसा देश मिलने जा रहा था, जो उसके शीत युद्ध, जो बाद में एक बड़ी वैश्विक गतिविधि होनी थी, के लिए मददगार साबित हो सकता था। 

इजराइल के अवैध सीमा विस्तार और पाकिस्तान का कबायली हमला जो, आजादी के तुरंत बाद हुआ था, अपने तयशूदा सीमा से बाहर जाकर दूसरे देश में सैन्य अतिक्रमण के मिलते जुलते उदाहरण हैं। दोनों ही देशों इजराइल और पाकिस्तान ने अपने गठन के तुरंत बाद, अपनी सीमा का विस्तार करना शुरू कर दिया और इस अवैध सीमा विस्तार के पीछे दोनो के ही तर्क समान थे। 

इजराइल, उस इलाके को, यहूदियों का राज्य कहता है और इतिहास को दो हजार साल पीछे ले जाता है और पाकिस्तान, कश्मीर पर अपना स्वाभाविक हक, कश्मीर के मुस्लिम बहुल राज्य होने के कारण मानता है। यह समता, धर्म आधारित राज्य की अवधारणा का परिणाम है। जो मित्र,  इजराइल के, फिलिस्तीन भूमि के अवैध कब्जे को नजरंदाज करके आज इजराइल के पक्ष में खड़े हैं क्या वे यही तर्क, पीओके के बारे में सुनना चाहेंगे ? 

इजराइल जब एक देश बना तो तर्क था कि, यहूदियों का कोई एक होम लैंड नहीं है, अतः उन्हे वही जगह दी गई जो जगह हजरत मूसा को फिरौन ने दासत्व से मुक्त कर उनके कबीले बनी इजराइल के लिए दिया था। और येरूशलम उस नए राज्य की राजधानी बनी जो तीनों अब्राहमी धर्मों से जुड़ी हुई मानी जाती है। 

इस नए राज्य का विरोध तब भी हुआ था, और फिलिस्तीन में तब भी आक्रोश और असंतोष था। पर उस आक्रोश और असंतोष को कम करने के लिए किसी दोस्ताना एजेंडे पर, न तो इजराइल आगे बढ़ा और न ही यूएनओ और न ही इजराइल को अस्तित्व में लाने वाली ब्रिटेन, यूएसए जैसी पश्चिमी ताकतों ने कोई प्रयास किया। 

सन 1948 से, पश्चिम एशिया एक बड़े युद्ध का केंद्र बनने के लिए अभिशप्त है और इस मुद्दे पर पूरी दुनिया अलग अलग दो विचारों में बंटी हुई है। एक इजराइल के पक्ष में तो दूसरा फिलिस्तीन के साथ है। इजराइल और पाकिस्तान, यह भी एक विडंबना है कि, दोनो एक दोनों के विपरीत अपने अपने ध्रुवों पर खड़े हैं ने, अपने पड़ोसी देशों की भूमि कब्जा कर रखी है जो तनाव, संघर्ष और युद्धों का कारण बना हुआ है। 

जब तक इजराइल, फिलिस्तीन की कब्जा की गई अवैध भूमि नहीं छोड़ेगा यह संघर्ष, विवाद और युद्ध की घटनाएं होती रहेंगी।  यही हाल भारत पाक के आपसी तनाव और विवाद का भी है। समस्या, इजराइल नामक एक नए देश के अस्तित्व से नहीं है, इसे तो लगभग सभी देशों ने मान्यता दे रखी है। समस्या, इजराइल द्वारा उस भूमि पर अवैध कब्जे की है जो इजराइल अपने जन्म के समय से ही बराबर किए जा रहा है। 

इस विवाद पर विश्व के महत्वपूर्ण नेताओं की यह प्रतिक्रिया भी पढ़े...

The Zionist argument to justify Israel's present occupation of Arab Palestine has no intelligent or legal basis in history... not even in their own religion.
~ MALCOLM X 

अरब फ़िलिस्तीन पर इज़राइल के वर्तमान कब्जे को सही ठहराने के ज़ायोनी तर्क का इतिहास में कोई तार्किक या कानूनी आधार नहीं है... यहां तक ​​कि उनके अपने धर्म में भी नहीं।
~ मैल्कम एक्स
००
It would be my greatest sadness to see Zionists (Jews) do to Palestinian Arabs much of what Nazis did to Jews
~ ALBERT EINSTEIN

 यह देखकर मुझे सबसे अधिक दुख होगा कि ज़ायोनीवादियों (यहूदियों) ने फ़िलिस्तीनी अरबों के साथ वही सब किया जो नाज़ियों ने यहूदियों के साथ किया था।
~ अल्बर्ट आइंस्टीन
०० 
We know too well that our freedom is incomplete without the freedom of the Palestinians.
~ NELSON MANDELA 

हम अच्छी तरह जानते हैं कि फिलिस्तीनियों की आज़ादी के बिना हमारी आज़ादी अधूरी है।
~ नेल्सन मंडेला
०० 
Palestine belongs to the Arabs in the same sense that England belongs to the English or France to the French. It is wrong and inhuman to impose the Jews on the Arabs.
~ MAHATMA GANDHI 

फ़िलिस्तीन उसी प्रकार अरबों का है जिस प्रकार इंग्लैंड अंग्रेज़ों का या फ़्रांस फ़्रांसीसियों का है।  यहूदियों को अरबों पर थोपना गलत और अमानवीय है।
~ महात्मा गांधी 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Saturday, 7 October 2023

पॉलिटिकल फंडिंग में पारदर्शिता लाए बिना राजनीतिक भ्रष्टाचार पर रोक लगाना असंभव है / विजय शंकर सिंह

मनीष सिसोदिया के केस में ईडी ने यह इल्जाम लगाया है कि, सौ करोड़ रुपए रिश्वत के रूप में शराब लॉबी से लिए गए और जब इस पर सवाल पूछा, सुप्रीम कोर्ट ने कि, धन किस माध्यम से मनीष सिसौदिया तक पहुंचा, यानी मनी ट्रेल क्या है तो ईडी, अदालत के इस सवाल का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई। मामला गोवा के चुनाव का है और मनीष सिसोदिया पर आरोप है कि, उन्होंने सौ करोड़ रुपए चुनावी चंदे के लिए, शराब लॉबी से लिया। चुनाव के लिए चंदा लेना अपराध नहीं है पर मनी लांड्रिंग के माध्यम से अघोषित धन चंदे के रूप में लेना अपराध है। 

साल 2018 में बीजेपी की मोदी सरकार ने, चनावी फंड के लिए इलेक्टोरल बोंड की योजना शुरू की थी। उक्त इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में जो महत्वपूर्ण तथ्य हैं, वे इस प्रकार हैं। आंकड़े पुराने हैं, पर पॉलिटिकल फंडिंग में भ्रष्टाचार की पड़ताल के लिए, इसकी क्रोनोलोजी को समझना होगा। 

इलेक्टोरल बोंड योजना की घोषणा, पहली बार, 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट भाषण में हुई । 2 जनवरी, 2018 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने विवादास्पद इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के नियमों को आधिकरिक रूप से जारी किया था। दो महीने बाद ही इन नियमों में प्रधानमंत्री कार्यालय के दिशा-निर्देश के अनुसार बदल कर इलेक्टोरल बॉन्ड की अवैध बिक्री की अनुमति दे दी गई। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का विरोध, रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग और देश के समूचे प्रतिपक्ष ने किया था, पर तमाम मुखर विरोध के बावजूद इस योजना को लागू किया गया। 

इस योजना के द्वारा भारत की राजनीति में बड़े व्यापारिक घरानों के घुसपैठ को वैधता प्रदान कर दी गई और ऐसे तमाम लोगों को गुमनाम रहते हुए राजनीतिक दलों को चंदा देने का रास्ता खोल दिया गया। इससे भारतीय राजनीति में अवैध विदेशी धन के प्रवाह का रास्ता भी सुगम हो गया। ये बॉन्ड चंदादाता की पहचान को पूरी तरह से गुप्त रखता है। चंदादाता को पैसे का स्रोत बताने की भी बाध्यता नहीं है और इसे पाने वाले राजनीतिक दल को यह बताने की जरूरत नहीं कि, उसे किसने यह धन दिया। 

जिस दिन योजना लागू हुई, उसी दिन इस योजना में एक और बदलाव कर बड़े व्यापारिक घरानों की चुनावी फंडिंग की सीमा को भी समाप्त कर दिया गया. इसका अर्थ यह था कि अब बड़े कारपोरेट संगठन, अपनी पसंदीदा पार्टी को जितना चाहें, उतना धन दे सकते थे.

सरकार ने 2018 में इसके लिए साल भर में 10-10 दिन के चार विंडो का प्रावधान किया था।  पहला जनवरी, दूसरा अप्रैल, तीसरा जुलाई और चौथा अक्टूबर में. हर साल इन्हीं चार महीनों के दरम्यान स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री कर सकता है। इसके साथ ही यह प्रावधान भी किया गया कि जिस वर्ष में लोकसभा के चुनाव होंगे उस वर्ष 30 दिन का अतिरिक्त विंडो का भी प्राविधान  बॉन्ड बेचने के लिए किया गया।

मार्च 2018 में हुई इलेक्टोरल बॉन्ड की पहली बिक्री में ही बीजेपी ने बाजी मारते हुए 95% राजनीतिक चंदे को अपने हक में भुना लिया। इलेक्टोरल बॉन्ड के नियमों को पहले ही मौके पर तोड़मरोड़ कर दिया गया. नियमत: पहली बिक्री स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा अप्रैल 2018 में होनी चाहिए थी लेकिन इसे मार्च में ही खोल दिया गया।  मई 2018 में कर्नाटक के विधानसभा चुनावी होने थे. इस मौके पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने वित्त मंत्रालय के निर्देश भेजा कि 10 दिन के लिए विशेष तौर पर इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री की जाय। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने निर्देश में कहीं भी कर्नाटक के चुनावों से इस बिक्री को नहीं जोड़ा था लेकिन वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने इस इशारे के खुद ही समझ लिया था।

वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने अपने नोट में लिखा कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ही अतिरिक्त बिक्री की मांग की गई है। वित्त मंत्रालय के वह अधिकारी लिखते हैं, “इलेक्टोरल बॉन्ड बिक्री की नियमावली जो कि 2 जनवरी, 2018 को जारी हुई है, में पैरा 8(2) में सिर्फ लोकसभा के चुनाव का जिक्र है. इसका अर्थ है कि इलेक्टोरल बॉन्ड की अतिरिक्त बिक्री का नियम राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए मान्य नहीं होगा.” 

वित्तीय मामलों के विभाग में तैनात तत्कालीन उप निदेशक विजय कुमार ने आंतरिक फाइलों में अपने ये विचार 3 अप्रैल, 2018 को दर्ज किए। इसके बाद कुमार ने सुझाव दिया कि शायद कमी नियमों में ही है न कि प्रधानमंत्री कार्यालय में, इसलिए नियमों में फेरबदल कर देना चाहिए। 3 अप्रैल, 2018 के नोट में उन्होंने जो नियम लिखे वो लेखक की भावना को व्यक्त नहीं करते हैं जिसके मुताबिक बॉन्ड का इस्तेमाल लोकसभा और विधानसभा दोनो चुनाव के लिए मान्य था. उन्होंने कहा इस गड़बड़ी को सुधारने की जरूरत है.

उनके सुझाव को वित्त सचिव एससी गर्ग ने खारिज कर दिया. उनके मुताबिक अधिकारी का आकलन गलत था. “बॉन्ड के विशेष बिक्री की व्यवस्था सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए थी. अगर हम विधानसभा चुनावों के लिए विशेष विंडो खोलने लगेंगे तो साल भर के भीतर ही ऐसे अनेक विंडो खुल जाएंगे. संशोधन की जरूरत नहीं है,” गर्ग ने 4 अप्रैल, 2018 को लिखा। 

11 अप्रैल, 2018 को यानी एक सप्ताह बाद जूनियर अधिकारी ने नियमों और प्रधानमंत्री कार्यालय की मांग के बीच मौजूद विरोधाभासों को स्पष्ट करने की मांग की। उप निदेशक कुमार ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा, "पीएमओ ने चुनावी बांड जारी करने हेतु, 10 दिनों के लिए एक विशेष विंडो खोलने की इच्छा जताई है। जबकि 2 जनवरी, 2018 को जारी इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की अधिसूचना के पैरा 8(2) के अनुसार एक महीने के लिए विशेष विंडो सिर्फ उसी वर्ष में खोला जाएगा जिस साल लोकसभा का चुनाव होगा। फिलहाल लोकसभा चुनाव काफी दूर हैं लिहाजा विशेष विंडो खोला जाना मौजूदा अधिसूचना के अनुरूप नहीं है।’’

यह पहली बार हुआ जब अधिकारियों ने लिखित में स्वीकार किया कि, निर्देश सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से आया है। इसके बाद वित्त सचिव गर्ग को बात समझ में आ गई और उन्होंने अपनी राय बदल दी। 11 अप्रैल को ही उन्होंने वित्त मंत्री जेटली को एक नोट लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि, जिस साल लोकसभा के चुनाव नहीं होंगे उन वर्षों में सिर्फ चार बार ही इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने की अनुमति है। 
उन्होंने कहा, “यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इलेक्टोरल बांड बियरर बॉन्ड होते हैं. यह तभी सुरक्षित माना जाता है कि सामान्य वर्ष (जिस साल लोकसभा चुनाव न हो) में केवल चार विंडो के जरिए इन्हें जारी किया जाय ताकि इसका इस्तेमाल करेंसी के रूप में न हो सके।”

यह सब आरबीआई की चेतावनी के बाद किया गया। फिर भी वित्त सचिव गर्ग ने वित्तमंत्री जेटली को उन नियमों में फेरबदल करने का सुझाव दिया जिन्हें उनकी सरकार ने सिर्फ चार महीने पहले जनवरी 2018 में स्वीकृत और अधिसूचित किया था। गर्ग ने अपनी बात ये कहते हुए खत्म की कि, ‘‘ज़रूरत को देखते हुए, हम अपवाद के तौर पर एक से 10 मई,  2018 की अवधि के लिए एक अतिरिक्त विंडो खोल सकते हैं.’’ गर्ग ने इस "ज़रूरत" को ठीक से स्पष्ट नहीं किया लेकिन जेटली ने इस अपवाद को सहमति दे दी।

वित्त मंत्रालय ने अपनी फाइलों में दावा किया कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पीएमओ के निर्देश पर इलेक्टोरल बॉन्ड की इस अवैध बिक्री को एक अपवाद मामले के तौर पर मंजूरी दी गई। लेकिन 2018 के अंत में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने थे. ऐसे वक्त में इलेक्टोरल बॉन्ड को नियंत्रित करने वाले नियमों में फेरबदल करना बीजेपी सरकार की आदत बन गई। नवंबर-दिसंबर में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित थे. एक बार फिर से उप निदेशक विजय कुमार ने 22 अक्टूबर, 2018 को अपने सीनियर्स के पास एक नया प्रस्ताव लेकर पहुंचे. इसमें एक बार फिर से नवंबर महीने में इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के लिए विशेष विंडो खोलने की बात थी।

ठीक चुनावों से पहले. इस बार उन्होंने यह नहीं बताया कि निर्देश कहां से आए थे, लेकिन इन निर्देशों का उद्देश्य साफ़ था। उनके नोट से स्पष्ट हो गया कि बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने मई 2018 में ‘विशेष विंडो के नाम से इलेक्टोरल बॉन्ड की जो अवैध बिक्री शुरू की थी वह आगे एक परंपरा के तौर पर निभाई जाएगी। 22 अक्टूबर, 2018 को कुमार द्वारा लिखे गए नोट में कहा गया है, “पांच राज्य विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के लिए 10 दिन का अतिरिक्त विशेष विंडो खोलने का प्रस्ताव आया है. इससे पहले एक से 10 मई, 2018 के बीच कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले भी वित्त मंत्री की सहमति से इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री के लिए विशेष विंडो खोला गया था.”

मई 2018 में प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश पर जो बात सिर्फ एक बार कानून में तोड़मरोड़ से शुरू हुई थी उसे नवंबर 2018 तक आते-आते मोदी सरकार ने एक स्थापित परंपरा बना दिया। मई 2019 तक 6000 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड की खरीददारी हुई जिन्हें राजनीतिक दलों को बतौर चंदा दिया गया. जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है इस पैसे में सबसे बड़ी लाभार्थी भारतीय जनता पार्टी रही।

उपरोक्त विवरण, न्यूजक्लिक वेबसाइट के एक लेख से लिया गया है। यह लेख इलेक्टोरल बोंड के इतिहास और उससे बीजेपी को कितना लाभ मिला इस का एक संक्षिप्त इतिहास बताता है। 

अब सवाल उठता है कि इलेक्टोरल बंद की जरूरत क्यों पड़ी ? यह कोई मजबूरी थी या कुछ और ? हुआ यह कि, चुनाव आयोग के नियमों के अंतर्गत, सभी राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से अधिक की धन राशि वाले चंदों का विवरण, निर्वाचन आयोग को, अनिवार्यतः देना होता है, जिसमें, चंदा देने वाले व्यक्ति, कंपनी या ट्रस्ट का नाम, उनके द्वारा दी गई चंदा की राशि, उसका पता, पैन नंबर, चेक/डीडी नंबर, बैंक का नाम और पता दर्ज करना होता है। लेकिन, इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये मिले चंदे में यह सब विवरण देने की जरूरत नहीं है। किस दल को कितना चंदा मिला यह तो राजनीतिक दलों की ऑडिट रिपोर्ट से पता चल जाता है पर वह चंदा किस व्यक्ति, कम्पनी या ट्रस्ट ने दिया है, इसकी जानकारी नहीं मिल पाती है। इस अपारदर्शी प्राविधान से सरकार पर, आरोप लगने लगा कि, इलेक्टोरल बॉन्ड आने के बाद से मोटी कमाई करने वाले लोग, कॉरपोरेट्स और कंपनियां चंदा देने के लिए इस गोपनीय रास्ते का इस्तेमाल कर रही हैं। चुनाव सुधार और चुनावी फंडिंग की पादर्शिता की दिशा में काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इस मुद्दे पर आपत्ति की है और पॉलिटिकल फंडिंग के इस संवेदनशील विंदु को उठाया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है। 

अब इलेक्टोरल बॉन्ड से किसको कितना चंदा मिला है, इस पर चर्चा करते हैं। 
० वित्त वर्ष 2019-20 में बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये सर्वाधिक 2 हजार 555 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। 
० इससे पहले 2018-19 में पार्टी को 1450 करोड़ रुपये का चंदा इलेक्टोरल बांड से मिला था। 
० वहीं कांग्रेस को 2019-20 में इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये 317.8 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। हालांकि 2020-21 में ये काफी घटकर महज 10 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
० अगस्त 2021 में एडीआर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि साल 2019-20 में राजनीतिक दलों ने कुल 3 हजार 429.56 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड को भुनाया था। इसमें से 76 फीसदी राशि अकेले बीजेपी के खाते में गई थी। वहीं कांग्रेस को सिर्फ 9 फीसदी राशि प्राप्त हुई थी।
० वर्ष 2019-20 में राष्ट्रीय पार्टियों (बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी, टीएमसी और सीपीआई) ने अलग-अलग माध्यमों को मिलाकर कुल 4 हजार 758 करोड़ रुपये की कमाई की थी, जिसमें से 3 हजार 623.28 करोड़ रुपये (76.15%) की आय अकेले बीजेपी को हुई थी। 
० इस दौरान कांग्रेस की कमाई 682.21 करोड़ रुपये और सीपीआई को सबसे कम 6.58 करोड़ रुपये थी.
० वित्त वर्ष 2018-19 से 2019-20 के बीच महज एक साल में भाजपा की आय में 50.34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी. वहीं इस दौरान कांग्रेस की आय 25.69 फीसदी घट गई थी.
एडीआर के मुताबिक बीजेपी की 70 फीसदी से अधिक की कमाई इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये होती है. वहीं कांग्रेस की कमाई में 46.59 फीसदी, तृणमूल कांग्रेस की कमाई में 69.92 फीसदी और एनसीपी की कमाई में 23.95 फीसदी हिस्सा इलेक्टोरल बॉन्ड का है।

जैसे नोटबंदी और जीएसटी के भी नए नए नियम बनाए जाते रहे, कुछ वैसा ही प्रयोग इलेक्टोरल बांड के साथ भी होता रहा। कुछ उदाहरण देखें। 

० 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने, जब पहली बार, इलेक्टोरल बॉन्ड का प्रस्ताव, संसद में रखा तब, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आरबीआई ने चेतावनी दी थी कि, इस तरह के बॉन्ड का दुरुपयोग मनी लाउंड्रिंग के लिए हो सकता है। लेकिन देश के सबसे बड़े बैंक की यह चेतावनी अनसुनी कर दी गई। 
० जब योजना की रूपरेखा पेश हुई तो वह कुछ इस प्रकार थी। 
केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एसबीआई को इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने का अधिकार दिया गया।
० इसे कोई भी व्यक्ति, कारपोरेशन, एनजीओ अथवा कानूनी रूप से वैध संस्था खरीद सकता है और अपनी पसंद के राजनीतिक दल को दान कर सकता है।
० पॉलिटिकल पार्टी चंदे में मिले, इस धनराशि को, एक तयशुदा बैंक एकाउंट में जमा कर देगी। 

वित्त वर्ष 2020-21 में, क्रमशः, बीजेपी को, ₹477.5 करोड़, (गिरावट 39% की), कांग्रेस को ₹74.5 करोड़ (46 % की गिरावट), एनसीपी को ₹26.2 करोड़, सीपीएम को ₹12.8 करोड़, तृणमूल कांग्रेस को, ₹42.5 लाख, सीपीआई को, ₹1.49 करोड़ का चंदा मिला। रिपोर्ट के मुताबिक बसपा ने हमेशा की तरह अपनी अनुदान रिपोर्ट में 20 हजार रुपये से अधिक का शून्य चंदा दिखाया है। ₹20 हजार से ऊपर के चंदे के संदर्भ में अधिकांश पार्टियों के चंदे 41.5% की गिरावट हुई है। 

जो आंकड़े दिए गए हैं, वे राजनीतिक दलों को मिले चंदे का पूरा विवरण नहीं है। ₹20 हजार, या इससे कम राशि का चंदा भी लोग देते हैं। बीएसपी अपने आय के खाते में ऐसे ही चंदे का विवरण बताती है। 2014 के बाद, सरकार ने पॉलिटिकल फंडिंग के लिए, इलेक्टोरल बॉन्ड, यानी पार्टियों को चंदा देने का एक ऐसा तरीका लागू किया गया जो विशेषज्ञों की नजर में अपारदर्शी था। कहां तो जरूरत थी कि पॉलिटिकल फंडिंग को पारदर्शी बनाया जाय और आय व्यय का विवरण, राजनीतिक दलों की अधिकृत वेबसाइट पर नियमित रूप से डाली जाए, उसे अपडेट किया जाय, लेकिन एक ऐसी व्यवस्था लाई गई जिसने चुनाव सुधार के सबसे महत्वपूर्ण विंदु, पोलिटिकल फंडिंग को और भी जटिल बना दिया।  इस प्रकार, पिछले कुछ सालों में, पॉलिटिकल पार्टियों को जिस माध्यम से सबसे अधिक चंदा मिल रहा है, वह, इलेक्टोरल बॉन्ड यानी चुनावी बॉन्ड है।  

राजनीतिक जीवन में जैसी चुनाव प्रक्रिया है, उसे देखते हुए भ्रष्टाचार एक बीमारी नहीं एक जरूरत का रूप ले चुका है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा, राजनीतिक जीवन में संगठित भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण है। निर्वाचन आयोग द्वारा बार बार इस चेतावनी के बाद कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को पारदर्शी बनाया जाय, संसद ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही भ्रष्टाचार के इस मूल कारण को रोकने के लिए कोई जतन ही किए। और तो और इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप के राजनैतिक चंदे की एक ऐसी अपारदर्शी योजना लाई गई जिसने कॉर्पोरेट और सत्तारूढ़ दल के बीच जो भ्रष्ट गठबंधन है उसे और मजबूत ही किया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि, आरबीआई ने इस योजना के लागू होने तक, इसका विरोध किया और बार बार कहा कि, यह योजना मनी लांड्रिंग का एक नया रास्ता खोलेगी जिससे देश में काले धन की समस्या होगी। जब सरकार ने आरबीआई की नहीं सुनी तो, रिजर्व बैंक ने, दो महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस योजना में मनी लॉन्ड्रिंग की संभावना को सीमित करने की कोशिश की। वे है, 
० बॉन्ड को साल में सिर्फ दो बार नियत समय के भीतर बेचा जाएगा। इसे विंडो कहा गया।
० खरीददार को इसे खरीदने के 15 दिन के भीतर अपनी पार्टी के खाते में जमा करवाना होगा। 
० जनवरी 2018 में वित्त मंत्रालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड के क्रय विक्रय से, संबंधित नियमावली जारी की। इस नियमावली में, यह प्राविधान रखा गया कि,
० इलेक्टोरल बॉन्ड साल में चार बार बेचे जाएंगे।
० बिक्री की तारीख से 15 दिनों के भीतर ही इन्हें भुना लेना होगा और फिर राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार में कर सकते हैं.

अक्सर हम राजनीतिक दलों के नेताओं को सार्वजानिक जीवन में शुचिता और भ्रष्टाचार पर भाषण देते, देखते सुनते रहते हैं, पर किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने लोकतंत्र के इस दीमक का पेस्ट कंट्रोल करने का कोई प्रयास करते नहीं देखा और देखा भी तो, उन्हे निर्वाचन आयोग, अदालत और अन्य एनजीओ के उन प्रयासो पर खामोशी ओढ़ते हुए देखा। आरटीआई के दायरे में राजनीतिक दल खुद को लाने के लिए भी तैयार नहीं हैं। यह तो टीएन शेषण, लिंगदोह, जैसे कुछ काबिल मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की सजगता और दृढ़ता का परिणाम है कि, चुनाव में काफी हद तक काले धन पर रोक लगाने की कोशिश हुई लेकिन यह सारे प्रयास भी अभी तक चुनाव प्रक्रिया को, बहुत कुछ साफ सुथरा नहीं कर पाए हैं। सरकार और संसद को, पॉलिटिकल फंडिग को न केवल पारदर्शी बनाना होगा बल्कि उसे, राजनैतिक दलों को आरटीआई के दायरे में भी लाने पर विचार करना होगा। इससे पूंजी और सत्ता का गंदा गठजोड़ टूटेगा और उसका सीधा असर, सार्वजनिक जीवन पर पड़ेगा।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Friday, 6 October 2023

क्या मनीष सिसोदिया पर ईडी की कार्यवाई निराधार साबित हो रही है ? / विजय शंकर सिंह

अक्सर पुलिस, जिसे आम तौर पर थाना पुलिस कहते हैं, पर यह आरोप लगता रहता है कि, वे जानबूझकर कर, सुबूतों से छेड़छाड़ कर या बिना सुबूतों के भी कुछ मामलों में फर्जी केस बना देते हैं और ऐसा वे किसी दबाव या लोभ में करते हैं। कुछ हद तक जांच के बाद, इस तरह के आरोप सही भी निकलते हैं और दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही भी होती है। लेकिन जब बात ईडी प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, एनआईए, आदि विशेषज्ञ जांच एजेंसियों की होती है तो, पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि, इन एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच में कोई फर्जीवाड़ा नहीं होगा। पर ईडी का ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में, बेहद निराशाजनक रहा है। ईडी, पिछले दस साल में, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और शत्रुता से दुष्प्रेरित होकर, कार्य करने का एक उपकरण बन गई है। अंत में सुप्रीम कोर्ट को भरी अदालत में ईडी को चेतावनी देनी पड़ी कि, किसी के प्रति बदले की कार्यवाही के रुप में, कोई जांच नहीं की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसौदिया की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ईडी से कई सवाल पूछे जैसे,
० मनी ट्रेल, यानी पैसे किस श्रृंखला में दिया गया है यह बताए।
० आपके मामले के अनुसार, मनीष सिसौदिया के पास कोई पैसा नहीं आया... तो शराब समूह से पैसा कैसे आया?
० यह केवल अप्रूवर के बयानों के आधार पर है कि आप कह रहे हैं कि रिश्वत दी गई थी।
० क्या आपके पास यह दिखाने के लिए कोई डेटा है कि पॉलिसी कॉपी की गई और साझा की गई? यदि प्रिंट आउट लिया गया था, तो डेटा उसे दिखाएगा। इस आशय का कोई डेटा नहीं है.
० 15 तारीख को दस्तावेज़ तैयार किया गया था और तब बदला नहीं गया था। 15 तारीख को शराब ग्रुप का कोई भी व्यक्ति सिसौदिया से नहीं मिला।

कहने का आशय यह कि, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से तो लगता है कि, ईडी का पूरा केस लचर और गढ़े गए सुबूतों पर टिका हुआ है। अदालती कार्यवाही का पूरा विवरण दिलचस्प और सरकार की जांच एजेंसी की साख पर बेहद गंभीर सवाल उठाता हुआ दिख रहा है। 

दिल्ली शराब नीति घोटाले पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दर्ज मामलों में आम आदमी पार्टी (आप) नेता और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत आवेदन की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। आज लगभग, साढ़े चार घंटे की लगातार सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों के सामने, सवालों की झड़ी लगा दी। सुनवाई, जस्टिस संजीव खन्ना और एसवीएन भट्टी की पीठ कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने, मनीष सिसोदिया द्वारा दायर दो याचिकाओं पर विचार कर रही है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के उन फैसलों को चुनौती दी गई थी, जिसमें, उन्हें सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही जांच के संबंध में, जमानत देने से इनकार कर दिया गया है। ईडी और सीबीआई की ओर से पेश हुए, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, एएसजी, एसवी राजू की ओर इंगित और विस्तार से पूछताछ की भूमिका तैयार करते हुए, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा कि, "आम तौर पर, किसी जमानत याचिका के मामले में, हम इतना समय नहीं लेते हैं।" लेकिन अदालत ने समय भी लिया और गंभीरता से पूछताछ करते हुए, जज साहबान मामले की तह में भी गए। 

० क्या आबकारी नीति को चुनौती दी गई है ?

जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत, तथ्यों की प्रकृति के बारे में, एएसजी से स्पष्टीकरण मांगते हुए, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने पूछा कि, "क्या 2021-22 के लिए दिल्ली सरकार की एक्साइज पॉलिसी, को कोई चुनौती देने का मामला विचाराधीन है।"
इस पर एएसजी एसवी राजू ने कहा कि, "एजेंसियां ​​नीतिगत फैसले को चुनौती नहीं दे रही हैं।" 
यानी, दिल्ली सरकार की आबकारी नीति को कोई चुनौती नहीं दी गई है। इस पर, जस्टिस खन्ना ने फिर पूछा, "लेकिन आप कहते हैं कि नीतिगत निर्णय व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रेरित था। तो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि आप नीतिगत निर्णय को चुनौती दे रहे हैं?"

अदालत ने ऐसा इसलिए पूछा कि, एजेंसी ने नीति पर सवाल भी जांच के दौरान उठाए थे। नीति को चुनौती देना एक अलग मसला है, आबकारी मामले में भ्रष्ट लेनदेन दूसरा और धन की मनी लांड्रिंग का आरोप एक अन्य मामला है जो पीएमएलए का अपराध है। इसीलिए अदालत ने नीति को चुनौती के मामले पर सरकार से स्पष्टीकरण चाहे।

एएसजी ने तब नकारात्मक जवाब दिया और दोहराया कि "एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत तथ्य, यह था कि, विचाराधीन नीति को, इस तरीके से तैयार किया गया था,  जिससे कुछ थोक विक्रेताओं को फायदा हुआ और इसमें मनीष सिसोदिया की भी भूमिका थी।"
उन्होंने कहा कि, "यह नीति, पुरानी एक्साइज नीति को बदलने के लिए एक "मुखौटे" के रूप में तैयार की गई थी, जिसे दिल्ली सरकार (यहां सरकार का अर्थ उपराज्यपाल है) का समर्थन नहीं था। इसे बदलने के लिए, रवि धवन विशेषज्ञ समिति से रिपोर्ट मांगी गई थी।  हालाँकि, जब रिपोर्ट प्रतिकूल आई, तब, मनीष सिसौदिया इससे नाराज़ हो गए, तो उन्होंने उक्त रिपोर्ट के खिलाफ (जनता से) आपत्तियाँ और सुझाव मांगे।"
एएसजी ने आगे कहा, "पुरानी नीति वह नहीं थी, जो वे (मनीष सिसोदिया) चाहते थे। नीति को बदलने के लिए उन्हें धवन समिति की रिपोर्ट मिली थी, लेकिन यह रिपोर्ट वैसी नहीं थी जैसा वे चाहते थे। इसलिए फिर उन्होंने (मनीष सिसोदिया) आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए। उन आपत्तियों में हम याचिकाकर्ता (मनीष सिसोदिया) की (संदिग्ध) भूमिका देखते हैं।"

० अब सवाल उठता है, किसी नीति के बारे में, क्या लोगों से राय मांगना या समर्थन करने के लिए कहना गलत है?

एएसजी राजू ने अपनी दलीलों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, "नई आबकारी नीति तैयार करने के लिए हितधारकों की सार्वजनिक राय को छुपाया गया और उसमें हेरफेरी की गई।"
इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि "विभिन्न पक्षों को रवि धवन रिपोर्ट के खिलाफ आपत्तियां उठाने वाले ईमेल का मसौदा तैयार करने के लिए कहा गया था।"
उन्होंने कहा कि, "ये ईमेल एक हस्तलिखित नोट, निर्धारित ईमेल पते पर भेजे गए उक्त पंक्तियों पर कई ईमेल प्राप्त करने के निर्देश के साथ" से कॉपी किए गए थे, जिसे मनीष सिसोदिया ने जाकिर खान को सौंपा था। ये ईमेल खुदरा लाइसेंस के आवंटन जैसे मुद्दों पर थे।" 
एएसजी के अनुसार, "ज़ोन की नीलामी के माध्यम से, उत्पाद शुल्क और वैट में कमी, साथ ही लाइसेंस शुल्क में वृद्धि, और शराब की दुकानों की संख्या में वृद्धि को अंततः नई आबकारी नीति, विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों से पूरी तरह से अलग होने के बावजूद, जनता की राय को, नीति में हेरफेर करने के लिए भेजा गया था।"
उन्होंने प्रस्तुत किया कि "अंततः, इन सभी, साक्ष्यों को आपस में लिंक किया गया था।" 

इस पर, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा,
"मिस्टर राजू, इस पर विश्वास करना बहुत मुश्किल है... एक नीति बनाई गई है। कुछ राजनीतिक नेता सोचते हैं कि, यह नीति इस तरह होनी चाहिए। वे बयान देते हैं। वे फीडबैक लेते हैं। वे लोगों से नीति का समर्थन करने के लिए कह रहे हैं - क्या यह गलत है?"
एएसजी राजू ने दोहराया कि, "वास्तविक सुझाव कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन समान शब्दों वाले ईमेल ने स्थापित किया कि यह "कॉपी-पेस्ट का काम" था।"
दरअसल, एक ईमेल ड्राफ्ट करके, नीति के समर्थन में रायशुमारी के लिए कुछ ईमेल पते पर भेजे गए थे। ईडी का कहना है यह रायशुमारी नहीं हुई, बल्कि एक तयशुदा राय को, मांगना हुआ। अदालत ईडी के इस तर्क से सहमत नहीं हुई। 

एएसजी ने कहा कि, "मनीष सिसोदिया कुछ पार्टियों के लिए उपयुक्त तरीके से आबकारी नीति तैयार करने के लिए, पूर्वाग्रह युक्त विचार के साथ काम कर रहे थे।" 
इस तर्क का आधार, तयशुदा ईमेल का ड्राफ्ट था, जिसका उल्लेख एएसजी अदालत में कर चुके हैं। 
इस संदर्भ में आगे एएसजी ने कहा कि, "मनीष  सिसौदिया ने पूर्व आबकारी आयुक्त राहुल सिंह से कैबिनेट नोट का मसौदा तैयार करने को कहा था। हालाँकि, चूंकि उक्त नोट उनके विचार के अनुरूप नहीं था कि, नीति कैसे तैयार की जानी है, एक नया नोट तैयार किया गया और मंत्रियों की कैबिनेट के सामने रखा गया और पुराने नोट को नष्ट कर दिया गया।"

इस दलील पर न्यायमूर्ति खन्ना ने टिप्पणी की, "श्री राजू, कभी-कभी नौकरशाह कुछ (ड्राफ्ट) बनाते हैं। कभी-कभी राजनीतिक एक्जीक्यूटिव (मंत्री आदि) कह सकते हैं कि कृपया इसे इस तरह से तैयार करें। यहां, राजनीतिक एक्जीक्यूटिव ने एक नोट भेजा है जिसमें कहा गया है कि यह (सचिव द्वारा तैयार ड्राफ्ट) वैसा नहीं है जैसा हम चाहते थे..." 
अदालत का दृष्टिकोण यह था कि, सचिव द्वारा बनाए गए ड्राफ्ट में मंत्रियों द्वारा कोई भी संशोधन किया जा सकता है और यह कोई असामान्य स्थिति नहीं है। 
एएसजी राजू ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, "यह तथ्य कि, नोट को नष्ट कर दिया गया था, यह स्पष्ट रूप से स्थापित है कि "इसमें कुछ ऐसा था जिसे वे देखना नहीं चाहते थे।" 

हुआ यह था कि, सचिव द्वारा तैयार ड्राफ्ट को अस्वीकार करके मंत्री द्वारा बदल दिया गया था, और सचिव द्वारा तैयार किए गया ड्राफ्ट बदल दिया गया था। इस पर एएसजी अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे थे। 

 ० क्या यह बयान कि विजय नायर, मनीष सिसौदिया के लिए काम कर रहे थे, महज़ एक राय नहीं है?

सुनवाई के दौरान, एएसजी ने कहा कि, "एक अप्रुवर (सरकारी, वायदा माफी गवाह या अनुमोदक) के बयान के अनुसार, विजय नायर, मनीष सिसोदिया की तरफ से काम कर रहे थे।" 
इस पर जस्टिस खन्ना ने कहा, "यह किसका बयान है? यह उनकी राय है। जिरह में दो प्रश्न होंगे और यह तर्क उड़ जाएगा। यह महज एक राय है, वह भी किसी विशेषज्ञ की नहीं। विशेषज्ञ की राय अलग है। यह एक निष्कर्ष निकाला गया है। अतः, ईडी राय मायने नहीं रखती। अदालत की राय  मायने रखती है।"

एएसजी राजू ने तर्क दिया कि, "विजय नायर को सीएम के बंगले के बगल में एक बंगला दिया गया था और वह सीएम के कार्यालय से अपना काम करते थे। वह कोई ऐसा व्यक्ति है, जो आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ है। इसलिए यदि कोई कहता है कि वह डिप्टी सीएम से जुड़ा हुआ है...देखें कि वह कैसे काम कर रहा है, तो इस पर विश्वास करना ही होगा। आबकारी नीति जारी होने से पहले ही, उनके पास जीओएम GoM नीति है। इससे पता चलता है कि नीति बनाने में उसकी एक महत्वपूर्ण थी।"

० बिना पैसों के लेनदेन के, विचार-विमर्श के बाद, नीति में किया गया परिवर्तन अवैध नहीं है।

सुनवाई की कार्यवाही के दौरान, न्यायमूर्ति खन्ना ने यह भी कहा कि, "दबाव समूह" और "लॉबिंग" हमेशा मौजूद रहेंगे और कोई भी सरकार इसके बिना काम नहीं कर सकती।" 
जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा, "हम समझते हैं कि नीति में बदलाव हुआ है। हर कोई अपने व्यवसाय के लिए अच्छी नीतियों का समर्थन करेगा। दबाव समूह हमेशा वहां रहते हैं। नीति में बदलाव भले ही गलत हो, बिना पैसे के लेनदेन के विचार के, कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह पैसे के लेनदेन की भूमिका ही है, जो इसे  अपराध बनाती है। एक हद तक यह कहा जा सकता है कि कोई दबाव समूह नहीं हो सकता, तो, कोई सरकार इसके बिना चल नहीं सकती है। कोई न कोई लॉबिंग हमेशा रहेगी। बेशक हम यह नहीं कह रहे हैं कि, रिश्वत ली जा सकती है।'

अदालत ने अपना ध्यान धन के लेनदेन के मुद्दे पर केंद्रित रखा। मनीष सिसोदिया के हस्तक्षेप से, नीति तो बदली गई। पर क्या इस नीति बदलने के पीछे पैसे की भूमिका थी? अदालत यह जानना चाहती थी। लेकिन पैसे की भूमिका नहीं मिली और न ही ऐसा ही कुछ प्रमाणित कर सकी। 

० क्या मंत्रिपरिषद को दिया गया दस्तावेज़ वही था जो सिसौदिया के कंप्यूटर पर मिला था?

इसके बाद चर्चा 15 मार्च, 2021 के ड्राफ्ट नोट पर शुरू हुई। एएसजी के अनुसार, "मनीष सिसोदिया के कंप्यूटर से मिले ड्राफ्ट नोट में थोक विक्रेताओं के लिए लाभ मार्जिन 5% तय किया गया था।  हालाँकि, सिसोदिया द्वारा दिए गए GoM के अंतिम मसौदे में 12% का बढ़ा हुआ मार्जिन था।"
इस संबंध में न्यायमूर्ति खन्ना ने टिप्पणी की, "यह एक स्पष्ट तथ्यात्मक अशुद्धि है। दस्तावेज़ 15 तारीख को 11.27 बजे तैयार किया गया है। इसे बदला नहीं गया है। शराब व्यापारियों के समूह की तरफ से 15 तारीख तक कोई भी मनीष सिसौदिया से नहीं मिला है। इसलिए उस संबंध में आपका तर्क गलत है। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है। कृपया जांच एजेंसी से पूछें कि, क्या मंत्रिपरिषद को दिया गया दस्तावेज 15 तारीख को कंप्यूटर में मिले दस्तावेज जैसा ही था या अलग?"

 ० रिश्वत, किकबैक कैसे दी गई?

इसके बाद न्यायमूर्ति खन्ना ने सवाल उठाया कि, "किक बैक कैसे दिया गया। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि सिसोदिया ने 100 करोड़ रुपये की रिश्वत के बदले दक्षिण के कुछ नेताओं को शराब के लाइसेंस दिए।"
जस्टिस संजीव खन्ना ने पूछा, "आप कैसे कहते हैं कि किक बैक दी गई थी? यह पूरी तरह से, अप्रूवर के बयानों के आधार पर ही कहा जा रहा है।"

एएसजी राजू ने जवाब देते हुए कहा कि, "इंडोस्पिरिट थोक में नहीं मिल रहा था। इंडोस्पिरिट आदि के साझेदारों के खिलाफ कुछ शिकायतें थीं, इसलिए वे थोक में इसे प्राप्त करने के पात्र नहीं थे। मनीष सिसौदिया ने तब, हस्तक्षेप किया और कहा कि, उन सभी शिकायतों को तुरंत दूर किया जाए। एक महादेव शराब थोक विक्रेता हैं। उन्हे (सौदे से) बाहर निकलने के लिए दबाव डाला गया...उन्हें बिना किसी कारण बताओ नोटिस के बंद कर दिया गया। जैसे ही उन्होंने लाइसेंस छोड़ा, उन सभी चीजों को मंजूरी दे दी गई।''

 ० अगर सिसौदिया के पास कोई पैसा नहीं आया तो शराब समूह ने पैसा कैसे दिया?

न्यायमूर्ति खन्ना द्वारा एएसजी से अगला प्रश्न था, "आपके के केस के अनुसार मनीष सिसौदिया के पास कोई पैसा नहीं आया है... तो शराब समूह से पैसा कैसे आया? आपने दो आंकड़े लिए हैं 100 करोड़ और 30 करोड़। उन्हें (मनीष सिसोदिया को) इस धनराशि भुगतान किसने किया? ऐसे कई लोग हो सकते हैं जो पैसे का भुगतान कर रहे हों, जरूरी नहीं कि, पैसा शराब से जुड़ा हो।"
जस्टिस खन्ना ने आगे जोड़ा, "सबूत कहां है? दिनेश अरोड़ा (एक अप्रूवर) ने स्वयं पैसा लिया है। (मनीष सिसोदिया के खिलाफ) सबूत कहां है? क्या दिनेश अरोड़ा के बयान के अलावा कोई अन्य सबूत आप के पास है?"

तब एएसजी ने बताया कि, सभी गतिविधियां गुप्त रूप से की गईं, लेकिन पीठ आश्वस्त नहीं दिखी। जस्टिस खन्ना ने आगे कहा, "आपको सुबूतों की एक कड़ी स्थापित करनी होगी। रिश्वत का पैसा, शराब लॉबी से व्यक्ति तक आना चाहिए। हम आपसे सहमत हैं कि, ऐसी कड़ी स्थापित करना कठिन कार्य है, क्योंकि सब कुछ गुप्त रूप से किया जाता है। लेकिन यही तो आपकी इन्वेस्टिगेटिव क्षमता की परीक्षा है..."

० सिसौदिया को पीएमएलए के तहत कैसे लाया जाएगा?

पीएमएलए अधिनियम के तहत आरोपों के संबंध में, न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, "मनीष सिसौदिया इस सब में शामिल नहीं हैं। विजय नायर इसमें शामिल हैं, लेकिन मनीष सिसौदिया इस मामले में नहीं आते हैं। आप उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कैसे लाएंगे? पैसा उनके पास नहीं जा रहा है। अगर यह एक कंपनी है जिसके साथ वह भी शामिल है, तो हमारे पास परोक्ष दायित्व है। अन्यथा अभियोजन लड़खड़ाता है। मनी लॉन्ड्रिंग पूरी तरह से एक अलग अपराध है... हमें यह साबित करना होगा कि, वह उस संपत्ति के कब्जे में है। आपको आपराधिक धारा में अंकित सटीक शब्दों पर जाना होगा और  तब आप के ऊपर है कि, कैसे उन्हें, पीएमएलए का आरोपी बनाते हैं।"
पीठ ने कहा कि "पीएमएलए अपराध की आय से जुड़ी प्रक्रिया या गतिविधि से निपटता है न कि "पीढ़ी" से।"

जस्टिस खन्ना ने आगे कहा, "उन्हें (मनीष सिसोदिया को) पैसा नहीं मिला है, किसी और को मिला है। पैसा, उसके द्वारा नहीं लिया गया है, यह किसी और द्वारा लिया गया है। और, उपयोग किसी और द्वारा किया गया है। प्रोजेक्टिंग किसी और के द्वारा है...पीढ़ी इसका हिस्सा नहीं है। मुझे नहीं पता। इसलिए मैंने कह रहा हूं, संभवतः आप इसे किसी तरह से जोड़जाड़ कर केस में ला सकते हैं। उकसाना एक अलग बात है, परोक्ष दायित्व अलग है और मुख्य अपराधी कोई अलग हो सकता है।"
जब एएसजी राजू ने प्रस्तुत किया कि "अपराध से आय पैदा करने में मनीष सिसोदिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी, तो न्यायमूर्ति खन्ना ने दोहराया कि "पीएमएलए की धारा 3 के तहत अपराध से आय पैदा करना स्वयं में कोई अपराध नहीं है।"

एएसजी ने अपनी बात पर जोर दिया और कहा- "वह एक ऐसी प्रक्रिया या गतिविधि में शामिल है जो अपराध की आय से जुड़ी है।"
तब, न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, "जब आप रिश्वत देते हैं, तो आप अपराध की आय से जुड़ी गतिविधि में शामिल होते हैं। मान लीजिए, अंततः कोई पैसा नहीं दिया जाता है। क्या पीएमएलए कारगर होगा? पीएमएलए में जो ट्रिगर होता है वह, अपराध की आय है। अपराध में भुगतान या भुगतान किया जाता है। आय के बाद पीएमएलए शुरू हो जाएगा। आपको संबंधित व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराधों की आय से जोड़ना होगा। उकसाना, एक विंदु हो सकता है। लेकिन एक प्रमुख अपराधी के रूप में यह एक अलग स्थिति होगी।"
अब इस मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर 2023 को होगी.

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Wednesday, 4 October 2023

चरैवेति चरैवेति.../ विजय शंकर सिंह

समाज की अग्रगामी गति को रोका नहीं जा सकता है। समाज के पहिए को कितनी भी कोशिश, रोकने या पीछे करने की कोशिश की जाय, वह कुछ समय के लिए, लग रहे जोर के कारण, थम तो जाता है, कुछ पीछे भी खिसकता है, पर जैसे ही उसे अवसर मिलता है, वह आगे की ओर बढ़ने लगता है। समाज विकास की स्वाभाविक गति, अग्रगामी होती है। अतीत में जो घटा रहता है वह उस लीक का अध्ययन होता है जिस पर समाज आगे बढ़ चुका होता है। वही लीक इतिहास कहलाती है। यह एक सामान्य व्याख्या है और मेरी व्याख्या है। आप सब मित्र असहमत हो सकते हैं। 

समाज के इस अग्रगामी चरित्र से जो लोग या अन्य उप समाज, सीख लेकर, समाज के साथ कदमताल मिलाते हुए चल निकलते हैं, वे ही, कभी न कभी, समाज का नेतृत्व करते हैं। लेकिन जो लीक पर बैठ कर, लीक की गहराई और अतीत में अपनी स्थिति को लेकर, गर्व के भाव से भर कर, वही रुके रहते हैं, अपने अन्य लोगों को, रोकने की कोशिश करते हैं, और इस उम्मीद में जड़ बन जाते हैं कि, शायद इन लीक पर समाज का पहिया पीछे की ओर घूमे, वे अतीत के ब्लैक होल में, गुम हो जाते है। कभी कभी तो इतिहास में भी उनका उल्लेख मुश्किल से मिलता है। 

ऐसा प्रतिगामी मानस, अक्सर अतीत की यादों के इर्द गिर्द लटके हुए चमगादड की तरह, उसी अंधकार में, रोशनी देख कर असहज हो जाता है, और एक ऐसा तनाव ओढ़ लेता है कि, हर अग्रगामी और प्रगतिशील विचार उसे निरंतर असहज करने लगता है। लेकिन जिसे आगे बढ़ना है, उन्नति करना है, जीवन के बेहतर आकाश छूना है, वे समय और समाज के साथ आगे बढ़ते जाते हैं। अतीत में किसी का कोई भी स्थान रहा हो, कितना भी गौरवशाली इतिहास रहा हो, वह एक न एक दिन धुंधलाता जरूर है। गौरवशाली इतिहास भी तभी हुआ जब युगधर्म के अनुसार, तत्कालीन समाज ने अपनी गति बनाए रखी और अपने उत्थान के प्रति सजग रहा। पर जैसे ही, बदलते समय के साथ तालमेल टूटा,  संध्या बेला आ गई और जब सूरज ढला तो, रात तो आनी ही थी। 

देश के इतिहास में भी समय समय पर जिस समाज ने बदलते समय में खुद को, उसके साथ बनाए रखा, वह प्रगति करता चला गया। दिक्कत यह है, खुद को गौरवशाली अतीत के वारिस, इस अतीत के मोहपाश से, निकलने के लिए न तो मानसिक रूप से तैयार होते हैं और न ही, अतीत की उस विपाशा से खुद मुक्त होकर, आगे बढ़ पाते हैं। जो कल था वह आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं होगा। दुनिया भर के समाज के विकास का अध्ययन करें तो, आप पाएंगे कि, जो समाज, अतीत के मोहपाश से खुद को मुक्त करके आगे बढ़ गया, उन्होंने ही नेतृत्व किया और जैसे ही उसकी गति अवरुद्ध हुई वह फिर उसी लीक पर खड़ा खड़ा समाज की गति का गुबार देखता रहा और इतिहास के विद्वान, उसके पतन के कारणों पर विश्लेषण और किताबें लिखते रहे। 

पीछे लौटने और अतीत का लबादा ओढ़े, पुरातात्विक मोह त्याग कर समाज की अग्रगामी और प्रगतिशील गति के साथ आगे बढ़िए और यही समाज, देश और व्यक्ति की तरक्की का नुस्खा है। अतीत का पुरातात्विक मोह, अध्ययन के लिए हैं, उन कारणों के शोध के लिए है, जिनके कारण अतीत में प्राप्त स्थान, आप के मन में गर्व जताता है और आप को एक महान विरासत के अंग के रूप में याद दिलाता है। थम जाना या म्यूजियम में रखे उस लबादे को ओढ़ कर, फ्लैशबैक की जिंदगी में चले जाना, एक तात्कालिक सुख और गर्व का एहसास भले ही दे दे, पर, वह समाज की गति से चलना नहीं है, बल्कि लीक पर ही बैठे रहना है। 

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वदुम्। 
उदुम्बरम् सुर्यस्य पस्य स्ह्रेमनम्। 
यो न तन्द्रयते चरन् चरैवेति चरैवेति॥ 
(ऐतरेय ब्राह्मण)
चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है, चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है, सूर्य का परिश्रम देखोे,जो नित्य चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

पत्रकारों पर छापे सामाजिक न्याय पर हो रही बहस से ध्यान भटकाने की साजिश तो नहीं ? / विजय शंकर सिंह

सुबह सुबह खबर मिली की, पत्रकार उर्मिलेश, अभिसार शर्मा, औनिंद्यो चक्रवर्ती, और इतिहासकार, सुहैल हाशमी के घर पुलिस पहुंची। यह छापा और पूछताछ, आतंकवाद के समर्थन के आरोप में यूएपीए की धाराओं के अंतर्गत दर्ज एक एफआईआर के सन्दर्भ में डाला गया है। किसी भी पत्रकार के गिरफ्तारी की कोई आधिकारिक खबर तो अभी नहीं मिल रही है पर, सोशल मीडिया पर यह जरूर कहा लग रहा है कि, उनमें से कुछ को, गिरफ्तारी के लिए पुलिस थाने ले जाया गया है। लेकिन पुलिस की तरफ से ऐसी कोई पुष्टि नहीं की गई है। अचानक बड़े और प्रतिष्ठित पत्रकारों पर छापे की यह खबर, हैरान करने वाली है। 

उपरोक्त पत्रकारों के अतिरिक्त, न्यूजक्लिक से जुड़े, भाषा सिंह, आर्थिक मामलों के प्रसिद्ध पत्रकार, परोंजय गुहा ठाकुरता, प्रबीर पुरकायस्थ और एक अन्य संजय राजौरा के घर भी, पुलिस के पहुंचने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल है। परंजोय गुहा ठाकुरता ने राफेल घोटाले पर एक किताब, फ्लाइंग लाइज लिखी है और अडानी घोटाले पर उन्होंने कई खोजी लेख भी लिखे हैं। उनके खिलाफ अडानी समूह ने मानहानि के कई मुकदमे भी दायर करवा रखे हैं। एक जानकारी यह भी आ रही है कि, एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के घरों पर भी छापा मारा गया है। यह भी खबर है कि, मुंबई में रहने वाली, तीस्ता सीतलवाड से दिल्ली पुलिस अधिकारी पूछताछ कर रहे हैं।

द वायर के अनुसार, यह छापेमारी एफआईआर संख्या 224/2023 के संबंध में है। यह मामला 17 अगस्त, 2023 को दायर किया गया था, और इसमें 153 (ए) (धर्म, जाति के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) के साथ-साथ यूएपीए UAPA की धाराएं, 13, 16, 17, 18 और 22  लगाई गईं हैं। साथ ही, भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी) (किसी अपराध को करने के लिए आपराधिक साजिश के अलावा किसी अन्य आपराधिक साजिश में शामिल होना) भी जोडी गई है।

वर्तमान एफआईआर की जड़ें कथित तौर पर न्यूयॉर्क टाइम्स की अगस्त की रिपोर्ट से जुड़ी हैं।  द वायर के लेख के अनुसार, "भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया था कि कांग्रेस नेताओं और न्यूज़क्लिक को "भारत विरोधी" माहौल बनाने के लिए चीन से धन मिला था। 

द वायर ने न्यूज क्लिक के और कुछ अन्य पत्रकारों के खिलाफ छापे के संबंध में जिन आपराधिक मुकदमों की उल्लेख किया है, उनमें आईपीसी भारतीय दंड विधान की धारा 153A के साथ साथ, UAPA, यूएपीए कानून की धारा 13/14/15/16/17/18 का उल्लेख है। 

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A 'धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा, आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और सद्भाव बिगाड़ने' के मामले में लगाई जाती है। इसमें 3 साल तक के कारावास, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है। इस धारा का संबंध किसी भी फंडिंग से नहीं है। 
अब आते हैं, UAPA की धाराओं पर। 
० धारा 13. गैरकानूनी गतिविधियों के लिए सजा.  
(1) जो कोई भी- (ए) किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में भाग लेता है या करता है, या (बी) उसे करने के लिए उकसाता है, सलाह देता है या उकसाता है, उसे सात साल तक की अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा, और साथ ही उसे दंडित भी किया जाएगा।  जुर्माने का भागी होगा.

० धारा 14.
अपराधों का शमन 
राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त एक अधिकारी, इस संबंध में राज्य सरकार के किसी भी सामान्य या विशेष आदेश के अधीन, इस अधिनियम के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का शमन, संस्था के पहले या बाद में कर सकता है।  अभियोजन पक्ष के, अहसास पर...

० UAPA एक्ट धारा 15 
यूएपीए की धारा 15 "आतंकवादी कृत्य" को परिभाषित करती है और इसमें कम से कम पांच साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।  यदि आतंकवादी कृत्य के परिणामस्वरूप मृत्यु हो जाती है, तो सजा मृत्यु या आजीवन कारावास है।

० धारा 16: आतंकवादी कृत्य के लिए सज़ा 
जो कोई भी धारा 15 में उल्लिखित किसी भी आतंकवादी कृत्य को अंजाम देता है उसे सजा मिल सकती है - 5 साल से लेकर आजीवन कारावास, जुर्माना या दोनों।

० धारा 17. 
यह धारा धन की फंडिंग से जुड़ा है। 
जो कोई भी आतंकवादी कृत्य करने के उद्देश्य से धन जुटाएगा, उसे कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि पांच साल से कम नहीं होगी, लेकिन जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

यहां यह सवाल उठता है कि, 
० यदि चीन से धन आया भी तो वह किस तरह से आया, वैध और आरबीआई के नियमों के अंतर्गत आया या किसी हवाला या आपराधिक चैनल के द्वारा आया है। 
० यदि धन आया भी है तो क्या वह धन मीडिया कंपनी के पास आया है या, उर्मिलेश, भाषा, अभिसार शर्मा, सोहेल हाशमी आदि पत्रकारों की जेब में आया है? 

यह भी सवाल उठता है कि,  मीडिया कंपनी के खिलाफ क्या कार्यवाही हुई। छापों की सूचना तो इन्हीं पत्रकारों के संदर्भ में आ रही है। यदि इस बात के सुबूत जांच एजेंसी के पास हैं कि, इन पत्रकारों ने चीन से धन लेकर उससे आतंकवादी गतिविधियां में अपना योगदान दिया है, तब तो बात अलग है पर केवल पत्रकारों को ही टारगेट करना, यह अनेक संदेहों को जन्म देता है। 

वर्तमान सरकार का रवैया, आजाद प्रेस के प्रति अक्सर शत्रुतापूर्ण दिखता रहा है। चाहे मणिपुर में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के खिलाफ दर्ज मुकदमे हों या अन्य जगहों पर पत्रकार उत्पीड़न के मामले हों। सोशल मीडिया के तेजी से हो रहे प्रसार के कारण, सरकार को भय है कि, जन संचार का यह सुलभ और सुगम माध्यम, आने वाले चुनावी साल और समय में, बीजेपी की असहजता को बढ़ा सकता है। 

अडानी समूह के खिलाफ शेल कंपनियों से मनी लांड्रिंग करके निवेश के आरोप हलफनामों के रूप में सुप्रीम कोर्ट में एक   याचिकाकर्ता अनामिका जायसवाल द्वार दायर किए गए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इसी अक्तूबर में उसकी सुनवाई नियत की है। पर क्या सरकार का यह दायित्व नहीं बनता है कि वह अडानी समूह के खिलाफ, मनी लांड्रिंग के आरोपों की जांच कराए। पर सरकार चुप है। 

यह भी एक विडंबनापूर्ण तथ्य है कि, जिस चीन से फंडिंग का आरोप है, उसी चीन का एक कनेक्शन अडानी समूह से भी है। इसका खुलासा भी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में आया है। अडानी समूह के प्रति तो आज तक किसी एजेंसी ने जांच करने की जहमत नहीं उठाई। 

सीपीआई-एम नेता सीताराम येचुरी के आधिकारिक आवास पर भी दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल द्वारा न्यूज़क्लिक से जुड़ी संस्थाओं पर चल रही कार्रवाई के तहत मंगलवार सुबह छापा मारा गया था, जिसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने कथित तौर पर चीनी फंडिंग प्राप्त करने के रूप में, एफआईआर में नामित किया गया है। 

छापे पर सीताराम येचुरी ने कहा, 
"पुलिस मेरे घर पर आई क्योंकि मेरे एक साथी का बेटा न्यूज़क्लिक के लिए काम करता है. वो मेरे साथ ही रहते हैं. पुलिस ने उससे पूछताछ की. उन्होंने उसका लैपटॉप और फोन जब्त कर लिया. वे क्या जांच कर रहे हैं, कोई नहीं जानता. अगर ये पत्रकारिता का गला घोंटने की कोशिश है तो देश को इसके पीछे का कारण जानना चाहिए।"

पत्रकारों पर छापा, जातीय जनगणना के बाद सामाजिक न्याय के मुद्दे को चर्चा में आने से रोकने का एक कुत्सित प्रयास है। यदि चीन से अवैध धन आया भी है तो, उसमे कोई पत्रकार या लेखक कैसे दोषी हो सकता है। कानून के उल्लंघन से अर्जित धन का दोष, मीडिया कंपनी का तो हो सकता है पर पत्रकारों का दोष हो, इस पर संशय है। ऐसा संशय जातीय जनगणना के बाद देश में हो रही सामाजिक न्याय के मुद्दे पर चर्चा के बाद, इस तरह के छापे की टाइमिंग के कारण उठ रहा है। क्योंकि जितने भी पत्रकार, इस छापे में निशाने पर है वे सरकार विरोधी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। बीजेपी और सरकार, जब से जातीय जनगणना की रिपोर्ट, बिहार सरकार ने जारी की है, तब से असहज है और इस रिपोर्ट को लेकर इंडिया गठबंधन उत्साहित है और बीजेपी भ्रम में है। 

भारत तेजी से और बड़ी संख्या में गिर रहा है  विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नीचे और वर्तमान में निचले 20 देशों में है।  जहां तक ​​प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल है, यह G20 देशों में सबसे निचले पायदान पर है।  2015 से नियमित रूप से सभी वैश्विक सूचकांकों, फ्रीडम हाउस, वी-डेम, इकोनॉमिस्ट इंडेक्स द्वारा डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग दर्ज की गई है। 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh


Sunday, 1 October 2023

नाचब त घूंघट का...!/ विजय शंकर सिंह

आरएसएस कभी हिंदू राष्ट्र की बात करता है तो कभी सबका डीएनए एक बताता है, तो कभी मुस्लिम विरोध की बात तो कभी सामाजिक समरसता की बात, यह सब कहते हुए वह, एक अजीब सी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात पर आ जाता है। पर कभी भूल कर भी, रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की बात नहीं करता है। 

संस्कृति हो या सभ्यता, इन सबका मूल, आर्थिक निर्भरता और उन्नति में है। दुनिया की सारी महान सभ्यताएं और संस्कृतियां, आर्थिक रूप से मजबूत भी रहीं है। कृषि, व्यापार, राज्य विस्तार, शिक्षा आदि के क्षेत्र में, उनकी उपलब्धियां आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। सभ्यता और संस्कृति कभी भावुकता भरे नारों से न तो उन्नति करती है और न ही इतिहास में अपना स्थान बना पाती है। 

आरएसएस कभी बीजेपी सरकार के दौरान होने वाले आर्थिक घोटालों, अनियमितता और आरोपों पर सवाल नहीं उठाता है। खुद को राजनीति से दूर रहने की बात, बार बार कहने वाला यह संगठन, आज तक यह तय नहीं कर पाया कि, उसे करना क्या है, और उसे कहना क्या है। 

राजनीति में न रहने की बात, बार बार कहते हुए भी संगठन मंत्री के रूप में, वह बीजेपी की कमान अपने हाथ में रखे रहता है। जैसे ही किसी चुनाव में उसे बीजेपी की हालत खराब दिखती है, तो, वह दल बल के साथ चुनाव में सक्रिय हो जाता है, और यह मंत्र भी वह जपता रहता है कि, उसका राजनीति से कोई लेनादेना नहीं है। 

आरएसएस यदि राजनीति में है और बीजेपी के पक्ष में खुल कर सक्रिय है, तो यह कोई आपत्तिजनक बात है भी नहीं। राजनीतिक सोच, दल, दृष्टिकोण आदि के चयन करने का अधिकार, देश के हर नागरिक को है। पर आपत्ति इस दोहरे स्टैंड पर है, झूठ और ओढ़े हुए आदर्श के लबादे पर है। 

जब देश गुलाम था, लोग देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे, राष्ट्रवाद की भावना लोगों में व्याप्त थी, तब यह कहां था? इसका तब स्टैंड क्या था ? गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष, आदि के बारे में इनके क्या खयालात थे? आज जब देश के लोगों को, रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं चाहिए तो, यह कभी  धर्म और सांप्रदायिकता का कार्ड खेलता है तो कभी आरक्षण के मुद्दे उठाकर, जातिवादी राजनीति का। 

राजनीति में आरएसएस जैसे संगठन को जरूर आना चाहिए और जब वे हैं ही राजनीतिक एजेंडे के साथ, तो खुल कर रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य सहित अन्य जनहित के मुद्दों पर, उनको अपना विचार रखना चाहिए। आरएसएस यदि जनहित और बीजेपी सरकार में व्याप्त आर्थिक अनियमितताओं पर बोलने लगेगा तो, इसका सकारात्मक परिणाम भी होगा। पर यह चुप्पी क्यों है, यह बात हैरांतलब है। 

आरएसएस को, 'साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं' की, शातिर मनोदशा से मुक्त होना चाहिए। अंत में, इसी से मिलती जुलती, हमारी तरफ की एक कहावत भी पढ़ लें, नाचब त घूंघट का...!

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh